श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 449, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय ४३३
तभी भोगविलास और सम्पत्ति के प्रयास सिद्धियों को नग्न कर देते हैं। राजा के साथ जिसका मेलजोल रहता है
उसे रिश्वत लेना सरल रहता है लेकिन सम्भवतः इसी में उनकी मृत्यु हो जाती है। उसी प्रकार साधक के लिये
सिद्धि घातक ही है। इस अध्याय के विषय का प्रतिपादन करने का यही कारण है कि उद्धव ! मेरी प्राप्ति में
सिद्धि ही सबसे बड़ा विघ्न है। एकाग्र भजन से मेरी प्राप्ति का प्रसंग निकट आते ही सिद्धियाँ आ जाती हैं और
उन भोगों की आसक्ति से साधकों को भुलावा देकर उन्हें कंगाल बना देती हैं। जो मेरे आत्मसुख के विषय में
नहीं जानते वे मूर्ख रहते हैं, उन्हें अत्यन्त विषय वासना के कारण इस सिद्धि का अत्यन्त कौतुक मालूम होता है।
वेश्या के जैसे हावभाव रहते हैं वैसे ही सिद्धि का वैभव होता है। उस सबका त्याग करने के लिये भगवान ने इस
अध्याय का निरूपण किया। जिसे मेरा आत्मसुख प्राप्त होता है वह इन सिद्धियों को तुच्छ मानता है। वे जन्म-
मरण की चिन्ता भी नहीं करते। उनके अंतःकरण में मेरे प्रति परिपूर्ण आनन्द भरा रहता है। सद्गुरु चरणों की
सेवा करने से सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ही भर जाता है। फिर सिद्धियों को कौन पूछे ? यह बात हरिभक्त जानते हैं।
हरिभक्ति पर भक्त बिक जाता है, भजन से अहंभाव नष्ट होता है, ऐसे समय सिद्धियों के उपयोग की कल्पना भी
मन में नहीं आती। भुक्ति, मुक्ति, ऋद्धि, सिद्धि ये सब सद्गुरु के चरणों में ही हैं। जो मंदबुद्धि यह बात नहीं
जानते वे अनेक प्रकार की सिद्धियों की इच्छा करते हैं। निरपेक्षता यही सचमुच सभी सिद्धियों का साधन है इसे
पक्का ध्यान में रखो। निरपेक्ष व्यक्ति के आँगन में सभी सिद्धियाँ सेवारत रहती हैं जिनके मन में सिद्धियों की
इच्छा रहती है :उन्हें सिद्धियाँ सीधे मुँह देखती भी नहीं और निरपेक्ष व्यक्ति के चरणों की धूल को वे शिरसावंद्य
करती हैं। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भी अधिक निरपेक्षता ही श्रेष्ठ है। यह निरपेक्षता हाथ लगने पर सायुज्यता
मुक्ति भी चरणों पर गिर पड़ती है। निरपेक्षता के पास ही सारी सिद्धियाँ रहती हैं, सारे विधि रहते हैं और समृद्धि
वहाँ दिन-रात चरणों का वन्दन करती रहती है। जहाँ निरपेक्षता होती है वहीं योगक्षेम रहता है और वहीं सद्भाव
रहता है और निरपेक्षता के पास ही भगवान का स्वरूप खड़ा रहता है। निरपेक्षता के पास ही वेदान्त होता है,
निरपेक्षता के पास ही सच्चा योग होता है, निरपेक्षता ही स्वानंद का उपभोग है और निरपेक्ष को ही भगवान प्राप्त
होते हैं। एका (एकनाथ) ने जनार्दन की शरण में जाकर उनके पवित्र चरणों का वंदन करते ही उसे सदा बढ़ती
रहने वाली निरपेक्षता प्राप्त हुई इसलिये वह सदा आनन्द से परिपूर्ण रहता है। हमें स्वानंद का आत्मबोध हुआ
यह केवल सद्गुरु चरणों का प्रसाद है। श्रीगुरुचरणों में ही महासुख का लीलाविलास तथा आनन्द का मूल बीज
होता है। गुरुचरणों की भक्ति करने से अनायास ही चारों मुक्ति प्राप्त हो जाती हैं। इसीलिये विरक्ति गुरुभक्त की
आत्मशांति के साथ सेवा करने लगती है। एका जनार्दन की शरण में गया इसलिये उनकी कृपा से श्रीमद्भागवत
के निरूपण का पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
इति श्रीमद्भागवते एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
एकाकार टीकायां सिद्धि निरूपण स्तोत्र नाम पंचदशोध्यायः ॥ १५ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु