श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ४४१
क्रियाओं में कर्त्ता मैं हूँ। किसान की तरह मैं निर्माण करने वाला और पालन करने वाला तथा संहार करने वाला
हूँ। भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये अवतार लेने वाला एक मैं ही हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा,
कर्म की क्रियाशक्ति भी मैं ही हूँ। ये साधारण स्वरूप बतलाये। अब विशेष विभूतियों के बारे में सुनो।
अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम्।
गुणानां चाप्यहं साम्यं गुंणिन्त्यौत्पत्तिको गुणः॥१०॥
लक्ष्मीपति बोले, गतिशील में जो गति होती है वह गति मैं हूँ। हे उद्धव ! सचमुच गति की मूल गति मैं हूँ,
यह जान लो। चेतना से ही सबको गति प्राप्त होती है। चेतना से ही इन्द्रियों की प्रकृति होती है। अर्थात् गति की
गति एक मैं ही हूँ। सभी गतियों में श्रेष्ठ गति है प्राणियों को मुक्ति प्राप्त होना। लेकिन उस मुक्ति को भी मेरे ही
कारण मुक्ति प्राप्त होती है। सारांश गतियों की भी गति एक मैं हूँ। देवताओं और मानवों को एक सीमा में रखने
वाली एक काल की सत्ता है। लेकिन सचमुच उस काल को भी मर्यादा में रखने वाला महाकाल मैं हूँ। हे
भक्तिराज ! तीनों गुणों की साम्यावस्था मैं हूँ। अकृत्रिम गुण का जो स्वभावधर्म है, वह भी सचमुच मैं ही हूँ यह
जान लो।
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥११॥
हे उद्धव ! मैं स्वयं को गुणी कहता हूँ क्योंकि मुझ में क्रिया का प्रथम सूत्र प्रधान रहता है। माया का पहला
कार्य मैं हूँ इसलिये सभी गुणों से युक्त मैं ही हूँ। संसार में आकाश सबसे महान है। लेकिन वह भी मुझसे
लुकाछिपि खेलता है। मेरे महत्तत्त्व के चमत्कार की ठीक-ठीक कल्पना मुझे ही निश्चित रूप से नहीं होती।
नारायण बोले, ज्ञान प्रधान जो महत्तत्त्व है वह मैं हूँ। सूक्ष्म में ब्रह्मदेव आदि भी जिसका आकलन नहीं कर पाते
वह जीव मैं हूँ। अजेय वस्तुओं में मन मैं हूँ। उस मन को जीतने के लिये मेरे सिवाय किसी में पूर्ण सामर्थ्य नहीं
है। मेरा स्मरण करने से मन स्थिर होता है और मुझे भूलने से मन विचलित होता है। वेदशास्त्र के बल पर मन
का आकलन नहीं होता। मैं ही मन हूँ। मेरा चिन्तन करने में उसका विलय हो जाता है और मुझे भूलने से वह
इधर-उधर भटकने लगता है।
हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत्।
अक्षराणामकारोऽस्मि पदानिच्छन्दसामहम्॥१२॥
गोविन्द ने कहा कि वेदों का अध्ययन करने वाला प्रसिद्ध जो ब्रह्मदेव है वह मैं हूँ। मेरे ही कारण वेदों का
उल्लंघन नहीं किया जा सकता। वेदों के सम्बन्ध के विचार भी मैं ही हूँ। ओंकार के अतिरिक्त जितने भी मंत्र हैं
वे सब बच्चों की कहानियों की तरह निष्फल हैं। मैं श्रीकृष्ण ही मंत्र का ओंकार है। उसके ही कारण सारे मंत्र
पावन हो गये। अकार, उकार और मकार इनका अर्थ, मात्रा के साथ जो उच्चार है वही त्रिवर्णात्मक ओंकार है।
इसके ही कारण मंत्र पावन होते हैं। किसी भी अक्षर के उच्चार के लिये अकार आवश्यक होता है। उद्धव ! वह
अकार भी मैं श्रीकृष्ण ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक समझ लो। श्रीकृष्ण ने कहा, छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ इसलिये
ब्रह्मवृंद उस गायत्री मंत्र का सेवन करते हैं। श्रीकृष्ण बोले, सभी छन्दों में प्रमुख जो गायत्री छंद है वह तथा सभी
द्वंद्वों में जो निर्द्वंद्व है, वह मैं हूँ। उस गायत्री मंत्र के ही कारण ब्रह्मवृंद मुझे पूजनीय बन गये हैं।