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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 869 में से

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पृष्ठ 509

अट्ठारहवाँ अध्याय ४९३
किये क्षुद्र मनोरथ भी पूर्ण नहीं होता। जिस धन को देकर अमृत प्राप्त होता है, उसकी जगह मद्य खरीदने से
अधर्म होता है, मद बढ़ता है, पागलपन की हलचल करता है जिससे सारा संसार उस पर थूकता है। अपने पति
से रममाण होने पर पतिव्रता को परलोक प्राप्त होता है लेकिन यदि वह परपुरुष से रममाण होती है तो वह पतन
की ओर जाती है। जिह्वा अगर दुरुक्ती बोलती है तो यम मस्तक पर प्रहार करता है लेकिन यदि वह जिह्वा 'राम
राम' कहे तो हरिभक्तों से यम भी काँपता है। उसी प्रकार उत्तम जन्म लेकर सकाम कर्म करने से अत्यन्त दुःख
भोगना पड़ता है और बार-बार जन्म-मृत्यु भोगनी पड़ती है। लेकिन वही देह यदि स्वधर्माचरण करे तो सभी
कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्म-मरण के फेरे चुक जाते हैं। लेकिन यह मर्म कितने ही लोगों की समझ में
नहीं आता। स्वधर्म से भगवान की भक्ति सम्भव है यही इसका गूढ़ रहस्य है। उद्धव! यही बात मैं तुम्हें यथार्थ
ढंग से बताऊँगा। स्वधर्म पर आचरण करना अनिवार्य है, लेकिन उसमें फल की आशा छोड़नी चाहिये। इसमें
संकल्प न करने पर भी वह मुझे अर्पण होता है। अरे! यदि घर के मटके में मोतियों का ढेर मिल जाय तो फिर
ताम्रवर्णी नदी का समुद्र से मिलन स्थल खोजने की क्या आवश्यकता है? यदि अपने ही घर के वृक्ष कल्पवृक्ष
की तरह फल देने लगे तो अमरावती जाने की क्या आवश्यकता है? अथवा सद्गुरु का तीर्थ लेने पर पवित्रता
प्राप्त होती है तो फिर इधर-उधर के सैकड़ों तीर्थों की ओर दौड़ने की क्या आवश्यकता है? अथवा यदि ईश्वर
भावना से पिता की पूजा करने से मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर ज्ञाता लोग देवी-देवताओं को क्यों भजें? उसी
प्रकार स्वकर्म करते समय ही निष्कर्मता प्राप्त होती है परन्तु उसी स्वधर्म में फल की इच्छा रखने पर प्राणी
अपने वास्तविक स्वार्थ से भटक जाते हैं। निर्विकल्प मन से स्वधर्मचरण करने का ही नाम है 'मेरा शुद्ध
भजन'। उसी भजन से प्रसन्न होकर मैं अपने भक्तों को विवेकयुक्त वैराग्य और ज्ञान देता हूँ। उसी ज्ञान से बुद्धि
पवित्र होती है। चित्त शुद्ध होता है तो मेरी 'परमभक्ति' उत्पन्न होती है और हे उद्धव! उसी भक्ति से भक्तों को
मेरे श्रेष्ठ स्वरूप की प्राप्ति होती है। इसलिये निष्काम स्वधर्माचरण ही मेरा उत्तम भजन है। उस भजन से ही जो
भक्तों में उत्तम होते हैं वे स्वयं पुरुषोत्तम होकर रहते हैं। इस प्रकार, स्वधर्म में ही हमें मुक्ति प्राप्त होती है यही
बात तुम्हें विस्तार से बतायी।
एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम्।
यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम्॥४८॥
उद्धव! तुमने पूछा था कि स्वधर्म से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? और मैंने उत्तर दिया था, भक्ति से। स्वधर्म
हाथ में आते ही स्वकर्म का तत्काल विनाश होता है और संसार का सारा भ्रम दूर होता है। इस प्रकार स्वधर्म से
परमपद की प्राप्ति होती है। मुझे प्राप्त करना हो तो स्वस्वकर्म अर्थात् स्वधर्म का निष्काम भाव से आचरण करना
चाहिये। यह मर्म जिसकी समझ में आ गया, समझ लो पुरुषोत्तम उसके वश हुआ। स्वस्वधर्म जैसे पारस पत्थर
निर्विकल्प ढंग से प्राप्त होने पर उसे दूष्य पदार्थों में लगाते ही वे सारे पदार्थ चिन्मात्र सुवर्ण अर्थात् ब्रह्ममय ही हो
जाते हैं। स्वधर्म जैसे सूर्य का निष्कामता से अंतःकरण में उदय होते ही वह अज्ञानरूपी रात्रि को नष्ट कर
सदासर्वदा स्वप्रकाश से ही विचरण करता है। स्वधर्म का अमृत जो निष्काम भाव से सेवन कर पाते हैं उन्हें मैं
जन्म-मरण के जाल में फँसने ही नहीं देता। लेकिन जो स्वधर्म से विमुख हो जाते हैं उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं होती।
वे मूर्ख सकाम होने के कारण करोड़ों जन्म तक असह्य दुःख भोगते रहते हैं। स्वधर्म से स्वकर्म करते समय यदि
निष्काम होने का मर्म मालूम हो जाय तो वे जन्म-मरण के जाल से बच कर परब्रह्मस्वरूप तक पहुँचते हैं। इस