सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 515

उन्नीसवाँ अध्याय ४९९
रस्सी के ही रूप में शेष रहता है। बीच के अन्तराल में जब सर्प का भास होता है तब भी वही रस्सी ही रहता
है। हे उद्धव! इस प्रकार आदि और अन्त का विचार करें तो ब्रह्म ही सत्य है, प्रपंच (संसार) मिथ्या है और
वेदशास्त्र भी इससे सहमत हैं। इस प्रकार इस प्रपंच में कितना भी परिवर्तन हुआ और जन्म-मरण के करोड़ों
चक्र चलते रहे तो भी हे उद्धव! उनसे तुम्हारा सम्पर्क ही नहीं होगा। क्योंकि तुम प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों
तीरों से नित्यमुक्त ही हो। उद्धव! निर्गुण, निःसंग, निर्विकार, अज, अव्यय, अक्षर, अनंत और अपार जो ब्रह्म है,
वही सचमुच तुम हो। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव ने मन में गाँठ बाँध ली। हर्ष उसके मन में समा नहीं
रहा था। उसे अपने लिये यह सृष्टि छोटी मालूम होने लगी। 'तुम ब्रह्म हो' ऐसा श्रीकृष्ण ने कहते ही उद्धव
खुशी से नाचने लगा। यह देख कर श्रीकृष्ण को समाधान हुआ। श्रीकृष्ण अपने मुख से 'तुम पूर्ण ब्रह्म हो' ऐसा
कहते हैं, इससे वह स्वयं धन्य समझने लगा। मेरा जैसा भाग्यवान और कौन है? ऐसा विचार मन में आकर
उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन किया। 'तुम स्वयं ही परब्रह्म हो' इसका अर्थ वह श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथैतद् वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम्।
आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्ते त्वद्भक्तियोगं च महद्विमृग्यम्॥८॥
(उद्धव बोले) हे विश्ववसेना! हे विश्वेश्वर! विश्वमूर्ते! विश्वंकर श्रीकृष्ण! जिसके योग से
महासाक्षात्कार हो ऐसा निश्चित ज्ञान मुझे बतायें। जो केवल ज्ञान देते रहते हैं उन्हें मैं निरा मूर्ख ही समझता हूँ।
इसलिये जिससे जीव का बन्धन टूट जाये ऐसी प्रखर वैराग्ययुक्ति मुझे बतायें। क्योंकि ज्ञान के बिना वैराग्य अन्धा
रहता है। वह शिलाओं से टकरा कर गिर पड़ता है और वैराग्य के बिना लंगड़ा होता है। उसे युक्ति मालूम रहती
है लेकिन उसका पुरुषार्थ काम नहीं करता। इसलिये विवेक और वैराग्य ये दोनों यदि हृदय मन्दिर में प्रवेश करें
तभी विषयावस्था छोड़कर जीव 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यही समझ कर विचरण करने लगता है। ज्ञान को जब तक
विज्ञान का साथ नहीं मिलता तब तक जीवत्व का विनाश नहीं होता। इसलिये जो जीव और शिव दोनों का ही
निवारण करे ऐसा विज्ञान मुझे बतायें। जिसमें असंभावना का दोष रत्ती मात्र भी नहीं रहता, उसी को 'शुद्ध ज्ञान'
कहते हैं और जिसमें 'विपरीत भावना' बिलकुल नहीं रहती उसी को ज्ञाता लोग विपुल कहते हैं। ऐसा अत्यन्त
शुद्ध और विपुल ज्ञान, उससे युक्त वैराग्य और विज्ञान और उसमें भी श्रेष्ठ तुम्हारा जो भजन हो वह कृपया मुझे
बतायें। हे कृपामूर्ति श्रीकृष्ण! ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य सहित तुम्हारी प्राचीन भक्ति के बारे में भी मुझे निश्चित रूप
से बतायें। तुम्हारी श्रेष्ठ भक्ति की खोज बड़े-बड़े साधु महात्मा भी कर रहे हैं और जीव प्राण लेकर धरना देकर
बैठे हैं। उस भक्ति के बारे में मुझे बतायें। तुम्हारी उत्तम भक्ति करने से त्रिविध तापों का भी क्षय होता है और
मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिये उद्धव विनती कर रहा है।
तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे संतप्यमानस्य भवाध्वनीश।
पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्घ्रिद्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात्॥९॥
जो त्रिविध ताप से दग्ध रहते हैं, कामक्रोध जिन्हें जर्जर कर देते हैं; आशा और तृष्णा में जो डूबे रहते हैं
और जन्म-मरण में लिप्त रहते हैं; संसार के अत्यन्त विकट मार्ग पर जो दुःख के साथ भी नहीं चल पाते, ऐसी
यातना भोगने वाले पुरुष के लिये हरि के पदकमल में ही आश्रय है। तुम्हारे चरण कमल के सिवा शरण जाने के
लिये कोई अन्य स्थान ही दिखायी नहीं देता इसलिये काया, वाचा और मन से मैं भक्तिभाव से तुम्हारी ही शरण