श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रिय संयमः।
तितिक्षा दुःखसम्मर्षो जिह्वोपस्थ जयोधृतिः ॥ ३६ ॥
विवेकयुक्त बुद्धि असार छोड़ कर सार को ही ग्रहण करती है। ऐसी बुद्धि मन की विभिन्न वृत्तियों को
सँभालते हुए, जिस पर नमक समुद्र से मिल जाता है उसी प्रकार सारी वृत्तियों के साथ परमात्मा से मिल जाती
है। समुद्र में नमक घुलते ही वह समुद्रस्वरूप हो जाता है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप से मिलकर बुद्धि भी
चैतन्यधन हो जाती है। इस प्रकार बुद्धि के शान्त स्वरूप होने का शम कहना चाहिये। लेकिन इससे पहले दम
करना आवश्यक है। शत्रु का दमन करना इस अर्थ में यहाँ 'दम' नहीं है, बल्कि इसका अर्थ इन्द्रियों के दमन से
है। उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। जिससे 'शम' को सहायता मिले ऐसे ढंग से इन्द्रियों को अपने वश में
रखना शास्त्रीय विधि के अतिरिक्त उन्हें किसी प्रकार का भोग नहीं देना, रातदिन वैराग्य से उन पर नियंत्रण
रखना इसी का नाम 'दम' है। अब 'तितिक्षा' का भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। कोई बड़ा सुख प्राप्त होने पर वह
उसका जिस उल्हास से