श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पन्द्रहवाँ अध्याय ४३३
तभी भोगविलास और सम्पत्ति के प्रयास सिद्धियों को नग्न कर देते हैं। राजा के साथ जिसका मेलजोल रहता है
उसे रिश्वत लेना सरल रहता है लेकिन सम्भवतः इसी में उनकी मृत्यु हो जाती है। उसी प्रकार साधक के लिये
सिद्धि घातक ही है। इस अध्याय के विषय का प्रतिपादन करने का यही कारण है कि उद्धव ! मेरी प्राप्ति में
सिद्धि ही सबसे बड़ा विघ्न है। एकाग्र भजन से मेरी प्राप्ति का प्रसंग निकट आते ही सिद्धियाँ आ जाती हैं और
उन भोगों की आसक्ति से साधकों को भुलावा देकर उन्हें कंगाल बना देती हैं। जो मेरे आत्मसुख के विषय में
नहीं जानते वे मूर्ख रहते हैं, उन्हें अत्यन्त विषय वासना के कारण इस सिद्धि का अत्यन्त कौतुक मालूम होता है।
वेश्या के जैसे हावभाव रहते हैं वैसे ही सिद्धि का वैभव होता है। उस सबका त्याग करने के लिये भगवान ने इस
अध्याय का निरूपण किया। जिसे मेरा आत्मसुख प्राप्त होता है वह इन सिद्धियों को तुच्छ मानता है। वे जन्म-
मरण की चिन्ता भी नहीं करते। उनके अंतःकरण में मेरे प्रति परिपूर्ण आनन्द भरा रहता है। सद्गुरु चरणों की
सेवा करने से सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ही भर जाता है। फिर सिद्धियों को कौन पूछे ? यह बात हरिभक्त जानते हैं।
हरिभक्ति पर भक्त बिक जाता है, भजन से अहंभाव नष्ट होता है, ऐसे समय सिद्धियों के उपयोग की कल्पना भी
मन में नहीं आती। भुक्ति, मुक्ति, ऋद्धि, सिद्धि ये सब सद्गुरु के चरणों में ही हैं। जो मंदबुद्धि यह बात नहीं
जानते वे अनेक प्रकार की सिद्धियों की इच्छा करते हैं। निरपेक्षता यही सचमुच सभी सिद्धियों का साधन है इसे
पक्का ध्यान में रखो। निरपेक्ष व्यक्ति के आँगन में सभी सिद्धियाँ सेवारत रहती हैं जिनके मन में सिद्धियों की
इच्छा रहती है :उन्हें सिद्धियाँ सीधे मुँह देखती भी नहीं और निरपेक्ष व्यक्ति के चरणों की धूल को वे शिरसावंद्य
करती हैं। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भी अधिक निरपेक्षता ही श्रेष्ठ है। यह निरपेक्षता हाथ लगने पर सायुज्यता
मुक्ति भी चरणों पर गिर पड़ती है। निरपेक्षता के पास ही सारी सिद्धियाँ रहती हैं, सारे विधि रहते हैं और समृद्धि
वहाँ दिन-रात चरणों का वन्दन करती रहती है। जहाँ निरपेक्षता होती है वहीं योगक्षेम रहता है और वहीं सद्भाव
रहता है और निरपेक्षता के पास ही भगवान का स्वरूप खड़ा रहता है। निरपेक्षता के पास ही वेदान्त होता है,
निरपेक्षता के पास ही सच्चा योग होता है, निरपेक्षता ही स्वानंद का उपभोग है और निरपेक्ष को ही भगवान प्राप्त
होते हैं। एका (एकनाथ) ने जनार्दन की शरण में जाकर उनके पवित्र चरणों का वंदन करते ही उसे सदा बढ़ती
रहने वाली निरपेक्षता प्राप्त हुई इसलिये वह सदा आनन्द से परिपूर्ण रहता है। हमें स्वानंद का आत्मबोध हुआ
यह केवल सद्गुरु चरणों का प्रसाद है। श्रीगुरुचरणों में ही महासुख का लीलाविलास तथा आनन्द का मूल बीज
होता है। गुरुचरणों की भक्ति करने से अनायास ही चारों मुक्ति प्राप्त हो जाती हैं। इसीलिये विरक्ति गुरुभक्त की
आत्मशांति के साथ सेवा करने लगती है। एका जनार्दन की शरण में गया इसलिये उनकी कृपा से श्रीमद्भागवत
के निरूपण का पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
इति श्रीमद्भागवते एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
एकाकार टीकायां सिद्धि निरूपण स्तोत्र नाम पंचदशोध्यायः ॥ १५ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
सोलहवाँ अध्याय
ओंकारस्वरूप सद्गुरु श्रीमूर्त्ति को मेरा नमस्कार। हे श्रीगुरुराया! यह सारा चराचर तुम्हारा ही स्वरूप है।
विश्व की आत्मा तुम हो, विश्व का स्फुरण भी तुम ही हो और निराकार तथा साकार मूर्ति तुम ही हो। तुम्हारे
रूप की महिमा शास्त्रज्ञों की समझ से परे है। उसके वर्णन के प्रति श्रुति मौन है और वर्णन करने में शब्दों ने भी
हार मान ली है। तुम्हारे स्वरूप के बारे में कोई दृष्टांत भी नहीं दिया जा सकता। तुम्हारे सादृश जो भी खोजने की
कोशिश करें वह तुम्हारा ही स्वरूप रहता है। तुम्हारे प्रभाव की यह विशेषता है कि वहाँ दूजेपन की जड़ ही कट
जाती है। फिर चारों ओर जब एक ही बात हो तो उसमें दूसरे प्रकार का दृष्टांत कहाँ मिलेगा? तुम्हारी महिमा
अगाध है तो तुम्हारा ध्यान भी कैसे किया जाय? उद्देश्य, शब्द और दृष्टांत ये जिसके वर्णन के क्षेत्र में ही नहीं
आते वह श्रीमद्भागवत का अर्थ तुम ओवी के रूप में कहलाते हो। वह मेरे मराठी के आर्त बोल लेकिन सद्गुरु
ने उन्हें गहन बना दिया है। उसमें प्रेम की जो आर्द्रता है वह केवल गुरुभक्त ही जानते हैं। जिनकी गुरुचरणों पर
भक्ति नहीं है उन्होंने भले ही वेदशास्त्र का पठन किया हो शास्त्रव्युत्पत्ति का अध्ययन किया हो लेकिन उनमें
विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी? वे भले ही कोटि प्रयास क्यों न करें लेकिन उनसे उन्हें समाधान नहीं होगा। किन्तु
सद्गुरु की कृपादृष्टि होने पर गुरुभक्तों को ब्रह्मत्व से ही पुष्टि प्राप्त होती है। हे सद्गुरु जनार्दन! आप समस्त
संसार के अधिष्ठान हैं। स्वाभाविक ऐक्य रूप से आप स्वयं ही समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हैं। जिनसे सारे
प्राणिमात्र से ऐक्य होता है, जिन्हें सद्गुरु की भक्ति प्राप्त होती है वही इस श्रीमद्भागवत के अर्थ को जान
सकता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर शास्त्र की व्युत्पत्ति सीखने का कष्ट किये बिना ही उत्तम भावार्थी भक्त
भागवत का अर्थ सहज ही जान सकता है। अंतःकरण में एकनिष्ठ भक्ति उत्पन्न होते ही उस भक्ति के योग से
देवाधिदेव प्रकट होते हैं। तभी भागवत का वास्तविक रहस्य मन पर अंकित होता है। इसलिये गुरुभक्ति करने से
भागवत का अर्थ अच्छी तरह समझ में आता है। फिर काव्य आदि अथवा व्युत्पत्ति आदि उपायों की क्या
आवश्यकता है? शास्त्रज्ञान भी क्यों किया जाय? और व्यर्थ का ध्यान भी क्यों धारण किया जाय? साधकों के
लिये सद्गुरु के चरण यही चलता-फिरता पूर्ण ब्रह्म है। गुरुभजन के बिना शिष्य का समाधान नहीं होता क्योंकि
उससे श्रेष्ठ साधन है ही नहीं। उसी सद्गुरुकृपा के अभ्यास से ग्यारहवें स्कंध के पूर्वार्ध का ज्ञान देशी भाषा में
यथामति आत्मबोध से वर्णन किया। ईख पेरने से उसका रस निकलता है। उसे यदि वैसे ही रख दिया जाय तो
वह अधिक समय तक नहीं टिकता। उसे आँच पर पका कर उसका गुड़ बनाकर रखना पड़ता है। गुड़ भी
अधिक समय तक रखने पर पसीजने लगता है इसलिये उसकी शक्कर बनाकर रखना पड़ता है। चतुर लोग उस
चीनी को भी स्वच्छ और सूखी ताड़ मिश्री बनाकर रखते हैं। श्री भागवत की भी वैसी ही कथा है। सर्वप्रथम
श्रीनारायण ने ही इसका वर्णन किया जिसका श्रीव्यास ने दस लक्षणों में वर्णन किया। शुक्राचार्यजी के मुख से
उस दस लक्षणयुक्त कथा का वर्णन होने से उसमें और भी मिठास आ गयी। उसमें से कठिन शब्दों को स्पष्ट कर
श्रीधर ने उस पर उत्तम टीका प्रस्तुत की। उसी श्रीहरि टीका को 'भावार्थ दीपिका' कहते हैं। उसी भावार्थ का
निरूपण मैंने देशी भाषा में किया। मूल वक्ता नारायण ही है और उस पर व्यास, शुक तथा श्रीधर ने व्याख्यान
प्रस्तुत किया है। उनमें मूल भाष्य की मिठास पर ध्यान देते हुए एकाजनार्दन इस काव्य का कर्त्ता बन गया है।
सोलहवाँ अध्याय ४३५
श्रीनारायण ने मूल बीज ब्रह्मदेव में स्थापित किया जो नारदरूपी भावभूमि में सशक्त रूप से अंकुरित हुआ। उसी
के दश लक्षण-भागवतरूपी बालों का श्रीव्यास ने संकलन किया और शुक्राचार्य ने परीक्षित के लिये बालों में से
दाने मलकर एकत्र किये और उसकी राशियाँ बनायीं। उन दानों को शास्त्र रीति से आत्मबुद्धि के सूप में पछोर
कर श्रीधर ने उनमें से बड़े-बड़े दाने छाँट लिये। फिर एका जनार्दन ने उनके उत्तम पकवान तैयार कर मराठी
शब्दरूपों से उन्हें भक्तजनों को परोसा। जो आत्मभक्त होंगे वही उसका माधुर्य जान पायेंगे। श्रोताओं के ध्यान देने
से और जनार्दन की कृपा के कारण एका जनार्दन ने देशी भाषा में यह पूर्वार्ध पूर्ण किया। उसका क्रम इस प्रकार
है—पहले अध्याय में वैराग्य की उत्पत्ति का प्रसंग लाते हुए श्रीकृष्ण ने अपने कुल का क्षय करने के लिये
ब्राह्मणों के शाप रूप से प्रारम्भ किया। दूसरे अध्याय से चौथे अध्याय तक नारदजी ने वसुदेव के घर जाकर
निमिजयंती के प्रश्नोत्तर के रूप में पंचाध्याई समाप्त की। छठवें अध्याय में श्रीकृष्णमूर्ति का दर्शन करने के लिये
देवताओं की भीड़ उमड़ती है। वे श्रीकृष्ण को निजधाम चलने की प्रार्थना करते हैं। सुरश्रेष्ठों की विनती सुनकर
और द्वारका पर छायी विपत्ति को सुनकर उद्धव श्रीकृष्ण से मुझे भी निजधाम ले चलने की प्रार्थना करते हैं।
उसके प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण ने सातवें अध्याय में ज्ञानमय तथा त्यागयुक्त छोटा-सा भाषण किया। उस समय
त्यागसंग्रह के लक्षण के प्रसंग में यदू और अवधूत के संवाद रूप में चौबीस गुरुओं का परिच्छेद आठवें और
नौवें अध्याय में पूरा किया। श्रद्धा किस प्रकार रखनी चाहिये और ज्ञान पर किस तरह विश्वास करना चाहिये इस
सम्बन्ध में बताकर उसमें अनेक मतों का समावेश करने की दृष्टि से श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में ज्ञान का
चमत्कार समझाया। ग्यारहवें अध्याय में बद्ध-मुक्त का अन्तर बताकर साधु का लक्षण और भक्ति का पूर्ण स्वरूप
स्पष्ट किया। भागवत के बारहवें अध्याय में भगवान ने अत्यन्त गूढ़ ज्ञान प्रकट किया है। उसका रहस्य स्पष्ट
करने में बड़े-बड़े ज्ञाता भी सन्देह में पड़ जाते हैं। बारहवें अध्याय की चाभी केवल युक्ति-प्रयुक्ति से समझ में
नहीं आयेगी किन्तु जनार्दन की कृपारूप माँ साथ में थी इसलिये उसने ग्रन्थ का मार्ग दिखाया। उस बारहवें
अध्याय में सत्संग की अगाध महिमा, कर्म का कर्त्ता कौन, त्यागबुद्धि यही कर्म का लक्षण है आदि विषय हैं।
उस बारहवें अध्याय का श्रवण करने से चित्त पर ज्ञान का संस्कार होता है। लेकिन उसमें विषय-वासना बाधक
होती है जिससे साधकों को पीड़ा होती है। गुणभेदों का लक्षण, और उससे होनेवाली विषय की आसक्ति,
सत्वशुद्धि के प्रकार आदि का निरूपण तेरहवें अध्याय में किया। फिर उसी प्रसंग में विषयों का और चित्त का
समन्वय कैसे होता है और उसे कैसे सुलझाया जाता है यह समझने के लिये उत्तम निर्णयात्मक हंसगीत का
कथन किया। हंसगीत में जो ज्ञान दिया गया है और समाधि तक जो समाधान किया गया है उसे साधने का मार्ग
भगवान ने स्वयं चौदहवें अध्याय में निरूपित किया है। साधनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है, सगुण स्वरूप ही मेरी निर्गुण
मूर्ति है तथा योगयुक्त ध्यानावस्थिति कैसी होती है इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण ने चौदहवें अध्याय में बतलाया
है। सिद्धियों के लिये ध्यानधारणा करने के प्रकार भिन्न-भिन्न हैं। उनके बारे में भी श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया
और ईश्वर प्राप्ति में सिद्धियाँ किस प्रकार बाधक हैं इस बारे में उन्होंने पन्द्रहवें अध्याय में बतलाया है। इस
प्रकार पन्द्रह अध्यायों में पूर्वार्ध का अत्यन्त निर्मल निरूपण हुआ। अब उत्तरार्ध शेष है उसके सम्बन्ध की कथा
के बारे में सुनिये। सोलहवें अध्याय में भगवान की विभूति का निरूपण है तथा अठारहवें अध्याय में वर्णाश्रम
कर्म की जानकारी तथा विधान प्रकारों का निरूपण है। उन्नीसवाँ अध्याय गहन है। उसमें ज्ञान माहात्म्य है तथा
उद्धव के प्रश्नों का ज्ञानात्मक उत्तर दिया गया है। उस ज्ञान का योग, अज्ञान, ज्ञान तथा मध्यावस्था इन तीन
प्रकारों से श्रीकृष्ण ने बीसवें अध्याय में बतलाया है। आगे उद्धव ने गुणदोषों की अवस्था जब वेदों के मत्थे रख
४३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दी तो उस वेदवाद का सच्चा सात्त्विक निरूपण इक्कीसवें अध्याय में किया। उसी वेदवाद निरूपण के प्रसंग में
तत्त्वों की कुल संख्या कितनी है यह प्रश्न सामने आया। तब श्रीकृष्ण ने उस तत्वसंख्या का यथार्थ निरूपण
किया। सभी तत्त्वों का विवेचन, प्रकृति और पुरुष का लक्षण तथा जन्म-मरण आदि का निरूपण बाईसवें
अध्याय में किया। दूसरों के अपराध सह कर स्वयं निर्द्वंद्व रहना चाहिये इस आशय का भिक्षुगीत संवाद तेईसवें
अध्याय में स्पष्ट किया गया है। अद्वैत में स्थिर होने के लिये चौबीसवें अध्याय में सांख्यशास्त्र का वर्णन है।
निर्गुण से ही गुणों की उत्पत्ति होती है और गुणों का क्षय होने पर निर्गुण ही शेष रहता है। प्रारम्भ में निर्गुण रहता
है और अन्त में भी निर्गुण ही रहता है। इस बीच मिथ्या ही गुणों का आभास होता है। ऐसे इस अद्वैत प्राप्ति के
लिये सांख्यशास्त्र का निरूपण किया। वे मिथ्या गुण प्रवृत्तियुक्त होते हैं, उन तीन गुणों का परस्पर सम्बन्ध रहता
है और निर्गुण के सम्बन्ध से किस प्रकार आत्मनिष्ठा कायम रखी जाय इसे पचीसवें अध्याय में बताया गया है।
छब्बीसवें अध्याय में अनुताप की असीम शक्ति प्रदर्शित करने के लिये पुरूरवा ने कामपाश में फँस कर उर्वशी का
उपभोग करते हुए भी किस प्रकार विरक्ति प्राप्त की इसका वर्णन है। भजन की विधि, मूर्ति का लक्षण, वैदिक,
तांत्रिक तथा मिश्र भजन क्या होता है इस उद्धव के प्रश्न का निरूपण सत्ताईसवें अध्याय में है। बड़े-बड़े योगियों
का योगमंजर, गहन ज्ञान से परिपूर्ण, आत्मसुख का निचोड़ ऐसा अट्ठाईसवाँ अध्याय केवल ज्ञानविषयों से भरा
हुआ है। उसी अध्याय में 'संसार असम्भवनीय है' ऐसा गहन प्रश्न उद्धव ने किया था, उसका उत्तर भगवान ने
दिया है। ग्यारहवें स्कंध का कलश तथा भक्तिप्रेम का अत्यन्त मनोहर स्वरूप ऐसा अत्यन्त रसाल और भक्तियुक्त
ज्ञानोपदेश उन्तीसवें अध्याय में है। उसके अगले दो अध्यायों में स्त्रीपुत्रादि सारे कुल का संहार प्रत्यक्ष अपनी
आँखों के सामने होते हुए भी ज्ञान से समर्थ व्यक्ति का चित्त नहीं डगमगाता यह बात श्रीकृष्ण ने ही प्रत्यक्ष
दिखला दी है। ब्राह्मणों का शाप अत्यन्त कठोर होता है। उस शाप ने श्रीकृष्ण को भी पीड़ा पहुँचायी फिर औरों
की क्या बिसात ? ब्रह्मशाप से सारे कुल का भी विनाश होता है। ब्राह्मण का क्रोध अत्यन्त सामर्थ्यवान होता है,
उसने सारे समुद्र को मूत्रमय कर दिया। ब्राह्मण के क्षोभ से एक क्षण में शिव का भी लिंगपात हुआ। इसलिये
चाहे सज्ञान हो या अज्ञान हो उसे ब्राह्मण से वैर नहीं करना चाहिये। यही दिखलाने के लिये श्रीकृष्ण ने प्रसिद्ध
कुलक्षय का दिग्दर्शन किया। जिसने श्रीकृष्ण के देह पर प्रहार किया उस व्याध को भी श्रीकृष्ण ने जीवन से मुक्त
किया। यहाँ तक यह दिखा दिया कि ज्ञाता किस प्रकार देहातीत और क्षमाशील होता है। उन्तीसवें अध्याय तक
श्रीकृष्ण ने ज्ञान का उपदेश किया। उसके अगले दो अध्यायों में अपनी ही विदेह स्थिति के बारे में बतलाया।
राम अयोध्या आकर गये और कृष्ण ने भी अपना देह त्याग दिया, इन बातों से उन्होंने भावी मुमुक्षुओं को तरने के
लिये देहाभिमान के मिथ्या होने का महत्त्व स्थापित किया। पन्द्रहवें अध्याय तक इस स्कन्ध के पूर्वार्ध का
समापन हुआ। उनमें अत्यन्त पवित्र बातों का कथन हुआ है, साथ ही सूत्र के रूप में उत्तरार्ध के प्रत्येक अध्याय
का तात्पर्य भी स्पष्ट रूप से बतला दिया है। सद्गुरु जनार्दन सहायता के लिये हैं अतः श्रोतागण ध्यान दें। अगले
उत्तरार्ध का व्याख्यान भी जनार्दन एकनाथ के मुख से कहलवायेंगे। वसन्त के आगमन के साथ वृक्षों पर फूल
और फलों की बहार आ जाती है। उसी प्रकार जनार्दन के कृपाकटाक्ष के कारण कविता के शब्द भी पुष्पित
पल्लवित होते हैं। जिस प्रकार आकाश में सूर्य का उदय होते ही नये कमल खिल उठते हैं उसी प्रकार जनार्दन
की कृपा से कविता में नूतनता का विकास होता है। हाथ में मुरली लेकर श्रीकृष्ण ने सारे संसार को समाहित कर
दिया उसी प्रकार मुझे कवीश्वर बनाकर मेरा हाथ थामा और सब कुछ जनार्दन ही बोल रहे हैं। उस जनार्दन की
कृपा साक्षात् क्षीर सागर की तरह है। उसके कृपा की कोई सीमा नहीं है। उस जनार्दन की कृपा से उत्तरार्ध में
सोलहवाँ अध्याय ४३७
अर्थसिद्धि बुद्धि का प्रवेश हो रहा है। पिछली कथा में पन्द्रहवें अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने बताया था कि मेरी
प्राप्ति में सिद्धियाँ बाधक होती हैं। अर्थात् सिद्धियों पर से ध्यान हटा कर मेरे स्वरूप में मन लगाना चाहिये।
श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव ने प्रश्न किया। "हे श्रीकृष्णनाथ! समर्थ, मेरी एक विनती सुनो। तुम
अपनी समस्त विभूतियों के बारे में मुझे बताओ।"
उद्धव उवाच
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम्।
सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्भवः ॥ १॥
भूत और भौतिक का कारण तुम हो, जन्म, स्थिति और लय तुम्हारे ही कारण होते हैं, फिर भी तुम अकर्ता
हो इसीलिये तुम परब्रह्म हो। इस पर तुम कहोगे कि प्राणियों की उत्पत्ति स्थिति और लय प्रकृति ही करती है।
लेकिन वह प्रकृति अर्थात् माया तुम्हारे ही अधीन है। तुम्हारे ही कारण प्रकृति में चालन की क्षमता आती है।
इसलिये प्रकृति परतंत्र है। तुम परमात्मा स्वतंत्र हो। तुम अनादि, अव्यय और अथाह हो। वेदों को भी तुम्हारी
थाह नहीं लगती। प्रकृति पर तुम्हारा आवरण है। तुम स्वयं जीव का स्वरूप हो लेकिन जीव नहीं हो। जीव
जितना अज्ञान से युक्त है और तुम सचमुच ही ज्ञान और अज्ञान से बिलकुल परे हो, इसलिये तुम अविनाशी
और अपरोक्ष साक्षात परब्रह्म हो। तो तुम कैसे अपरोक्ष हो ? इसका कारण यह है कि तुम सबमें सर्वत्र अंतर्बाह्य
व्याप्त हो और तिस पर भी तुम अतर्क्य हो। उसके सम्बन्ध में सुनो।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयमकृतात्मभिः ।
उपास्ते त्वां भगवन् याथातथ्येन ब्राह्मणाः ॥ २॥
मछली से लेकर हिरण्यगर्भ तक समस्त प्राणियों में निरन्तर अंतर्बाह्य व्याप्त रहने वाले तुम्हें ब्राह्मण वेद के
अर्थ से निश्चित रूप से जानते हैं अथवा जो उपनिषदों का यथार्थ रहस्य जानकर तुम्हारे प्रति भजनयुक्त रहते हैं,
वे तुम्हें निश्चित अर्थ में सर्वव्यापी सर्वात्मा जानते हैं। उस सर्वात्मा का पार जानना चाहे तो तुम अचिंत्य और
अनन्त ऐश्वर्यमुक्त हो। जो साधारण लोग तुम्हें नहीं जानते उनके विचार सुनो। इनका मन बिका होता है, वे
कामेन्द्रियों के दास बन जाते हैं वे केवल जिह्वा का पोषण करते हैं और निद्रा के गरजमाई बन जाते हैं। ऐसे लोगों
को तुम्हारे स्वयंसिद्ध तथा सर्वव्यापी स्वरूप की कल्पना भी नहीं होती। हमारे शरीर में ही आत्मस्वरूप है इसकी
उन्हें कल्पना ही नहीं होती। वे सदा विषयों में लिप्त रहते हैं। विषयों के प्रति उनका अंतःकरण चंचल बना रहता
है। उन्हें सगुण स्वरूप का ध्यान नहीं होता और मन निर्गुण स्वरूप में प्रवेश ही नहीं करता। ऐसे अज्ञानी लोग
किस प्रकार तर पायेंगे ? इसलिये शास्त्रों की खोजबीन करने तथा ध्यानधारणा के झंझट में न पड़ उन्हें केवल
भजन करना पड़े ऐसे प्रकार के उत्तम उपाय जो आपके पास हों उन्हें बतायें।
येषु येषु च भावेषु भक्त्या त्वां परमर्षयः।
उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद् वदस्व मे ॥ ३॥
तुम्हारी जिन विभूतियों की संतों ने दृढ़ भावना से भक्ति कर उपासना की और तुम्हारे स्वरूप तक पहुँचे, वे
सारी विभूतियाँ उनके स्वरूप, उनकी भक्ति और उनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है इसके सम्बन्ध में मुझे
निश्चयपूर्वक बतायें। इस पर यदि तुम सभी वस्तुओं में अपनी विभूतियों को ढूँढ़ने के लिये कहोगे तो हे
श्रीकृष्ण! तुम अतर्क्य हो। वह सब हमारे ध्यान में नहीं आयेगा।
४३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गूढश्चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन।
न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते ॥ ४ ॥
समस्त प्राणिमात्र के हृदय में तुम ही हो। लेकिन हृदय में होते हुए भी तुम गुप्त हो। देह ही मैं हूँ इस भ्रम
में सारे प्राणी तुम्हें नहीं देख पाते। हे देवराया ! उस देहभ्रम का मूल कारण तुम्हारी माया है। लेकिन तुम्हारी कृपा
होने पर उस माया का भी अपने गुणों के साथ विलय हो जाता है और फिर सर्वत्र सभी स्थानों पर समस्त
प्राणिमात्र के देह में भी अंतर्बाह्य तुम्हारा ही स्वरूप अभिव्यक्त होता है। इतना तुम्हारी कृपा का फल है। लेकिन
वह कृपा किन गुणों से प्राप्त होती है। इसलिये हे गोविन्द ! तुम्हारी कृपा प्राप्त करने के लिये तुम्हारी विभूतियों
की उपासना करनी चाहिये। इसीलिये कृपया अपनी समग्र विभूतियों के बारे में बतायें ऐसी विनती बार-बार कर
रहा हूँ।
याः काश्च भूमौ दिवि वै रसायां विभूतयो दिक्षु महाविभूते ।
तां मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते नमामि ते तीर्थपदाङ्घ्रिपद्मम् ॥ ५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल तथा दसों दिशाओं में फैली हुई तुम्हारी समस्त विभूतियों के बारे
में मुझे बतायें। कहते हुए उद्धव ने साक्षात दण्डवत किया और जहाँ से सारे तीर्थों का उद्गम होता है ऐसे
श्रीकृष्ण के चरणों पर मस्तक रख कर वन्दन किया। उद्धव का प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और
क्या उत्तर दिया ? बोले, तुम्हारा यह प्रश्न शत्रुरूपी हाथियों के झुण्ड का सिंह, गाण्डीव धारण कर महान पराक्रम
करने वाला मेरा सखा और लाडला, इतना ही नहीं मेरा प्राण, जिसके रथ पर बैठ कर मैं घोड़ों की लगाम थामता
हूँ, जिसे कुरुक्षेत्र के समरांगण में दोनों सेनाओं के बीच मैंने उपदेश किया उस नरावतार अर्जुन ने भी ऐसा ही
प्रश्न किया था। उद्धव के प्रश्न पर सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
श्रीभगवानुवाच
एदमेतदह पृष्टः प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
युयुत्सुना विनशने सपत्नैर्जुनैन वै ॥ ६ ॥
पहले जब दुर्योधन ने मेरा तिरस्कार कर घनघोर युद्ध की शुरुआत की थी, उस समय अर्जुन ने मुझसे यही
प्रश्न पूछा था। शत्रुओं का निर्दलन करने में अत्यन्त पराक्रमी, धैर्यवान, वीर, ज्ञानसम्पन्न तथा प्रश्न करने वालों में
अत्यन्त चतुर अर्जुन मेरी आत्मा ही है। उस अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में घातक युद्ध में अपने ही लोगों का वध होगा इस
भय से मुझसे यही प्रश्न किया था।
ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गर्ह्यमधर्मं राज्यहेतुकम्।
ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोऽयमिति लौकिकः ॥ ७ ॥
स तदा पुरुषव्याघ्रो युक्त्या मे प्रतिबोधितः।
अभ्यभाषत मामेवं यथा त्वं रणमूर्धनि ॥ ८ ॥
उसने कहा, केवल राज्यलोभ के लिये गुरु, गोत्रज, चाचा आदि का वध करना मेरी दृष्टि से अत्यन्त निंद्य
है। इसलिये भले ही प्राण चले जाए लेकिन मुझे युद्ध नहीं करना है। लौकिक धर्मप्रवृत्ति के कारण 'मैं मारने
सोलहवाँ अध्याय ४३९
वाला और ये मरने वाले' इस प्रकार की मोह की भ्रान्ति अर्जुन के मन में उत्पन्न हुई। राज्यसुख का लालच कर
उसके लिये अपने रिश्तेदारों का निंद्य कर्म करना मुझे शुद्ध अधर्म लगता है। इसमें धर्म के स्वधर्म की हानि
होगी। प्रतिदिन जिसके चरणों का तीर्थ लेना चाहिये, जिनकी उच्चासन पर बिठा कर पूजा करनी चाहिये उन्हें
प्रखर बाणों से घायल कर उन स्वजनों के रक्त में लिपटी हुई पृथ्वी का उपयोग कैसे किया जाय ? जब हमारे ही
बन्धु बान्धवों का रक्त इस पृथ्वी पर बहेगा तभी हम राजकर्ता बनेंगे। यह कर्म अत्यन्त भयंकर है। वह मुझसे
नहीं होगा। जो अपने कुल में सत्पुत्रों के फलने-फूलने की कामना करें उनके ही हृदय में बाणों से प्रहार करें ?
क्या इसी प्रकार हम अपने पूर्वजों के उपकार का बदला चुकायें। जिनका हमें श्राद्ध और तर्पण करना चाहिये
उनके ही प्राण हम अपने बाणों से बाँध कर ले लें? इस प्रकार तो हम अपने पितरों का अच्छा उद्धार करेंगे।
उससे हमारे धर्म का विनाश होगा। इस युद्ध में मरने पर स्वर्ग प्राप्त होगा और विजयी होने पर राज्य प्राप्त होगा।
लेकिन हे श्रीकृष्ण ! ये दोनों ही नश्वर हैं। फिर किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये युद्ध किया जाय? इस उदासीन
प्रवृत्ति से धनुषबाण त्याग कर शोकाकुल अर्जुन उस समरांगण में म्लान देह से खड़ा रहा। उस समय उस महान
वीरसिंह का मैंने अनेक युक्तियों से समाधान किया। उसकी कथा सुनो। हे अर्जुन देह नश्वर होने के साथ मलमूत्र
का केवल भण्डारगृह है। कितना ही उपचार करने पर भी वह मरणाधीन तथा क्षणिक है और जीव स्वयंसिद्ध
तथा नित्य होकर निर्मल है। उसे जन्म नहीं, उसे विनाश नहीं, वह अचल, अच्छेद्य, अभेद्य तथा निर्मल है। वह
मूल में ही जड़ है। हे अर्जुन ! अब इसका सच्चा अर्थ समझो। देह तुम्हारे प्रयत्न से बचने वाला नहीं है और जीव
तुम्हारे मारने से मरने वाला नहीं है। उसकी हत्या का पाप लगेगा यह तुम्हारा सोचना केवल अहँभाव है। यदि
तुमने इन सब का निर्माण किया होता, तो तुम उन्हें मार सकते थे। लेकिन बात वैसी नहीं है। इसलिये मैं इन्हें
मारूँगा यह कहने में तुम अभिमान में लिपटे हुए हो ऐसा भास होता है। जो देह का निर्माता होता है वही उसका
संहारक होता है। तुम न निर्माणकर्ता हो और न मारने वाले ही हो, फिर व्यर्थ ही अहंता कष्ट क्यों भोगते हो?
यदि तुम इस अहंता का त्याग नहीं करोगे तो सभी हत्याओं की राशि तुम्हारे पास आयेगी और उसके लिये अर्जुन
तुम दोषी होगे। हे अर्जुन ! सुनो। देहादि कर्मों की अहंता जो अपने माथे पर लेता है वह तीनों लोकों में पूरी तरह
दोषी होता है। अब यदि तुम स्वधर्म के बारे में पूछ रहे हो तो क्षत्रिय का क्षात्रधर्म सुनो। उस क्षात्रधर्म के अनुसार
यदि समरांगण में पितापुत्र एक दूसरे का वध करें तो इसमें क्षत्रियों को दोष नहीं है। युद्ध तो क्षात्रधर्म का एक
तीर्थ ही है। समरांगण में जिसकी मृत्यु होती है वह निजमुक्त ही होता है। यह जो तुम्हें तुम्हारे भाग्य से प्राप्त
हुआ है उसे तुम अनिष्ट मानते हो। कर्तृत्व मानना यह दोष अहंता के मत्थे है। उस देहअहंता का जो स्पर्श नहीं
करता वही कर्म करके भी अकर्ता तथा भोग भोगते हुए भी अभोक्ता है। वही संग में रह कर भी निःसंग है। वह
अकेला ही पूरा संसार है। जो खरा निरभिमानी होता है वह समरांगण का सच्चा वीर है। हे अर्जुन ! तुम यदि
अभिमान छोड़ दो तो मेरे ही समकक्ष हो जाओगे। फिर किसी पाप की वार्ता भी तुम्हें स्पर्श नहीं करेगी। अब वह
अहंता कैसे जाये ? तो निश्चय करके मुझ पर ध्यान केन्द्रित कर स्वधर्म कर्म का आचरण करने से चित्त की शुद्धि
होगी और चित्त शुद्ध होते ही वह मेरे भक्तिमार्ग पर लग जाता है। भजन के योग से मेरे भक्त तत्काल मुझसे
समरस हो पाते हैं। हे अर्जुन ! अभिमान छोड़ने के सम्बन्ध में यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो जन्म-मरण के
भूषण जो सारे दोष हैं वह तुम्हें भोगने होंगे इसे ध्यान में रखो। तुम जो नित्यमुक्त हो, अजन्मा हो, अविनाशी हो
यह तुम्हारी सद्बुद्धि विलय को प्राप्त होगी और फिर देखना। निरन्तर जन्म-मरण का भोग भोगते रहोगे। इसलिये
'करना' और 'न करना' इन दोनों को प्रकृति के सुपुर्द कर तुम काया, वाचा, मनसा मेरी शरण में आओगे तो मैं
४४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तुम्हें किसी भी कर्म का स्पर्श नहीं होने दूँगा। इसलिये, हे अर्जुन ! 'मरने वाला' और 'मारने वाला' इन दोनों
भावनाओं को छोड़कर तुम समरांगण में वीरता दिखलाओ तभी मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। हे अर्जुन ! तुम कर्म
करने वाले हो और मैं तुम्हारा उद्धार करने वाला, इस प्रकार का भेदभाव मेरे शरणागतों में नहीं होता। पहले मुझ
अनन्त की शरण में आना और फिर जीव के नाते अलग रहना यह गुड़ में पत्थर की तरह जीने की तरह है। वह
अनन्यभाव से शरण आना नहीं है। नदी समुद्र की शरण में जाती है तो समुद्र होकर ही रहती है। वह फिर वापस
लौटना भूल जाती है क्योंकि वह समुद्र के साथ एकरूप जो हो जाती है। गंगा एक बार समुद्र स्वरूप होने पर
कोई प्रवाह उसे पीछे की ओर नहीं खींचता। उसी प्रकार अंतर्वाह्य आत्मस्वरूप के साथ तद्रूप होकर मेरा भक्त
दिन-रात निरन्तर मेरी शरण में आया रहता है। दीपक यदि अग्नि से मिलने जाता है तो वह भी अग्नि ही बन
जाता है। उसी प्रकार हे अर्जुन ! जो मेरी शरण में आया वह मत्स्वरूप होकर रह गया। हे अर्जुन ! अब मुक्तों के
लक्षण सुनो। ये जो प्राणीमात्रों के आकार देख रहे हो वे सब मुझ श्रीकृष्ण के ही हैं इस श्रद्धा से जो देखता है
उसे ही ब्रह्मस्वरूप का साम्राज्य प्राप्त होता है। मेरे आत्मस्वरूप में संसार यही सबसे बड़ा भ्रम है। तब 'मैं
मारनेवाला' और 'ये मरने वाले' इस बात को कौन स्वीकार करेगा ? जहाँ मृगजल नहीं होता वहाँ तो सूखा ही
रहता है लेकिन जहाँ मृगजल का आभास होता है वहाँ क्या आर्द्रता रहती है ? उसी प्रकार संसार को रूप-नाम
देकर कल्पना की जाती है लेकिन वास्तव में वहाँ रूप-नाम का अभाव होता है और केवल शुद्ध ब्रह्म ही रहता है
ऐसा जिसका दृढ़ विश्वास रहता है वह देह में विचरण करते हुए भी चलता-फिरता ब्रह्म ही रहता है। देह को
जड़त्व के कारण कर्म की बाधा नहीं होती और आत्मा धर्म-अधर्म को स्पर्श नहीं करता। यह मर्म जिसने जान
लिया वह देह में विचरण करते हुए भी चलता-फिरता ब्रह्म है। देह में .रहते हुए भी वह विदेही है। मैंने अपना
यह गुह्य ज्ञान अर्जुन को बतलाया। इस प्रकार मैंने अनेक युक्तियों से उस युद्ध में अर्जुन को उपदेश दिया। तब
उसने भी तुम्हारी ही तरह मुझसे विनती कर मेरी विभूतियों के बारे में पूछा था। उस समय मैंने अर्जुन को जो
बतलाया वह तुम्हें भी बतलाऊँगा। इस प्रकार उद्धव को आश्वासन देकर वे उसे अपनी विभूतियाँ बताने लगे।
उद्धव मैं स्वयं भी अपनी विभूतियों की गणना नहीं कर सकता। मैं त्रैलोक्य की ही अन्तरात्मा हूँ, मेरी विभूतियों
की गणना कौन करेगा ?
अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः ।
अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥
मैं सर्वसमर्थ हूँ तथा प्रत्येक जीव के हृदय में हृदयस्थ होकर रहता हूँ। मेरे पास जीव जो कुछ भी माँगता है
उसके लिये मैं कभी भी ना नहीं कहता। प्रभु होने के नाते प्रत्येक वस्तु की पूर्ति करता हूँ। जीव संकट के समय
मुझसे जो कुछ माँगता है उसे मैं अत्यन्त असीम मात्रा में देता हूँ। इसीलिये मुझे ईश्वर कहते हैं। मैं आत्मा के
रूप में हृदय में वास करता हूँ इस बात का जिन्हें विश्वास नहीं है वे मृगजल की बाढ़ में नौका के साथ बह गये
ऐसा समझ लो। उसमें नौका बाँधने का कष्ट व्यर्थ हो जाता है। उसी प्रकार कठिन साधन साध कर वे साधनों के
साथ डूब जाते हैं। मुझे प्राप्त करने का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि मैं परब्रह्म हृदय में ही रहता हूँ। यही
जिसका नित्यकर्म है वही मेरी श्रेष्ठ विभूति है। मैं समस्त प्राणीमात्र के हृदय में रहने वाला, मैं सबका 'सुहृद और
सम्बन्धी, भी ईश्वरी सत्ता का नियामक और मैं ही प्राणीमात्र का शासक हूँ। इस प्रकार समस्त प्राणीमात्र का
स्वामी मैं हूँ, यह जो सारे प्राणी हैं वे भी मैं हूँ, प्राणीमात्र की जन्मभूमि का उत्पत्ति स्थान मैं हूँ और उत्पत्ति आदि
सोलहवाँ अध्याय ४४१
क्रियाओं में कर्त्ता मैं हूँ। किसान की तरह मैं निर्माण करने वाला और पालन करने वाला तथा संहार करने वाला
हूँ। भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये अवतार लेने वाला एक मैं ही हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा,
कर्म की क्रियाशक्ति भी मैं ही हूँ। ये साधारण स्वरूप बतलाये। अब विशेष विभूतियों के बारे में सुनो।
अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम्।
गुणानां चाप्यहं साम्यं गुंणिन्त्यौत्पत्तिको गुणः॥१०॥
लक्ष्मीपति बोले, गतिशील में जो गति होती है वह गति मैं हूँ। हे उद्धव ! सचमुच गति की मूल गति मैं हूँ,
यह जान लो। चेतना से ही सबको गति प्राप्त होती है। चेतना से ही इन्द्रियों की प्रकृति होती है। अर्थात् गति की
गति एक मैं ही हूँ। सभी गतियों में श्रेष्ठ गति है प्राणियों को मुक्ति प्राप्त होना। लेकिन उस मुक्ति को भी मेरे ही
कारण मुक्ति प्राप्त होती है। सारांश गतियों की भी गति एक मैं हूँ। देवताओं और मानवों को एक सीमा में रखने
वाली एक काल की सत्ता है। लेकिन सचमुच उस काल को भी मर्यादा में रखने वाला महाकाल मैं हूँ। हे
भक्तिराज ! तीनों गुणों की साम्यावस्था मैं हूँ। अकृत्रिम गुण का जो स्वभावधर्म है, वह भी सचमुच मैं ही हूँ यह
जान लो।
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥११॥
हे उद्धव ! मैं स्वयं को गुणी कहता हूँ क्योंकि मुझ में क्रिया का प्रथम सूत्र प्रधान रहता है। माया का पहला
कार्य मैं हूँ इसलिये सभी गुणों से युक्त मैं ही हूँ। संसार में आकाश सबसे महान है। लेकिन वह भी मुझसे
लुकाछिपि खेलता है। मेरे महत्तत्त्व के चमत्कार की ठीक-ठीक कल्पना मुझे ही निश्चित रूप से नहीं होती।
नारायण बोले, ज्ञान प्रधान जो महत्तत्त्व है वह मैं हूँ। सूक्ष्म में ब्रह्मदेव आदि भी जिसका आकलन नहीं कर पाते
वह जीव मैं हूँ। अजेय वस्तुओं में मन मैं हूँ। उस मन को जीतने के लिये मेरे सिवाय किसी में पूर्ण सामर्थ्य नहीं
है। मेरा स्मरण करने से मन स्थिर होता है और मुझे भूलने से मन विचलित होता है। वेदशास्त्र के बल पर मन
का आकलन नहीं होता। मैं ही मन हूँ। मेरा चिन्तन करने में उसका विलय हो जाता है और मुझे भूलने से वह
इधर-उधर भटकने लगता है।
हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत्।
अक्षराणामकारोऽस्मि पदानिच्छन्दसामहम्॥१२॥
गोविन्द ने कहा कि वेदों का अध्ययन करने वाला प्रसिद्ध जो ब्रह्मदेव है वह मैं हूँ। मेरे ही कारण वेदों का
उल्लंघन नहीं किया जा सकता। वेदों के सम्बन्ध के विचार भी मैं ही हूँ। ओंकार के अतिरिक्त जितने भी मंत्र हैं
वे सब बच्चों की कहानियों की तरह निष्फल हैं। मैं श्रीकृष्ण ही मंत्र का ओंकार है। उसके ही कारण सारे मंत्र
पावन हो गये। अकार, उकार और मकार इनका अर्थ, मात्रा के साथ जो उच्चार है वही त्रिवर्णात्मक ओंकार है।
इसके ही कारण मंत्र पावन होते हैं। किसी भी अक्षर के उच्चार के लिये अकार आवश्यक होता है। उद्धव ! वह
अकार भी मैं श्रीकृष्ण ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक समझ लो। श्रीकृष्ण ने कहा, छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ इसलिये
ब्रह्मवृंद उस गायत्री मंत्र का सेवन करते हैं। श्रीकृष्ण बोले, सभी छन्दों में प्रमुख जो गायत्री छंद है वह तथा सभी
द्वंद्वों में जो निर्द्वंद्व है, वह मैं हूँ। उस गायत्री मंत्र के ही कारण ब्रह्मवृंद मुझे पूजनीय बन गये हैं।
४४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट्।
आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥
देवताओं में इन्द्र मैं हूँ, वसुओं में अग्नि मैं हूँ, आदित्यों में वामन मैं हूँ और रुद्रों में नीललोहित मैं हूँ।
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनुः।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु ॥ १४ ॥
मैंने ब्रह्मदेव को शाप देकर उसे पूजा के अयोग्य कर दिया। शंकर का नैवेद्य भक्षण करने के लिये निषिद्ध कर
दिया, भृगु ने विष्णु के हृदय पर लात से मारा और उस लात के चिह्न के रूप श्रीवत्सचिह्न ने भृगु के माहात्म्य का
वर्णन किया। श्रीकृष्ण बोले, ब्रह्मर्षि में पूज्य हुआ वह भृगुऋषि मैं हूँ और मनु के रूप में मैं स्वयं श्रेष्ठ राजर्षि बन
गया हूँ। श्रीकृष्ण बोले, देवर्षियों में नारदमुनि मैं ही हूँ। कामधेनु भी मेरा अत्यन्त पवित्र और प्रसिद्ध स्वरूप है।
सिद्धेश्वराणां कपिलः सुपर्णोऽहं पतत्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा ॥ १५ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सिद्धों में मुनिश्रेष्ठ कपिल मैं हूँ। पक्षियों में गरुड़ के रूप में रहने वाला पक्षीराजा मैं हूँ।
कृष्ण ने कहा, प्रजापति में मुख्य दक्ष मैं हूँ और पितृगण में श्रेष्ठ अर्यमा तो मेरा ही स्वरूप है।
मां विद्ध्युद्धव दैत्यानां प्रह्लादमसुरेश्वरम्।
सोमं नक्षत्रौषधीनां धनेशं यक्षरक्षसाम् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, भक्ति के सामर्थ्य से दैत्यों में अत्यन्त महान प्रह्लाद मैं हूँ। उसी प्रकार नक्षत्रों का और
औषधियों का स्वामी जो चन्द्रमा है वह भी मेरा ही स्वरूप है। यक्ष राक्षसों में श्रेष्ठ कुबेर भी भी मेरा ही स्वरूप
है। उसके विश्वास पर श्रीकृष्ण का भण्डार सदा उसके पास रहता है।
ऐरावतं गजेन्द्राणां यादसां वरुणं प्रभुम्।
तपतां द्युमतां सूर्यं मनुष्याणां च भूपतिम् ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, गजेन्द्रों में जो ऐरावत है वह मैं हूँ, जलचरों का राजा जो वरुण है वह मेरा ही स्वरूप है।
श्रीकृष्ण बोले, अपनी प्रभा से निरन्तर प्रकाश देने वाला, संसार को प्रकाशित कर देदीप्यमान लगने वाला तथा
अपने तेज से अत्यन्त प्रखर दिखायी देने वाला सूर्य मैं हूँ। मनुष्यों में जो पृथ्वी का उपभोग करता है, सारी भूमि
जिसके हाथ में रहती है, जिसे राजा कहते हैं वह मेरा ही स्वरूप है।
उच्चैः श्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम्।
यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥
नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम्।
आश्रमाणाामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥ १९ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सारे अश्वों में श्रेष्ठ जो उच्चैःश्रवा है वह मैं हूँ और जिसके लिये सारा त्रैलोक्य प्रयत्नशील
रहता है वह सुवर्ण धातु मैं हूँ। श्रीहरि कहते हैं, नागों में जो अनंत यह नाम धारण करता है वह नाग मैं हूँ।
नाखून, दाढ़ें तथा सींग धारण करने वाले जो चौपाये हैं उनमें सिंह मैं हूँ। नारायण ने कहा, चारों आश्रमों में जो
सोरहवाँ अध्याय ४४३
संन्यास है वह मैं हूँ। वर्णों में श्रेष्ठ तथा चलता फिरता जो ब्रह्म है वह ब्राह्मण मैं हूँ।
तीर्थानां स्रोतसां गङ्गा समुद्रः सरसामहम्।
आयुधानां धनुरहं त्रिपुरघ्नो धनुष्मताम् ॥ २०॥
श्रीरंग बोले, पवित्र नदियों में गंगोदक मैं हूँ। सरोवरों में श्रेष्ठ जो समुद्र है वह पूर्णरूप से मैं हूँ, ऐसा
श्रीकृष्ण ने कहा। शस्त्रों में धनुष नामक जो शस्त्र है, वह मैं हूँ और जिसने त्रिपुरों का संहार किया, वह
त्रिपुरशत्रु धनुर्धर मैं हूँ।
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालयः।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यवः ॥ २१॥
श्रीकृष्ण ने कहा, त्रिभुवन का निवास स्थान जो महामेरु है वह मैं हूँ। चढ़कर जाने में कठिन जो हिमालय
पर्वत है वह भी मैं हूँ ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वृक्षों में पीपल मैं हूँ। औषधियों में प्रसिद्ध जो यव है वह मैं हूँ ऐसा
श्रीकृष्ण ने उत्साह से कहा।
पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब्रह्मिष्ठानां बृहस्पतिः।
स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानजः ॥ २२॥
भगवान बोले, श्रीराम का पुरोहित बनकर नाम कमाने वाले वसिष्ठ मुनि मैं हूँ और वेद वेत्ताओं में अग्रगण्य
श्रेष्ठ देवगुरु वृहस्पति भी मैं हूँ। श्रीकृष्ण बोले, सेनापतियों में श्रेष्ठ जो स्कन्द (कार्तिकस्वामी) है वह मैं हूँ।
स्वधर्मप्रवर्तकों में अग्रगण्य तथा ब्राह्मणों में अत्यन्त पूजनीय ब्रह्मा मैं हूँ।
यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम्।
वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचिः ॥ २३ ॥
और फिर सर्वज्ञ हरि बोले, जिसमें कारण देवता, ऋषि, पितर तथा अन्य प्राणिमात्र और सारा विश्व सन्तुष्ट
होता है वह यज्ञ का ब्रह्मयज्ञ मैं हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा, किसी भी प्राणिमात्र को जिससे दुःख हो ऐसा भाषण नहीं
करना चाहिये ऐसा तो अहिंसाव्रत है वह मैं स्वयं हूँ। किसी को वायु से पवित्रता आती है, किसी को अग्नि से
पावित्र्य आता है, कोई जल से पवित्र होता है तो कोई भाषा से ही पवित्र होता है। कोई बुद्धि से ही पवित्र होते हैं
किन्तु इन सब में पवित्रता नाम की जो वस्तु है वह मेरा ही स्वरूप है। पावन को भी पावन करने वाला एक मैं हूँ
ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। संसार मेरे ही नाम से पवित्र होता है यह सभी मानते हैं। मेरा यह स्वरूप पुनीतों से भी
अधिक पवित्र है।
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम्।
आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४॥
गोविन्द कहते हैं, जिसके कारण साधकों के अंतःकरण में परमानन्द उत्पन्न होता है और सन्तोष की
अनुभूति होती है इस प्रकार का जो योग 'आत्मनिरोध' के नाम से प्रसिद्ध है वह मैं हूँ और हे उद्धव ! मुख्य रूप
से विवेक को साथ लेकर नीति, न्याय से जो विजयी होने की कामना करता है उस नीति की भी नीति मैं हूँ।
गोपाल कहते हैं, केवल आत्मानात्मा का विचार करने वाली जो अध्यात्म विद्या है वह विद्या मैं हूँ। मेरे ही कारण
विवेक की वृद्धि होती है। श्रीकृष्ण बोले, जिसमें विकल्प का अन्त ही नहीं है ऐसे वादों में अखण्ड चलने वाला
४४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वाद मैं हूँ। अन्य कौन से विकल्प हैं, वह भी सुनो। हे उद्धव! आख्याति, अन्यथाख्याति, सत्ख्याति तथा
अनिर्वचनीय ऐसे जो प्रख्यात हैं वे वाद मैं हूँ।
स्त्रीणां तु शतरूपाहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः।
नारायणो मुनीनां च कुमारी ब्रह्मचारिणाम्॥ २५ ॥
जनार्दन बोले, शतरूपा और मनु ये दोनों मैं ही हूँ। सदासर्वदा बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों में नारायण
मैं हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं, सचमुच हे उद्धव! निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर रहने वाले सनत्कुमार भी
मेरा ही स्वरूप हैं यह जान लो।
धर्मानामस्मि संन्यासः क्षेमानामबहिर्मतिः।
गुह्यानां सूनृतं मौनं मिथुनानामजस्त्वहम्॥ २६ ॥
समस्त प्राणिमात्र को अभयदान देने की परम्परा चलते रखना, सारे प्राणियों में आत्माराम मैं हूँ, यह
समझना यही संन्यास का मुख्य धर्म है। पुरुषोत्तम कहते हैं कि वह धर्म स्वयं मैं हूँ। काया, वाचा अथवा मन से
किसी भी प्राणी को दुःख न देना यही संन्यासधर्म कहलाता है। गोविन्द बोले वह संन्यासधर्म मैं हूँ। अंतःकरण में
शुद्ध बोध हुए बिना, ओंठ भींचकर द्वंद्व सहन करना इसे क्षमा नहीं कहते। क्षमा का स्वरूप सुनो। पुरुषोत्तम कहते
हैं, अंतःकरण में सचमुच परब्रह्म अंकित होकर जो बाह्य रूप में प्राणिमात्र से समान भाव से आचरण करता है
वही वृत्ति क्षमा है। वह क्षमा मैं हूँ। जिसके पास क्षमा रहती है उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सहनी होती। सारे संसार
में असत्यवादी मनुष्य ही पापी है। असत्य में करोड़ों पाप भरे रहते हैं। असत्य की बात झूठी होती है। उस पर
कोई ध्यान नहीं देता। बहिर्मुखता को असत्य ही जानो व इस लोक में या परलोक में भी खोटे सिक्के की तरह
है। जिसने मन से उसका त्याग किया उसका मैं श्रीकृष्ण भी वन्दन करता हूँ। सत्य भाषण करना अथवा
मनःपूर्वक मौन धारण करना यही गुह्य में सबसे बड़ा गुह्य है। श्रीकृष्ण ने कहा कि वह गुह्य मैं हूँ। सत्य पर प्रेम
रखना यही मेरा आत्मगुह्य है। ब्रह्मदेव का देह मनु और शतरूपा के रूप में विभाजित हुआ। नारायण कहते हैं,
वह एकनिष्ठा से मनुष्यसृष्टि उत्पन्न करने वाला जोड़ा मैं ही हूँ।
संवत्सरोऽस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्॥ २७॥
श्रीकृष्ण कहते हैं, एक पल की भी गलती किये बिना निरन्तर सावधान रहने वाला संवत्सर काल मैं ही
हूँ। त्रसरेणु से संवत्सर तक लव, निमिष, दिन आदि की कालगणना मैं संकर्षण सावधानी से करता हूँ। कृष्ण
कहते हैं, मधु-माधव इन दो महीनों का जो वसन्त ऋतु है वह मैं हूँ। सारे महीनों में अनाज को परिपक्व स्थिति
में लाने वाला सुहाना मार्गशीर्ष माह मैं हूँ। पंचांग में जिसकी गणना नहीं हो सकती, नक्षत्रों में होते हुए भी जो
सर्वथा गुप्त है, अदृश्य होते हुए भी जो ज्ञानी लोगों को मिल जाता है, वह अभिजित नक्षत्र मैं हूँ, ऐसा श्रीकृष्ण
करते हैं।
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोऽसितः।
द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान्॥ २८॥
श्रीरंग कहते हैं, जिस युग में सभी धर्म व्यवस्थित ढंग से चलते हैं, अधर्म का जरा भी अंश नहीं होता, वह
सोलहवाँ अध्याय ४४५
कृतयुग मैं हूँ। अच्युत बोले, उद्धव! धैर्य में आत्मधैर्य बड़ा विचित्र है। इस प्रकार के धैर्यवान जो असित और
देवल हैं वह मैं हूँ। हृषीवंशी कहते हैं, वेदों का विभाग करने वाले राजहंस, जिन्होंने वेदों का चयन कर उन्हें
ब्राह्मणों को सौंपा वे द्वैपायन व्यास मैं हूँ। लक्ष्मीपति कहते हैं, जो कवि हैं उनमें सचमुच परमार्थज्ञानी उशना
(शुक्राचार्य) कवि मैं हूँ। जो साक्षात आत्मस्वरूप ज्ञान हैं ऐसे शुक्राचार्य मैं हूँ।
वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम्।
किम्पुरुषाणां हनुमान् विद्याधराणां सुदर्शनः ॥ २९ ॥
षड्गुण ऐश्वर्य से भाग्यवान, पूर्णरूप से भगवत्स्वरूप तथा वासुदेव नाम से प्रसिद्ध श्रीकृष्णरूप से मैं ही
यहाँ उपस्थित हूँ और हे उद्धव! भगवद्भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ जो तुम हो, वह मैं ही हूँ, यह ध्यान में रखो।
श्रीकृष्ण के मुख से यह बात सुनते ही उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन किया। उद्धव ने नमस्कार करते ही
श्रीकृष्ण ने उसे आलिंगन में बाँध लिया। उस समय पूरा त्रैलोक्य आनन्द से भर गया। आत्मानंद का मेघ श्रीकृष्ण
इससे प्रसन्न हुआ। उद्धव और श्रीकृष्ण दोनों एकरूप हो गये। 'जो मैं हूँ' 'वही तुम हो' यह वचन श्रीकृष्ण ने
सत्य करके दिखलाया। दोनों के दो भाव मिटकर उद्धव श्रीकृष्ण बन गया और श्रीकृष्ण उद्धव रूप में रंग गये।
वह देख उद्धव आश्चर्यचकित हो गया और श्रीकृष्ण का प्रिय भक्त होने के गर्व से क्षणभर के लिये फूल गया।
वानरों में हनुमान मैं हूँ ऐसा जब श्रीकृष्ण ने कहा तो उद्धव का अभिमान नष्ट हुआ और वह मन ही मन झेंप
गया क्योंकि जब वानर और जानवर भी कृष्ण के मुझ से अधिक प्रिय भक्त बन गये तो हरिभक्तों का अंत कहाँ है
यह जानना कठिन है। फिर मुझ जैसे दास की क्या बिसात है? इस प्रकार मन में विचार कर उसने श्रीकृष्ण को
नमस्कार किया और कहा, कृपया अपनी सभी विभूतियों के बारे में मुझे बताइये। इस पर श्रीकृष्ण ने हँसकर क्या
कहा? वे बोले, ऐसा सुदर्शन विद्याधर तो सचमुच मेरी ही विभूति है।
रत्नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोशः सुपेशसाम्।
कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम् ॥ ३० ॥
श्रीरंग कहते हैं, रत्नों में जो पद्मराग होता है वह मैं हूँ। श्रीहरि बोले, मनोहर वस्तुओं में अत्यन्त निर्दोष जो
कमल की कली होती है वह मैं हूँ। श्रीहरि कहते हैं दस प्रकार के दर्भों में जो कुशदर्भ होता है, वह मैं हूँ और
श्रीहरि ने स्वयं बताया कि सकल होमद्रव्यों में जो गोघृत होता है, वह मैं हूँ।
व्यवसायिनामहं लक्ष्मीः कितवानां छलग्रहः।
तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३१ ॥
लक्ष्मीपति बोले, हे उद्धव! व्यवसाय तथा उद्योग करने वालों को साधन के रूप में दान में दी जाने वाली
अपार सम्पत्ति मैं हूँ। कपट की कपटयुक्ति जिससे अतर्क्य छल किया जा सकता है वह मायामय मूर्ति मैं श्रीकृष्ण
ही हूँ। परब्रह्म में जीवत्व की कल्पना तथा जीव की ब्रह्मस्वरूप से एकता इस सारे कपट का सूत्रधार भी मैं हूँ।
यह कपट देवताओं की समझ से भी परे है। ब्रह्मदेव और शंकर स्वयं को माया का नियंता समझते हैं लेकिन
उसी शंकर को मैंने मोहिनीदर्शन से फँसाया और ब्रह्मदेव को गौ के बछड़े चुराने में फँसाया। इसीलिये ठगों में
महाठग मैं हूँ। लक्ष्मीपति कहते हैं, सहनशीलों में जो सहनशक्ति होती है, वह मैं हूँ। श्रीपति आगे बतलाते हैं,
सात्त्विक पुरुष की जो मूल की सत्ववृत्ति होती है, वह मैं ही हूँ।
Here is the complete, line-by-line transcription of the page into clean Devanagari Markdown, matching the original text:
४४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ओजः सहो बलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम्।
सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं परा॥ ३२॥
बलवान में जो अत्यन्त प्रबल मनोबल, शरीरबल और धैर्यबल होता है और जिसके कारण वह कभी
विचलित नहीं होता वह धैर्यबल भी मैं श्रीकृष्ण ही हूँ। पुरुषोत्तम बोले, जिसके कारण मेरे प्रति अपार प्रेम उत्पन्न
होता है वह भक्तों की कामना नष्ट करने वाला भजनकर्म मैं ही हूँ। भक्तिपूर्वक पूजाविधि के लिये जिन नौ प्रकार
की मूर्तियों का विधान किया गया है उनमें मुझ वासुदेव की मूर्ति पहली है। अब नौ मूर्तियों की उपपत्ति सुनो।
वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, हयग्रीव, नारायण, वराह, वामन और नरसिंह ये नौ प्रकार की मूर्तियों के स्वरूप हैं।
उसमें की पहली मूर्ति मैं हूँ। उद्धव ! शेष जो आठ मूर्तियाँ हैं वे सचमुच मेरी ही विभूति है। हयग्रीव वेद की मूर्ति
है। श्री व्यास ने उसकी भक्ति की इसलिये उन्हें 'वेदव्यास' की उपाधि प्राप्त हुई और त्रिभुवन में उनकी कीर्ति
[
सोलहवाँ अध्याय ४४७
ब्रह्मण्यानां बलिरहं वीराणामहमर्जुनः।
भूतानां स्थितिरुत्पत्तिरहं वै प्रतिसंक्रमः॥ ३५॥
श्रीकृष्ण कहते हैं, ब्राह्मण भजन में बलि का श्रेष्ठत्व है। निश्चित रूप से वह बलि मैं ही हूँ। ब्राह्मण भजन
के सामर्थ्य ने मुझे बली के द्वार का द्वारपाल बनाया है। नारायण कहते हैं पाण्डवों में सामर्थ्य से परिपूर्ण नरावतार
जो अर्जुन है वह मैं ही हूँ। इसीलिये वह मेरा प्राण ही है। श्रीपति कहते हैं, उद्धव ! प्राणिमात्र की उत्पत्ति, स्थिति
मैं ही हूँ, और उन प्राणियों की संहारगति भी मैं ही हूँ।
गत्युक्त्युत्सर्गोपादानमानन्दस्पर्शलक्षणम्।
आस्वादश्रुत्यवघ्राणमहं सर्वेन्द्रियेन्द्रियम्॥ ३६॥
समझ लो कि ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों का वास्तविक इन्द्रिय मैं हूँ। उनकी क्रिया मेरे ही कारण
प्रकट होती है। 'गति-ग्रहण-गमन', मलमूत्र विसर्जन करना, देखना, स्पर्श करना, घ्राण, सुनना, चखना ये सारी
क्रियायें मेरे ही कारण होती हैं। इन्द्रियों का यह चलन मेरे बिना नहीं हो सकता। उनका भी सम्पूर्ण लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। मन का भी महामन मैं हूँ। नयनों का भी नयन मैं हूँ। स्पर्शों का स्पर्श मैं हूँ और जिह्वा की मूलजिह्वा मैं
हूँ। नाक का मूल मैं हूँ, कान का आद्यकान मैं हूँ, ग्रहण का निजग्रहण मैं हूँ और गति की भी गति मैं हूँ, यह
जान लो। हे उद्धव ! आनन्द का आनन्द मैं हूँ, बुद्धि का भी प्रबोध मैं हूँ और सारे इन्द्रियों का जो विषय स्वाद है
वह मुकुन्द मैं हूँ। वाणी की व्यापक वाणी मैं हूँ, परावाणी का प्रेरक भी मैं हूँ और सारे इन्द्रियों का स्वामी भी मैं
हूँ, इसीलिये मुझे 'हषीकेश' यह नाम दिया गया है।
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान्।
विकारःपुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्त्वं तमः परम्॥ ३७॥
मूल तत्त्वों की संख्या पचीस है। उनमें तीन गुण मिला दें तो वह संख्या अट्ठाईस होती है, उनके बारे में
तुम्हें विस्तृत रूप से बताता हूँ। अहंकार, महत्तत्त्व, पृथ्वी (गंध), वायु (स्पर्श), आकाश (शब्द), उदक (रस)
और तेज (तेज) ये पंचतन्मात्रा मिलकर एक स्थूल प्रकृति तैयार होती है और पंचमहाभूत तथा ग्यारह इन्द्रिय
मिलकर विकारों की संख्या सोलह है। इसमें प्रकृति और पुरुष मिलाने से तत्त्वों की संख्या पच्चीस हो जाती है।
प्रकृति में गुणों का वास होता है। यह तत्त्वों का तत्त्वविलास है। गुण विकारयुक्त प्रकृति और तत्त्वसंख्या का
निश्चय इनके बारे में तुम्हें जो विचार बतलाये वही मेरा परात्परस्वरूप है।
अहमेतत्प्रसंख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयः।
मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना।
सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार पचीस तत्त्वों का ज्ञान मैं ही हूँ। भगवान बोले, इन तत्त्वों को गिनने का जो ज्ञान है, वह स्वयं मैं
हूँ। भगवान आगे बताते हैं, इसे जानने का लक्षण भी स्वयं मैं ही हूँ। जीव और ईश्वर, गुणी और गुणावतार, क्षेत्र
(शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) ये सब निश्चित रूप से मैं हूँ। मेरे सिवा एक अणु भी कोई वस्तु स्वतंत्र नहीं है।
सर्वत्र मैं ही सर्वात्मा हूँ और चिन्मात्र भी मैं हूँ। हे उद्धव ! यहाँ मेरे सिवा अलग कुछ भी शेष नहीं रह गया है
और सामान्य देह में मैं ही हूँ, यह जान लो। हे उद्धव ! शायद तुम कहोगे कि इसका संक्षेपण न किया जाय तो
यहाँ विस्तार नहीं किया जा सकता। उसका कारण बताता हूँ।
४४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया।
न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥
कालरूप से मैं पृथ्वी के परमाणुओं की भी गणना कर सकता हूँ, किन्तु मेरी विभूतियों की संख्या की गणना
मैं भी नहीं कर सकता। मैंने अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण किया है। उन्हें मैं नहीं गिन सकता, फिर मेरी सारी
विभूतियाँ कौन वाचाल गिन सकता है? मैं सर्वत्र नारायण हूँ, मेरी विभूतियाँ गिनने की शक्ति मुझमें नहीं है फिर
उनका वर्णन कैसे करें? हे उद्धव! मनुष्य में मेरी विभूति किस रूप में रहती है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः।
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र समेऽशवः ॥ ४० ॥
जिसकी प्रतापशक्ति (ओजस्विता) अत्यन्त प्रबल है, जिसके पास लक्ष्मी निरन्तर वास करती है, जिसके
ऐश्वर्य की कोई सीमा नहीं है, स्वधर्म में जिसकी बहुत कीर्ति है, जिसके वैभव का सामर्थ्य इतना है कि वह सम्पूर्ण
त्रैलोक्य को अपनी आज्ञा में रखता है और जिसकी दान देने की तो कोई सीमा ही नहीं है, जिसका भाग्य निरन्तर
बहता ही रहता दिखाई देता है, जिसका सामर्थ्य अत्यन्त विलक्षण है और जिसकी बात का कोई उत्तर नहीं दे
सकता, जिसके भाग्य की शालीनता सभी लोगों के नेत्रों को मनोहारी लगती है, जिसे सहनशीलता के प्रति लगाव,
निंद्यकर्म के प्रति लज्जा होती है और व्यावहारिकता की जो साक्षात मूर्ति है, ऐसे लक्षण जिसमें होते हैं वह मेरी
विभूति है, यह जान लो। इतना ही क्यों, इनमें से एक भी लक्षण जिसमें हो वह भी मेरी विभूति है यह जान लो।
एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः।
मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते ॥ ४१ ॥
संक्षेप में ही जिन विभूतियों के सम्बन्ध में तुम्हें बताया उन्हें हे उद्धव! मनोविकारों के अनुभव के रूप में
ही जानना चाहिये। साधकों की साधनस्थिति को देखते हुए मेरी विभूतियों को सत्य ही जानना चाहिये।
परमार्थदृष्टि से विचार करने पर उन्हें काल्पनिक समझना चाहिये। वास्तव में मेरा स्वरूप अद्वैत है यह ध्यान में
रखो। मुझे नाम नहीं है, रूप नहीं है, गुण नहीं है और वर्ण भी नहीं है। अतः नाना प्रकार की विभूतियों का यदि
लक्षण बताना हो तो वह मिथ्या ही होगा।
वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।
आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ ४२ ॥
मेरा स्वरूप नित्य निर्विकार होने के कारण मन को, बुद्धि को अथवा वाचा को भी उसकी थाह नहीं लग
पाती, फिर बेचारी इन्द्रियाँ क्या पार पायेंगी? प्राण को भी इस स्वरूप का ठीक-ठीक पता नहीं चलता। इसलिये
शमदम के अनुक्रम से मन, बुद्धि, वाणी और इन्द्रियों का संयम करो और प्राणधर्म के अनुसार प्राण का नियंत्रण
करो जिससे तुम आत्मस्वरूप तक पहुँचोगे। अब यदि मन, बुद्धि, वाचा आदि इन्द्रियों का नियमन करने का मर्म
नहीं जानता ऐसा कहोगे तो उसका अनुक्रम भी सुलभ रीति से बताता हूँ। वाणी का संयम मेरे नाम से करें, मन
का नियमन ध्यान सामर्थ्य से करें, प्राण का नियमन प्राणत्याग से करें और इन्द्रियों का नियमन दम से अर्थात्
संयम से करें और बुद्धि का नियमन आत्मविचार से करें, जीव का नियमन परमात्मसुख से करें। इतना करने पर
तुम सहज ही, निश्चित रूप से मत्स्वरूप हो जाओगे। एक बार मत्स्वरूप होने पर संसार दिखायी ही नहीं पड़ेगा।
सोलहवाँ अध्याय ४४९
जन्म-मरण की वार्ता समाप्त होगी और आने-जाने का क्रम समाप्त होगा। मैंने बतायी हुई नियम पद्धति के
अनुसार नियमन करने की बात जिसकी समझ में नहीं आती वह कोटि-कोटि दुःख भोगता है। उसका भी वर्णन
करता हूँ।
यो वै वाङ्मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यतिः।
तस्य व्रतं तपो दानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ४३ ॥
मैंने बताये हुए नियमों के अनुसार जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों का निष्ठापूर्वक नियमन नहीं करता उसके
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। कच्ची मिट्टी के बर्तन का पानी जिस प्रकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार उसका व्रत,
तप, दान, योग, याग, शब्दज्ञान ये सब व्यर्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार राख में होम करने से अथवा अमंगल स्थिति
में कर्मों का आचरण करे या कुपात्र को दान दें वैसी ही स्थिति साधनों की होती है। ऊसर पर बीज डालने से
अथवा भिखारी ब्राह्मण को भोजन का निमंत्रण दे अथवा बाँस को इच्छायें होने लगे उसी प्रकार उन साधनों की
स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार हे उद्धव ! यदि मन में यदि विधिपूर्वक नियम का पालन न किया जाय तो
सारे साधन देखते-देखते व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये मन आदि इन्द्रियों की जो वृत्ति है उसका नियमन करना
चाहिये ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं।
तस्मान्मनोवचः प्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः।
मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते॥ ४४ ॥
देखो! मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ तथा प्राण इनका नियमन अवश्य करना चाहिये, इसे ध्यान में रखो। इस प्रकार
वृत्ति को सावधान रखते हुए जो मेरा भजन करता है उसकी विषय वासनायें जल जाती हैं और मेरे भक्तिमार्ग पर
चलने से निर्विकल्प शान्ति उत्पन्न होती है। भक्तिमार्ग पर चलने से सारे साधन लज्जित हो जाते हैं। भक्ति के
कारण ही मैं लक्ष्मीपति प्रकट होकर मेरे भक्तों की संसार से निवृत्ति करता हूँ। यदि मेरे भक्तों को सांसारिक बाधा
होती है तो मुझ भगवान को ही उससे लज्जा होती है। मैं निजभक्तों को कष्ट में नहीं रहने देता। प्रह्लाद का छल
होते ही मैं नरसिंह रूप में शुष्क काष्ठ में प्रकट हुआ और गजेन्द्र के लिये वैकुण्ठ छोड़कर दौड़ पड़ा। कौरव
द्रौपदी का छल कर रहे थे अतः मैंने तत्काल उनके मुँह में कालिख पोत दी। अग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी उस
समय मैं वह दावाग्नि पी गया। इन्द्र गोकुल को कष्ट दे रहा था, उस समय मैंने गोवर्धन पर्वत हाथ पर उठा
लिया। उसी प्रकार गोपियों का मनोरथ पूरा करने के लिये मैं श्रीपति कामी बन गया। अर्जुन की प्रतिज्ञा पूर्ण हो
इसलिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया और जयद्रथ को मारने का पराक्रम करा कर अर्जुन को बचाया।
अम्बरीष का गर्भवास मैंने आनन्दपूर्वक झेला। मैं श्रीकृष्ण कभी भी अपने भक्तों को नीचा नहीं देखने देता। भक्तों
के चरणों की धूल मैं श्रीपति अपने हृदय पर धारण करता हूँ। इतना ही नहीं, भक्ति के कारण मैंने भालू और
बन्दरों को भी अपने पास बिठाया। इसीलिये हे उद्धव ! मैं तुम्हें बार-बार कहता हूँ कि मेरी भक्ति करनी चाहिये।
मेरा भजन करने से भक्त सहज ही मद्भाव प्राप्त करता है। मेरी ही भावना मन में धारण कर भजन करने से मैं
अनन्त उसके हाथ आ जाता हूँ और बाद में उसका सेवक बन जाता हूँ। इतना प्यार है मुझे भक्ति से। यहाँ मेरी
भक्ति से सुलभ अन्य कोई साधन ही नहीं है यह जानकर ही मैंने तुम्हें भक्तिमार्ग पर लगाया है। सद्भक्ति प्राप्त हो
जाने पर संसार बिचारा क्या है? मेरे भक्त चारों मुक्तियों को दूर हटाकर आत्मसुख का उपभोग करते हैं। मेरे
भक्तों की महिमा अत्यन्त अतर्क्य और गहन है। इतना कहकर श्रीकृष्ण उद्धव को प्यार से सहलाने लगे। श्रीकृष्ण
४५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
के हाथ के स्पर्श से उद्धव को जाने क्या हुआ ? कुछ ऐसा ही हुआ जैसे अभी-अभी ब्यायी हुई गौ का बछड़ा माँ
के दूध से आह्लादित होता है। जिस प्रकार चकोर चन्द्रमा के किरणों से अंतर्बाह्य तृप्त रहता है अथवा मेघ को
देखकर मोर आनन्द से नाचने लगता है, उसी प्रकार उद्धव भी आत्मानंद में पूरी तरह रंग गया और यह भूल गया
कि मैं भगवान का भक्त हूँ और श्रीकृष्ण भी भूल गये कि वे भगवान हैं। इस प्रकार वे दोनों जब एकरूप होकर
मस्त हो गये थे, तभी वहाँ परमानन्द की पताका स्वानंद से फहराने लगी। इस भक्तिसुख का माधुर्य जिसके भाग्य
में है वही जाने। भजनरूपी व्यवसाय में उद्धव को श्रीकृष्ण का लाभ हुआ। एकनाथ जनार्दन की शरण में गया
इसीलिये भजनसुख का रहस्य और भक्तों के अंतःकरण का रहस्य अकेले उसकी समझ में आया। भक्तों के प्राण
उस परमात्मा ने गोकुल में ग्वाला बनकर तथा ग्वालों के साथ हिल-मिल कर गोपियों और गोपालों का उद्धार
किया। यदि केवल उनके ही खेल-खेल कर बालगोपालों का उद्धार किया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
लेकिन उसकी अपूर्व कला और उदार लीला तो कुछ और ही है। उसे सुनिये। पर्वत, पाषाण, तृण, भृंग, मत्स्य,
मृग, मगर, उसी प्रकार व्याघ्र, वनचर, सर्प आदि विषैले प्राणी, कबूतर, मोर आदि गोकुल के प्राणियों का उस
कृपालु एवं सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण ने स्वयं अपनी लीला से ही उद्धार किया। पिता के वचन के बहाने, सीता के
वियोग के कारण श्रीरामचन्द्र ने रीछ, बन्दर और राक्षसों का भी उद्धार किया। अब इससे भी बड़ी लीला सुनिये।
अयोध्या से लेकर लंका के बीच के मार्ग में जो भी वृक्ष, वनस्पति, ढोके, पत्थर, पर्वत, घास जैसी तुच्छ वनस्पति
और कृमि कीटक थे उन सबका श्रीरामचन्द्र ने अपनी लीला से ही उद्धार किया। इस प्रकार वह जनार्दन नाना
प्रकार के अवतार लेकर जब सभी का उद्धार करता रहता है तो उसने एक एकनाथ को पावन कर दिया, इसमें
आश्चर्य क्यों माना जाय ? लेकिन उसने एक बड़ा आश्चर्य किया कि मुझ जैसे मूढ़ के मुँह से श्रीमद्भागवत के
शब्द देशी भाषा में बुलवाये। इसका मुझे भी बहुत बड़ा आश्चर्य है। जिसकी ऐसी कृपा है उस जनार्दन की ही
शरण में यह एकनाथ है। उसके ही चरणों का स्मरण कर यह सोलहवाँ अध्याय वह पूर्ण करता है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां विभूतियोग नाम षोडशोध्यायः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु। श्री विट्ठलार्पणमस्तु।
सत्रहवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम महामेरु स्वरूप हो। सूक्ष्म स्वरूप में तुम पर्वत हो
यह प्रतीत होने पर भी चैतन्यरूप में तुम अत्यन्त महान हो तथा सभी का आधार हो। वैकुण्ठ, कैलाश आदि
तुम्हारे आत्मज्ञान के अत्यन्त उच्च शिखर हैं। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर तुम्हारे ही सहारे वास करते हैं। यह
त्रैलोक्य और सारे लोक तुम्हारे ही आधार पर टिके हुए हैं। समस्त प्राणिमात्र की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में
विलय तुम्हारे में ही होता है। देवता, दैत्य, छोटे, बड़े, सौम्य, क्रूर आदि विविध प्रकार के भूत धारण करके भी
तुम्हारा स्वरूप निर्विकार है। उसमें विवेक का खेत है तथा चिद्रत्न की खानें हैं। उसका एक टुकड़ा भी हाथ लग
जाय तो साधारण आदमी बड़ा व्यापारी बन जायगा। उस पर्वत पर उगी औषधियों का तो बड़ा चमत्कार है।
उनका सेवन करने से वे उन्हें अजर-अमर कर देती हैं। उस पर ज्ञान गंगा के सोते भी निरन्तर बहते रहते हैं। जो
देवताओं तथा मनुष्यों का विश्राम स्थल है, जो ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों का आश्रम है, जो क्रियाकर्मों का
नैष्कर्म्य है और जो जीवों का निजधाम है, जो भजन का क्षेत्र, भक्तों के जीवन का बगीचा है, जो पसन्द की भी
पसन्द है और जो आत्मानुभव से माधुर्य का भी माधुर्य है ऐसा वह सद्गुरु रूप महामेरु जो कठोरता के बिना ही
सबका आधार है, जिसके कारण साधकों का जीवन भी सुखमय हो जाता है, उन साधकों का समाधान, शिष्यों
के लिये तो आत्मानंद रूप मेघ, मुमुक्षुरूप चातकों का जीवन ऐसा जो जनार्दन स्वामी है वह प्रसन्न हो उठा।
उसके चरणों के कृपाप्रसाद से श्रीमद्भागवत के एकादशस्कंध का बड़े आनन्द से वर्णन किया। उसमें उद्धव ने
श्रीकृष्ण से विभूतियों के बारे में पूछा। उनका वर्णन सोलहवें अध्याय में लक्ष्मीपति ने भजनप्रीत्यर्थ यथार्थ रीति
से किया। उस विभूतिवर्णन की विशेष बात यह है कि उसमें श्रीकृष्ण ने कहा कि भक्तों का जो कर्म है, वह मैं
आत्माराम ही हूँ। उसमें एक शंका उत्पन्न हुई कि निरन्तर कर्म करते हुए कितने ही लोग केवल कर्मठ हो गये हैं,
जिनकी कोई गिनती नहीं है। तो कर्म से कैसे मुक्ति मिलती है ? इच्छा से कर्म करते समय कर्म में कर्तव्यता का
अभिमान न हो और कर्म से मोक्ष प्राप्ति हो ऐसा उपाय स्वयं पूछे। क्योंकि लक्ष्मीपति ने स्वयं ही बताया कि
सात्त्विक जो कर्म करते हैं वह कर्म ही मेरी विभूति है। यह बात सोलहवें अध्याय के अन्त में बतायी गयी है।
स्वयं होकर स्वकर्म का आचरण करने से वह कर्म ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है वह जो कर्मक्रिया का मर्म है उसे
सरल ढंग से बताने के लिये भगवान से कहें। उद्धव के मन में यही उद्देश्य था इसलिये इस शंका का समाधान
करने के लिये व भगवान से वर्णाश्रम की तथा स्वधर्म की पृष्ठभूमि ही पूछने लगा।
उद्धव उवाच
यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।
वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषा द्विपदामपि॥ १॥
उद्धव ने कहा, हे भक्तों के भगवान ! तुम्हारी आत्मविभूति का श्रवण करते हुए मेरे मन में आया कि स्वधर्म से
किस प्रकार भक्ति का उदय होगा। तुम तो कल्प के प्रारम्भ से ही अत्यन्त सहृदयता से कहते आ रहे हो कि स्वधर्म
कर्म से ही भक्ति प्राप्त होती है और इस सम्बन्ध में तुमने वर्णाश्रम का उत्कृष्ट प्रतिपादन किया है। सभी मनुष्यों को
उत्तम गति और भगवद्भक्ति स्वधर्म से प्राप्त होती है इसका तुमने ही यथार्थ और निश्चित निरूपण किया है।
४५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।
स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत् समाख्यातुमर्हसि ॥२॥
हे कमलनयन अच्युत! सुनो। जिस स्वधर्म का आचरण करने से तुम्हारी भक्ति स्वाभाविक ढंग से भक्तों
को प्राप्त होती है उस कर्णकौशल्य का लक्षण, हे कमलनयन! माधव! कृपामूर्ति! मुझसे निवेदन करें। हे
लक्ष्मीपति! शायद तुम यह कहोगे कि मैंने कल्प के प्रारम्भ में स्वधर्म की यह स्थिति किसे बतायी ? तो इस
सम्बन्ध में मेरी विनती सुनो।
पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो।
यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव ॥३॥
जिसकी बाहों का प्रताप अद्भुत रहता है, जो विश्व का मर्यादा का धर्मसेतु व्यवस्थित रूप से रखना
जानता है उसे 'महाबाहु' कहते हैं। स्वधर्म कर्म का प्रकाशक अनादि वक्ता एक तुम ही हो और वर्णाश्रम का
विचार ब्रह्मदेव से कथन करने वाले उपदेशक भी तुम ही हो। तेरहवें अध्याय में तुमने हंस रूप में स्वधर्म का
निश्चित विचार विस्तारपूर्वक बताया और उसमें से ही आत्मज्ञान का रहस्य ढूँढ़कर मुझे उत्तम ढंग से बतलाया।
लेकिन तुमने हंसरूप से स्वयं ही जो स्वधर्म बतलाया उसमें के स्वधर्म का लक्षण और उसका निरूपण मेरी
समझ में नहीं आया। इसलिये सनत्कुमार ने तुम्हारे मुख से जिस आश्रमधर्म का भक्तिपूर्वक श्रवण किया, उसे
मुझे बतायें। अब तुम यदि यह कहोगे कि परम्परा से सनत्कुमार द्वारा ही धर्म का प्रसार हुआ है अतः उसको
समझ कर तुम उसका रहस्य जान लो। किन्तु हे श्रीकृष्ण! मुझसे यह नहीं होगा।
स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन।
न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः॥४॥
काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि षड्रिपु भक्तों के बहुत बड़े बैरी हैं, उनका तुम संहार करते हो
इसीलिये तुम्हें अरिमर्दन कहते हैं। भक्तों के लिये शत्रु का नाश करने वाला तुम्हारे बिना त्रिभुवन में कोई नहीं है
इसलिये मैं अनन्य भाव से तुम्हारी शरण आया हूँ। कल्प के प्रारम्भ में तुमने सनकादिकों को उपदेश किया, उस
उपदेश को अब काफी लम्बा समय व्यतीत हो गया है इसलिये अब किसी के पास वह धर्म नहीं रह गया है।
आज के युग में लोग स्वधर्म में तत्पर नहीं रहते। स्वधर्म का विचार भूल कर वे कामासक्ति तथा उदरपूर्ति में ही
सादर लिप्त रहते हैं। इसलिये जिससे यथार्थ धर्म अंतःकरण पर अंकित हो सके ऐसा उपदेशक ही नहीं रह गया
है। इसलिये हे वैकुण्ठाधिपति! स्वधर्म की निष्ठा के बारे में मुझे तुम ही बताओ।
वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।
सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः॥५॥
कर्त्रावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन।
त्यक्ते महीतले देव विनष्टं कः प्रवक्ष्यति ॥६॥
हे श्रीकृष्ण! इस संसार में जिसका ज्ञान मात्रा से आच्छादित नहीं है, ऐसा धर्मोपदेश तुम्हारे सिवा और कोई
नहीं दे सकता है। कुछ लोग शास्त्रवचन की मीमांसा कर कर्मों का प्रतिपादन करते हैं लेकिन उन कर्मों का
आचरण किस प्रकार किया जाय यह उनकी भी समझ में नहीं आता। इसीलिये हे भगवन्! धर्म का कर्ता, धर्म