श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 461, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ४४५
कृतयुग मैं हूँ। अच्युत बोले, उद्धव! धैर्य में आत्मधैर्य बड़ा विचित्र है। इस प्रकार के धैर्यवान जो असित और
देवल हैं वह मैं हूँ। हृषीवंशी कहते हैं, वेदों का विभाग करने वाले राजहंस, जिन्होंने वेदों का चयन कर उन्हें
ब्राह्मणों को सौंपा वे द्वैपायन व्यास मैं हूँ। लक्ष्मीपति कहते हैं, जो कवि हैं उनमें सचमुच परमार्थज्ञानी उशना
(शुक्राचार्य) कवि मैं हूँ। जो साक्षात आत्मस्वरूप ज्ञान हैं ऐसे शुक्राचार्य मैं हूँ।
वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम्।
किम्पुरुषाणां हनुमान् विद्याधराणां सुदर्शनः ॥ २९ ॥
षड्गुण ऐश्वर्य से भाग्यवान, पूर्णरूप से भगवत्स्वरूप तथा वासुदेव नाम से प्रसिद्ध श्रीकृष्णरूप से मैं ही
यहाँ उपस्थित हूँ और हे उद्धव! भगवद्भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ जो तुम हो, वह मैं ही हूँ, यह ध्यान में रखो।
श्रीकृष्ण के मुख से यह बात सुनते ही उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन किया। उद्धव ने नमस्कार करते ही
श्रीकृष्ण ने उसे आलिंगन में बाँध लिया। उस समय पूरा त्रैलोक्य आनन्द से भर गया। आत्मानंद का मेघ श्रीकृष्ण
इससे प्रसन्न हुआ। उद्धव और श्रीकृष्ण दोनों एकरूप हो गये। 'जो मैं हूँ' 'वही तुम हो' यह वचन श्रीकृष्ण ने
सत्य करके दिखलाया। दोनों के दो भाव मिटकर उद्धव श्रीकृष्ण बन गया और श्रीकृष्ण उद्धव रूप में रंग गये।
वह देख उद्धव आश्चर्यचकित हो गया और श्रीकृष्ण का प्रिय भक्त होने के गर्व से क्षणभर के लिये फूल गया।
वानरों में हनुमान मैं हूँ ऐसा जब श्रीकृष्ण ने कहा तो उद्धव का अभिमान नष्ट हुआ और वह मन ही मन झेंप
गया क्योंकि जब वानर और जानवर भी कृष्ण के मुझ से अधिक प्रिय भक्त बन गये तो हरिभक्तों का अंत कहाँ है
यह जानना कठिन है। फिर मुझ जैसे दास की क्या बिसात है? इस प्रकार मन में विचार कर उसने श्रीकृष्ण को
नमस्कार किया और कहा, कृपया अपनी सभी विभूतियों के बारे में मुझे बताइये। इस पर श्रीकृष्ण ने हँसकर क्या
कहा? वे बोले, ऐसा सुदर्शन विद्याधर तो सचमुच मेरी ही विभूति है।
रत्नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोशः सुपेशसाम्।
कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम् ॥ ३० ॥
श्रीरंग कहते हैं, रत्नों में जो पद्मराग होता है वह मैं हूँ। श्रीहरि बोले, मनोहर वस्तुओं में अत्यन्त निर्दोष जो
कमल की कली होती है वह मैं हूँ। श्रीहरि कहते हैं दस प्रकार के दर्भों में जो कुशदर्भ होता है, वह मैं हूँ और
श्रीहरि ने स्वयं बताया कि सकल होमद्रव्यों में जो गोघृत होता है, वह मैं हूँ।
व्यवसायिनामहं लक्ष्मीः कितवानां छलग्रहः।
तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३१ ॥
लक्ष्मीपति बोले, हे उद्धव! व्यवसाय तथा उद्योग करने वालों को साधन के रूप में दान में दी जाने वाली
अपार सम्पत्ति मैं हूँ। कपट की कपटयुक्ति जिससे अतर्क्य छल किया जा सकता है वह मायामय मूर्ति मैं श्रीकृष्ण
ही हूँ। परब्रह्म में जीवत्व की कल्पना तथा जीव की ब्रह्मस्वरूप से एकता इस सारे कपट का सूत्रधार भी मैं हूँ।
यह कपट देवताओं की समझ से भी परे है। ब्रह्मदेव और शंकर स्वयं को माया का नियंता समझते हैं लेकिन
उसी शंकर को मैंने मोहिनीदर्शन से फँसाया और ब्रह्मदेव को गौ के बछड़े चुराने में फँसाया। इसीलिये ठगों में
महाठग मैं हूँ। लक्ष्मीपति कहते हैं, सहनशीलों में जो सहनशक्ति होती है, वह मैं हूँ। श्रीपति आगे बतलाते हैं,
सात्त्विक पुरुष की जो मूल की सत्ववृत्ति होती है, वह मैं ही हूँ।