श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 513, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ४९७
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धाः पदं श्रेष्ठं विदुर्मम ।
ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥ ३ ॥
ज्ञान और विज्ञान की सम्पदा प्राप्त किये बिना मेरी प्राप्ति अर्थात् स्वस्वरूपस्थिति कभी भी किसी को प्राप्त
नहीं हो सकती। गुरुमुख से शास्त्रशुद्ध श्रवण करने से जो प्राप्त होता है, उसे 'ज्ञान' कहते हैं; और उसके
प्रत्यक्षानुभव को 'विज्ञान' कहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। स्वयं तैयार की हुई रसोई जब तक चख कर नहीं
देखी जाती तब तक वह कड़वी है, मधुर है या नमक अधिक है यह ठीक से नहीं मालूम होता। इस स्थिति को
ज्ञाता लोग 'ज्ञान' कहते हैं और उसके रस की माधुरी स्वयं चख कर देखने से जो स्थिति प्राप्त होती है उसे
'विज्ञान' कहते हैं। सारांश, मेरे सर्वोत्तम पद की प्राप्ति के लिये 'ज्ञानविज्ञान' की सम्पत्ति ही कारणीभूत है। इस
प्रकार जो मेरा वास्तविक स्वरूप जानते हैं उनसे मुझे अनन्य प्रीति होती है। वेद, शास्त्र अथवा युक्ति से मेरा
स्वरूप नहीं जाना जा सकता। उसका जिसे आकलन होता है उसके सिवा मुझे कुछ प्रिय नहीं है। उसका लक्षण
यही है कि उसके प्रत्येक पग पर मैं अपना देह आगे करता हूँ। इतना ही नहीं, बल्कि मैं उस पर अपना सब कुछ
न्योछावर करता हूँ। उसे जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है उसे मैं बिना माँगे ही दे देता हूँ और उसमें यदि
कोई बाधा आती हो तो स्वयं उसे दूर करता हूँ। उसे सांसारिक आँधी का कहीं कोई कष्ट न हो इसलिये मैं स्वयं
उसका सामना करता हूँ। इतना मैं उस पर आसक्त हो उठता हूँ। ज्ञानी जिस ज्ञान से मुझे प्रिय हैं, उस ज्ञान की
पवित्र कीर्ति यथार्थ ढंग से भगवान आत्मज्ञानपूर्वक उद्धव को बता रहे हैं।
तपस्तीर्थे जपो दानं पवित्राणीतराणि च।
नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता ॥ ४ ॥
सारे साधनों से जो शुद्धि नहीं होती, वह निश्चय ही ज्ञान के एक अंश से होती है। हे बुद्धिमान उद्धव! इस
ज्ञानशुद्धि की महिमा सुनो। पंचाग्नि साधन से तप किया अथवा गंगा, त्रिवेणी आदि तीर्थों के दर्शन किये, अनेक
मंत्रों का जप किया अथवा गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण आदि का दान किया; अथवा और भी अन्य पवित्र
'स्वधर्मकर्मादि' आचार किये, अथवा 'योग', 'अग्निहोत्र', नाना प्रकार के 'यज्ञ' आदि अत्यन्त शुद्ध और पावन
करने वाले जो कर्म किये वे तपादिक साधन हैं उनकी शुद्धि महान है, लेकिन उनकी पवित्रता ज्ञान के अल्पांश
भी नहीं है। आधे क्षण की ज्ञाननिष्ठा से जो पवित्रता प्राप्त होती है उसे तपादि साधन नाना साधनों से कल्पांत में
भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे। ऐसा जो पवित्र ज्ञान है उसे मुख्य रूप से धारण कर मेरा भजन करें यही बात श्रीकृष्ण
निरूपित करते हैं।
तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो भज मां भक्तिभावितः ॥ ५ ॥
इसलिये हे उद्धव ! ऐसा जो ज्ञान का पवित्र प्रवाह है, उसमें निजभाव को प्रक्षालित कर, जीव
परमात्मस्वरूप ही है यह पहचान लें। जीव और परमात्मा दोनों एक हैं यह जानना 'ज्ञान' है और ऐक्यभाव से
परमात्मसुख का भोग करना 'विज्ञान' है। इस प्रकार ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न होकर मेरा भजन करें। उद्धव ! मेरे उस
भजन के लक्षण सुनो। यह यत्र-तत्र जो कुछ भी देखता है वहाँ उसे मेरे सिवा कुछ भी नहीं दिखायी देता। फिर
वह उन-उन स्थानों पर अनन्य भाव से भजन करने लगता है। अहोरात्र चलने वाले मेरे ऐसे भजन में कभी खण्ड
नहीं पड़ता। जागृति हो, स्वप्न हो अथवा सुषुप्ति हो मेरे भजन में बाधा नहीं आती। मुझे भूल कर वह जहाँ भी