श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ४३७
अर्थसिद्धि बुद्धि का प्रवेश हो रहा है। पिछली कथा में पन्द्रहवें अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने बताया था कि मेरी
प्राप्ति में सिद्धियाँ बाधक होती हैं। अर्थात् सिद्धियों पर से ध्यान हटा कर मेरे स्वरूप में मन लगाना चाहिये।
श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव ने प्रश्न किया। "हे श्रीकृष्णनाथ! समर्थ, मेरी एक विनती सुनो। तुम
अपनी समस्त विभूतियों के बारे में मुझे बताओ।"
उद्धव उवाच
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम्।
सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्भवः ॥ १॥
भूत और भौतिक का कारण तुम हो, जन्म, स्थिति और लय तुम्हारे ही कारण होते हैं, फिर भी तुम अकर्ता
हो इसीलिये तुम परब्रह्म हो। इस पर तुम कहोगे कि प्राणियों की उत्पत्ति स्थिति और लय प्रकृति ही करती है।
लेकिन वह प्रकृति अर्थात् माया तुम्हारे ही अधीन है। तुम्हारे ही कारण प्रकृति में चालन की क्षमता आती है।
इसलिये प्रकृति परतंत्र है। तुम परमात्मा स्वतंत्र हो। तुम अनादि, अव्यय और अथाह हो। वेदों को भी तुम्हारी
थाह नहीं लगती। प्रकृति पर तुम्हारा आवरण है। तुम स्वयं जीव का स्वरूप हो लेकिन जीव नहीं हो। जीव
जितना अज्ञान से युक्त है और तुम सचमुच ही ज्ञान और अज्ञान से बिलकुल परे हो, इसलिये तुम अविनाशी
और अपरोक्ष साक्षात परब्रह्म हो। तो तुम कैसे अपरोक्ष हो ? इसका कारण यह है कि तुम सबमें सर्वत्र अंतर्बाह्य
व्याप्त हो और तिस पर भी तुम अतर्क्य हो। उसके सम्बन्ध में सुनो।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयमकृतात्मभिः ।
उपास्ते त्वां भगवन् याथातथ्येन ब्राह्मणाः ॥ २॥
मछली से लेकर हिरण्यगर्भ तक समस्त प्राणियों में निरन्तर अंतर्बाह्य व्याप्त रहने वाले तुम्हें ब्राह्मण वेद के
अर्थ से निश्चित रूप से जानते हैं अथवा जो उपनिषदों का यथार्थ रहस्य जानकर तुम्हारे प्रति भजनयुक्त रहते हैं,
वे तुम्हें निश्चित अर्थ में सर्वव्यापी सर्वात्मा जानते हैं। उस सर्वात्मा का पार जानना चाहे तो तुम अचिंत्य और
अनन्त ऐश्वर्यमुक्त हो। जो साधारण लोग तुम्हें नहीं जानते उनके विचार सुनो। इनका मन बिका होता है, वे
कामेन्द्रियों के दास बन जाते हैं वे केवल जिह्वा का पोषण करते हैं और निद्रा के गरजमाई बन जाते हैं। ऐसे लोगों
को तुम्हारे स्वयंसिद्ध तथा सर्वव्यापी स्वरूप की कल्पना भी नहीं होती। हमारे शरीर में ही आत्मस्वरूप है इसकी
उन्हें कल्पना ही नहीं होती। वे सदा विषयों में लिप्त रहते हैं। विषयों के प्रति उनका अंतःकरण चंचल बना रहता
है। उन्हें सगुण स्वरूप का ध्यान नहीं होता और मन निर्गुण स्वरूप में प्रवेश ही नहीं करता। ऐसे अज्ञानी लोग
किस प्रकार तर पायेंगे ? इसलिये शास्त्रों की खोजबीन करने तथा ध्यानधारणा के झंझट में न पड़ उन्हें केवल
भजन करना पड़े ऐसे प्रकार के उत्तम उपाय जो आपके पास हों उन्हें बतायें।
येषु येषु च भावेषु भक्त्या त्वां परमर्षयः।
उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद् वदस्व मे ॥ ३॥
तुम्हारी जिन विभूतियों की संतों ने दृढ़ भावना से भक्ति कर उपासना की और तुम्हारे स्वरूप तक पहुँचे, वे
सारी विभूतियाँ उनके स्वरूप, उनकी भक्ति और उनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है इसके सम्बन्ध में मुझे
निश्चयपूर्वक बतायें। इस पर यदि तुम सभी वस्तुओं में अपनी विभूतियों को ढूँढ़ने के लिये कहोगे तो हे
श्रीकृष्ण! तुम अतर्क्य हो। वह सब हमारे ध्यान में नहीं आयेगा।