श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वाद मैं हूँ। अन्य कौन से विकल्प हैं, वह भी सुनो। हे उद्धव! आख्याति, अन्यथाख्याति, सत्ख्याति तथा
अनिर्वचनीय ऐसे जो प्रख्यात हैं वे वाद मैं हूँ।
स्त्रीणां तु शतरूपाहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः।
नारायणो मुनीनां च कुमारी ब्रह्मचारिणाम्॥ २५ ॥
जनार्दन बोले, शतरूपा और मनु ये दोनों मैं ही हूँ। सदासर्वदा बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों में नारायण
मैं हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं, सचमुच हे उद्धव! निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर रहने वाले सनत्कुमार भी
मेरा ही स्वरूप हैं यह जान लो।
धर्मानामस्मि संन्यासः क्षेमानामबहिर्मतिः।
गुह्यानां सूनृतं मौनं मिथुनानामजस्त्वहम्॥ २६ ॥
समस्त प्राणिमात्र को अभयदान देने की परम्परा चलते रखना, सारे प्राणियों में आत्माराम मैं हूँ, यह
समझना यही संन्यास का मुख्य धर्म है। पुरुषोत्तम कहते हैं कि वह धर्म स्वयं मैं हूँ। काया, वाचा अथवा मन से
किसी भी प्राणी को दुःख न देना यही संन्यासधर्म कहलाता है। गोविन्द बोले वह संन्यासधर्म मैं हूँ। अंतःकरण में
शुद्ध बोध हुए बिना, ओंठ भींचकर द्वंद्व सहन करना इसे क्षमा नहीं कहते। क्षमा का स्वरूप सुनो। पुरुषोत्तम कहते
हैं, अंतःकरण में सचमुच परब्रह्म अंकित होकर जो बाह्य रूप में प्राणिमात्र से समान भाव से आचरण करता है
वही वृत्ति क्षमा है। वह क्षमा मैं हूँ। जिसके पास क्षमा रहती है उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सहनी होती। सारे संसार
में असत्यवादी मनुष्य ही पापी है। असत्य में करोड़ों पाप भरे रहते हैं। असत्य की बात झूठी होती है। उस पर
कोई ध्यान नहीं देता। बहिर्मुखता को असत्य ही जानो व इस लोक में या परलोक में भी खोटे सिक्के की तरह
है। जिसने मन से उसका त्याग किया उसका मैं श्रीकृष्ण भी वन्दन करता हूँ। सत्य भाषण करना अथवा
मनःपूर्वक मौन धारण करना यही गुह्य में सबसे बड़ा गुह्य है। श्रीकृष्ण ने कहा कि वह गुह्य मैं हूँ। सत्य पर प्रेम
रखना यही मेरा आत्मगुह्य है। ब्रह्मदेव का देह मनु और शतरूपा के रूप में विभाजित हुआ। नारायण कहते हैं,
वह एकनिष्ठा से मनुष्यसृष्टि उत्पन्न करने वाला जोड़ा मैं ही हूँ।
संवत्सरोऽस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्॥ २७॥
श्रीकृष्ण कहते हैं, एक पल की भी गलती किये बिना निरन्तर सावधान रहने वाला संवत्सर काल मैं ही
हूँ। त्रसरेणु से संवत्सर तक लव, निमिष, दिन आदि की कालगणना मैं संकर्षण सावधानी से करता हूँ। कृष्ण
कहते हैं, मधु-माधव इन दो महीनों का जो वसन्त ऋतु है वह मैं हूँ। सारे महीनों में अनाज को परिपक्व स्थिति
में लाने वाला सुहाना मार्गशीर्ष माह मैं हूँ। पंचांग में जिसकी गणना नहीं हो सकती, नक्षत्रों में होते हुए भी जो
सर्वथा गुप्त है, अदृश्य होते हुए भी जो ज्ञानी लोगों को मिल जाता है, वह अभिजित नक्षत्र मैं हूँ, ऐसा श्रीकृष्ण
करते हैं।
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोऽसितः।
द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान्॥ २८॥
श्रीरंग कहते हैं, जिस युग में सभी धर्म व्यवस्थित ढंग से चलते हैं, अधर्म का जरा भी अंश नहीं होता, वह