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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 869 में से

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पृष्ठ 455

सोलहवाँ अध्याय ४३९
वाला और ये मरने वाले' इस प्रकार की मोह की भ्रान्ति अर्जुन के मन में उत्पन्न हुई। राज्यसुख का लालच कर
उसके लिये अपने रिश्तेदारों का निंद्य कर्म करना मुझे शुद्ध अधर्म लगता है। इसमें धर्म के स्वधर्म की हानि
होगी। प्रतिदिन जिसके चरणों का तीर्थ लेना चाहिये, जिनकी उच्चासन पर बिठा कर पूजा करनी चाहिये उन्हें
प्रखर बाणों से घायल कर उन स्वजनों के रक्त में लिपटी हुई पृथ्वी का उपयोग कैसे किया जाय ? जब हमारे ही
बन्धु बान्धवों का रक्त इस पृथ्वी पर बहेगा तभी हम राजकर्ता बनेंगे। यह कर्म अत्यन्त भयंकर है। वह मुझसे
नहीं होगा। जो अपने कुल में सत्पुत्रों के फलने-फूलने की कामना करें उनके ही हृदय में बाणों से प्रहार करें ?
क्या इसी प्रकार हम अपने पूर्वजों के उपकार का बदला चुकायें। जिनका हमें श्राद्ध और तर्पण करना चाहिये
उनके ही प्राण हम अपने बाणों से बाँध कर ले लें? इस प्रकार तो हम अपने पितरों का अच्छा उद्धार करेंगे।
उससे हमारे धर्म का विनाश होगा। इस युद्ध में मरने पर स्वर्ग प्राप्त होगा और विजयी होने पर राज्य प्राप्त होगा।
लेकिन हे श्रीकृष्ण ! ये दोनों ही नश्वर हैं। फिर किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये युद्ध किया जाय? इस उदासीन
प्रवृत्ति से धनुषबाण त्याग कर शोकाकुल अर्जुन उस समरांगण में म्लान देह से खड़ा रहा। उस समय उस महान
वीरसिंह का मैंने अनेक युक्तियों से समाधान किया। उसकी कथा सुनो। हे अर्जुन देह नश्वर होने के साथ मलमूत्र
का केवल भण्डारगृह है। कितना ही उपचार करने पर भी वह मरणाधीन तथा क्षणिक है और जीव स्वयंसिद्ध
तथा नित्य होकर निर्मल है। उसे जन्म नहीं, उसे विनाश नहीं, वह अचल, अच्छेद्य, अभेद्य तथा निर्मल है। वह
मूल में ही जड़ है। हे अर्जुन ! अब इसका सच्चा अर्थ समझो। देह तुम्हारे प्रयत्न से बचने वाला नहीं है और जीव
तुम्हारे मारने से मरने वाला नहीं है। उसकी हत्या का पाप लगेगा यह तुम्हारा सोचना केवल अहँभाव है। यदि
तुमने इन सब का निर्माण किया होता, तो तुम उन्हें मार सकते थे। लेकिन बात वैसी नहीं है। इसलिये मैं इन्हें
मारूँगा यह कहने में तुम अभिमान में लिपटे हुए हो ऐसा भास होता है। जो देह का निर्माता होता है वही उसका
संहारक होता है। तुम न निर्माणकर्ता हो और न मारने वाले ही हो, फिर व्यर्थ ही अहंता कष्ट क्यों भोगते हो?
यदि तुम इस अहंता का त्याग नहीं करोगे तो सभी हत्याओं की राशि तुम्हारे पास आयेगी और उसके लिये अर्जुन
तुम दोषी होगे। हे अर्जुन ! सुनो। देहादि कर्मों की अहंता जो अपने माथे पर लेता है वह तीनों लोकों में पूरी तरह
दोषी होता है। अब यदि तुम स्वधर्म के बारे में पूछ रहे हो तो क्षत्रिय का क्षात्रधर्म सुनो। उस क्षात्रधर्म के अनुसार
यदि समरांगण में पितापुत्र एक दूसरे का वध करें तो इसमें क्षत्रियों को दोष नहीं है। युद्ध तो क्षात्रधर्म का एक
तीर्थ ही है। समरांगण में जिसकी मृत्यु होती है वह निजमुक्त ही होता है। यह जो तुम्हें तुम्हारे भाग्य से प्राप्त
हुआ है उसे तुम अनिष्ट मानते हो। कर्तृत्व मानना यह दोष अहंता के मत्थे है। उस देहअहंता का जो स्पर्श नहीं
करता वही कर्म करके भी अकर्ता तथा भोग भोगते हुए भी अभोक्ता है। वही संग में रह कर भी निःसंग है। वह
अकेला ही पूरा संसार है। जो खरा निरभिमानी होता है वह समरांगण का सच्चा वीर है। हे अर्जुन ! तुम यदि
अभिमान छोड़ दो तो मेरे ही समकक्ष हो जाओगे। फिर किसी पाप की वार्ता भी तुम्हें स्पर्श नहीं करेगी। अब वह
अहंता कैसे जाये ? तो निश्चय करके मुझ पर ध्यान केन्द्रित कर स्वधर्म कर्म का आचरण करने से चित्त की शुद्धि
होगी और चित्त शुद्ध होते ही वह मेरे भक्तिमार्ग पर लग जाता है। भजन के योग से मेरे भक्त तत्काल मुझसे
समरस हो पाते हैं। हे अर्जुन ! अभिमान छोड़ने के सम्बन्ध में यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो जन्म-मरण के
भूषण जो सारे दोष हैं वह तुम्हें भोगने होंगे इसे ध्यान में रखो। तुम जो नित्यमुक्त हो, अजन्मा हो, अविनाशी हो
यह तुम्हारी सद्बुद्धि विलय को प्राप्त होगी और फिर देखना। निरन्तर जन्म-मरण का भोग भोगते रहोगे। इसलिये
'करना' और 'न करना' इन दोनों को प्रकृति के सुपुर्द कर तुम काया, वाचा, मनसा मेरी शरण में आओगे तो मैं