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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 869 में से

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पृष्ठ 452

४३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

दी तो उस वेदवाद का सच्चा सात्त्विक निरूपण इक्कीसवें अध्याय में किया। उसी वेदवाद निरूपण के प्रसंग में
तत्त्वों की कुल संख्या कितनी है यह प्रश्न सामने आया। तब श्रीकृष्ण ने उस तत्वसंख्या का यथार्थ निरूपण
किया। सभी तत्त्वों का विवेचन, प्रकृति और पुरुष का लक्षण तथा जन्म-मरण आदि का निरूपण बाईसवें
अध्याय में किया। दूसरों के अपराध सह कर स्वयं निर्द्वंद्व रहना चाहिये इस आशय का भिक्षुगीत संवाद तेईसवें
अध्याय में स्पष्ट किया गया है। अद्वैत में स्थिर होने के लिये चौबीसवें अध्याय में सांख्यशास्त्र का वर्णन है।
निर्गुण से ही गुणों की उत्पत्ति होती है और गुणों का क्षय होने पर निर्गुण ही शेष रहता है। प्रारम्भ में निर्गुण रहता
है और अन्त में भी निर्गुण ही रहता है। इस बीच मिथ्या ही गुणों का आभास होता है। ऐसे इस अद्वैत प्राप्ति के
लिये सांख्यशास्त्र का निरूपण किया। वे मिथ्या गुण प्रवृत्तियुक्त होते हैं, उन तीन गुणों का परस्पर सम्बन्ध रहता
है और निर्गुण के सम्बन्ध से किस प्रकार आत्मनिष्ठा कायम रखी जाय इसे पचीसवें अध्याय में बताया गया है।
छब्बीसवें अध्याय में अनुताप की असीम शक्ति प्रदर्शित करने के लिये पुरूरवा ने कामपाश में फँस कर उर्वशी का
उपभोग करते हुए भी किस प्रकार विरक्ति प्राप्त की इसका वर्णन है। भजन की विधि, मूर्ति का लक्षण, वैदिक,
तांत्रिक तथा मिश्र भजन क्या होता है इस उद्धव के प्रश्न का निरूपण सत्ताईसवें अध्याय में है। बड़े-बड़े योगियों
का योगमंजर, गहन ज्ञान से परिपूर्ण, आत्मसुख का निचोड़ ऐसा अट्ठाईसवाँ अध्याय केवल ज्ञानविषयों से भरा
हुआ है। उसी अध्याय में 'संसार असम्भवनीय है' ऐसा गहन प्रश्न उद्धव ने किया था, उसका उत्तर भगवान ने
दिया है। ग्यारहवें स्कंध का कलश तथा भक्तिप्रेम का अत्यन्त मनोहर स्वरूप ऐसा अत्यन्त रसाल और भक्तियुक्त
ज्ञानोपदेश उन्तीसवें अध्याय में है। उसके अगले दो अध्यायों में स्त्रीपुत्रादि सारे कुल का संहार प्रत्यक्ष अपनी
आँखों के सामने होते हुए भी ज्ञान से समर्थ व्यक्ति का चित्त नहीं डगमगाता यह बात श्रीकृष्ण ने ही प्रत्यक्ष
दिखला दी है। ब्राह्मणों का शाप अत्यन्त कठोर होता है। उस शाप ने श्रीकृष्ण को भी पीड़ा पहुँचायी फिर औरों
की क्या बिसात ? ब्रह्मशाप से सारे कुल का भी विनाश होता है। ब्राह्मण का क्रोध अत्यन्त सामर्थ्यवान होता है,
उसने सारे समुद्र को मूत्रमय कर दिया। ब्राह्मण के क्षोभ से एक क्षण में शिव का भी लिंगपात हुआ। इसलिये
चाहे सज्ञान हो या अज्ञान हो उसे ब्राह्मण से वैर नहीं करना चाहिये। यही दिखलाने के लिये श्रीकृष्ण ने प्रसिद्ध
कुलक्षय का दिग्दर्शन किया। जिसने श्रीकृष्ण के देह पर प्रहार किया उस व्याध को भी श्रीकृष्ण ने जीवन से मुक्त
किया। यहाँ तक यह दिखा दिया कि ज्ञाता किस प्रकार देहातीत और क्षमाशील होता है। उन्तीसवें अध्याय तक
श्रीकृष्ण ने ज्ञान का उपदेश किया। उसके अगले दो अध्यायों में अपनी ही विदेह स्थिति के बारे में बतलाया।
राम अयोध्या आकर गये और कृष्ण ने भी अपना देह त्याग दिया, इन बातों से उन्होंने भावी मुमुक्षुओं को तरने के
लिये देहाभिमान के मिथ्या होने का महत्त्व स्थापित किया। पन्द्रहवें अध्याय तक इस स्कन्ध के पूर्वार्ध का
समापन हुआ। उनमें अत्यन्त पवित्र बातों का कथन हुआ है, साथ ही सूत्र के रूप में उत्तरार्ध के प्रत्येक अध्याय
का तात्पर्य भी स्पष्ट रूप से बतला दिया है। सद्गुरु जनार्दन सहायता के लिये हैं अतः श्रोतागण ध्यान दें। अगले
उत्तरार्ध का व्याख्यान भी जनार्दन एकनाथ के मुख से कहलवायेंगे। वसन्त के आगमन के साथ वृक्षों पर फूल
और फलों की बहार आ जाती है। उसी प्रकार जनार्दन के कृपाकटाक्ष के कारण कविता के शब्द भी पुष्पित
पल्लवित होते हैं। जिस प्रकार आकाश में सूर्य का उदय होते ही नये कमल खिल उठते हैं उसी प्रकार जनार्दन
की कृपा से कविता में नूतनता का विकास होता है। हाथ में मुरली लेकर श्रीकृष्ण ने सारे संसार को समाहित कर
दिया उसी प्रकार मुझे कवीश्वर बनाकर मेरा हाथ थामा और सब कुछ जनार्दन ही बोल रहे हैं। उस जनार्दन की
कृपा साक्षात् क्षीर सागर की तरह है। उसके कृपा की कोई सीमा नहीं है। उस जनार्दन की कृपा से उत्तरार्ध में