श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूजा है और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार जो मेरी पूजा करता है वह मेरा अत्यन्त चहेता होता है, मैं
सर्वांग से उसके घर में काम करता हूँ क्योंकि उसका मुझ पर स्वामित्व रहता है। उसकी प्रत्येक कृति मेरा भजन
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥२२॥
लौकिक कर्म हो अथवा अन्य कोई भी शरीर कर्म हो उस कर्म द्वारा मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। उद्धव! मेरे
भजन का स्वरूप बड़ा निराला है। वह भक्त बाहर चबूतरे पर बैठकर गपसड़ाका भी करे लेकिन उसमें मेरा
कीर्तन उत्पन्न होता है। उसकी रसाल वाणी मेरे गुण के गायन की गर्जना करती है। वह जो स्वधर्म कर्म क्रिया
करता है, वह भी मुझे ही अर्पण करता है। मेरे सिवा अन्य कुछ भी करना उसकी समझ में नहीं आता है। उसके
सारे इन्द्रियों के कर्म में मेरी भक्ति अपने आप उत्पन्न होती है। मेरे नाम के सिवा अथवा मेरे गुणानुवाद के सिवा
उसकी वाणी को और कुछ भी मालूम नहीं होता। उसे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब वह मुझे ही अर्पण
करता है और अन्त में वह अपना मन भी मुझे अर्पण करता है। अब मन किस प्रकार मेरे स्वरूप में अर्पण होता
है, इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तपः॥२३॥
मैं जो परमात्मा हूँ, वही सच्चा स्वार्थ है, ऐसा निश्चय कर, अपना परमार्थ साधने के लिये लोग धन-धान्य
आदि सर्वस्व खर्च करते हैं। परमार्थ पूरी तरह साधने के लिये मन में सच्चा वैराग्य होना आवश्यक होता है
इसलिये मुझ श्रीकृष्ण से मिलने के लिये वे सारे सुखोपभोग का त्याग करते हैं। छत्र, चामर, हाथी, घोड़े आदि
सारा वैभव छोड़कर रंक बन जाते हैं। मुझ तक यदि पहुँचना है तो प्रखर वैराग्य चाहिये। मेरा निजसुख प्राप्त
करने के लिये पत्नी, बच्चे, धनधान्य आदि का झट त्याग कर देते हैं। उन्हें इतना अधिक अनुताप होता है। चाह
कर मेरा भजन करने से वे भोग को भूलने लगते हैं। सच्चा भक्त मेरी प्राप्ति के लिये एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने
देता। मुझे प्राप्त करने के उद्देश्य से ही श्रौत स्मार्त कर्म करता है। अग्निहोत्र, यज्ञयाग, बड़े-बड़े व्रत वह मेरे लिये
करता रहता है। मेरा चिद्रूप प्राप्त करने के लिये गायत्री आदि मंत्रों का जाप करता है। दुर्धर तप भी मत्स्वरूप की
प्राप्ति के लिये करते हैं। मैं विश्वंभर सर्वव्यापी और सर्वतोमुखी होने के कारण वह गरीबों को अन्नदान करता है,
उससे मैं सुखी होता हूँ। हृदय में मैं स्वतः सिद्ध ही रहता हूँ, मेरा आवाहन कर वह भोजन करता है और वह भी
मुझे ही अर्पण करता है। प्रत्येक ग्रास के साथ हरि का स्मरण करने से वह अन्न पूर्ण ब्रह्म हो जाता है। इस प्रकार
मेरे भक्त स्वयं ही अपने सारे कर्म मुझे अर्पण करते हैं। इस प्रकार जो सदासर्वदा अपने सारे कर्म कृष्णार्पण करता
है, उसका मन भी मुझे ही अर्पण होता है। उसी का निरूपण भगवान करते हैं।
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।
मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥२४॥
लोहे को तैयार कर, उस पर उत्तम मुलम्मा लगाया जाय तो उसका दर्पण बन जाता है। उसी प्रकार सारे
कर्म मुझे अर्पण करने से मन भी शुद्ध हो जाता है। सोने को जितना तपाया जाय उतना उसका तेज बढ़ता है;
वस्त्र जितना अधिक धोया जाता है उतना अधिक वह स्वच्छ होता है। उसी प्रकार सारे कर्म मुझे अर्पण करने से