श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोरहवाँ अध्याय ४४३
संन्यास है वह मैं हूँ। वर्णों में श्रेष्ठ तथा चलता फिरता जो ब्रह्म है वह ब्राह्मण मैं हूँ।
तीर्थानां स्रोतसां गङ्गा समुद्रः सरसामहम्।
आयुधानां धनुरहं त्रिपुरघ्नो धनुष्मताम् ॥ २०॥
श्रीरंग बोले, पवित्र नदियों में गंगोदक मैं हूँ। सरोवरों में श्रेष्ठ जो समुद्र है वह पूर्णरूप से मैं हूँ, ऐसा
श्रीकृष्ण ने कहा। शस्त्रों में धनुष नामक जो शस्त्र है, वह मैं हूँ और जिसने त्रिपुरों का संहार किया, वह
त्रिपुरशत्रु धनुर्धर मैं हूँ।
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालयः।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यवः ॥ २१॥
श्रीकृष्ण ने कहा, त्रिभुवन का निवास स्थान जो महामेरु है वह मैं हूँ। चढ़कर जाने में कठिन जो हिमालय
पर्वत है वह भी मैं हूँ ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वृक्षों में पीपल मैं हूँ। औषधियों में प्रसिद्ध जो यव है वह मैं हूँ ऐसा
श्रीकृष्ण ने उत्साह से कहा।
पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब्रह्मिष्ठानां बृहस्पतिः।
स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानजः ॥ २२॥
भगवान बोले, श्रीराम का पुरोहित बनकर नाम कमाने वाले वसिष्ठ मुनि मैं हूँ और वेद वेत्ताओं में अग्रगण्य
श्रेष्ठ देवगुरु वृहस्पति भी मैं हूँ। श्रीकृष्ण बोले, सेनापतियों में श्रेष्ठ जो स्कन्द (कार्तिकस्वामी) है वह मैं हूँ।
स्वधर्मप्रवर्तकों में अग्रगण्य तथा ब्राह्मणों में अत्यन्त पूजनीय ब्रह्मा मैं हूँ।
यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम्।
वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचिः ॥ २३ ॥
और फिर सर्वज्ञ हरि बोले, जिसमें कारण देवता, ऋषि, पितर तथा अन्य प्राणिमात्र और सारा विश्व सन्तुष्ट
होता है वह यज्ञ का ब्रह्मयज्ञ मैं हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा, किसी भी प्राणिमात्र को जिससे दुःख हो ऐसा भाषण नहीं
करना चाहिये ऐसा तो अहिंसाव्रत है वह मैं स्वयं हूँ। किसी को वायु से पवित्रता आती है, किसी को अग्नि से
पावित्र्य आता है, कोई जल से पवित्र होता है तो कोई भाषा से ही पवित्र होता है। कोई बुद्धि से ही पवित्र होते हैं
किन्तु इन सब में पवित्रता नाम की जो वस्तु है वह मेरा ही स्वरूप है। पावन को भी पावन करने वाला एक मैं हूँ
ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। संसार मेरे ही नाम से पवित्र होता है यह सभी मानते हैं। मेरा यह स्वरूप पुनीतों से भी
अधिक पवित्र है।
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम्।
आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४॥
गोविन्द कहते हैं, जिसके कारण साधकों के अंतःकरण में परमानन्द उत्पन्न होता है और सन्तोष की
अनुभूति होती है इस प्रकार का जो योग 'आत्मनिरोध' के नाम से प्रसिद्ध है वह मैं हूँ और हे उद्धव ! मुख्य रूप
से विवेक को साथ लेकर नीति, न्याय से जो विजयी होने की कामना करता है उस नीति की भी नीति मैं हूँ।
गोपाल कहते हैं, केवल आत्मानात्मा का विचार करने वाली जो अध्यात्म विद्या है वह विद्या मैं हूँ। मेरे ही कारण
विवेक की वृद्धि होती है। श्रीकृष्ण बोले, जिसमें विकल्प का अन्त ही नहीं है ऐसे वादों में अखण्ड चलने वाला