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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 869 में से

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पृष्ठ 462

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४४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ओजः सहो बलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम्।
सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं परा॥ ३२॥
बलवान में जो अत्यन्त प्रबल मनोबल, शरीरबल और धैर्यबल होता है और जिसके कारण वह कभी
विचलित नहीं होता वह धैर्यबल भी मैं श्रीकृष्ण ही हूँ। पुरुषोत्तम बोले, जिसके कारण मेरे प्रति अपार प्रेम उत्पन्न
होता है वह भक्तों की कामना नष्ट करने वाला भजनकर्म मैं ही हूँ। भक्तिपूर्वक पूजाविधि के लिये जिन नौ प्रकार
की मूर्तियों का विधान किया गया है उनमें मुझ वासुदेव की मूर्ति पहली है। अब नौ मूर्तियों की उपपत्ति सुनो।
वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, हयग्रीव, नारायण, वराह, वामन और नरसिंह ये नौ प्रकार की मूर्तियों के स्वरूप हैं।
उसमें की पहली मूर्ति मैं हूँ। उद्धव ! शेष जो आठ मूर्तियाँ हैं वे सचमुच मेरी ही विभूति है। हयग्रीव वेद की मूर्ति
है। श्री व्यास ने उसकी भक्ति की इसलिये उन्हें 'वेदव्यास' की उपाधि प्राप्त हुई और त्रिभुवन में उनकी कीर्ति
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