श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
किये बिना संन्यास लेना केवल विडम्बना है। वैराग्य के अभाव में मन लालची रहता है और बुद्धि विषयलंपट
हो जाती है। न ज्ञान, न ध्यान और न साधन केवल उदरभरण के लिये हाथ में दण्ड ले लेते हैं। इसमें अनुताप तो
कभी होने से रहा, श्रवण मनन भी कभी नहीं होगा। आदरपूर्वक कभी साधन भी नहीं करते, ऐसे को कभी
ब्रह्मज्ञान नहीं होगा, उसका संन्यास व्यर्थ, उसका दण्ड व्यर्थ, उसका मुंडन व्यर्थ, उसके भगवे वस्त्र भी व्यर्थ
रहते हैं। वह केवल विदूषक का स्वांग है। संन्यास लेने के बाद काम में उफान आता है, क्रोध और लोभ की
आग भड़क उठती है और मन में चौगुना अभिमान उत्पन्न हो जाता है। अधिकाधिक आसक्त होना, सदैव गाँव के
लोगों के बारे में उलटी-सीधी और गन्दी बातें करना। दण्ड और कौपीन का उपयोग केवल पाखण्ड के लिये
करना। दण्ड ग्रहण करने के लिए ऐसा पुरुष अधिकारी ही नहीं है। संन्यास के बहाने वह अपनी हानि कर लेता
है। वह यज्ञ के अधिकारी देवताओं को उलझाता है, स्वधा के अधिकारी पितृगण को उलझाता है, ऋषि और
भूतगण को भी उलझन में डाल देता है क्योंकि उसके हाथ से किसी भी वस्तु का बलिदान तो होता ही नहीं है।
जीवरूप में मैं परमात्मा स्वयं हृदय में वास करता हूँ लेकिन वह मुझे भी ठगता है। इसलिये जीवों के उद्धार के
लिये जो संन्यास ग्रहण किया जाता है वह केवल बन्धन का कारण बन जाता है। संन्यास ग्रहण यह दृढ़ साधन
होने के कारण क्यों है? इसका निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं। कुछ लोग कहेंगे, यह कुछ विचित्र-सा लगता
है। वास्तव में यह पहले के श्लोकों के तीन चरणों के अर्थ का ही निरूपण है। श्रोतागण ध्यान देकर सुनें।
संन्यास ग्रहण कर वह ज्ञान, ध्यान आदि साधन नहीं करता, ओंकार का जप भी नहीं करता और विषय के
प्रति वैराग्य भी नहीं रखता इसलिये स्त्रियों की अभिलाषा कर वह धन एकत्र करता है और गोदान आदि ग्रहण
कर अर्चन अथवा यजन-याजन कराता है। मठाधिपति होने के नाते धनधान्य का लोभ बढ़ाता है और नाना प्रकार
के कष्ट सहते हुए, जीवात्मा की हानि होती है। इस प्रकार अधर्म करते रहने से जीव को दृढ़ बन्धन अवश्य प्राप्त
होता है और जिस नरदेह के योग से इहलोक और परलोक साधा जाता है उस नरदेह से यह वंचित हो जाता है।
चौरासी लाख योनियों के जब असंख्य फेरे होते हैं तब कहीं भाग्यवान लोगों को नरदेह प्राप्त होता है। इस प्रकार
उस नरदेह को प्राप्त कर यदि स्वयं ही उसे डुबो दिया और अधर्माचरण किया तो उस संन्यासी को नरक की ही
प्राप्ति होगी। अरे! जिसका नाम 'चौथा आश्रम' है और जिसे भगवान भी शिरसावंदन करते हैं, उसमें भी यदि
कोई अधर्म करे तो नरक ही जाना पड़ेगा। जिस नरक में करोड़ों वर्ष भी बीत जाएँ तो पता न चले ऐसे नरक में
वे डूब जाते हैं। जब प्रमुख चतुर्थाश्रम की यह स्थिति है तो अन्य आश्रमों की क्या बात की जाय? इसलिये
श्रीकृष्ण स्वयं उस आश्रमधर्म का उपाय बताते हैं।
भिक्षोधर्मः शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकसः।
गृहिणो भूतरक्ष्येज्या द्विजस्याचार्यसेवनम्॥ ४२॥
संन्यासी के लिये शान्ति प्रमुख है। इसके अतिरिक्त इन्द्रियों का निग्रह होना चाहिये। अहिंसा तो उसका
स्वधर्म है। संन्यासी का श्रेष्ठ धर्म यही है। तपप्रधान मंत्रहोम वानप्रस्थ का स्वधर्म है, और तीनों आश्रमस्थों को
आश्रय देकर सुख पहुँचाना यह गृहस्थ का कर्त्तव्य है। अग्निहोत्र गृहस्थ के लिये प्रमुख है। उसे संन्यासी को
तथा ब्रह्मचारी को अन्न देना चाहिये और प्राणिमात्र का संरक्षण करना चाहिये। उसका मार्ग भी सुन लो। गृहस्थ
याचक को यथाशक्ति भोजन, वस्त्र पात्र, रुपया-पैसा, रहने के लिये तृणपर्ण की झोपड़ियाँ बनवा दें और गरीबों
की रक्षा करे। अब ब्रह्मचारी का स्वधर्म है श्रद्धापूर्वक गुरु की सेवा करना। उद्धव! इस प्रकार आश्रमधर्म के ये