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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 869 में से

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पृष्ठ 519

उन्नीसवाँ अध्याय ५०३
उठता है। नमक पानी में मिलने पर उसका स्वभाव ही नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञेय प्राप्त होने के बाद ज्ञान
का ज्ञातापन ही समाप्त हो जाता है। ज्ञेय की यथार्थ प्राप्ति होने के बाद, स्वरूप में केवल चिन्मात्रता ही रह जाती
है, फिर व्याप्य-व्यापक अथवा साधक-बाधक जैसी बात नहीं रह जाती। सूर्योदय होने के बाद जिस प्रकार
चन्द्रमा नक्षत्रों के साथ लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय की प्राप्ति के आगे सारे संसार के साथ ज्ञानसम्पत्ति का
भी लोप हो जाता है। इस प्रकार का साङ्ग अपरोक्ष ज्ञान जब तक नहीं हो जाता तब तक वह प्रपंच के स्वरूप
और संसार को आत्मा से भिन्न समझता है और केवल ब्रह्मज्ञान की बकवास करता है। ऐसा जो शाब्दिक ब्रह्मज्ञान
है वह भी त्रिगुणात्मक ही रहता है और परब्रह्म तो निराकार और निर्गुण है, उसे न जन्म है न मरण। जितना भी
कुछ त्रिगुणात्मक है वह सब नाशवान है। इसी विषय पर नाशवान और साकार का निरूपण अब श्रीकृष्ण स्वयं
कर रहे हैं।
एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत्।
स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद् भावानां त्रिगुणात्मनाम्॥ १५॥
यदि नाशवान न होता तो सगुण को सत्य ही मानते। यहाँ तीन गुण हैं जिन्हें उत्पत्ति, स्थिति और लय है।
रजोगुण से उत्पत्ति, सत्त्वगुण से स्थिति और तमोगुण से अन्त में नाश होता है। यह गुणों की वृत्ति का स्वभाव ही
है। इन गुणों में परब्रह्म रहता ही है; उसी के योग से कार्य प्रकाशित होता है; लेकिन वह वस्तु जन्ममरणादि दोषों
से अलिप्त रहती है और अविनाशी ही रहती है जो वस्तु तीनों गुणों पर आश्रित नहीं होती, जिसके योग से ही
गुणों के कर्म चलते हैं, वह तीन गुणों से बिल्कुल अलग है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात् सृज्यं यदन्वियात्।
पुनस्तत्प्रतिसंक्रामे यच्छिष्येत तदेव सत्॥१६॥
गुणों के पूर्व, मध्य और अन्त में, उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय के समय जो अविनाशी
रूप से विद्यमान रहता है, वही 'संत' अर्थात् शाश्वत है ऐसा मैं समझता हूँ। वह 'संततत्त्व' ऐसा है जिसके
आधार पर संसार टिका हुआ है और जो संसार में अंतर्बाह्य भरा हुआ है और जिसके कारण संसार प्रकाशित होता
है। यह संसार ही है जो उत्पन्न होता है और इसका लय होता है; लेकिन वह तत्त्व कायम ही रहता है। ऐसी जो
आत्मवस्तु है, वही सच है, यह तुम जान लो। जिस प्रकार घट और मठ होते हैं और चले जाते हैं, लेकिन
आकाश वैसे ही रहता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और लय होने पर भी परब्रह्म उसी अवस्था में एकत्र
रहता है। अलंकार बनाने से पूर्व का सुवर्ण, अलंकार तैयार होने पर भी सुवर्ण के ही रूप में रहता है अथवा
अलंकार टूटने पर भी सुवर्ण ही रहता है। उसी प्रकार चराचर को व्यापने वाला परब्रह्म अखण्ड ही रहता है।
कैसा भी आकार या विकास हो लेकिन इससे परब्रह्म को कोई विकार नहीं होता। इस प्रकार अखण्ड रहने वाली
जो परब्रह्म रूप वस्तु है, उसके चार प्रमाण हैं। उनके आधार पर उस वस्तु को जानें और प्रपंच को मिथ्या समझें।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्।
प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥ १७॥
यत्र-तत्र-सर्वत्र एक अद्वैत परब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं है। उस परब्रह्म में यह प्रपंच मिथ्या आभास ही
है। इसका प्रमाण वेदों में भी है। देह की क्षणभंगुरता हम साक्षात देखते ही हैं। यही प्रपंच की अधिकता का
दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण है। मार्कण्डेय और भुशुंडी ने कोटि-कोटि कल्पांत के समय प्रपंच को शख होते अपनी