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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 869 में से

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पृष्ठ 518

५०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया तो वह युद्ध के लिये तैयार हो गया। सारांश दैवयोग से कौरव पाण्डवों के युद्ध में दुर्योधनादि बैरी परिवार
सहित मारे गये। युद्ध समाप्त हो जाने के बाद धर्मराज राजसिंहासन पर बैठा, तब उसके अंतःकरण में विचार
उठा कि "पृथ्वी पर महापातकी एक मैं ही हूँ।" मैंने उसे राज्य पर बिठाया तो वह बोला, मैंने अनेक ब्राह्मण
गुरुओं को मारा, कर्ण दुःशासन को मैंने मारा, और राजा दुर्योधन भी मेरे हाथों मारा गया। यहाँ वास्तव में
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकर्त्ता एक ईश्वर ही होते हुए, धर्मराज इन सबका 'कर्त्ता मैं हूँ' ऐसे कहने लगा।
देहाभिमान के कारण वह अत्यन्त पश्चात्ताप से स्वयं को अपने ही कुलगोत्र का विनाश करने वाला महापातकी
कहने लगा। तब उसका समाधान करने के लिये मैं भीष्मनिर्वाह का मौका पाकर उसे उनके पास ले गया और
उससे प्रश्न पुछवाये धर्म ने किये हुए प्रश्न अब सुनो। उसने 'राजधर्म' पूछा; 'दानधर्म' पूछा; आपद्धर्म पूछा और
मुख्य रूप से सबसे उत्तम 'मोक्ष धर्म' भी पूछा। वही अब सुनो।
तानहं तेऽभिधास्यामि देवव्रतमुखाच्छ्रुतान्।
ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान्॥ १३॥
भीष्म के मुख से निकले वे अति उत्तम मोक्षधर्म मैंने श्रवण किये। उनके योग से संसार का भ्रम दूर होता
है और सारा कर्म दग्ध हो जाता है। ज्ञान, विज्ञान, श्रद्धा, भक्ति, अनित्य की नश्वरता तथा वैराग्यस्थिति आदि के
सम्बन्ध में भीष्म ने धर्म को बताया। वही मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ। भीष्म को 'देवव्रत' कहते हैं। इसका
कारण वह भगवान पर चित्त रखकर, निश्चयपूर्वक आत्मानुसंधान धारण कर, स्वस्थ अंतःकरण से शरपंजर पर
लेटा हुआ था। उसने मोक्षधर्म बतलाया। उसमें मुख्य रूप से प्रथम 'ज्ञान' बतलाया। वही उत्तम ज्ञान पुरुषोत्तम
सुना रहे हैं, श्रवण करें।
नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।
ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४॥
प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, पंचतन्मात्रा अर्थात् पाँच सूक्ष्म भूत और अहंकार आदि मिलाकर तत्त्वों की संख्या
नौ है। कुछ लोगों के अनुसार वह 'ग्यारह' है, अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन और पाँच
अर्थात् पंचमहाभूत होते हैं और 'तीन' अर्थात् सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते हैं। इन सब तत्त्वों की संख्या
मिलाने पर 'अट्ठाईस' होती है। ये सारे तत्त्व सभी प्राणिमात्र में समसमान भाव से विचरण करते रहते हैं। ब्रह्मदेव
से लेकर स्थावर तक में ये सारे तत्त्व समान रूप में भरे हुए हैं। उसी प्रकार इनमें 'जीवचैतन्य' भी समसमान रूप
में ही प्रतिबिम्बित हुआ है और यही सबका नाम, रूप और अभिमान प्रकाशित करता है। जलाशय में, कुएँ में
अथवा समुद्र में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब एक जैसा ही होता है, उसी प्रकार ब्रह्मदेव से लेकर मक्खी तक सबके
शरीर में जीव भी एक समान ही होता है। प्राणिमात्र में चैतन्य समसमान होने के कारण सबका आत्मा एक है यह
समझना यही 'शुद्ध ज्ञान' है और मेरा भी यही मत है। अब विज्ञान का भी लक्षण तुम्हें बताता हूँ। इसे श्रीकृष्ण
आधे श्लोक में वर्णन कर रहे हैं। पहले से ही देखते रहने के अनुसार व्यापक परब्रह्म से देहादिक सारे तत्त्व भरे
हुए हैं यह वह निश्चित रूप से देखता है। जिस प्रकार घटादिकों में आकाश ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार सारे
संसार में चिदाभास ही व्याप्त है। ऐसा शुद्ध ज्ञान ज्ञेयप्राप्ति का कारण होता है और ज्ञेय प्राप्त होते ही वह ज्ञान
वृत्ति के साथ लुप्त हो जाता है। (यही विज्ञान है) वह केवल ज्ञान से ही जाना जाता है इसलिये उसे 'ज्ञेय' कहते
हैं। और ज्ञेय प्राप्त होते ही जिस प्रकार सूर्य के तेज से जुगनू शरमा जाता है उसी प्रकार वह ज्ञान भी लज्जित हो