श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आया हूँ। छत्र केवल एक ही ताप दूर करता है लेकिन तुम्हारे चरण का छत्र कुछ विशेष ही है। वह त्रिविध तापों
के साथ सारा संताप दूर कर संसार को पापरहित कर देता है। कोई अपने ही मन से तुम्हारी शरण में आया। कोई
बैर करके ही तुम में विलीन हो गया, किसी ने भावार्थ से तुम्हारा भजन किया तो किसी ने भयभीत होकर तुम्हारा
स्मरण किया; कुछ तुम्हारे कुल के होने के कारण तुम्हारे सुहृद बन गये, कुछ स्नेह के कारण तुमसे प्रेमबद्ध हो
गये, कुछ काम तंत्र से अंग-संग कर तर गये तो कोई आज्ञाधारी सेवक बन कर रहे। सारांश, अनेक प्रकारों से
विचित्र ढंग से जिन्होंने तुम्हारे चरण छत्र का आश्रय लिया, उनके सामने संसार भय नहीं टिक सकता। भक्त हो,
बैरी हो अथवा अपना हो उन सबको ही तुम अपना निजपद देते हो। तुम्हारी उदारता महान है। तुम सबके स्वानंद
बोध हो। होम हवन करके अग्नि को जो भी अर्पण किया जाता है, उसे अग्नि अपने जैसा कर देता है, यदि
गलती से भी उसमें कुछ गिर जाय तो उसकी भी वही गति होती है। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण! किसी कारण से भी
जो तुम्हारे पास आते हैं, उनकी सांसारिक पीड़ा दूर कर उन्हें समत्व से तुम अपने पद तक पहुँचाते हो। तुम्हारा
चरणरूप छत्र त्रिविध तापों का निवारण कर सदा सर्वदा परमामृत की वर्षा कर रहा है। इसीलिये मैं उनकी शरण
में हूँ। जिस संसार के भय से मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ उस भवभय का स्वरूप उद्धव स्वयं ही बता रहे हैं।
दष्टं जनं सम्पतितं बिलेऽस्मिन् कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम् ।
समुद्धरैनं कृपयाऽपवर्ग्यैर्वचोभिरासिञ्च महानुभाव ॥ १०॥
लोग संसाररूपी गुफा में फँस कर गृहदारारूप कुएँ में गिर गये हैं। उसमें भी कालरूपी सर्प ने काट लिया
है। वे वेदनायें तो और भी भयानक हैं। उस कालरूप सर्प का विष क्षण-प्रतिक्षण शरीर में चढ़ रहा है; फिर भी
लोग अभिमान के भुलावे में विषयसुख की इच्छा करते ही हैं। कालसर्प का प्रताप कुछ विचित्र ही है। उसने विष
जैसे कडुए विषय को भी मधुर बना दिया है और अत्यन्त मधुर परमार्थ को जीव भाव से कडुआ बना दिया है।
विषय विष से भी ज्यादा भयंकर हैं। विष एक ही बार मारक होता है किन्तु विषय बार-बार वार करते रहते हैं।
कालसर्प ने लोगों पर इतनी अधिक मोहिनी डाल रखी है। विषय एक शुद्ध विष है। मूर्ख लोग ही उसकी ओर
मोहित होते हैं और विषयों की तृष्णा बढ़ाते हैं। ऐसे जो दुःख में डूबे हुए लोग हैं उनका उद्धार करें। इस पर आप
शायद यह कहेंगे कि जब वे साधन करेंगे तब मैं उनका उद्धार करूँगा। किन्तु हे स्वामिन! जब तक आपकी कृपा
नहीं होती, तब तक साधन भी व्यर्थ हो जाते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी कृपा हो जाय तो संसार की व्यथा स्पर्श भी
नहीं करेगी। हे कृपानिधि! हे अनंता, कृष्णनाथा! मेरी विनती सुनें। तुम्हारी मोक्षफल रूपी जो कथाएँ हैं, उस
कथामृत का सिंचन कर सबका उद्धार करें। तुम्हारे मुख से कथामृत का एक बिन्दु भी प्राप्त हुआ तो वह संसार
सर्प का विष उतार कर स्वानंद-सुख उत्पन्न करता है। अब आपका आग्रह सभी लोगों का उद्धार करने के प्रति
क्यों है? लोग मेरी जैसी विनती नहीं करते हैं। ऐसी कल्पना यदि आपके मन में आ रही हो तो मेरा यह कहना है
कि जैसे कोई अन्धा व्यक्ति यदि अन्धे कुएँ में पड़ा दिखाई दे तो देखने वाले को उसको बाहर निकाल कर अच्छे
मार्ग पर लगाना चाहिये, उसी प्रकार ज्ञानंध लोग दुःख में डूबते रहते हैं, उनका उद्धार करें ऐसी मेरी आपसे
प्रार्थना है। अब यह पूछोगे कि ये लोग अन्धे कैसे हो गये? तो उन्हें संसाररूपी सर्प ने ग्रस लिया है इसलिये वे
आत्मसुख भूल कर विषयसुख के मोह में फँस गये हैं। श्रीकृष्ण! सचमुच आप ऐसे दीनजनों का उद्धार करें।
इतना कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरण पर मस्तक रख दिया और प्रार्थना की। भक्त की ऐसी विनती सुनकर भक्तों
का प्रभु प्रसन्न हो उठा। वह अब उसे एक उत्तम सभा का ज्ञान देगा। उस सभा में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण, देवर्षि