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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

अठारहवाँ अध्याय ४९१
प्रमुख लक्षण हैं। गृहस्थाश्रम के लिये जो धर्म बताया गया है उसे अन्य आश्रमधर्मी न करें। किन्तु अन्य आश्रम
के कुछ धर्म गृहस्थाश्रम वाले करें तो कोई हर्ज नहीं है।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं संतोषो भूतसौहृदम्।
गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥४३॥
गृहस्थ को निष्पाप होने के लिये आवश्यक जप और तप करना चाहिये और अंतःशुद्धि तथा बाह्यशुद्धि इन
दो शुद्धियों को अवश्य साधना चाहिये। मन की छटपटाहट को छोड़, जितना मिले उतने ही में संतोष मानना
चाहिये। सब का सुहृद समझ कर परोपकार करने की इच्छा रखनी चाहिये। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का यही
लक्षण है कि केवल ऋतुकाल में स्वस्त्री से रममाण हो। मुख्यरूप से मेरा भजन करना यह सभी का स्वधर्म है।
सभी वर्णों को और सभी आश्रमों को यही स्वधर्म है कि विषयों की आसक्ति छोड़ मेरा भजन करें। स्वधर्म से
मेरी भक्ति करने पर भक्तों को क्या प्राप्त होता है वह श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
इति मां यः स्वधर्मेण भजन्नित्यमनन्यभाक्।
सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥४४॥
एकनिष्ठा से तथा स्वधर्म से मेरी भक्ति करने से समस्त भूतों में मेरी भावना दृढ़ होती है। सभी प्राणियों में
मेरी भावना पैदा होने पर, जिसके पैरों पर चारों मुक्तियाँ गिरती हैं वह मेरी चौथी भक्ति प्रकट होती है। असीम
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