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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 869 में से

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पृष्ठ 521

उन्नीसवाँ अध्याय ५०५
और मृत्यु को ही मारने लगते हैं। इससे उनके भय से ही सारा संसार भागने लगता है। मेरे कथामृतसार को प्राशन
करने से उनका अंतःकरण मेरी भक्ति में रंग जाता है। वे अत्यन्त उल्हास से मेरे गुण और चरित्र का गायन करते
हैं। मेरा नाम, मेरे पद, अद्वैत बोध से, नानाप्रकार के छंदों में, कीर्तनों में आनन्दपूर्वक गाते हैं और परमानन्द में
डोलते रहते हैं। बड़े समारोह में अत्यन्त प्रेमपूर्वक नामसंकीर्तन का गजर करते रहते हैं और नामघोष के साथ
तालियाँ बजाते हैं जिससे महापापों की होली जल जाती है। कीर्तन की ऐसी चाह उत्पन्न होने पर शास्त्रविधियुक्त
प्रायश्चित्तों का कहीं ठौर नहीं रह जाता, तीर्थ लाचार हो जाते हैं और जप-तप के संकट नष्ट हो जाते हैं। कीर्तन
का गजर सुनकर यमलोक का व्यापार रुक जाता है। उन्हें कोई काम न रहने के कारण वे खाली हाथ घूमते रहते
हैं। शमधर्म अपने अस्त्र छिपा कर रखता है। कीर्तन की चाह देखकर भगवान दौड़ा-दौड़ा आता है, वैकुण्ठ से
वह कूद कर आता है। इस प्रकार जो कीर्तन का नित्य निरन्तर गजर करता है, उसके अधीन मैं श्रीकृष्ण हो जाता
हूँ। कीर्तन का मुझे वास्तव में इतना सम्मोहन होता है। कीर्तन की ही तरह वह मेरे गरुड़ध्वज की पूजा भी बड़े
आदर से करता है। सुगन्धित पुष्पादिक सामग्री से देवता की पूजा करता है। इस प्रकार अत्यन्त निष्ठा से मेरी
पूजा कर मेरा स्तुतिस्तोत्र भी गाता रहता है। आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता।
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ २१ ॥
वह अपने इन्द्रियों की योजना पूजाविधान की ओर करता है; 'वाणी' हरिकीर्तन को अर्पण करता है;
'हृदय' मेरे ध्यान में मग्न रखता है और 'अष्टांग' नमस्कार की ओर लगाता है। इस प्रकार वह अंतर्बाह्य अपनी
इच्छा से मुझ पर ही समर्पित रहता है लेकिन मेरे भक्तों को देखते ही वह आनन्द में मेरे पास आना ही भूल जाता
है। मेरे भक्त बड़े भाग्य से ही मेरे घर आते हैं। उस दिन को दीपावली या दशहरा की तरह समझना चाहिये।
लड़की जिस प्रकार ससुराल से मायके आती है, उसी प्रकार यहाँ सारे तीर्थ दौड़ते हुए आते हैं। भक्तपूजा की
शोभा देखने के लिये सनकादिकों के भी झुण्ड आते हैं। नारद, प्रह्लाद आदि भक्तों की टोलियाँ दौड़ती हुई आती
हैं। उस स्थान पर असंख्य सिद्ध एकत्र होते हैं। बड़े-बड़े देवताओं की तो बाढ़ आ जाती है। महात्माओं के झुण्ड
इकट्ठा होते हैं और पितर दौड़ते-हाँफते चले आते हैं। वेदों का तो वहाँ प्रवेश ही नहीं हो पाता; विधि विधान
लजाकर पीछे मुड़ जाते हैं। इस प्रकार मेरे भक्त की पूजा के कौतुक से द्वार पर भीड़ उमड़ पड़ती है। बड़े उत्कर्ष
से मेरे भक्त की पूजा देखकर मैं कृष्ण भी मोहित हो जाता हूँ फिर औरों की क्या बात की जाय ? भक्तपूजा का
ऐसा माहात्म्य है। मेरी पूजा को भी पीछे छोड़कर जो मेरे भक्त की प्रेम से पूजा करता है तो उसे मुझ श्रीकृष्ण के
सकल लोकों के साथ सपरिवार पूजा करने का श्रेय प्राप्त होता है क्योंकि मेरी मूर्तियाँ अचेतन व्यक्ति तथा भक्त
मेरी चलती बोलती मूर्तियाँ हैं। उनकी यथाविधि पूजा करने से मुझ भगवान को संतोष प्राप्त होता है। जो मद्भाव
मेरे भक्त के प्रति रखते हैं वही भाव सारे भूतों के प्रति रखना चाहिये क्योंकि भूताकृति अलग होने पर भी सब में
आत्मास्थिति एक जैसी होती है। देह का केशवपन करने से वह विधवा हो जाती है लेकिन आत्मा विधवा नहीं
होती। दहकते अंगारे विभिन्न आकारों में दिखायी देते हैं लेकिन उनमें अग्नि एक ही होता है। उसी प्रकार सारे
प्राणि मत्स्वरूप ही हैं। दीवार पर बने हुए चित्रों में अनेक आकृतियाँ दिखायी देती हैं लेकिन जिस प्रकार उनमें
दीवार एक ही रहती है, उसी प्रकार मैं चिदात्मा समस्त प्राणिमात्र में भरा हुआ हूँ इसे निश्चित समझना चाहिये।
दूसरी बात यह है कि दूजेपन का अहंकार त्याग कर समस्त प्राणिमात्र में मेरी भावना रखना यही मेरी सबसे श्रेष्ठ