श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 523, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ५०७
मन भी निर्मल होता है और मन शुद्ध होते ही वह मेरे स्वरूप में अर्पण होने लगता है। नदियों में बाढ़ का पानी
मिलने से वे समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार मन निर्मल होते ही वह मेरे स्वरूप में आकर मिलता है। मेरे
स्वरूप में मन जब स्थिर होता है, उस समय आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी ये तीनों प्रकार समाप्त हो जाते हैं और चौथा
प्रकार 'भक्ति' उत्पन्न होती है। भक्ति ही मेरी पूँजी है। उसमें दूसरी, तीसरी या चौथी समझना साधकों का भ्रम है।
मेरी अनेक भक्तियाँ नहीं हैं। वही एक मेरी श्रेष्ठ भक्ति इस साधन से प्राप्त होती है; ब्रह्मदेव, शंकर, सनकादिक
आदि इसी भक्ति के कारण मेरे भक्त कहलाते हैं। अहंकार पूरी तरह नष्ट होने पर सारे प्राणि आत्मस्वरूप दिखायी
देने लगते हैं। उद्धव! मेरे स्वरूप की जो 'सहजास्थिति' है वही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। इस श्रेष्ठ भक्ति का यदि एक
अंश भी प्राप्त हो जाय तो आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी संज्ञान होकर विचरण करने लगते हैं। वे सच्चे साधक बन
कर अपना स्वार्थ साधते हैं। यही भक्ति आर्त के मन में परमार्थ के विषय में आर्तता उत्पन्न करती है। मन में
भगवत्प्राप्ति की तीव्र व्यथा उत्पन्न होना, यही परमार्थ की 'आर्तता' है। जो भगवान की प्राप्ति के लिए चट्टान पर
से कूदने में भी नहीं डरता और जलती आग में भी प्रवेश करना चाहता है उसको ही वास्तव में 'आर्त' कहते हैं।
आर्त की स्थिति ऐसी होती है; किन्तु जिज्ञासु ऐसे साहस का निवारण करता है। वह कहता है, मनुष्यदेह
ब्रह्मप्राप्ति का साधन है। आत्महत्या से उसका विनाश नहीं करना चाहिये। पूर्व के भक्तों ने किस प्रकार
भगवद्भक्ति सम्पादित की, वह रीति जानने के लिये जो जीवप्राण हो उस युक्ति पर चलता है उसका ही नाम है
'जिज्ञासु'। मुझे जानने की जो इच्छा है उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। वही मेरे स्वरूप को प्रकाशित करती है।
इसीलिये मैं उन्हें 'जिज्ञासु' कहता हूँ। परब्रह्म तक पहुँचने के लिये जिस युक्ति का प्रयोग होता है, उसी का नाम
है 'शुद्ध जिज्ञासा'। वेदशास्त्र के अर्थज्ञान सम्बन्ध से जो प्रयास किया जाता है उसे लौकिक जिज्ञासा कहते हैं।
उसी प्रकार प्रत्येक अर्थ में मुझे माँगना या मुझे ही खोजना, इसे 'शुद्ध अर्थार्थी' कहते हैं, यह ध्यान में रखो। अर्थ
की अर्थात् द्रव्य की इच्छा करनेवाले को जो अर्थार्थी कहते हैं वे उस शब्द का गलत अर्थ लगाते हैं। संसार में
अनेक अर्थ अथवा वस्तु दिखाई देती हैं, उनका विचार कर जो परमार्थ की ओर दृष्टि लगाता है, उसी को
'अर्थार्थी' कहते हैं। उसमें भी मेरी भक्ति प्रकाशित होती है। इस प्रकार आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इनमें मेरी
'सहजभक्ति' प्रकाशित होती है। भक्त अपनी कल्पना भ्रान्ति से मेरी भक्ति के चार प्रकार मानते हैं। लेकिन वह
गलत है। मेरी जो निजभक्ति है वह 'एकमेव' है। ऐसी मेरी निजभक्ति कैसे प्राप्त की जाती है, आत्मनिवेदन की
स्थिति कैसी होती है, उसे हे उद्धव! मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया है। जिन भक्तों के हाथ में मेरी इस भक्ति
का सार सचमुच आ जाता है, उनके सारे व्यापार मद्रूप हो जाते हैं। वह जिधर ध्यान देते हुए बैठ जाता है वह
दिशा मैं ही बन जाता हूँ। वह जिधर अपने कदम बढ़ाता है, वहाँ की धरती भी मैं ही बन जाता हूँ। वह भोजन
करने बैठता है तो मैं षडरस बन जाता हूँ और प्राशन करने के लिये जल भी मैं ही बन जाता हूँ। वह निजपदों से
चलने लगता है तो मैं निजबोध से सामने का दृश्य समुदाय नष्ट कर देता हूँ और शान्ति पहले से ही पाँवड़े
बिछाये पग-पग पर उसकी नजर उतारती जाती है। शम-दम हाथ जोड़े आज्ञाधारी सेवक की तरह हाथ जोड़े
खड़े रहते हैं। ऋद्धि-सिद्धि घर में दासी की तरह खटती रहती हैं और विवेक तो उसके घर के रोज के चाकर
की तरह काम करता रहता है। उसका बैठने का स्थान मैं ही बन जाता हूँ। वह शान्ति से सो सके इसलिये मैं ही
उसके लिये समाधि का बिस्तर तैयार कर देता हूँ। वह जिन शब्दों का उच्चार करता है उसमें निःशब्द ब्रह्म ही
शब्द रूप में प्रकट होता है। इसलिये सुनने वालों को भी उससे समाधान होता है। वह सहज ही कुछ बोलने
लगता है तो उस बोल के साथ मेरे गुणानुवाद प्रकट होते हैं। इसलिये उसकी बातें सुनते समय स्वाभाविक रूप