श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार संसार में स्वधर्म तारने वाला ही होता है। स्वधर्मरूप नौका पर बैठकर मेरे कितने ही भक्त संसार सागर पार
कर गये। लेकिन 'पार कर गये' यह कहना भी गलत है क्योंकि मेरी प्राप्ति की इच्छा से स्वधर्म का आचरण
करने पर संसार सागर बिलकुल सूख जाता है और मुझ परमात्मा से उनकी सामने ही भेंट होती है। निष्काम भाव
से होने वाले स्वधर्माचरण का इतना माहात्म्य है। भगवान को भी वह अत्यन्त प्रिय होने के कारण उन्होंने अनेक
प्रकार से यह बात उद्धव को समझायी। भागवत भक्तिप्रधान है, उसकी भक्ति स्वधर्मयुक्त है। इस स्वधर्म भजन से
ही समस्त श्रेष्ठ भक्तों का उद्धार हो गया। उस स्वधर्म कर्म का रहस्य और आत्मभजन भक्ति का भावार्थ श्रीकृष्ण
ने उद्धव को ग्यारहवें स्कन्ध में बतलाया। उस ग्यारहवें स्कन्ध की बातें मानों स्वधर्म कर्म की कसौटी है। श्री
जनार्दन की कृपादृष्टि से ही एकनाथ ने मराठी भाषा में टीका लिखी। यह काम जनार्दनजी ने ही किया और
काव्य में मेरा नाम लिख दिया और अन्त में इस निरूपण से तो उन्होंने 'मैं' और 'तू' का भेद ही समाप्त कर
दिया। विषय का विषयपन ही नष्ट कर दिया, भेद का भान उड़ा दिया और जीव-शिव का भाव समाप्त कर
दिया। जनार्दनरूप पिता ने हमारे लिये परब्रह्म खिलौना बना दिया। इसलिये उसके कारण जो-जो क्रियाएँ होती हैं
वे सब अपने आप स्वधर्म से ही घटती हैं। स्वभावतः स्वधर्म से कर्म निष्कर्म होता है और संसार ही परब्रह्म हो
जाता है। जनार्दन की यही बहुत बड़ी कृपा है। इसलिये एकपन छोड़ कर एका जनार्दन की शरण में गया।
इसलिये उनकी ही कृपा से स्वधर्म कर्म का निरूपण सम्पूर्ण हुआ।
इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध के श्रीकृष्णोद्धव संवाद का एकनाथकृत टीका का
'वानप्रस्थ संन्यास धर्म निरूपण' नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ॐ तत्सत्-श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां वानप्रस्थ संन्यास निरूपण नाम अष्टादशोध्यायः ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।