श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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जाता है, वहाँ वह मुझे ही देखता है। इस प्रकार ऐसा नहीं कि विस्मरण को ही मृत्यु आती है; अपितु स्मरण भी
नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो ज्ञानविज्ञानसम्पन्न लोग हैं उन्हें मेरे सिवा कुछ भी दिखायी नहीं देता। उसी प्रकार
अनन्य भजन करने का ही नाम 'शुद्धभक्ति' है यह जान लो। पूर्व में भी बड़े-बड़े मुनिवर्यों ने इसी प्रकार मेरी
एकनिष्ठ भक्ति कर मुझे प्राप्त किया। उसके बारे में भी बताता हूँ।
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६॥
ज्ञानधन से अत्यन्त सम्पन्न तथा विज्ञान से परम पवित्र ऐसे जो ब्रह्मस्वरूप ब्राह्मण हैं वे यज्ञ के द्वारा मेरा
यजन करते हैं। वे अपने हृदय मन्दिर में (अथवा यज्ञमण्डप में) विकल्परूपी जमीन खोद कर श्रद्धा के आकार
से काम, दम और विरक्ति ये तीन कुण्ड तैयार करते हैं। उसमें क्षर और अक्षर (जीव और शिव) इन दो अरणियों
(अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ) को लेकर गुरुमन्त्र से मंथन कर निकाला हुआ निर्धूम, सूक्ष्म अग्नि उस
कुण्ड में डाल कर उसे प्रज्वलित करते हैं। शुद्धसत्त्वरूपी घृत में रजतमादि होमद्रव्य मिलाकर, युक्ति के मंत्रों से,
वैराग्यरूपी स्रुवा से (लकड़ी की करछुल) उसमें आहुति देते हैं। तदुपरान्त विद्यारूप तीक्ष्ण अस्त्र हाथ में ले कर,
संकल्परूपी पशु को मार कर यज्ञ के स्वामी अनन्त को उस निजबोध से सन्तुष्ट करते हैं। उसमें पूर्णाहुति के
लिये जीवभाव की आहुति देने से यज्ञभोक्ता अर्थात् मैं नारायण सन्तुष्ट होता हूँ। इस प्रकार मेरा यजन कर अनेक
मुनीश्वर जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मेरे स्वरूप तक पहुँच गये। बड़े-बड़े ऋषियों ने जो सिद्धि प्राप्त कर
ली वही उद्धव को भी प्राप्त हो सके इसलिये कृपासागर श्रीकृष्ण उसे प्रपंच का निषेध कर वस्तुतत्त्व का निरूपण
कर रहे हैं।
त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायान्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत्।
जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्युराद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये॥ ७॥
'मैं उद्धव हूँ' यह कहते समय तुम सचमुच कौन हो? तो तुम्हें तुम्हारे स्वरूप की कथा सुनाता हूँ। जन्म,
स्थिति और मृत्यु इन तीन विकारों का कारण त्रिगुण हैं और उनकी अधिष्ठात्री माया है; लेकिन उसे तुमसे ही
गति मिलती है। माया आदि से लेकर सभी कार्यों में अंतर्बाह्य तुम्हारा ही आश्रय है। तुम्हारे ही कारण उन्हें
चपलता अर्थात् चलन वलन (हिलना डोलना) प्राप्त हुआ है। तुम उनसे भिन्न चिदात्मा हो। मेरे कारण गुणकर्मों
में चलनता आयी यह कहें तो प्रपंच में सत्य आयी; वास्तव में यह सारा संसार मायामय है तथा मृगजाल का
आभास है। जो भी कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है, सत्य नहीं है। प्रपंच का सारा भान तो मृगजल की
तरह है। तुम जन्म-मरण से अलग हो, त्रिगुणों को स्पर्श न करने वाले तथा सचमुच ही प्रपंच से अलिप्त हो।
कैसे? तो सुनो। प्रपंच से अलिप्त रहने का तरीका यही है। उस युक्ति की परम प्रतीति यही है कि उत्पत्ति, स्थिति
और लय इनमें प्रपंच का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है। उत्पत्ति से पूर्व प्रपंच नहीं होता; और अन्त में भी कुछ
शेष दिखायी नहीं देता। बीच के काल में जिसका भास होता है वह भी मायामय होने के कारण मिथ्या है। प्रपंच
के, अर्थात् सृष्टि के पूर्व परब्रह्म ही रहता है, अंतकाल में भी निरूपम वही शेष रहता है और सृष्टि के
स्थितिकाल में भी ब्रह्म ही रहता है, भ्रमिष्ट लोगों को अवश्य ही संसार का मिथ्या भ्रम होता है। सूर्य के पहले
भी मृगजल का अस्तित्व नहीं होता और अस्त के बाद भी शेष नहीं रहता; बीच के काल में भी जो आभास होता
है उसमें भी पानी का अंशमात्र भी नहीं होता। रज्जु सर्प भी पहले रस्सी के ही रूप में रहता है और अन्त में भी