श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
अठारहवाँ अध्याय ४८१
मैंने तुम्हें बताया। इसी के योग से सच्चा संन्यास प्राप्त होता है। ये तीनों दण्ड न हों तो केवल बाँस का दण्ड लेने
से संन्यास प्राप्त नहीं होता। केवल दंभ के लिये संन्यास लेना शुद्ध देह की विडम्बना है। अब संन्यासी का
स्वधर्मयुक्त आहार विहार, आचार-विचार, आना-जाना आदि कैसा हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्हान् वर्जयंश्चरेत्।
सप्तागारान्संकॢप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता ॥ १८ ॥
पहले संन्यासियों को चारों वर्णों में भिक्षा थी। लेकिन कलियुग में ब्राह्मणों में ही चार वर्ण हो गये। जिस
वृत्ति के योग से ब्राह्मण का उदरनिर्वाह होता है, वही उस ब्राह्मण का वर्ण होता है। इसलिये उसे भी सुनो।
जीविका के प्रकार बताता हूँ। ब्राह्मण की उपजीविका की मुख्य वृत्ति है शिल उंछ अथवा कोरात्र; उसी प्रकार
अयाचित, अध्यापन अथवा याजन ये भी उपजीविका के साधन हैं। जो उपजीविका के लिये हाथ में शस्त्र लेकर
शूरवृत्ति से अपना निर्वाह करता है उसे ब्राह्मणों में 'क्षत्रिय' समझा जाय। जो नित्य वणिक का व्यवसाय कर
अपनी उपजीविका चलाता है वह सचमुच ब्राह्मणों में वैश्य है और जो शूद्र की वृत्ति पर ही सदा अपनी
उपजीविका कमाता है वह अपने कर्म के कारण शूद्र है। जब 'उत्तम' ब्राह्मण से भिक्षा नहीं मिलती तब क्षत्रिय
वृत्ति से रहने वाले ब्राह्मण से भिक्षा लेनी चाहिये। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों ब्राह्मणों में भिक्षा न
मिलती हो तो शूद्रवृत्ति पर निर्वाह करने वाले ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने का अधिकार है। उन ब्राह्मणों में भी जो
निंद्य हों, अपराधी या बहिष्कृत हों तो उनकी भिक्षा को हाथ नहीं लगाना चाहिये। यही भिक्षा का धर्म है। भिक्षा
लेनी है उसे नियमपूर्वक लें। किसी को पता न लगने दे कि मैं भिक्षा लेने आ रहा हूँ। गिन कर सात घर से ही
भिक्षा लेनी चाहिये और उसमें जो मिले उसमें सन्तुष्ट रहना चाहिये। अब सात घरों में जो भिक्षा मिलेगी, उस
भिक्षा का स्मृतिशास्त्र में विहित धर्म क्या है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।
विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम् ॥ १९॥
मिली हुई भिक्षा हाथ में लेकर गाँव के बाहर नदी के तट पर अथवा सरोवर के किनारे जाएँ और आचमन
करें। भिक्षा माँग कर लाये हुए अन्न का बारह प्रणव मंत्रों से अभिमंत्रण करें। मंत्रोदक से प्रोक्षण करने पर वह
अन्न पवित्र होता है। फिर उस अन्न के चार भाग करें। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और जीवमल इस प्रकार उसके चार
अधिकारी हुए। उन्हें वह कैसे अर्पण किया जाय, सुनो। विष्णु प्रीत्यर्थ जो भाग निकाला हो उसे पानी में डालें
और जीवों के लिये जो भाग निकाला हो उसे ठीक ढंग से जमीन पर रखना चाहिये। जो दो भाग रह गये उसे
सेवन करने का संन्यासी को अधिकार है। या अगर उतने में कोई गरीब माँगने आ जाय तो भूतदया की दृष्टि से
उसे तत्काल अन्न देना चाहिये। लेकिन मैं एक अन्नदाता हूँ ऐसी वृत्ति मन में नहीं उठने देनी चाहिये। दाता का
अभिमान होते ही वह संन्यासव्रत में अधर्म ही समझना चाहिये। कोई गरीब रोज ही अन्न माँगने आता है इसलिये
उसके लिये मधुकरी में अधिक अन्न नहीं माँगना चाहिये। मधुकरी का अन्न भक्षण करते समय यदि अन्न बच
जाए तो उसे फेंकने में दोष लगता है। इसलिये उसका पूरा भक्षण करना चाहिये। लेकिन संन्यासधर्म में सदा लघु
आहार ही करना चाहिये। अधिक भोजन करने से अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। निद्रा और आलस्य का
अत्यधिक कष्ट होता है। अब जिसके लिये संन्यासधर्म ग्रहण किया जाता है, वह संन्यासी का मुख्य धर्म है
जिससे आत्मपद की प्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
४८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः।
आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः ॥ २०॥
सदासर्वदा शरीर में परिपूर्ण वैराग्य, वह किसी मित्र या सखा की इच्छा नहीं करता। मन से निःसंग होकर
पृथ्वी पर आनन्दपूर्वक विचरण करता रहता है। इन्द्रियों को चित्त के पग से बाँध कर चित्त को चैतन्य में स्थिर
करता है। इससे उसे सर्वत्र चिन्मय स्वरूप ही दिखायी देने लगता है। देह में देहत्व का स्मरण नहीं होता।
आत्मस्थिति का उद्यम ऐसा ही होता है, इससे उसे आत्मक्रीड़ा में ही आराम मिलता है। अब आत्मसुख का
उत्साह और श्रेष्ठ अनुभव कैसा होता है, उसे सुनो। आत्मस्थिति से निजात्मयुक्त होने के कारण वह आत्मानंद में
ही निमग्न रहता है तथा सर्वत्र ऐक्यभाव से डोलते रहकर वह समरस से भर जाता है। ऐसे समत्वसुख का लाभ
मिल सके इसलिये वह सदा एकान्त में ही अकेला रहता है। यही बात श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाश्यः।
आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः॥ २१॥
पवित्र और निर्जन, विस्तृत तथा एकान्त स्थान देखकर वह सद्भक्ति से सदासर्वदा मेरा ध्यान करे। ऐसे
साधक को संसार दुःख में लीन हुए लोगों का साथ छोड़ कर निरन्तर एकान्त में ही रममाण होकर रहना चाहिये
क्योंकि मद्भावयुक्त रहने से साधकों को आत्मसुख की प्राप्ति होती है और जिसे आत्मसुख की प्राप्ति हुई वह
अनन्यभाव से मेरी शरण में आता है। उसे इस संसार में मेरे सिवा अन्य किसी बात में अर्थ ही नहीं दिखायी
देता। इस प्रकार मेरा अनन्य ध्यान करने से साधक 'मैं' और 'तू' का दूजापन भूल जाता है। भेदभाव नष्ट हो
जाने के कारण वह चैतन्यधन मत्स्वरूप होकर ही रहता है। मेरे उस स्वरूप की ऐसी स्थिति रहती है कि
आत्मदृष्टि से देखने पर 'न मैं हूँ', 'न वह है' ऐसी स्थिति हो जाती है। इसी स्थिति को अभेद प्राप्ति कहते हैं।
जब तक द्वैतभावना रहती है, तब तक साधक को संसारमय की बाधा रहती है। एक बार अभेद भावना प्राप्त होने
पर साधक निर्भय हो जाता है क्योंकि अभेद भावना जहाँ रहती है वहाँ बन्ध और मोक्ष की बात ही नहीं रह
जाती। अब जहाँ बन्ध और मोक्ष की गर्जना चलती रहती है उसके बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।
बंध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः ॥ २२॥
ऐक्यस्वरूप पर पहुँच कर एकात्मा प्राप्त होने के बाद बंध मोक्ष की ओर देखने पर वे दोनों मायिक और
मिथ्या लगने लगते हैं। बन्ध और मोक्ष ये दोनों मनुष्य की प्रवृत्ति में ही होते हैं। इन दोनों में भेद यही है कि
इन्द्रियों की विषयासक्ति का नाम 'दृढ़बन्धन' है और हे उद्धव ! काया, वाचा तथा मन से विषयों की शुद्ध विरक्ति
यही वास्तव में मुक्ति है। इसीलिये जिसे सचमुच ही मुक्ति की इच्छा है उसे विषयों की निवृत्ति करनी चाहिये।
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण मुख्य रूप से इसी का उपाय बता रहे हैं।
तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः।
विरक्तः क्षुल्लकामभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत् ॥ २३॥
इस दृष्टि से विचार करें तो जिस विषयासक्ति से दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता है; उन विषयों का ही यदि त्याग
करें तो 'मुक्ति' सहज सिद्ध है। लेकिन वह विरक्ति हमें कैसे प्राप्त हो ? इसके लिये साधक को ऐसा प्रयत्न
अट्ठारहवाँ अध्याय ४८३
करना चाहिये जिससे वैराग्य उत्पन्न हो। अंतःकरण में वासना दृढ़मूल रहती है; उसमें विषयरूप शाखायें फूटती हैं
जो काफी संख्या में बढ़ती है, इसलिये उस वासना को ही समूल नष्ट करने के लिये कठोर वैराग्य की साधना
करनी चाहिये। स्वधर्म कर्म करके वह मुझे अर्पण करना चाहिये, यही वैराग्य प्राप्ति का मुख्य साधन है। कर्म
करके उसका कर्त्तापन छोड़ देना इसी का नाम मदर्पण है। मदर्पण बुद्धि से कर्म करने पर मुझसे प्रेम उत्पन्न होता
है। चित्त में मेरा ही नाम, मेरी ही कीर्ति और मेरा ही चिन्तन होने लगता है। इस प्रकार मेरे प्रति प्रेम का उदय
होने पर वैराग्य उत्पन्न होता है और इस प्रकार विषयों से विरक्ति होकर धीरे-धीरे मेरे सुख की प्राप्ति होती है।
मेरे सुख के कारण मेरा भजन बढ़ने लगता है और सर्वत्र मेरी ब्रह्मत्व से पूर्ण भावना अंकित होती है। इसलिये
सर्वत्र एक ब्रह्म ही भरा हुआ है ऐसी भावना धारण कर, ब्रह्मसुख पर दृष्टि रखकर जब तक मन वानसारहित न
हो जाय तब तक पर्यटन करते रहना चाहिये।
पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत्।
पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४॥
अच्छे-अच्छे पुण्यक्षेत्रों में जाकर पृथ्वी पर्यटन करना चाहिये। पवित्र कुरुक्षेत्र, अत्यन्त पवित्र सात पुरी
(अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, जगन्नाथपुरी तथा द्वारका) पुष्कर, प्रयागराज आदि तीर्थ,
कृतमाला, पयस्विनी, पुण्यस्वरूप ताम्रपर्णी, गोदावरी, नर्मदा, त्रिवेणी, परमपवित्र गोमती; कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा,
तापी, पयोष्णी, चंद्रभागा, यमुना, भागीरथी, नीरा अथवा गंगा समुद्र से जहाँ मिलती है, वह संगम। ऋष्यमूक,
श्रीशैल, व्यंकटाद्रि (व्यंकटगिरी) मूलपीठ का सह्याद्रि अथवा गौतमी के तट का ब्रह्मगिरी आदि की यात्रा करने
से सारे पातकों का संहार होता है। इसलिये मुनिश्रेष्ठों को वह यात्रा अवश्य करनी चाहिये। दण्डकारण्य नाम का
बड़ा अरण्य, नैमिषारण्य, आनन्दवन (काशी के निकट) आदि वनों में संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये।
च्यवन, कपिल तथा न्यास के आश्रम, गौतम और वामन के उत्तम आश्रम, उसी प्रकार सारे श्रम का परिहार करने
वाली बदरिकाश्रम की यात्रा, ऐसे जो पवित्र स्थल हैं वहाँ संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये। अब मार्ग में भिक्षा
के लिये कहाँ जायें इसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। जहाँ उत्तम से उत्तम बाजार और रास्ते होते हैं, उसे ज्ञानी
लोग 'पुर' अथवा शहर कहते हैं। जिस गाँव में बड़ी-बड़ी सड़कें और बाजार न हों उसे 'ग्राम' कहते हैं। वहाँ
जाकर भिक्षा का रोज का व्रत पूरा करना चाहिये। गौ तथा ग्वाले जहाँ रहते हैं उसे 'व्रज' अर्थात् 'ग्वालों का
बाड़ा' कहते हैं। उसी प्रकार 'साय' अर्थात् 'प्याऊ' जहाँ हो वहाँ अथवा यात्रिक जनसमूह में भिक्षा के लिये
घूमते रहना चाहिये। इसी बात का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।
संसिद्ध्येत्याश्वसम्मोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५॥
अंतःकरण शुद्ध करने के लिये वानप्रस्थाश्रम में जो पुरुष हो, उसके द्वार पर भिक्षा के लिये बड़े आदर के
साथ खड़े हो जाना चाहिये। सात्विक के अन्न का सेवन करने से साधक के शरीर में भी प्रत्येक ग्रास के साथ
शुद्ध सात्विकता उत्पन्न होती है। ऐसे शुद्ध अन्न की महिमा है। इसके लिये वानप्रस्थ का द्वार देखकर वहाँ बार-
बार जाना चाहिये। इससे साधकों की निरन्तर शुद्धि होती है। शुद्ध भिक्षा मिलने पर वृत्ति भी सत्त्वशुद्ध होती है
और इससे वासना भी निःशेष होकर आत्मशांति प्रकट होती है। निःशेष वासना समाप्त होने पर उसे सत्यत्व से
संसार दिखायी ही नहीं देता। फिर विषय वासना कहाँ रहेगी ? उस समय अर्थात् ही वैराग्य उत्पन्न होता है।
४८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नैतद्वस्तुतया पश्येद्दृश्यमानं विनश्यति।
असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात् ॥ २६ ॥
इस लोक में जो भी कुछ दिखायी देता है, उसका नाश होता है यह सबको दिखाई देता है लेकिन विषय
के वश में रह कर तथा उसमें लिप्त होकर लोग कैसे छलावे में पड़े रहते हैं। इसके लिये शुद्ध भिक्षा की प्राप्ति
से जिसकी वृत्ति शुद्ध सत्त्वात्मक हो गयी है उसे सत्यत्त्व के कारण विषय दिखायी ही नहीं देते, फिर विषयासक्ति
कैसे होगी? इस प्रकार विषय का मिथ्या होने का जिसे भान होता है, उसका मन विषयासक्त नहीं होता। इसलिये
संसार के अथवा स्वर्ग के साधनों को वह स्पर्श ही नहीं करता। इस प्रकार जो विषय से विरक्त रहता है, उसी का
चित्त परमार्थ की ओर लगा रहता है और वह निजबोध से परमार्थयुक्त होकर संसार में अनासक्त होकर विचरण
करता रहता है। उसके निजबोध का लक्षण अथवा प्रपंच का मिथ्यापन तथा आत्मस्वरूप से आने वाले समाधान
के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक् प्राणसंहतम्।
सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ २७॥
मन, वाणी और प्राण इनके प्रवाह में अहंकार ने उत्पन्न किये हुए देह तथा अन्य संसार आत्मा को मिथ्या
और मायावी है ऐसा ही भास होता है। रस्सी में सर्प का भास सीप में चाँदी का आभास तथा धूप में मृगजल का
जिस प्रकार भास होता है, उसी प्रकार चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप में संसार का भास होता है। स्वप्न की बातें जिस
प्रकार मालूम होती है वैसा ही यह चराचर दिखायी देता है और इस प्रकार यह सारा मिथ्या है ऐसा विश्वास होने
पर स्मरण के सम्बन्ध में कोई आदर नहीं रह जाता। जो अच्छी तरह जग जाता है उसका मन स्वप्न के सुख की
इच्छा नहीं करता; उसी प्रकार स्वस्वरूप में जिसका मन स्थिर हो जाता है वह किसी भी प्रपंच की वस्तु का
स्मरण नहीं करता। इस प्रकार 'त्रिदंडी' और 'बहूदक' यह संन्यासियों का कर्म तुम्हें सुगम करके बतलाया। अब
'हंस' और 'परमहंस' के धर्म भी तुम्हें क्रमानुसार बताता हूँ। संन्यास भी चार प्रकार का है यह ध्यान में रखो।
एक 'हंस' और दूसरा 'परमहंस', तीसरा 'बहूदक' तथा चौथा जो पहले से भिन्न है, वह 'कुटीचक' कहलाता
है। कर्म का त्याग कर जो संन्यासी बना लेकिन मन में न ध्यान है, न ज्ञान है और अन्न के लिये अपने गाँव में ही
रहता है, उसे 'कुटीचक' कहते हैं। कुटीचक में संन्यासी वार्धक्य में 'अग्निहोत्र' और स्त्री का त्याग करता है
किन्तु शिखासूत्र नहीं त्यागता इसलिये उसे गायत्री मंत्र का अधिकार रहता है। नित्य पुत्र के ही घर भिक्षा लेता है,
उसके ही घर में पर्णकुटी बाँधता है और मठी छोड़कर दूर कहीं नहीं जाता इसलिये उसका नाम 'कटीचक' है।
शिखासूत्र का त्याग कर, त्रिदण्डी ग्रहण कर, केवल कर्माचरण करता है; लेकिन ज्ञान बिलकुल नहीं होता। न
निस्सीम वैराग्य रहता है; ज्ञान पर निष्ठा भी अच्छी नहीं रहती लेकिन वह अत्यन्त कर्मठ रहता है। वही
'बहूदकां' में श्रेष्ठ माना जाता है और वैराग्य के निश्चय से ज्ञानसाधना का विचार करने वाला; शिखासूत्र तथा
कर्म का त्याग कर आत्मचिन्तन पर ही जिसकी श्रद्धा रहती है उसे 'विविदर्श' संन्यास कहते हैं और जो इस
प्रकार दृढ़ निष्ठा से आचरण करता है, उसे 'हंस' कहते हैं। कुछ लोग इन्हें 'परमहंस' भी कहते हैं। अब
'परमहंस' का लक्षण सुनो। वह ज्ञाननिष्ठा से परिपूर्ण रहता है इसलिये उसके द्वार. पर 'शान्ति' भी चाकरी करती
है। वह तीनों गुणों को मिथ्या मानता है। कर्म की बात वह मिथ्या ही मानता है और वह स्वयं निष्कर्म ही है यह
वह जानता है। उसी प्रकार कर्म, क्रिया और कर्त्तव्यता यह प्रारब्ध के अनुसार प्रकृति पर ही निर्भर है। ऐसी
अट्ठारहवाँ अध्याय ४८५
स्थिति में जो समाधान में रहता है उसे 'परमहंस' कहते हैं। उसे मठ, मठी आदि की आवश्यकता नहीं होती।
वह नित्य उदास तथा निराश्रय में रहता है। अब हे उद्धव! उस हंस-परमहंस के धर्म तथा उसके मर्म का सुगमता
से वर्णन करता हूँ, सुनो। इतना कह कर श्रीकृष्ण स्वयं कहने लगे।
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।
सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः ॥ २८ ॥
जिसे विषय की वार्ता भी अच्छी नहीं लगती, ज्ञानप्राप्ति के लिये जो उद्यत रहता है, ऐसे अत्यन्त विरक्त
को 'संन्यासी' कहते हैं। वह ज्ञाननिष्ठा से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, उसका सदा मन स्वरूप में लीन रहता है।
उसका आत्मस्वरूप का अनुसन्धान कभी नहीं टूटता। यह हंस भी परमहंस की ही तरह है। भगवद्भक्ति करते-
करते उसकी सारी इच्छाओं की शान्ति हो जाती है। उसके मन में मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती। वही संन्यास
पद्धति सबसे उत्तम है। जो ज्ञाननिष्ठ मेरे भक्त होंगे, उन्हें दंडादिक आश्रमधर्म का अंतःकरण से त्याग करना
चाहिये और केवल बाह्य चिह्न लोकशिक्षा के लिये रखने चाहिये। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण आगे करने
वाले हैं। फिलहाल त्याग के लक्षण सुनो, ऐसा श्रीहरि ने कहा। वह आश्रमधर्म, सभी करता है लेकिन विधि का
दास बनकर नहीं रहता। जल में प्रतिबिम्ब भले ही काँप रहा हो लेकिन बाहर का बिम्ब नहीं काँपता। उसके
अनुसार स्वधर्म कर्म कर्तव्यता का पालन वह करता है लेकिन उसकी कर्मठता नहीं स्वीकारता। अपने सभी कर्मों
में वह अपनी कर्मातीतता अच्छी तरह जानता है। इस प्रकार वह स्वधर्म कर्म करता है लेकिन विधि का भय मन
में नहीं रखता। विधिनिषेध को पैरों तले रौंद कर वह बिना किसी उद्देश्य के कर्म करता है। अपने आश्रमकर्म को
स्पर्श नहीं करता और दण्डादि चिह्न भी हाथ में नहीं रखता। ऐसे सर्वस्व त्याग का लक्षण श्रीकृष्ण आगे बताने
वाले हैं। केवल लोकाचार के लिये वह दण्डादि चिह्न हाथ में धारण करता है और अंतःकरण में निष्काम रहता
है। उसी का लक्षण श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।
वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत्॥ २९॥
उसमें शुद्ध विवेकज्ञान रहता है, लेकिन वह बालक की तरह व्यवहार करता है। देहाभिमान त्याग कर मान
अथवा अपमान जो भी प्राप्त हो उसे सुख के साथ सहन करता है। वह अपने नैष्कर्म्य में अत्यन्त प्रवीण रहता है;
लेकिन कर्मठ की तरह वह सारे कर्मों का आचरण करता है, कहीं किसी बात की कमी दीखने नहीं देता। धर्म का
और अधर्म का लक्षण वह अच्छी तरह जानता है, सभी बातों में वह ज्ञानसम्पन्न रहता है, लेकिन यदि कोई प्रश्न करे
तो उसका समाधान नहीं करता। किसी अज्ञानी की तरह वह कुछ तो बकता रहता है। प्रश्न का समाधान करने पर
कहीं लोग मेरा मान-सम्मान न करें, इसलिये जानबूझ कर मतवाले की तरह बोलता रहता है। वेद का अर्थ तथा
निहित शास्त्रों का अर्थ वह जानता रहता है लेकिन लोगों में उसका प्रदर्शन नहीं करता है। इतना ही नहीं, अपितु
लोग उसे मूर्ख कहें इसके लिये वह अपनी पशुतुल्यता प्रदर्शित करता है। वह वेदवाद-संवाद-विवाद कुछ नहीं
करता, व्यर्थ का वितंडावाद भी नहीं करता। यही बात स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी न हेतुकः।
शुष्कवाद विवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत् ॥ ३० ॥
निजात्म बोध में पक्का होने के कारण वह मीमांसकों का अभिप्राय, कर्मकाण्डों का शास्त्रार्थ अथवा कर्म
४८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सम्बन्धी नानाप्रकार के विवाद वह नहीं करता। जिसे आत्मानंद का अनुभव होता है, वह तर्कशास्त्र के अनुसार
तर्क, वितर्क अथवा कुतर्क प्रारम्भ कर विवाद नहीं करता। प्रख्यात वितंडवादी जो मुँह से ब्रह्मज्ञान की गर्जना
करते हैं और मन में विषयवासना भरी रहती है वही वास्तव में पाखंडी है। सचमुच ब्रह्म का अनुभव न रहते हुए
जो पुरुष अपना आचार त्याग देता है, वह शुद्ध पाखण्डी, अपना पेट भरने वाला तथा दुष्ट स्वरूप का मनुष्य है।
जिसकी वाणी में वाद-विवाद का मैल नहीं है वही आत्मज्ञान से निर्मल रहता है। 'शुष्कवाद' अर्थात् निरर्थक
बकवास से भी वाद उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञानी होता है वह ऐसे वाद-विवाद की बातें देखना भी नहीं चाहता।
फिर वह स्वयं ऐसे विवादों में उलझे यह तो सम्भव ही नहीं है। शास्त्रार्थ चल रहा हो और युक्ति-प्रयुक्ति से पक्ष,
विपक्ष पर साधार बहस चल रही हो तो भी वह किसी का पक्ष नहीं लेता। सच्चाई वह जानता है, लेकिन मुँह से
कुछ नहीं कहता। श्रुतिस्मृति के विरोध में चल रहा वितंडावाद वह देखता रहता है और सही पक्ष क्या है, यह भी
वह जानता है, फिर भी वह किसी के भी समर्थन में नहीं बोलता। वाद-विवाद में बोलने से किसी के मन पर
आघात होगा या अपने ही अंतःकरण में क्रोध उत्पन्न होगा इसलिये वह एक भी शब्द नहीं बोलता।
नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु।
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचनं।
देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित्॥ ३१ ॥
जो ज्ञाता है वह लोगों के प्रति मन में उद्वेग नहीं रखता। कोई निन्दा करता है, कोई तिरस्कार करता है, कोई
अपमान करता है, फिर भी वह आत्मस्थिति से उसे स्वयं सहन करता है। लोग जो भी उपद्रव देते हैं उसे वह इस
प्रकार सहन करता है। प्राणिमात्र में एक ही आत्मा भरा हुआ है, ऐसी उसकी भावना होने के कारण उसे उसका
दुःख नहीं होता। अपने ही अवयव से कोई प्रमाद हो जाने पर जिस प्रकार चित्त में उद्वेग नहीं होता, उसी प्रकार
समस्त प्राणियों में एकात्मा की ही भावना होने के कारण वह उससे दुःखी नहीं होता। उसी प्रकार उसके संसर्ग से
प्राणिमात्र को उद्वेग नहीं होता, उल्टे जीवमात्र को सुख ही होता है। समस्त प्राणियों में भगवान का वास होने के
कारण कहीं उसे कष्ट न हो इसलिये हाथ-पैर हिलाते समय वह काफी सावधान रहता है। जोर से पुकारने से
कहीं भगवान चौंक पड़ेंगे या जप की माला जोर से घुमाने से कहीं भगवान के सिर पर चोट लगेगी इसलिये
हाथ-पैर की चेष्टाओं को निजात्मनिष्ठा से नियंत्रित कर वह प्राणी को भी धक्का नहीं लगने देता। भूतात्मा सभी
भूतों में भरा हुआ है यह जानकर वह जोर से भाषण भी नहीं करता फिर वितंडवाद में वह मुँह किस तरह
खोलेगा? अपने प्राणों पर भी संकट क्यों न आये लेकिन उससे किसी का अपमान नहीं होता। कोई भी जीव क्यों
न हो लेकिन उसका अपमान नहीं करना है, क्योंकि समस्त प्राणिमात्र में श्रीहरि ही विराजमान हैं यह उसे दिखायी
देता है। ज्ञाता को जनता से कोई उद्वेग नहीं होता और ज्ञाता से जनता को भी कभी उद्वेग नहीं होता। जिसकी ऐसी
आत्मस्थिति रहती है वह किसी से बैर नहीं करता। इसी अर्थ का भाषण श्रीकृष्ण सुना रहे हैं।
एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।
यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥३२॥
केवल पशु जैसे देह का अहंकार कर वह किसी से बैर नहीं करता। उसके बारे में भी सुनो। ज्ञानस्वरूप
आत्मा प्रकृति से परे रहता है, वही सारे प्राणियों का आत्मा है और मुझमें भी वही रहता है, यही सोच कर वह
एकात्मा का निर्वाह करता है। सचमुच, जब मेरा ही आत्मस्वरूप प्राणिमात्र में भरा हुआ है तो उसे अपना कौन
अठारहवाँ अध्याय ४८७
और पराया कौन ? और बैर भी किससे करना ? सभी प्राणियों में एक ही आत्मा किस तरह है इसी बात का
दृष्टांत भगवान श्रीकृष्ण दे रहे हैं और उद्धव श्रोता बनकर अत्यन्त सावधान चित्त से श्रवण कर रहा है।
अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित्।
लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥ ३३॥
हजारों गागरों में पानी भरा हो लेकिन उसमें एक ही चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है; उसी प्रकार समस्त
प्राणियों में एक ही आत्मा भरी हुई है। प्राणियों की आकृतियाँ भिन्न-भिन्न दिखायी देती हैं, लेकिन परम कारण से
वे अभिन्न हैं। जिस प्रकार अलंकारों के सुवर्ण में भेद नहीं होता अथवा मिट्टी के गोकुल (नंद, यशोदा, कृष्ण
आदि) बनाएँ तो निराले आकारों में भी वे पूजा के योग्य होते हैं, उन सबमें मिट्टी ही भरी होती है। उसी प्रकार
भगवान में भी प्राणियों का भास होता है अथवा सूत को बुनकर वस्त्र बनाने पर उससे साफा, दुपट्टा, साड़ी आदि
बनते हैं। उसी प्रकार यहाँ ब्रह्म ही संसार के रूप प्रतिभासित होता है। इस प्रकार चाहे साकार हो या निराकार हो,
दोनों ब्रह्म ही है। जिसके ज्ञान का यह निश्चय होता है उसका आहार सुनो। जिस समय खाने को कुछ नहीं
मिलता उस समय भी वह दुःखी नहीं होता। वह अन्न के लिये बेचैन नहीं होता। उसका मनोनिग्रह इतना
शक्तिशाली होता हैं। उत्तम आहार मिलने पर उसे हर्ष भी नहीं होता क्योंकि वह मानता है कि सारी बातें मनुष्य
के कर्म पर निर्भर है। सारांश मिलना या न मिलना ईश्वर के अधीन है इसलिये उसका सुख या दुःख उसके मन
को स्पर्श नहीं करता। प्राणी को जब लाभ भी भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर वह भिक्षा के लिये क्यों
घूमता है ? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं।
आहारार्थं समीहेत युक्तं तत्प्राणधारणम्।
तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते ॥ ३४॥
आश्रमधर्म का पालन करने के लिये भिक्षा के लिये अवश्य घूमना चाहिये। संन्यासी के धर्म के लिये मधुकरी
अत्यन्त योग्य है। साधकों को भी आहार के लिये अवश्य घूमना पड़ता है क्योंकि आहार के बिना उनका चित्त
चंचल होने लगता है। उन्हें रस की आसक्ति छोड़कर भिक्षा का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि आहार के बिना उनका
मन सभी अर्थों में क्षीण होने लगता है। आहार के बिना साधकों से श्रवण-मनन नहीं हो सकता। ध्यान-चिन्तन नहीं
होता इसलिये अनुसंधान भी नहीं टिकता। संन्यासी का यदि ध्यान न लगे तो उसके आश्रमधर्म का जहाज डूबने
लगता है। इसलिये अपने ही हित के लिये उसे भिक्षा के लिये जाना पड़ता है। भिक्षा मिलेगी ऐसी आशा न कर
केवल परमार्थ साधने के लिये भिक्षा का ही शौक रखना चाहिये। आहार सेवन करने से साधक को साधन की प्राप्ति
होती है, साधन मिलने से ज्ञानप्राप्ति होती है और ज्ञानप्राप्ति से मोक्ष का लाभ होता है। मिष्टान्न की तो कभी भी
इच्छा नहीं करनी चाहिये। फिर भीख किसकी माँगनी चाहिये ? इसी बात का उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं।
यदृच्छयोपपन्नामद्याच्छ्रेष्ठमुताऽपरम्।
तथां वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः ॥ ३५ ॥
रूखा-सूखा या मीठा, जैसा भी सुगमता से मिले, उससे ही प्राण धारण करना चाहिये। जिह्वा की लालच
छोड़ देनी चाहिये। निद्रा अथवा आलस्य अपना प्रभाव न दिखाये इस प्रकार का प्राणधारण करें। आसन अथवा
ध्यान ठीक तरह से लगे इस ढंग से खायें, इसे मुक्ताहार कहते हैं। पेड़ की छाल अथवा मृगचर्म, नया या पुराना
वस्त्र जो भी सुगमता से मिले उसे आनन्दपूर्वक ओढ़ें। कथरी अथवा मुलायम बिस्तर, पुआल या जमीन जो भी
४८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुगमता से मिले, उस पर मुनि शयन करते हैं। मैं एक भोक्ता अथवा शयनकर्ता हूँ, यह अहंकार उसमें नहीं
रहता। स्नान आदि कार्यों में भी वह निरभिमानी होता है। श्रीकृष्ण बताते हैं।
शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।
अन्यांश्च नियमाज्ञांनीं यथाहं लीलयेश्वरः ॥ ३६ ॥
आचमन, स्नान अथवा प्रातःविधि करते समय वह शास्त्रविधि का दास बनकर नहीं रहता क्योंकि उसका
कर्माभिमान ही टूट जाता है। सारांश, जैसे मैं अवतारी हूँ, उसी प्रकार वह भी रहता है। जिस प्रकार मैं अलिप्त
होकर सारे कर्म करता हूँ उसी प्रकार योगी भी करता है। जिसके अंतःकरण में विधि का भय नहीं होता वह
कभी कर्म करने के लिये नहीं उठता। इसी बात का रहस्य श्रीकृष्ण विस्तार से बता रहे हैं।
न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।
आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥ ३७ ॥
मेरा दर्शन हो जाने के कारण, कर्म करना अथवा कर्म न करना यह संदेह ही मिट जाता है और संकल्प का
प्राण ही निकल जाता है। मुझ परमात्मा को देखते ही संकल्प मन में ही विलीन हो जाता है, लिंगदेह की गाँठ
खुल जाती है और भेद की त्रिपुटी का लोप हो जाता है। जिसको भेद का ही भान नहीं होता, उसके देह का
पालन-पोषण, स्नान, पान, खाना, भोजन, बैठना-उठना, आना-जाना भी कैसे होगा? जिसने विकल्प के भ्रम को
जीत लिया और अद्वैतस्वरूप में मिल गया, उसके देह की स्थिति और चलन प्रारब्ध के ही हाथ में रहता है। वृक्ष
समूल उखड़ कर गिर भी जाय, तो भी उसमें आर्द्रता तो रहती ही है। पान खाकर निगल भी लें तो भी उसकी
लाली होठों पर रहती ही है। कन्यादान करने के बाद दामाद कन्या को बिदा कराकर ले भी गया लेकिन मान-
सम्मान तो रहता है और मरने तक रूठना और मनाना समाप्त नहीं होता। उसके अनुसार अभिमान के कारण मैं
जबर्दस्ती कर्मकर्ता बनता हूँ, वह अहंता ज्ञान के बल से समाप्त होती है। फिर भी शरीर प्रारब्ध से चलता है।
कुम्हार डंडा और बर्तन लेकर जाता है लेकिन पहिया (चाक) घूमता ही रहता है। उसी प्रकार अभिमान नष्ट होने
पर भी प्रारब्ध से देह चलता ही रहता है। उस देह का पालन-पोषण देह ही करता है इसे ध्यान में रखो। ज्ञाता
को सचमुच ही प्रपंच का भान ही नहीं रहता। जिस प्रकार देह के पास मिथ्यारूप छाया रहती है, उसी प्रकार
ज्ञाता को देह दिखायी पड़ता है। इसीलिये उसे 'देह मैं ही हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। छाया पालकी में बैठे
या विष्ठा पर पड़ी हो, लेकिन उस छाया के अभिमान से पुरुष को उसका कोई सुख या दुःख नहीं होता। उसके
अनुसार देह का मान-सम्मान ज्ञानी की स्थिति में बिलकुल बाधक नहीं होता। प्रारब्ध को क्षय होने पर उन्हें
विदेह मोक्ष प्राप्त होता है। पानी की लहर जिस प्रकार समुद्र के जल में मिल जाती है उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें ही
विदेह अवस्था में समरस हो जाता है। जब तक उद्गम-संगम प्रवाह रहता है तब तक नदी के नामरूप की
ख्याति रहती है लेकिन प्रलय होने पर वह समाप्त हो जाती है। उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें एकरूप हो जाते हैं।
उद्धव ! ब्रह्मसाक्षात्कार प्राप्त किये हुए संन्यासी कैसे रहते हैं और उनकी स्वधर्म की रीति कैसी होती है इसके
बारे में तुम्हें बतलाया। अब मुमुक्षु संन्यासी कैसा होता है, सुनो।
दुःखोदर्कैषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।
अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत् ॥ ३८ ॥
चोटी से मूल तक, जिसके फल उत्तरोत्तर दुःखदायी होते हैं, ऐसे अत्यंत बाधक विषयजाल के प्रति वह
अठारहवाँ अध्याय ४८९
अनासक्त रहता है; मेरी प्राप्ति के लिये जिसका चित्त सदा उत्सुक रहता है; जो स्वधर्म कर्म पर ही चलता है और
वेदशास्त्रों का विचार करता है; ऐहिक तथा पारलौकिक सुख से जिसका चित्त त्रस्त रहता है, ऐसा जो नित्य
विरक्त तथा विख्यात मुमुक्षु हो, वह जो ब्रह्मज्ञान साधने के लिये साधनों में मन लगाए और यदि उसका स्वधर्म
कर्म विपरीत हो जाय तो उन दोषों के कारण ही उसकी हानि होती है। इसलिये उसे विधिपूर्वक कर्मों का त्याग
कर संन्यास ग्रहण कर सद्गुरु की शरण में जाना चाहिये जिससे उसे श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। लेकिन कई
लोग केवल भावार्थी होते हैं। वे स्वधर्म कर्म के प्रकार नहीं जानते। उन्हें शास्त्रश्रवण की भी जानकारी नहीं
होती। लेकिन मेरे प्रति उनका प्रेम असीम रहता है। उसे भी संन्यास ग्रहण कर गुरु की शरण में जाना चाहिये।
उसे भी गुरुकृपा से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिसे गुरु बनायें वह परोक्षापरोक्ष ज्ञान में पारंगत होना चाहिये।
अब उसकी सेवा का भावार्थ स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।
यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ३९ ॥
गुरु के प्रति, वह अचल, निर्मल, परा से परे का परमेश्वर, परब्रह्म और ईश्वर है ऐसा विश्वास रखना
चाहिये। इस दृढ़ विश्वास की आदत से गुरुचरणों के प्रति अपूर्व लगाव उत्पन्न हो कर भजन में नित नया और
अधिकाधिक माधुर्य आने लगता है। इस प्रकार भजन में रुचि उत्पन्न होने पर अंतःकरण में अत्यन्त श्रद्धा उफन
आती है, गुरु की आज्ञा का वह रत्तीभर भी उल्लंघन नहीं करता और आलस को झटकार देता है। गुरुवचन के
श्रवण के बहाने विकल्प की जड़ काट देता है और संकल्प को सूली पर चढ़ाकर अभिमान का विनाश करता है।
उस समय ईर्ष्या किस तरह सिर उठाएगी ? वह भय के मारे वहीं समाप्त हो जाती है। इस प्रकार गुरु के प्रति
अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न होती है; वह परब्रह्म दृष्टि से ही गुरु को देखता है। जो निर्गुण और निराकार है वही साक्षात
मेरा गुरु है। नित्य और निर्विकल्प जो समाधिसुख है वह मेरे गुरु के चरणों का तीर्थ है। गुरु को इस प्रकार
ब्रह्मस्वरूप से देखने पर शिष्य को भी ब्रह्मस्वरूप की ही पुष्टि प्राप्त होती है। वह सारी सृष्टि को ही ब्रह्मरूप में
देखने लगता है और आत्मा की एकता से गुरुचरणों पर गिर जाता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप से ऐक्य होने पर भी
गुरु की सेवा करनी ही पड़ती है। ब्रह्म से ऐक्य होने पर भी अखण्डत्व के कारण सेवा नहीं टूटती। कर्पूर पानी में
डालने पर स्वयं पिघल जाता है लेकिन साथ ही वह जल को भी सुगन्धित कर देता है। उसी प्रकार अहंभाव नष्ट
होने पर भी वह सर्वदा गुरुचरणों की सेवा करता रहता है। ऐसी अवस्था प्राप्त न कर केवल मस्तक का मुण्डन
करा कर स्वयं को बड़ा संन्यासी कहलाना अनुचित है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं। संन्यास लेकर जो ब्रह्मस्वरूप का
साक्षात्कार नहीं कर लेता उसका श्रीकृष्ण धिःकार करते हैं और दोष लगाते हैं।
यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसार्थिः।
ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीव ति ॥ ४० ॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।
अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते ॥ ४१ ॥
कुछ लोग देह में वैराग्य की भावना हुए बिना ही, विषयों के प्रति विरक्ति न होते हुए भी, दूसरों की
देखादेखी, केवल अन्न के लिये संन्यास ग्रहण करते हैं। संन्यास लेने के पूर्व अंतःकरण में जो भी वैराग्य था, वह
भी संन्यास लेने के बाद तुरन्त चला जाता है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और छठवाँ मन यही छः शत्रु हैं। उनका निर्मूलन
४९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
किये बिना संन्यास लेना केवल विडम्बना है। वैराग्य के अभाव में मन लालची रहता है और बुद्धि विषयलंपट
हो जाती है। न ज्ञान, न ध्यान और न साधन केवल उदरभरण के लिये हाथ में दण्ड ले लेते हैं। इसमें अनुताप तो
कभी होने से रहा, श्रवण मनन भी कभी नहीं होगा। आदरपूर्वक कभी साधन भी नहीं करते, ऐसे को कभी
ब्रह्मज्ञान नहीं होगा, उसका संन्यास व्यर्थ, उसका दण्ड व्यर्थ, उसका मुंडन व्यर्थ, उसके भगवे वस्त्र भी व्यर्थ
रहते हैं। वह केवल विदूषक का स्वांग है। संन्यास लेने के बाद काम में उफान आता है, क्रोध और लोभ की
आग भड़क उठती है और मन में चौगुना अभिमान उत्पन्न हो जाता है। अधिकाधिक आसक्त होना, सदैव गाँव के
लोगों के बारे में उलटी-सीधी और गन्दी बातें करना। दण्ड और कौपीन का उपयोग केवल पाखण्ड के लिये
करना। दण्ड ग्रहण करने के लिए ऐसा पुरुष अधिकारी ही नहीं है। संन्यास के बहाने वह अपनी हानि कर लेता
है। वह यज्ञ के अधिकारी देवताओं को उलझाता है, स्वधा के अधिकारी पितृगण को उलझाता है, ऋषि और
भूतगण को भी उलझन में डाल देता है क्योंकि उसके हाथ से किसी भी वस्तु का बलिदान तो होता ही नहीं है।
जीवरूप में मैं परमात्मा स्वयं हृदय में वास करता हूँ लेकिन वह मुझे भी ठगता है। इसलिये जीवों के उद्धार के
लिये जो संन्यास ग्रहण किया जाता है वह केवल बन्धन का कारण बन जाता है। संन्यास ग्रहण यह दृढ़ साधन
होने के कारण क्यों है? इसका निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं। कुछ लोग कहेंगे, यह कुछ विचित्र-सा लगता
है। वास्तव में यह पहले के श्लोकों के तीन चरणों के अर्थ का ही निरूपण है। श्रोतागण ध्यान देकर सुनें।
संन्यास ग्रहण कर वह ज्ञान, ध्यान आदि साधन नहीं करता, ओंकार का जप भी नहीं करता और विषय के
प्रति वैराग्य भी नहीं रखता इसलिये स्त्रियों की अभिलाषा कर वह धन एकत्र करता है और गोदान आदि ग्रहण
कर अर्चन अथवा यजन-याजन कराता है। मठाधिपति होने के नाते धनधान्य का लोभ बढ़ाता है और नाना प्रकार
के कष्ट सहते हुए, जीवात्मा की हानि होती है। इस प्रकार अधर्म करते रहने से जीव को दृढ़ बन्धन अवश्य प्राप्त
होता है और जिस नरदेह के योग से इहलोक और परलोक साधा जाता है उस नरदेह से यह वंचित हो जाता है।
चौरासी लाख योनियों के जब असंख्य फेरे होते हैं तब कहीं भाग्यवान लोगों को नरदेह प्राप्त होता है। इस प्रकार
उस नरदेह को प्राप्त कर यदि स्वयं ही उसे डुबो दिया और अधर्माचरण किया तो उस संन्यासी को नरक की ही
प्राप्ति होगी। अरे! जिसका नाम 'चौथा आश्रम' है और जिसे भगवान भी शिरसावंदन करते हैं, उसमें भी यदि
कोई अधर्म करे तो नरक ही जाना पड़ेगा। जिस नरक में करोड़ों वर्ष भी बीत जाएँ तो पता न चले ऐसे नरक में
वे डूब जाते हैं। जब प्रमुख चतुर्थाश्रम की यह स्थिति है तो अन्य आश्रमों की क्या बात की जाय? इसलिये
श्रीकृष्ण स्वयं उस आश्रमधर्म का उपाय बताते हैं।
भिक्षोधर्मः शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकसः।
गृहिणो भूतरक्ष्येज्या द्विजस्याचार्यसेवनम्॥ ४२॥
संन्यासी के लिये शान्ति प्रमुख है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियों का निग्रह होना चाहिये। अहिंसा तो उसका
स्वधर्म है। संन्यासी का श्रेष्ठ धर्म यही है। तपप्रधान मंत्रहोम वानप्रस्थ का स्वधर्म है, और तीनों आश्रमस्थों को
आश्रय देकर सुख पहुँचाना यह गृहस्थ का कर्त्तव्य है। अग्निहोत्र गृहस्थ के लिये प्रमुख है। उसे संन्यासी को
तथा ब्रह्मचारी को अन्न देना चाहिये और प्राणिमात्र का संरक्षण करना चाहिये। उसका मार्ग भी सुन लो। गृहस्थ
याचक को यथाशक्ति भोजन, वस्त्र पात्र, रुपया-पैसा, रहने के लिये तृणपर्ण की झोपड़ियाँ बनवा दें और गरीबों
की रक्षा करे। अब ब्रह्मचारी का स्वधर्म है श्रद्धापूर्वक गुरु की सेवा करना। उद्धव! इस प्रकार आश्रमधर्म के ये
अठारहवाँ अध्याय ४९१
प्रमुख लक्षण हैं। गृहस्थाश्रम के लिये जो धर्म बताया गया है उसे अन्य आश्रमधर्मी न करें। किन्तु अन्य आश्रम
के कुछ धर्म गृहस्थाश्रम वाले करें तो कोई हर्ज नहीं है।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं संतोषो भूतसौहृदम्।
गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥४३॥
गृहस्थ को निष्पाप होने के लिये आवश्यक जप और तप करना चाहिये और अंतःशुद्धि तथा बाह्यशुद्धि इन
दो शुद्धियों को अवश्य साधना चाहिये। मन की छटपटाहट को छोड़, जितना मिले उतने ही में संतोष मानना
चाहिये। सब का सुहृद समझ कर परोपकार करने की इच्छा रखनी चाहिये। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का यही
लक्षण है कि केवल ऋतुकाल में स्वस्त्री से रममाण हो। मुख्यरूप से मेरा भजन करना यह सभी का स्वधर्म है।
सभी वर्णों को और सभी आश्रमों को यही स्वधर्म है कि विषयों की आसक्ति छोड़ मेरा भजन करें। स्वधर्म से
मेरी भक्ति करने पर भक्तों को क्या प्राप्त होता है वह श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
इति मां यः स्वधर्मेण भजन्नित्यमनन्यभाक्।
सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥४४॥
एकनिष्ठा से तथा स्वधर्म से मेरी भक्ति करने से समस्त भूतों में मेरी भावना दृढ़ होती है। सभी प्राणियों में
मेरी भावना पैदा होने पर, जिसके पैरों पर चारों मुक्तियाँ गिरती हैं वह मेरी चौथी भक्ति प्रकट होती है। असीम
[L
४९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उभरने लगती है और समस्त प्राणिमात्र में परमात्मा का ही भास होने लगता है और इस प्रकार परमशक्ति का
विकास होता है। परमभक्ति का विकास होने पर मेरे भक्त को मत्स्वरूप की प्राप्ति होती है। उसी स्वरूप का
लक्षण श्रीकृष्ण यथार्थ रीति से यथाक्रम बताते हैं। परमात्मा परमज्योति, परब्रह्म परतप्ती, परात्परप्रकृति, जिसे वेद
'परावर' कहते हैं, वही अज, अव्यय, अक्षर, अरूप, अनाम, अगोचर, अलवृक्ष्य, अतर्क्य, अपार और
अनंतस्वरूप, इस क्रम में निज स्वरूप निज प्राप्ति भक्तों को स्वधर्म स्थिति में प्राप्त होती है, 'नेति', 'नेति' कह
कर श्रुति भी वहाँ से लौट जाती हैं। (ऐसी स्वरूप स्थिति में भक्त पहुँच जाते हैं) इस प्रकार मत्स्वरूप होने पर
संसार की बाड टूट जाती है, नामरूप की बात खत्म हो जाती है और मत्स्वरूप से समरस हो जाने के कारण वे
अनायास 'मैं' ही बन जाते हैं। पूर्व में 'मैं' था और अब 'शिव' हो गया हूँ। इसका भी स्मरण नहीं रहता। इस
प्रकार का अनुभव मेरे भक्तों को होता है। संसार का अस्तित्व ही जब समाप्त हो जाता है तो फिर उसकी
पुनरावृत्ति कैसे होगी ? सारांश, स्वधर्म करने से ही मेरी प्राप्ति होती है, इसे ध्यान में रखो। अब स्वयं श्रीकृष्ण ही
उस स्वधर्म की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। कृपया ध्यान देकर श्रवण करें।
वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः ।
स एवं मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः ॥ ४७ ॥
अत्यन्त प्राचीन काल से चलता आ रहा स्वधर्माचार, जो सचमुच मोक्ष दिलाने वाला है, उसके आचरण से
सकाम लोग स्वर्गादि लोकों की कामना करते हैं। लेकिन वह स्वर्ग मिलने पर भी वहाँ से मृत्युलोक में जन्म
लेना ही पड़ता है। इस प्रकार मेरी भक्ति न कर लोग सकाम होकर स्वधर्म नष्ट कर देते हैं। ब्राह्मण को यदि दान
में हाथी मिला तो उसे खिलायेगा कौन इसलिये वह किसी को दे देता है और पोथियाँ ढोने के लिये बूढ़ा बैल
खरीदते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण स्वधर्म की उपेक्षा करते हैं और स्वर्ग में भीख के दाने इकट्ठा करने जाते हैं। कोई
घर में कामधेनु बाँध दे तो उसका पोषण नहीं कर सकते यह कह कर मट्ठे के बदले में उसे किसी को दे देते हैं।
लेकिन इसमें कितनी हानि हुई इसे वे नहीं जानते हैं। उसी प्रकार मैंने ब्राह्मणों को अलग गायत्री मंत्र दिया था
जिसकी उपेक्षा कर वे जाने कौन से मंत्र जपते हैं और शूद्रों का सा व्यवहार करते हैं। वे सौर, शाक्त, गाणपत्य
आदि अनेक प्रकार की दीक्षा लेते हैं लेकिन गायत्री का अनुष्ठान नहीं करते। गायत्री का अनुष्ठान तो नहीं ही
करते, लेकिन उसके विपरीत काम करते हैं। पैसों के लिये ये ब्राह्मण गायत्री मंत्र का सारा श्रेय दूसरों को बेच
देते हैं। गायत्री मंत्र घर में होते हुए उसका भावार्थ ग्रहण नहीं करते और मूर्खों के द्वार पर भिक्षा माँगते फिरते
हैं। शस्त्रात्रों से भरे हुए रथ पर यदि कायर आदमी को बैठा दिया जाय तो वह रथ छोड़कर भाग जाने में ही
सुख का अनुभव करता है क्योंकि उसमें युद्ध करने का सामर्थ्य ही नहीं होता। उसी प्रकार मैं वेदरूप में नारायण
ब्राह्मणों के हृदय में वास करते हुए भी, उसकी महिमा न जानकर वेदों का किया हुआ पारायण बेच देते हैं।
स्वर्गफल की कामना कर अनेक प्रचण्ड यज्ञों का आयोजन करते हैं। सारांश, वे सकाम कल्पनायें स्वधर्म को
डुबो देती हैं। जिस वेद में कर्म का फल बताया गया है, वह वेद केवल मिथ्या ही नहीं है, बल्कि उस वेद में
सचमुच क्या प्रतिपादित किया गया है उसे बिना जाने व्यर्थ की बकवास करते रहते हैं। बालक दवा खा ले
इसलिये माँ उसे चीनी की चुटकी देती है लेकिन वह मुख्य उद्देश्य नहीं होता। उसका मुख्य उद्देश्य होता है पेट
का रोग दूर करना। उसी प्रकार वेद में जो फल बताया गया है उसका उद्देश्य स्वधर्म में रुचि उत्पन्न करना है
क्योंकि स्वधर्म से चित्त का मैल दूर होता है। लेकिन स्वधर्म छोड़कर सकाम कर्म करने पर उसमें भी बिना कष्ट
अट्ठारहवाँ अध्याय ४९३
किये क्षुद्र मनोरथ भी पूर्ण नहीं होता। जिस धन को देकर अमृत प्राप्त होता है, उसकी जगह मद्य खरीदने से
अधर्म होता है, मद बढ़ता है, पागलपन की हलचल करता है जिससे सारा संसार उस पर थूकता है। अपने पति
से रममाण होने पर पतिव्रता को परलोक प्राप्त होता है लेकिन यदि वह परपुरुष से रममाण होती है तो वह पतन
की ओर जाती है। जिह्वा अगर दुरुक्ती बोलती है तो यम मस्तक पर प्रहार करता है लेकिन यदि वह जिह्वा 'राम
राम' कहे तो हरिभक्तों से यम भी काँपता है। उसी प्रकार उत्तम जन्म लेकर सकाम कर्म करने से अत्यन्त दुःख
भोगना पड़ता है और बार-बार जन्म-मृत्यु भोगनी पड़ती है। लेकिन वही देह यदि स्वधर्माचरण करे तो सभी
कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्म-मरण के फेरे चुक जाते हैं। लेकिन यह मर्म कितने ही लोगों की समझ में
नहीं आता। स्वधर्म से भगवान की भक्ति सम्भव है यही इसका गूढ़ रहस्य है। उद्धव! यही बात मैं तुम्हें यथार्थ
ढंग से बताऊँगा। स्वधर्म पर आचरण करना अनिवार्य है, लेकिन उसमें फल की आशा छोड़नी चाहिये। इसमें
संकल्प न करने पर भी वह मुझे अर्पण होता है। अरे! यदि घर के मटके में मोतियों का ढेर मिल जाय तो फिर
ताम्रवर्णी नदी का समुद्र से मिलन स्थल खोजने की क्या आवश्यकता है? यदि अपने ही घर के वृक्ष कल्पवृक्ष
की तरह फल देने लगे तो अमरावती जाने की क्या आवश्यकता है? अथवा सद्गुरु का तीर्थ लेने पर पवित्रता
प्राप्त होती है तो फिर इधर-उधर के सैकड़ों तीर्थों की ओर दौड़ने की क्या आवश्यकता है? अथवा यदि ईश्वर
भावना से पिता की पूजा करने से मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर ज्ञाता लोग देवी-देवताओं को क्यों भजें? उसी
प्रकार स्वकर्म करते समय ही निष्कर्मता प्राप्त होती है परन्तु उसी स्वधर्म में फल की इच्छा रखने पर प्राणी
अपने वास्तविक स्वार्थ से भटक जाते हैं। निर्विकल्प मन से स्वधर्मचरण करने का ही नाम है 'मेरा शुद्ध
भजन'। उसी भजन से प्रसन्न होकर मैं अपने भक्तों को विवेकयुक्त वैराग्य और ज्ञान देता हूँ। उसी ज्ञान से बुद्धि
पवित्र होती है। चित्त शुद्ध होता है तो मेरी 'परमभक्ति' उत्पन्न होती है और हे उद्धव! उसी भक्ति से भक्तों को
मेरे श्रेष्ठ स्वरूप की प्राप्ति होती है। इसलिये निष्काम स्वधर्माचरण ही मेरा उत्तम भजन है। उस भजन से ही जो
भक्तों में उत्तम होते हैं वे स्वयं पुरुषोत्तम होकर रहते हैं। इस प्रकार, स्वधर्म में ही हमें मुक्ति प्राप्त होती है यही
बात तुम्हें विस्तार से बतायी।
एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम्।
यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम्॥४८॥
उद्धव! तुमने पूछा था कि स्वधर्म से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? और मैंने उत्तर दिया था, भक्ति से। स्वधर्म
हाथ में आते ही स्वकर्म का तत्काल विनाश होता है और संसार का सारा भ्रम दूर होता है। इस प्रकार स्वधर्म से
परमपद की प्राप्ति होती है। मुझे प्राप्त करना हो तो स्वस्वकर्म अर्थात् स्वधर्म का निष्काम भाव से आचरण करना
चाहिये। यह मर्म जिसकी समझ में आ गया, समझ लो पुरुषोत्तम उसके वश हुआ। स्वस्वधर्म जैसे पारस पत्थर
निर्विकल्प ढंग से प्राप्त होने पर उसे दूष्य पदार्थों में लगाते ही वे सारे पदार्थ चिन्मात्र सुवर्ण अर्थात् ब्रह्ममय ही हो
जाते हैं। स्वधर्म जैसे सूर्य का निष्कामता से अंतःकरण में उदय होते ही वह अज्ञानरूपी रात्रि को नष्ट कर
सदासर्वदा स्वप्रकाश से ही विचरण करता है। स्वधर्म का अमृत जो निष्काम भाव से सेवन कर पाते हैं उन्हें मैं
जन्म-मरण के जाल में फँसने ही नहीं देता। लेकिन जो स्वधर्म से विमुख हो जाते हैं उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं होती।
वे मूर्ख सकाम होने के कारण करोड़ों जन्म तक असह्य दुःख भोगते रहते हैं। स्वधर्म से स्वकर्म करते समय यदि
निष्काम होने का मर्म मालूम हो जाय तो वे जन्म-मरण के जाल से बच कर परब्रह्मस्वरूप तक पहुँचते हैं। इस
४९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार संसार में स्वधर्म तारने वाला ही होता है। स्वधर्मरूप नौका पर बैठकर मेरे कितने ही भक्त संसार सागर पार
कर गये। लेकिन 'पार कर गये' यह कहना भी गलत है क्योंकि मेरी प्राप्ति की इच्छा से स्वधर्म का आचरण
करने पर संसार सागर बिलकुल सूख जाता है और मुझ परमात्मा से उनकी सामने ही भेंट होती है। निष्काम भाव
से होने वाले स्वधर्माचरण का इतना माहात्म्य है। भगवान को भी वह अत्यन्त प्रिय होने के कारण उन्होंने अनेक
प्रकार से यह बात उद्धव को समझायी। भागवत भक्तिप्रधान है, उसकी भक्ति स्वधर्मयुक्त है। इस स्वधर्म भजन से
ही समस्त श्रेष्ठ भक्तों का उद्धार हो गया। उस स्वधर्म कर्म का रहस्य और आत्मभजन भक्ति का भावार्थ श्रीकृष्ण
ने उद्धव को ग्यारहवें स्कन्ध में बतलाया। उस ग्यारहवें स्कन्ध की बातें मानों स्वधर्म कर्म की कसौटी है। श्री
जनार्दन की कृपादृष्टि से ही एकनाथ ने मराठी भाषा में टीका लिखी। यह काम जनार्दनजी ने ही किया और
काव्य में मेरा नाम लिख दिया और अन्त में इस निरूपण से तो उन्होंने 'मैं' और 'तू' का भेद ही समाप्त कर
दिया। विषय का विषयपन ही नष्ट कर दिया, भेद का भान उड़ा दिया और जीव-शिव का भाव समाप्त कर
दिया। जनार्दनरूप पिता ने हमारे लिये परब्रह्म खिलौना बना दिया। इसलिये उसके कारण जो-जो क्रियाएँ होती हैं
वे सब अपने आप स्वधर्म से ही घटती हैं। स्वभावतः स्वधर्म से कर्म निष्कर्म होता है और संसार ही परब्रह्म हो
जाता है। जनार्दन की यही बहुत बड़ी कृपा है। इसलिये एकपन छोड़ कर एका जनार्दन की शरण में गया।
इसलिये उनकी ही कृपा से स्वधर्म कर्म का निरूपण सम्पूर्ण हुआ।
इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध के श्रीकृष्णोद्धव संवाद का एकनाथकृत टीका का
'वानप्रस्थ संन्यास धर्म निरूपण' नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ॐ तत्सत्-श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां वानप्रस्थ संन्यास निरूपण नाम अष्टादशोध्यायः ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
उन्नीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु ! हे त्र्यंबक ! हे ब्रह्मगिरि पर वास करने वाले ! हे त्रिगुण, त्रिपुट का भेद करने वाले !
हे कामांतक गिरिजेश ! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा अनुहत शब्दरूप डमरू का गजर चारों ओर सुनाई पड़ता है और
निरन्तर वेदानुवाद से वह कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन विभागों में गरजता रहता है। तुम्हारे हाथ में जो खड्गसम
शस्त्र है वह जीवों का संहार करता है और अनंग का अंग जलाकर ही स्वस्वरूप प्राप्ति करा देता है। हे त्रिनयन
त्रिंबकलिंग। चित्प्रकाशगर्भा शंकर ! तुमसे ही (गोदावरी रूप) चिद्गंगा का प्रवाह बहता रहता है जो अपनी
पवित्रता से सारे संसार को पावन कर देता है। दो नेत्र तो स्पष्ट दिखाई ही देते हैं और तीसरा ज्ञाननेत्र गुप्त है।
इसलिये बिना नेत्र के ही दिखाई देने वाले तुम त्रिलोचन हो। तुम अपने शरीर पर, बोधरूपी चन्द्र धारण करते हो,
इसलिये तुम 'चन्द्रशेखर' हो और वास्तव में चन्द्रसूर्यादि सारा चराचर तुम्हारे ही कारण प्रकाशित होता है। 'भव'
की बड़ी ख्याति है किन्तु तुम्हारी चिच्छक्ति भवानी ही उस भव को प्रकाशित करती है। विष्णु तुम हो, ब्रह्मदेव
तुम हो और अन्त में संहार करने वाले रुद्र भी तुम ही हो। हे प्रलयकाल के प्रलयरुद्र ! हे चित्समुद्र शिवरूपा
सद्गुरो ! नामरूप का आकार मोड़कर तुम सारे जीवों को एकरूप कर देते हो। हे गुरुराया ! शिव-शिव कह कर
निजभाव से तुम्हारे पैरों में लगते ही तुम्हारे निजरूप दिखाने से गुरु शिष्य भाव विलीन हो जाता है। वह
निजस्वरूप एक बार दिखायी दे जाय तो फिर जीव किस बात का ? और सृष्टि भी कैसी ? तीन गुणों के साथ
त्रिपुटी ही समाप्त हो जाती है और स्वानंद से भेंट होती है। उस स्वानंद के उद्गार सँभाले नहीं सँभलते। उस
स्वानंद का सार ही है ग्यारहवाँ स्कन्ध। उसमें भी अत्यन्त गहन स्वानंदसुख का निरूपण जिसमें किया गया है
वह है उन्नीसवाँ अध्याय। वह शास्त्रप्रमाणों से भी सिद्ध है। वह निरूपण सुनाते ही परमानन्द उफन उठता है।
इसलिये एका जनार्दन से विनती करता है कि श्रोतागण मेरी ओर ध्यान दें। सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में,
स्वधर्म कर्म से ही ब्रह्मप्राप्ति होती है इसलिये वर्णाश्रम के सारे प्रकार उद्धव को बताये। अब उन्नीसवें अध्याय में
जिस ज्ञान से आत्मज्ञान साध्य किया हो, उसका त्याग लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं। जीवन्मुक्त के लिये कर्म-
कर्तव्यता-कारण नहीं होता, इसलिये उद्धव के 'यम', आदि प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण ही देंगे। शास्त्रयुक्त, पांडित्य
का ज्ञान अथवा उसने किया हुआ प्रपंच का मिथ्यत्व निरूपण वह सब आनुमानिक तथा किताबी ज्ञान है। उसमें
जरा भी तथ्य नहीं है। हमें पूर्व की ओर जाना है यह एक शुद्ध स्मरण है किन्तु दिशा भूल जाने पर वह पश्चिम
को ही पूर्व मानते लगता है; उसी प्रकार शाब्दिक शास्त्रज्ञान है। बोलते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं इसलिये
साधक का कभी समाधान नहीं होता। वही दिशामूल समाप्त हो जाय तो जिस प्रकार वह पूर्व पूर्व की ही ओर
जाने लगता है उसी प्रकार अनुभव ज्ञान प्राप्त होने पर साधक को परमानन्द का नाम प्राप्त होता है। वह जिस
वेदान्त का श्रवण करता है, वह स्वयं ही होता रहता है। ऐसा होना यही आनुभविक ज्ञान का सच्चा और शुद्ध
लक्षण है यह ध्यान में रखो। ऐसा आनुभविक ज्ञान प्राप्त होने तक श्रवण और मनन नहीं छोड़ना चाहिये। इतना
ही नहीं, 'प्रत्यगावृत्ति' साधन अर्थात् आत्मानुसंधान का अभ्यास अवश्य करना चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त होने
पर प्रपंच का भान मिथ्या लगने लगता है। विषयों पर पानी पड़ जाता है और कल्पना पिघल जाती है। जो पुरुष
यह करे उसे ही ज्ञान साधन का त्याग करना चाहिये। यही सारा निरूपण भगवान कर रहे हैं।
४९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवान् नानुमानिकः ।
मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि संन्यसेत् ॥ १ ॥
(भगवान कहते हैं) वेदशास्त्रों में जो पारंगत; श्रवण मनन के अभ्यास से युक्त तथा जिन्हें स्वानुभव से
ब्रह्मविद्या साध्य है; लेकिन वह अनुभव ऐसा है जिसमें रस्सी को सर्प समझने का भ्रम अपने आप ही नष्ट हो
जाता है उसी प्रकार उसका भवभ्रम दूर हो जाता है; स्वांग करने वाले राजा-रानी जिस प्रकार प्रेम की झूठी
क्रीड़ा का ही अभिनय करते हैं उसी प्रकार प्रकृति पुरुष दोनों ही मिथ्या हैं यह वह जानता है। दीवार पर
अनेक प्रकार के चित्रविचित्र चित्र बनाये जाते हैं लेकिन जिस प्रकार वह वास्तव में एक दीवार ही रहती है,
उसी प्रकार समस्त चराचर एकरूप है यह वह जानता है; अथवा स्वप्न में अनेक प्रकार के कर्म दिखायी देने
पर भी जागृति में उसका कोई बन्धन नहीं होता, उसी प्रकार मैं यह जीव और प्राण हूँ और मैं यह कर्म करता
हूँ यह सब मिथ्या है यह जो जानता है; ऐसी स्थिति को कहते हैं, 'शुद्ध आत्मप्राप्ति' इसी को वास्तव में
'निजानुभव' कहते हैं। हे सात्वतकुल के भक्तशिरोमणि! उसकी एक और भी पहचान है। वह यह कि वहाँ
विषयोपभोग के बिना ही स्वानंद रहता है। इस प्रकार के अनुभव के बिना जो शाब्दिक ज्ञान होता है उसे केवल
'आनुमानिक' ज्ञान ही समझो, उद्धव! जिसके अनुभव में अनुमान का प्रवेश नहीं है, जो निरन्तर अपरोक्ष
साक्षात्कार में ही विचरण करता रहता है, ऐसे पुरुष को ज्ञान का साधन और वृत्तिरूप ज्ञान का त्याग करना
चाहिये। वैसे भी इसका अपने आप त्याग हो जाता है जिस प्रकार सूर्योदय होते ही चन्द्रमा के साथ नक्षत्रों का
तेज भी नष्ट हो जाता है, मारुति को आते देख नवचंडी (अहिरावण की देवी) भागने लगती है फिर अन्य भूतों
की क्या बात की जाय? उनके सामने खड़े होने का भी साहस नहीं होता। उसी प्रकार मेरे साक्षात्कार से उसे
वास्तव में कोई बाध्यता ही नहीं रह जाती। फिर उसकी निवृत्ति के बाद ज्ञान कैसे बचा रह पायेगा? मेरे
अनुभव में बन्ध और मोक्ष दोनों मिथ्या हैं। उद्धव! वहाँ साधन ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है। परमात्मस्वरूप
में बंध और मोक्ष दोनों ही मायास्वरूप हैं। इसलिये वहाँ ज्ञान और ध्यान का त्याग न करने पर भी त्याग हो ही
जाता है। लेकिन ज्ञान का और ध्यान का त्याग होने पर भी ज्ञानी को मेरी नितांत प्रीति रहती है। वही प्रीति का
लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्च संमतः।
स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः ॥ २॥
मुझ अद्वयानंदस्थिति रूप के प्रति ज्ञानी जनों में काफी प्रीति रहती है। उद्धव! उस प्रीति का लक्षण सुनो।
ज्ञानीजनों को प्रिय मैं स्वयंभू परमात्मा, ज्ञानियों का परम लाभ, उनकी जीवच्च कंठश्च निधि, ऐसा मैं पद्मनाभ हूँ।
ज्ञानियों का उत्तम स्वर्ग मेरे सिवा कोई है ही नहीं। उसी प्रकार ज्ञानियों का मोक्षभाग वह भी मैं निजात्मा श्रीरंग
हूँ। मैं परमात्मा नारायण ही ज्ञानियों का स्वधर्मसाधन हूँ अर्थात् ज्ञानियों को मेरे सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं
देता। ज्ञानियों के लिये मेरे सिवा स्वर्गसुख या मोक्षसुख रह ही नहीं जाता। वे अपने शुद्ध भक्तिभाव से मेरे
सर्वव्यापी चिदात्म-स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। ज्ञानियों का अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ संब कुछ एक मैं पुरुषोत्तम ही
हूँ। इसलिये आद्य, अव्यय तथा अनंत ये मेरे निजसुख उन्हें प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञाताओं को मुझसे प्रीति रहती है,
इसलिये वे भी मुझे प्रिय हैं। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव को बता रहे हैं।
उन्नीसवाँ अध्याय ४९७
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धाः पदं श्रेष्ठं विदुर्मम ।
ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥ ३ ॥
ज्ञान और विज्ञान की सम्पदा प्राप्त किये बिना मेरी प्राप्ति अर्थात् स्वस्वरूपस्थिति कभी भी किसी को प्राप्त
नहीं हो सकती। गुरुमुख से शास्त्रशुद्ध श्रवण करने से जो प्राप्त होता है, उसे 'ज्ञान' कहते हैं; और उसके
प्रत्यक्षानुभव को 'विज्ञान' कहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। स्वयं तैयार की हुई रसोई जब तक चख कर नहीं
देखी जाती तब तक वह कड़वी है, मधुर है या नमक अधिक है यह ठीक से नहीं मालूम होता। इस स्थिति को
ज्ञाता लोग 'ज्ञान' कहते हैं और उसके रस की माधुरी स्वयं चख कर देखने से जो स्थिति प्राप्त होती है उसे
'विज्ञान' कहते हैं। सारांश, मेरे सर्वोत्तम पद की प्राप्ति के लिये 'ज्ञानविज्ञान' की सम्पत्ति ही कारणीभूत है। इस
प्रकार जो मेरा वास्तविक स्वरूप जानते हैं उनसे मुझे अनन्य प्रीति होती है। वेद, शास्त्र अथवा युक्ति से मेरा
स्वरूप नहीं जाना जा सकता। उसका जिसे आकलन होता है उसके सिवा मुझे कुछ प्रिय नहीं है। उसका लक्षण
यही है कि उसके प्रत्येक पग पर मैं अपना देह आगे करता हूँ। इतना ही नहीं, बल्कि मैं उस पर अपना सब कुछ
न्योछावर करता हूँ। उसे जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है उसे मैं बिना माँगे ही दे देता हूँ और उसमें यदि
कोई बाधा आती हो तो स्वयं उसे दूर करता हूँ। उसे सांसारिक आँधी का कहीं कोई कष्ट न हो इसलिये मैं स्वयं
उसका सामना करता हूँ। इतना मैं उस पर आसक्त हो उठता हूँ। ज्ञानी जिस ज्ञान से मुझे प्रिय हैं, उस ज्ञान की
पवित्र कीर्ति यथार्थ ढंग से भगवान आत्मज्ञानपूर्वक उद्धव को बता रहे हैं।
तपस्तीर्थे जपो दानं पवित्राणीतराणि च।
नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता ॥ ४ ॥
सारे साधनों से जो शुद्धि नहीं होती, वह निश्चय ही ज्ञान के एक अंश से होती है। हे बुद्धिमान उद्धव! इस
ज्ञानशुद्धि की महिमा सुनो। पंचाग्नि साधन से तप किया अथवा गंगा, त्रिवेणी आदि तीर्थों के दर्शन किये, अनेक
मंत्रों का जप किया अथवा गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण आदि का दान किया; अथवा और भी अन्य पवित्र
'स्वधर्मकर्मादि' आचार किये, अथवा 'योग', 'अग्निहोत्र', नाना प्रकार के 'यज्ञ' आदि अत्यन्त शुद्ध और पावन
करने वाले जो कर्म किये वे तपादिक साधन हैं उनकी शुद्धि महान है, लेकिन उनकी पवित्रता ज्ञान के अल्पांश
भी नहीं है। आधे क्षण की ज्ञाननिष्ठा से जो पवित्रता प्राप्त होती है उसे तपादि साधन नाना साधनों से कल्पांत में
भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे। ऐसा जो पवित्र ज्ञान है उसे मुख्य रूप से धारण कर मेरा भजन करें यही बात श्रीकृष्ण
निरूपित करते हैं।
तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो भज मां भक्तिभावितः ॥ ५ ॥
इसलिये हे उद्धव ! ऐसा जो ज्ञान का पवित्र प्रवाह है, उसमें निजभाव को प्रक्षालित कर, जीव
परमात्मस्वरूप ही है यह पहचान लें। जीव और परमात्मा दोनों एक हैं यह जानना 'ज्ञान' है और ऐक्यभाव से
परमात्मसुख का भोग करना 'विज्ञान' है। इस प्रकार ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न होकर मेरा भजन करें। उद्धव ! मेरे उस
भजन के लक्षण सुनो। यह यत्र-तत्र जो कुछ भी देखता है वहाँ उसे मेरे सिवा कुछ भी नहीं दिखायी देता। फिर
वह उन-उन स्थानों पर अनन्य भाव से भजन करने लगता है। अहोरात्र चलने वाले मेरे ऐसे भजन में कभी खण्ड
नहीं पड़ता। जागृति हो, स्वप्न हो अथवा सुषुप्ति हो मेरे भजन में बाधा नहीं आती। मुझे भूल कर वह जहाँ भी
४९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाता है, वहाँ वह मुझे ही देखता है। इस प्रकार ऐसा नहीं कि विस्मरण को ही मृत्यु आती है; अपितु स्मरण भी
नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो ज्ञानविज्ञानसम्पन्न लोग हैं उन्हें मेरे सिवा कुछ भी दिखायी नहीं देता। उसी प्रकार
अनन्य भजन करने का ही नाम 'शुद्धभक्ति' है यह जान लो। पूर्व में भी बड़े-बड़े मुनिवर्यों ने इसी प्रकार मेरी
एकनिष्ठ भक्ति कर मुझे प्राप्त किया। उसके बारे में भी बताता हूँ।
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६॥
ज्ञानधन से अत्यन्त सम्पन्न तथा विज्ञान से परम पवित्र ऐसे जो ब्रह्मस्वरूप ब्राह्मण हैं वे यज्ञ के द्वारा मेरा
यजन करते हैं। वे अपने हृदय मन्दिर में (अथवा यज्ञमण्डप में) विकल्परूपी जमीन खोद कर श्रद्धा के आकार
से काम, दम और विरक्ति ये तीन कुण्ड तैयार करते हैं। उसमें क्षर और अक्षर (जीव और शिव) इन दो अरणियों
(अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ) को लेकर गुरुमन्त्र से मंथन कर निकाला हुआ निर्धूम, सूक्ष्म अग्नि उस
कुण्ड में डाल कर उसे प्रज्वलित करते हैं। शुद्धसत्त्वरूपी घृत में रजतमादि होमद्रव्य मिलाकर, युक्ति के मंत्रों से,
वैराग्यरूपी स्रुवा से (लकड़ी की करछुल) उसमें आहुति देते हैं। तदुपरान्त विद्यारूप तीक्ष्ण अस्त्र हाथ में ले कर,
संकल्परूपी पशु को मार कर यज्ञ के स्वामी अनन्त को उस निजबोध से सन्तुष्ट करते हैं। उसमें पूर्णाहुति के
लिये जीवभाव की आहुति देने से यज्ञभोक्ता अर्थात् मैं नारायण सन्तुष्ट होता हूँ। इस प्रकार मेरा यजन कर अनेक
मुनीश्वर जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मेरे स्वरूप तक पहुँच गये। बड़े-बड़े ऋषियों ने जो सिद्धि प्राप्त कर
ली वही उद्धव को भी प्राप्त हो सके इसलिये कृपासागर श्रीकृष्ण उसे प्रपंच का निषेध कर वस्तुतत्त्व का निरूपण
कर रहे हैं।
त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायान्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत्।
जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्युराद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये॥ ७॥
'मैं उद्धव हूँ' यह कहते समय तुम सचमुच कौन हो? तो तुम्हें तुम्हारे स्वरूप की कथा सुनाता हूँ। जन्म,
स्थिति और मृत्यु इन तीन विकारों का कारण त्रिगुण हैं और उनकी अधिष्ठात्री माया है; लेकिन उसे तुमसे ही
गति मिलती है। माया आदि से लेकर सभी कार्यों में अंतर्बाह्य तुम्हारा ही आश्रय है। तुम्हारे ही कारण उन्हें
चपलता अर्थात् चलन वलन (हिलना डोलना) प्राप्त हुआ है। तुम उनसे भिन्न चिदात्मा हो। मेरे कारण गुणकर्मों
में चलनता आयी यह कहें तो प्रपंच में सत्य आयी; वास्तव में यह सारा संसार मायामय है तथा मृगजाल का
आभास है। जो भी कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है, सत्य नहीं है। प्रपंच का सारा भान तो मृगजल की
तरह है। तुम जन्म-मरण से अलग हो, त्रिगुणों को स्पर्श न करने वाले तथा सचमुच ही प्रपंच से अलिप्त हो।
कैसे? तो सुनो। प्रपंच से अलिप्त रहने का तरीका यही है। उस युक्ति की परम प्रतीति यही है कि उत्पत्ति, स्थिति
और लय इनमें प्रपंच का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है। उत्पत्ति से पूर्व प्रपंच नहीं होता; और अन्त में भी कुछ
शेष दिखायी नहीं देता। बीच के काल में जिसका भास होता है वह भी मायामय होने के कारण मिथ्या है। प्रपंच
के, अर्थात् सृष्टि के पूर्व परब्रह्म ही रहता है, अंतकाल में भी निरूपम वही शेष रहता है और सृष्टि के
स्थितिकाल में भी ब्रह्म ही रहता है, भ्रमिष्ट लोगों को अवश्य ही संसार का मिथ्या भ्रम होता है। सूर्य के पहले
भी मृगजल का अस्तित्व नहीं होता और अस्त के बाद भी शेष नहीं रहता; बीच के काल में भी जो आभास होता
है उसमें भी पानी का अंशमात्र भी नहीं होता। रज्जु सर्प भी पहले रस्सी के ही रूप में रहता है और अन्त में भी
उन्नीसवाँ अध्याय ४९९
रस्सी के ही रूप में शेष रहता है। बीच के अन्तराल में जब सर्प का भास होता है तब भी वही रस्सी ही रहता
है। हे उद्धव! इस प्रकार आदि और अन्त का विचार करें तो ब्रह्म ही सत्य है, प्रपंच (संसार) मिथ्या है और
वेदशास्त्र भी इससे सहमत हैं। इस प्रकार इस प्रपंच में कितना भी परिवर्तन हुआ और जन्म-मरण के करोड़ों
चक्र चलते रहे तो भी हे उद्धव! उनसे तुम्हारा सम्पर्क ही नहीं होगा। क्योंकि तुम प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों
तीरों से नित्यमुक्त ही हो। उद्धव! निर्गुण, निःसंग, निर्विकार, अज, अव्यय, अक्षर, अनंत और अपार जो ब्रह्म है,
वही सचमुच तुम हो। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव ने मन में गाँठ बाँध ली। हर्ष उसके मन में समा नहीं
रहा था। उसे अपने लिये यह सृष्टि छोटी मालूम होने लगी। 'तुम ब्रह्म हो' ऐसा श्रीकृष्ण ने कहते ही उद्धव
खुशी से नाचने लगा। यह देख कर श्रीकृष्ण को समाधान हुआ। श्रीकृष्ण अपने मुख से 'तुम पूर्ण ब्रह्म हो' ऐसा
कहते हैं, इससे वह स्वयं धन्य समझने लगा। मेरा जैसा भाग्यवान और कौन है? ऐसा विचार मन में आकर
उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन किया। 'तुम स्वयं ही परब्रह्म हो' इसका अर्थ वह श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथैतद् वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम्।
आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्ते त्वद्भक्तियोगं च महद्विमृग्यम्॥८॥
(उद्धव बोले) हे विश्ववसेना! हे विश्वेश्वर! विश्वमूर्ते! विश्वंकर श्रीकृष्ण! जिसके योग से
महासाक्षात्कार हो ऐसा निश्चित ज्ञान मुझे बतायें। जो केवल ज्ञान देते रहते हैं उन्हें मैं निरा मूर्ख ही समझता हूँ।
इसलिये जिससे जीव का बन्धन टूट जाये ऐसी प्रखर वैराग्ययुक्ति मुझे बतायें। क्योंकि ज्ञान के बिना वैराग्य अन्धा
रहता है। वह शिलाओं से टकरा कर गिर पड़ता है और वैराग्य के बिना लंगड़ा होता है। उसे युक्ति मालूम रहती
है लेकिन उसका पुरुषार्थ काम नहीं करता। इसलिये विवेक और वैराग्य ये दोनों यदि हृदय मन्दिर में प्रवेश करें
तभी विषयावस्था छोड़कर जीव 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यही समझ कर विचरण करने लगता है। ज्ञान को जब तक
विज्ञान का साथ नहीं मिलता तब तक जीवत्व का विनाश नहीं होता। इसलिये जो जीव और शिव दोनों का ही
निवारण करे ऐसा विज्ञान मुझे बतायें। जिसमें असंभावना का दोष रत्ती मात्र भी नहीं रहता, उसी को 'शुद्ध ज्ञान'
कहते हैं और जिसमें 'विपरीत भावना' बिलकुल नहीं रहती उसी को ज्ञाता लोग विपुल कहते हैं। ऐसा अत्यन्त
शुद्ध और विपुल ज्ञान, उससे युक्त वैराग्य और विज्ञान और उसमें भी श्रेष्ठ तुम्हारा जो भजन हो वह कृपया मुझे
बतायें। हे कृपामूर्ति श्रीकृष्ण! ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य सहित तुम्हारी प्राचीन भक्ति के बारे में भी मुझे निश्चित रूप
से बतायें। तुम्हारी श्रेष्ठ भक्ति की खोज बड़े-बड़े साधु महात्मा भी कर रहे हैं और जीव प्राण लेकर धरना देकर
बैठे हैं। उस भक्ति के बारे में मुझे बतायें। तुम्हारी उत्तम भक्ति करने से त्रिविध तापों का भी क्षय होता है और
मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिये उद्धव विनती कर रहा है।
तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे संतप्यमानस्य भवाध्वनीश।
पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्घ्रिद्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात्॥९॥
जो त्रिविध ताप से दग्ध रहते हैं, कामक्रोध जिन्हें जर्जर कर देते हैं; आशा और तृष्णा में जो डूबे रहते हैं
और जन्म-मरण में लिप्त रहते हैं; संसार के अत्यन्त विकट मार्ग पर जो दुःख के साथ भी नहीं चल पाते, ऐसी
यातना भोगने वाले पुरुष के लिये हरि के पदकमल में ही आश्रय है। तुम्हारे चरण कमल के सिवा शरण जाने के
लिये कोई अन्य स्थान ही दिखायी नहीं देता इसलिये काया, वाचा और मन से मैं भक्तिभाव से तुम्हारी ही शरण
५०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आया हूँ। छत्र केवल एक ही ताप दूर करता है लेकिन तुम्हारे चरण का छत्र कुछ विशेष ही है। वह त्रिविध तापों
के साथ सारा संताप दूर कर संसार को पापरहित कर देता है। कोई अपने ही मन से तुम्हारी शरण में आया। कोई
बैर करके ही तुम में विलीन हो गया, किसी ने भावार्थ से तुम्हारा भजन किया तो किसी ने भयभीत होकर तुम्हारा
स्मरण किया; कुछ तुम्हारे कुल के होने के कारण तुम्हारे सुहृद बन गये, कुछ स्नेह के कारण तुमसे प्रेमबद्ध हो
गये, कुछ काम तंत्र से अंग-संग कर तर गये तो कोई आज्ञाधारी सेवक बन कर रहे। सारांश, अनेक प्रकारों से
विचित्र ढंग से जिन्होंने तुम्हारे चरण छत्र का आश्रय लिया, उनके सामने संसार भय नहीं टिक सकता। भक्त हो,
बैरी हो अथवा अपना हो उन सबको ही तुम अपना निजपद देते हो। तुम्हारी उदारता महान है। तुम सबके स्वानंद
बोध हो। होम हवन करके अग्नि को जो भी अर्पण किया जाता है, उसे अग्नि अपने जैसा कर देता है, यदि
गलती से भी उसमें कुछ गिर जाय तो उसकी भी वही गति होती है। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण! किसी कारण से भी
जो तुम्हारे पास आते हैं, उनकी सांसारिक पीड़ा दूर कर उन्हें समत्व से तुम अपने पद तक पहुँचाते हो। तुम्हारा
चरणरूप छत्र त्रिविध तापों का निवारण कर सदा सर्वदा परमामृत की वर्षा कर रहा है। इसीलिये मैं उनकी शरण
में हूँ। जिस संसार के भय से मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ उस भवभय का स्वरूप उद्धव स्वयं ही बता रहे हैं।
दष्टं जनं सम्पतितं बिलेऽस्मिन् कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम् ।
समुद्धरैनं कृपयाऽपवर्ग्यैर्वचोभिरासिञ्च महानुभाव ॥ १०॥
लोग संसाररूपी गुफा में फँस कर गृहदारारूप कुएँ में गिर गये हैं। उसमें भी कालरूपी सर्प ने काट लिया
है। वे वेदनायें तो और भी भयानक हैं। उस कालरूप सर्प का विष क्षण-प्रतिक्षण शरीर में चढ़ रहा है; फिर भी
लोग अभिमान के भुलावे में विषयसुख की इच्छा करते ही हैं। कालसर्प का प्रताप कुछ विचित्र ही है। उसने विष
जैसे कडुए विषय को भी मधुर बना दिया है और अत्यन्त मधुर परमार्थ को जीव भाव से कडुआ बना दिया है।
विषय विष से भी ज्यादा भयंकर हैं। विष एक ही बार मारक होता है किन्तु विषय बार-बार वार करते रहते हैं।
कालसर्प ने लोगों पर इतनी अधिक मोहिनी डाल रखी है। विषय एक शुद्ध विष है। मूर्ख लोग ही उसकी ओर
मोहित होते हैं और विषयों की तृष्णा बढ़ाते हैं। ऐसे जो दुःख में डूबे हुए लोग हैं उनका उद्धार करें। इस पर आप
शायद यह कहेंगे कि जब वे साधन करेंगे तब मैं उनका उद्धार करूँगा। किन्तु हे स्वामिन! जब तक आपकी कृपा
नहीं होती, तब तक साधन भी व्यर्थ हो जाते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी कृपा हो जाय तो संसार की व्यथा स्पर्श भी
नहीं करेगी। हे कृपानिधि! हे अनंता, कृष्णनाथा! मेरी विनती सुनें। तुम्हारी मोक्षफल रूपी जो कथाएँ हैं, उस
कथामृत का सिंचन कर सबका उद्धार करें। तुम्हारे मुख से कथामृत का एक बिन्दु भी प्राप्त हुआ तो वह संसार
सर्प का विष उतार कर स्वानंद-सुख उत्पन्न करता है। अब आपका आग्रह सभी लोगों का उद्धार करने के प्रति
क्यों है? लोग मेरी जैसी विनती नहीं करते हैं। ऐसी कल्पना यदि आपके मन में आ रही हो तो मेरा यह कहना है
कि जैसे कोई अन्धा व्यक्ति यदि अन्धे कुएँ में पड़ा दिखाई दे तो देखने वाले को उसको बाहर निकाल कर अच्छे
मार्ग पर लगाना चाहिये, उसी प्रकार ज्ञानंध लोग दुःख में डूबते रहते हैं, उनका उद्धार करें ऐसी मेरी आपसे
प्रार्थना है। अब यह पूछोगे कि ये लोग अन्धे कैसे हो गये? तो उन्हें संसाररूपी सर्प ने ग्रस लिया है इसलिये वे
आत्मसुख भूल कर विषयसुख के मोह में फँस गये हैं। श्रीकृष्ण! सचमुच आप ऐसे दीनजनों का उद्धार करें।
इतना कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरण पर मस्तक रख दिया और प्रार्थना की। भक्त की ऐसी विनती सुनकर भक्तों
का प्रभु प्रसन्न हो उठा। वह अब उसे एक उत्तम सभा का ज्ञान देगा। उस सभा में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण, देवर्षि