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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 869 में से

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पृष्ठ 511

उन्नीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु ! हे त्र्यंबक ! हे ब्रह्मगिरि पर वास करने वाले ! हे त्रिगुण, त्रिपुट का भेद करने वाले !
हे कामांतक गिरिजेश ! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा अनुहत शब्दरूप डमरू का गजर चारों ओर सुनाई पड़ता है और
निरन्तर वेदानुवाद से वह कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन विभागों में गरजता रहता है। तुम्हारे हाथ में जो खड्गसम
शस्त्र है वह जीवों का संहार करता है और अनंग का अंग जलाकर ही स्वस्वरूप प्राप्ति करा देता है। हे त्रिनयन
त्रिंबकलिंग। चित्प्रकाशगर्भा शंकर ! तुमसे ही (गोदावरी रूप) चिद्गंगा का प्रवाह बहता रहता है जो अपनी
पवित्रता से सारे संसार को पावन कर देता है। दो नेत्र तो स्पष्ट दिखाई ही देते हैं और तीसरा ज्ञाननेत्र गुप्त है।
इसलिये बिना नेत्र के ही दिखाई देने वाले तुम त्रिलोचन हो। तुम अपने शरीर पर, बोधरूपी चन्द्र धारण करते हो,
इसलिये तुम 'चन्द्रशेखर' हो और वास्तव में चन्द्रसूर्यादि सारा चराचर तुम्हारे ही कारण प्रकाशित होता है। 'भव'
की बड़ी ख्याति है किन्तु तुम्हारी चिच्छक्ति भवानी ही उस भव को प्रकाशित करती है। विष्णु तुम हो, ब्रह्मदेव
तुम हो और अन्त में संहार करने वाले रुद्र भी तुम ही हो। हे प्रलयकाल के प्रलयरुद्र ! हे चित्समुद्र शिवरूपा
सद्गुरो ! नामरूप का आकार मोड़कर तुम सारे जीवों को एकरूप कर देते हो। हे गुरुराया ! शिव-शिव कह कर
निजभाव से तुम्हारे पैरों में लगते ही तुम्हारे निजरूप दिखाने से गुरु शिष्य भाव विलीन हो जाता है। वह
निजस्वरूप एक बार दिखायी दे जाय तो फिर जीव किस बात का ? और सृष्टि भी कैसी ? तीन गुणों के साथ
त्रिपुटी ही समाप्त हो जाती है और स्वानंद से भेंट होती है। उस स्वानंद के उद्गार सँभाले नहीं सँभलते। उस
स्वानंद का सार ही है ग्यारहवाँ स्कन्ध। उसमें भी अत्यन्त गहन स्वानंदसुख का निरूपण जिसमें किया गया है
वह है उन्नीसवाँ अध्याय। वह शास्त्रप्रमाणों से भी सिद्ध है। वह निरूपण सुनाते ही परमानन्द उफन उठता है।
इसलिये एका जनार्दन से विनती करता है कि श्रोतागण मेरी ओर ध्यान दें। सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में,
स्वधर्म कर्म से ही ब्रह्मप्राप्ति होती है इसलिये वर्णाश्रम के सारे प्रकार उद्धव को बताये। अब उन्नीसवें अध्याय में
जिस ज्ञान से आत्मज्ञान साध्य किया हो, उसका त्याग लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं। जीवन्मुक्त के लिये कर्म-
कर्तव्यता-कारण नहीं होता, इसलिये उद्धव के 'यम', आदि प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण ही देंगे। शास्त्रयुक्त, पांडित्य
का ज्ञान अथवा उसने किया हुआ प्रपंच का मिथ्यत्व निरूपण वह सब आनुमानिक तथा किताबी ज्ञान है। उसमें
जरा भी तथ्य नहीं है। हमें पूर्व की ओर जाना है यह एक शुद्ध स्मरण है किन्तु दिशा भूल जाने पर वह पश्चिम
को ही पूर्व मानते लगता है; उसी प्रकार शाब्दिक शास्त्रज्ञान है। बोलते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं इसलिये
साधक का कभी समाधान नहीं होता। वही दिशामूल समाप्त हो जाय तो जिस प्रकार वह पूर्व पूर्व की ही ओर
जाने लगता है उसी प्रकार अनुभव ज्ञान प्राप्त होने पर साधक को परमानन्द का नाम प्राप्त होता है। वह जिस
वेदान्त का श्रवण करता है, वह स्वयं ही होता रहता है। ऐसा होना यही आनुभविक ज्ञान का सच्चा और शुद्ध
लक्षण है यह ध्यान में रखो। ऐसा आनुभविक ज्ञान प्राप्त होने तक श्रवण और मनन नहीं छोड़ना चाहिये। इतना
ही नहीं, 'प्रत्यगावृत्ति' साधन अर्थात् आत्मानुसंधान का अभ्यास अवश्य करना चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त होने
पर प्रपंच का भान मिथ्या लगने लगता है। विषयों पर पानी पड़ जाता है और कल्पना पिघल जाती है। जो पुरुष
यह करे उसे ही ज्ञान साधन का त्याग करना चाहिये। यही सारा निरूपण भगवान कर रहे हैं।