सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

सोलहवाँ अध्याय ४४७
ब्रह्मण्यानां बलिरहं वीराणामहमर्जुनः।
भूतानां स्थितिरुत्पत्तिरहं वै प्रतिसंक्रमः॥ ३५॥
श्रीकृष्ण कहते हैं, ब्राह्मण भजन में बलि का श्रेष्ठत्व है। निश्चित रूप से वह बलि मैं ही हूँ। ब्राह्मण भजन
के सामर्थ्य ने मुझे बली के द्वार का द्वारपाल बनाया है। नारायण कहते हैं पाण्डवों में सामर्थ्य से परिपूर्ण नरावतार
जो अर्जुन है वह मैं ही हूँ। इसीलिये वह मेरा प्राण ही है। श्रीपति कहते हैं, उद्धव ! प्राणिमात्र की उत्पत्ति, स्थिति
मैं ही हूँ, और उन प्राणियों की संहारगति भी मैं ही हूँ।
गत्युक्त्युत्सर्गोपादानमानन्दस्पर्शलक्षणम्।
आस्वादश्रुत्यवघ्राणमहं सर्वेन्द्रियेन्द्रियम्॥ ३६॥
समझ लो कि ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों का वास्तविक इन्द्रिय मैं हूँ। उनकी क्रिया मेरे ही कारण
प्रकट होती है। 'गति-ग्रहण-गमन', मलमूत्र विसर्जन करना, देखना, स्पर्श करना, घ्राण, सुनना, चखना ये सारी
क्रियायें मेरे ही कारण होती हैं। इन्द्रियों का यह चलन मेरे बिना नहीं हो सकता। उनका भी सम्पूर्ण लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। मन का भी महामन मैं हूँ। नयनों का भी नयन मैं हूँ। स्पर्शों का स्पर्श मैं हूँ और जिह्वा की मूलजिह्वा मैं
हूँ। नाक का मूल मैं हूँ, कान का आद्यकान मैं हूँ, ग्रहण का निजग्रहण मैं हूँ और गति की भी गति मैं हूँ, यह
जान लो। हे उद्धव ! आनन्द का आनन्द मैं हूँ, बुद्धि का भी प्रबोध मैं हूँ और सारे इन्द्रियों का जो विषय स्वाद है
वह मुकुन्द मैं हूँ। वाणी की व्यापक वाणी मैं हूँ, परावाणी का प्रेरक भी मैं हूँ और सारे इन्द्रियों का स्वामी भी मैं
हूँ, इसीलिये मुझे 'हषीकेश' यह नाम दिया गया है।
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान्।
विकारःपुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्त्वं तमः परम्॥ ३७॥
मूल तत्त्वों की संख्या पचीस है। उनमें तीन गुण मिला दें तो वह संख्या अट्ठाईस होती है, उनके बारे में
तुम्हें विस्तृत रूप से बताता हूँ। अहंकार, महत्तत्त्व, पृथ्वी (गंध), वायु (स्पर्श), आकाश (शब्द), उदक (रस)
और तेज (तेज) ये पंचतन्मात्रा मिलकर एक स्थूल प्रकृति तैयार होती है और पंचमहाभूत तथा ग्यारह इन्द्रिय
मिलकर विकारों की संख्या सोलह है। इसमें प्रकृति और पुरुष मिलाने से तत्त्वों की संख्या पच्चीस हो जाती है।
प्रकृति में गुणों का वास होता है। यह तत्त्वों का तत्त्वविलास है। गुण विकारयुक्त प्रकृति और तत्त्वसंख्या का
निश्चय इनके बारे में तुम्हें जो विचार बतलाये वही मेरा परात्परस्वरूप है।
अहमेतत्प्रसंख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयः।
मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना।
सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार पचीस तत्त्वों का ज्ञान मैं ही हूँ। भगवान बोले, इन तत्त्वों को गिनने का जो ज्ञान है, वह स्वयं मैं
हूँ। भगवान आगे बताते हैं, इसे जानने का लक्षण भी स्वयं मैं ही हूँ। जीव और ईश्वर, गुणी और गुणावतार, क्षेत्र
(शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) ये सब निश्चित रूप से मैं हूँ। मेरे सिवा एक अणु भी कोई वस्तु स्वतंत्र नहीं है।
सर्वत्र मैं ही सर्वात्मा हूँ और चिन्मात्र भी मैं हूँ। हे उद्धव ! यहाँ मेरे सिवा अलग कुछ भी शेष नहीं रह गया है
और सामान्य देह में मैं ही हूँ, यह जान लो। हे उद्धव ! शायद तुम कहोगे कि इसका संक्षेपण न किया जाय तो
यहाँ विस्तार नहीं किया जा सकता। उसका कारण बताता हूँ।