श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें४९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवान् नानुमानिकः ।
मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि संन्यसेत् ॥ १ ॥
(भगवान कहते हैं) वेदशास्त्रों में जो पारंगत; श्रवण मनन के अभ्यास से युक्त तथा जिन्हें स्वानुभव से
ब्रह्मविद्या साध्य है; लेकिन वह अनुभव ऐसा है जिसमें रस्सी को सर्प समझने का भ्रम अपने आप ही नष्ट हो
जाता है उसी प्रकार उसका भवभ्रम दूर हो जाता है; स्वांग करने वाले राजा-रानी जिस प्रकार प्रेम की झूठी
क्रीड़ा का ही अभिनय करते हैं उसी प्रकार प्रकृति पुरुष दोनों ही मिथ्या हैं यह वह जानता है। दीवार पर
अनेक प्रकार के चित्रविचित्र चित्र बनाये जाते हैं लेकिन जिस प्रकार वह वास्तव में एक दीवार ही रहती है,
उसी प्रकार समस्त चराचर एकरूप है यह वह जानता है; अथवा स्वप्न में अनेक प्रकार के कर्म दिखायी देने
पर भी जागृति में उसका कोई बन्धन नहीं होता, उसी प्रकार मैं यह जीव और प्राण हूँ और मैं यह कर्म करता
हूँ यह सब मिथ्या है यह जो जानता है; ऐसी स्थिति को कहते हैं, 'शुद्ध आत्मप्राप्ति' इसी को वास्तव में
'निजानुभव' कहते हैं। हे सात्वतकुल के भक्तशिरोमणि! उसकी एक और भी पहचान है। वह यह कि वहाँ
विषयोपभोग के बिना ही स्वानंद रहता है। इस प्रकार के अनुभव के बिना जो शाब्दिक ज्ञान होता है उसे केवल
'आनुमानिक' ज्ञान ही समझो, उद्धव! जिसके अनुभव में अनुमान का प्रवेश नहीं है, जो निरन्तर अपरोक्ष
साक्षात्कार में ही विचरण करता रहता है, ऐसे पुरुष को ज्ञान का साधन और वृत्तिरूप ज्ञान का त्याग करना
चाहिये। वैसे भी इसका अपने आप त्याग हो जाता है जिस प्रकार सूर्योदय होते ही चन्द्रमा के साथ नक्षत्रों का
तेज भी नष्ट हो जाता है, मारुति को आते देख नवचंडी (अहिरावण की देवी) भागने लगती है फिर अन्य भूतों
की क्या बात की जाय? उनके सामने खड़े होने का भी साहस नहीं होता। उसी प्रकार मेरे साक्षात्कार से उसे
वास्तव में कोई बाध्यता ही नहीं रह जाती। फिर उसकी निवृत्ति के बाद ज्ञान कैसे बचा रह पायेगा? मेरे
अनुभव में बन्ध और मोक्ष दोनों मिथ्या हैं। उद्धव! वहाँ साधन ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है। परमात्मस्वरूप
में बंध और मोक्ष दोनों ही मायास्वरूप हैं। इसलिये वहाँ ज्ञान और ध्यान का त्याग न करने पर भी त्याग हो ही
जाता है। लेकिन ज्ञान का और ध्यान का त्याग होने पर भी ज्ञानी को मेरी नितांत प्रीति रहती है। वही प्रीति का
लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्च संमतः।
स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः ॥ २॥
मुझ अद्वयानंदस्थिति रूप के प्रति ज्ञानी जनों में काफी प्रीति रहती है। उद्धव! उस प्रीति का लक्षण सुनो।
ज्ञानीजनों को प्रिय मैं स्वयंभू परमात्मा, ज्ञानियों का परम लाभ, उनकी जीवच्च कंठश्च निधि, ऐसा मैं पद्मनाभ हूँ।
ज्ञानियों का उत्तम स्वर्ग मेरे सिवा कोई है ही नहीं। उसी प्रकार ज्ञानियों का मोक्षभाग वह भी मैं निजात्मा श्रीरंग
हूँ। मैं परमात्मा नारायण ही ज्ञानियों का स्वधर्मसाधन हूँ अर्थात् ज्ञानियों को मेरे सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं
देता। ज्ञानियों के लिये मेरे सिवा स्वर्गसुख या मोक्षसुख रह ही नहीं जाता। वे अपने शुद्ध भक्तिभाव से मेरे
सर्वव्यापी चिदात्म-स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। ज्ञानियों का अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ संब कुछ एक मैं पुरुषोत्तम ही
हूँ। इसलिये आद्य, अव्यय तथा अनंत ये मेरे निजसुख उन्हें प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञाताओं को मुझसे प्रीति रहती है,
इसलिये वे भी मुझे प्रिय हैं। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव को बता रहे हैं।