श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट्।
आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥
देवताओं में इन्द्र मैं हूँ, वसुओं में अग्नि मैं हूँ, आदित्यों में वामन मैं हूँ और रुद्रों में नीललोहित मैं हूँ।
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनुः।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु ॥ १४ ॥
मैंने ब्रह्मदेव को शाप देकर उसे पूजा के अयोग्य कर दिया। शंकर का नैवेद्य भक्षण करने के लिये निषिद्ध कर
दिया, भृगु ने विष्णु के हृदय पर लात से मारा और उस लात के चिह्न के रूप श्रीवत्सचिह्न ने भृगु के माहात्म्य का
वर्णन किया। श्रीकृष्ण बोले, ब्रह्मर्षि में पूज्य हुआ वह भृगुऋषि मैं हूँ और मनु के रूप में मैं स्वयं श्रेष्ठ राजर्षि बन
गया हूँ। श्रीकृष्ण बोले, देवर्षियों में नारदमुनि मैं ही हूँ। कामधेनु भी मेरा अत्यन्त पवित्र और प्रसिद्ध स्वरूप है।
सिद्धेश्वराणां कपिलः सुपर्णोऽहं पतत्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा ॥ १५ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सिद्धों में मुनिश्रेष्ठ कपिल मैं हूँ। पक्षियों में गरुड़ के रूप में रहने वाला पक्षीराजा मैं हूँ।
कृष्ण ने कहा, प्रजापति में मुख्य दक्ष मैं हूँ और पितृगण में श्रेष्ठ अर्यमा तो मेरा ही स्वरूप है।
मां विद्ध्युद्धव दैत्यानां प्रह्लादमसुरेश्वरम्।
सोमं नक्षत्रौषधीनां धनेशं यक्षरक्षसाम् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, भक्ति के सामर्थ्य से दैत्यों में अत्यन्त महान प्रह्लाद मैं हूँ। उसी प्रकार नक्षत्रों का और
औषधियों का स्वामी जो चन्द्रमा है वह भी मेरा ही स्वरूप है। यक्ष राक्षसों में श्रेष्ठ कुबेर भी भी मेरा ही स्वरूप
है। उसके विश्वास पर श्रीकृष्ण का भण्डार सदा उसके पास रहता है।
ऐरावतं गजेन्द्राणां यादसां वरुणं प्रभुम्।
तपतां द्युमतां सूर्यं मनुष्याणां च भूपतिम् ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, गजेन्द्रों में जो ऐरावत है वह मैं हूँ, जलचरों का राजा जो वरुण है वह मेरा ही स्वरूप है।
श्रीकृष्ण बोले, अपनी प्रभा से निरन्तर प्रकाश देने वाला, संसार को प्रकाशित कर देदीप्यमान लगने वाला तथा
अपने तेज से अत्यन्त प्रखर दिखायी देने वाला सूर्य मैं हूँ। मनुष्यों में जो पृथ्वी का उपभोग करता है, सारी भूमि
जिसके हाथ में रहती है, जिसे राजा कहते हैं वह मेरा ही स्वरूप है।
उच्चैः श्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम्।
यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥
नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम्।
आश्रमाणाामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥ १९ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सारे अश्वों में श्रेष्ठ जो उच्चैःश्रवा है वह मैं हूँ और जिसके लिये सारा त्रैलोक्य प्रयत्नशील
रहता है वह सुवर्ण धातु मैं हूँ। श्रीहरि कहते हैं, नागों में जो अनंत यह नाम धारण करता है वह नाग मैं हूँ।
नाखून, दाढ़ें तथा सींग धारण करने वाले जो चौपाये हैं उनमें सिंह मैं हूँ। नारायण ने कहा, चारों आश्रमों में जो