श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गूढश्चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन।
न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते ॥ ४ ॥
समस्त प्राणिमात्र के हृदय में तुम ही हो। लेकिन हृदय में होते हुए भी तुम गुप्त हो। देह ही मैं हूँ इस भ्रम
में सारे प्राणी तुम्हें नहीं देख पाते। हे देवराया ! उस देहभ्रम का मूल कारण तुम्हारी माया है। लेकिन तुम्हारी कृपा
होने पर उस माया का भी अपने गुणों के साथ विलय हो जाता है और फिर सर्वत्र सभी स्थानों पर समस्त
प्राणिमात्र के देह में भी अंतर्बाह्य तुम्हारा ही स्वरूप अभिव्यक्त होता है। इतना तुम्हारी कृपा का फल है। लेकिन
वह कृपा किन गुणों से प्राप्त होती है। इसलिये हे गोविन्द ! तुम्हारी कृपा प्राप्त करने के लिये तुम्हारी विभूतियों
की उपासना करनी चाहिये। इसीलिये कृपया अपनी समग्र विभूतियों के बारे में बतायें ऐसी विनती बार-बार कर
रहा हूँ।
याः काश्च भूमौ दिवि वै रसायां विभूतयो दिक्षु महाविभूते ।
तां मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते नमामि ते तीर्थपदाङ्घ्रिपद्मम् ॥ ५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल तथा दसों दिशाओं में फैली हुई तुम्हारी समस्त विभूतियों के बारे
में मुझे बतायें। कहते हुए उद्धव ने साक्षात दण्डवत किया और जहाँ से सारे तीर्थों का उद्गम होता है ऐसे
श्रीकृष्ण के चरणों पर मस्तक रख कर वन्दन किया। उद्धव का प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और
क्या उत्तर दिया ? बोले, तुम्हारा यह प्रश्न शत्रुरूपी हाथियों के झुण्ड का सिंह, गाण्डीव धारण कर महान पराक्रम
करने वाला मेरा सखा और लाडला, इतना ही नहीं मेरा प्राण, जिसके रथ पर बैठ कर मैं घोड़ों की लगाम थामता
हूँ, जिसे कुरुक्षेत्र के समरांगण में दोनों सेनाओं के बीच मैंने उपदेश किया उस नरावतार अर्जुन ने भी ऐसा ही
प्रश्न किया था। उद्धव के प्रश्न पर सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
श्रीभगवानुवाच
एदमेतदह पृष्टः प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
युयुत्सुना विनशने सपत्नैर्जुनैन वै ॥ ६ ॥
पहले जब दुर्योधन ने मेरा तिरस्कार कर घनघोर युद्ध की शुरुआत की थी, उस समय अर्जुन ने मुझसे यही
प्रश्न पूछा था। शत्रुओं का निर्दलन करने में अत्यन्त पराक्रमी, धैर्यवान, वीर, ज्ञानसम्पन्न तथा प्रश्न करने वालों में
अत्यन्त चतुर अर्जुन मेरी आत्मा ही है। उस अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में घातक युद्ध में अपने ही लोगों का वध होगा इस
भय से मुझसे यही प्रश्न किया था।
ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गर्ह्यमधर्मं राज्यहेतुकम्।
ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोऽयमिति लौकिकः ॥ ७ ॥
स तदा पुरुषव्याघ्रो युक्त्या मे प्रतिबोधितः।
अभ्यभाषत मामेवं यथा त्वं रणमूर्धनि ॥ ८ ॥
उसने कहा, केवल राज्यलोभ के लिये गुरु, गोत्रज, चाचा आदि का वध करना मेरी दृष्टि से अत्यन्त निंद्य
है। इसलिये भले ही प्राण चले जाए लेकिन मुझे युद्ध नहीं करना है। लौकिक धर्मप्रवृत्ति के कारण 'मैं मारने