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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 869 में से

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पृष्ठ 528

५१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मालूम ही नहीं रहता क्योंकि देह प्रारब्ध के अधीन है यह वह जानता है, उसी प्रकार स्वर्ग के सुखोपभोग के
लिये वह पुण्य का भी संचय नहीं करता; क्योंकि जिस पुण्य से स्वर्गभोग प्राप्त होते हैं उसी पुण्य का क्षय होते
ही पुनः जन्म लेना पड़ता है; इसलिये पुण्य सम्पत्ति का क्षय होगा इसलिये मेरे भक्त संग्रह नहीं करते। इसी का
नाम है 'असंचय' अर्थात् संग्रह न करना। अब 'आस्तिक्य' का लक्षण यह है कि सर्वत्र सब जगह मेरा
ब्रह्मस्वरूप ही व्याप्त है, यह देखना। ब्रह्म का अभाव वह कहीं नहीं देखता। 'ब्रह्मचर्य' का अर्थ है कि आश्रम
के अनुसार शास्त्रों में जो आचार बताया गया है उसे निश्चयपूर्वक पालन करना। झूठ और अनुचित भाषण न
करने का ही अर्थ है, 'मौन'। नित्य वेदपठन, गायत्री स्मरण अथवा भगवान का नामस्मरण करना चाहिये (यह
भी मौन ही है) वृत्ति आत्मस्वरूप में, स्वधर्म में अथवा साधु की संगत में स्थिर होने का अर्थ है 'स्थिरता'। कोई
देह का वन्दन करे अथवा मारे लेकिन दोनों ही समय क्षमा एक जैसी। देह का भोग प्रारब्ध पर निर्भर है, वह
विचार कर वह सदा क्षमाशील रहता है। अभय को पहचानने का ढंग है कि जो-जो पराया दिखाई देता है, उसे
अपना ही समझना। आत्मा भी एक है और पंचमहाभूत भी एक ही है। यदि देखा जाय तो इसके सिवा कुछ भी
नहीं है। इसकी प्रतीति होते ही भय का महादुःख समाप्त हो जाता है। इसी का नाम है 'अभय'। दूजेपन की बात
ही समाप्त होने पर संसार में दवा के लायक भी भय नहीं मिलता। इस प्रकार अभय के आनन्द की पुष्टि
आत्मदृष्टि से हो जाती है। इन्हीं का नाम है बारह यम! उद्धव! इनका रहस्य तुम्हें बतलाया। अब जिसे 'नियम'
कहते हैं उसके नियम भी सुगम दृष्टि से बताता हूँ। सुनो।
शौचं जपस्तपो होमः श्रद्धाऽऽतिथ्यं मदर्चनम्।
तीर्थाटनं परार्थेहा तुष्टिराचार्यसेवनम्॥ ३४॥
'शौच' अर्थात् स्वच्छता का प्रकार ऐसा है। विचारों से अंतःकरण की शुद्धि करें और बाह्य शौच अर्थात्
शुद्धि वेदाज्ञा के अनुसार मृत्तिका और जल से करें। अब 'जप' का विचार सुनो। जिसे जैसा अधिकार प्राप्त हो
उसके अनुसार मंत्र का जप करें अथवा अलग से किये गुरु का नाम अथवा गुरु ने दिया हुआ मंत्र जपें।
'वेदघोष' ब्राह्मण का जप है और 'ओंकार' संन्यासी का जप है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन जातियों को
'द्विजन्मा' कहते हैं। उन्हें आगमोक्त मंत्र का जप करना चाहिये। नाममंत्र तो सभी के लिये लागू है। अब जिससे
अंतःकरण की शुद्धि होती है, वह तप का प्रमुख प्रकार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने धर्म का आदरपूर्वक
आचरण करना चाहिये। शरीर शोषण को 'तप' कहना मूर्खों का प्रयास है। हृदय में सत्त्वरूप श्रीहरि का चिन्तन
करना ही सबसे श्रेष्ठ तप है। अब 'होम' के बारे में सुनो। 'अग्नि' देवता का मुख है। इसके लिये पंचमहायज्ञ,
अग्निहोत्र आदि करना 'होम' कहलाता है। उद्धव! मेरे भजन की अत्यन्त चाह रखना अथवा धर्म के प्रति प्रेम
रखना इसी का नाम मूर्तिमंत 'श्रद्धा' है। समय पर अन्न अथवा धन न होने पर भी सत्कार से समाधान करता है,
दीन-दुखियों के चरणों का वन्दन कर मधुर भाषण से उन्हें सन्तुष्ट करता है। जो सचमुच ही दीन है उसे देखकर
उसे अत्यन्त नम्र होकर यथाशक्ति द्रव्य अर्पण करना, इसी का नाम 'आतिथ्य' है। अंतःकरण की सच्ची आकुलता
से, प्रेम से लोकसमाज के साथ बड़े समारोह से मुझ भगवान की विधिपूर्वक पूजा करना, अथवा ब्राह्मणों का
समुदाय एकत्र कर उनकी षोडशोपचार पूजा करने से मुझ श्रीहरि को सन्तोष प्राप्त होता है, क्योंकि ब्राह्मणों की
पूजा अत्यन्त पवित्र वस्तु है। उसी प्रकार अंतःकरण शुद्ध करने के लिये तीर्थयात्रा पर जाते रहना चाहिये।
तीर्थयात्रा में श्रद्धा रखने का ही नाम है 'तीर्थाटन'। पग-पग पर मेरे नाम की जय-जयकार तथा मेरा गुणानुवाद