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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 869 में से

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पृष्ठ 450

सोलहवाँ अध्याय
ओंकारस्वरूप सद्गुरु श्रीमूर्त्ति को मेरा नमस्कार। हे श्रीगुरुराया! यह सारा चराचर तुम्हारा ही स्वरूप है।
विश्व की आत्मा तुम हो, विश्व का स्फुरण भी तुम ही हो और निराकार तथा साकार मूर्ति तुम ही हो। तुम्हारे
रूप की महिमा शास्त्रज्ञों की समझ से परे है। उसके वर्णन के प्रति श्रुति मौन है और वर्णन करने में शब्दों ने भी
हार मान ली है। तुम्हारे स्वरूप के बारे में कोई दृष्टांत भी नहीं दिया जा सकता। तुम्हारे सादृश जो भी खोजने की
कोशिश करें वह तुम्हारा ही स्वरूप रहता है। तुम्हारे प्रभाव की यह विशेषता है कि वहाँ दूजेपन की जड़ ही कट
जाती है। फिर चारों ओर जब एक ही बात हो तो उसमें दूसरे प्रकार का दृष्टांत कहाँ मिलेगा? तुम्हारी महिमा
अगाध है तो तुम्हारा ध्यान भी कैसे किया जाय? उद्देश्य, शब्द और दृष्टांत ये जिसके वर्णन के क्षेत्र में ही नहीं
आते वह श्रीमद्भागवत का अर्थ तुम ओवी के रूप में कहलाते हो। वह मेरे मराठी के आर्त बोल लेकिन सद्गुरु
ने उन्हें गहन बना दिया है। उसमें प्रेम की जो आर्द्रता है वह केवल गुरुभक्त ही जानते हैं। जिनकी गुरुचरणों पर
भक्ति नहीं है उन्होंने भले ही वेदशास्त्र का पठन किया हो शास्त्रव्युत्पत्ति का अध्ययन किया हो लेकिन उनमें
विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी? वे भले ही कोटि प्रयास क्यों न करें लेकिन उनसे उन्हें समाधान नहीं होगा। किन्तु
सद्गुरु की कृपादृष्टि होने पर गुरुभक्तों को ब्रह्मत्व से ही पुष्टि प्राप्त होती है। हे सद्गुरु जनार्दन! आप समस्त
संसार के अधिष्ठान हैं। स्वाभाविक ऐक्य रूप से आप स्वयं ही समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हैं। जिनसे सारे
प्राणिमात्र से ऐक्य होता है, जिन्हें सद्गुरु की भक्ति प्राप्त होती है वही इस श्रीमद्भागवत के अर्थ को जान
सकता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर शास्त्र की व्युत्पत्ति सीखने का कष्ट किये बिना ही उत्तम भावार्थी भक्त
भागवत का अर्थ सहज ही जान सकता है। अंतःकरण में एकनिष्ठ भक्ति उत्पन्न होते ही उस भक्ति के योग से
देवाधिदेव प्रकट होते हैं। तभी भागवत का वास्तविक रहस्य मन पर अंकित होता है। इसलिये गुरुभक्ति करने से
भागवत का अर्थ अच्छी तरह समझ में आता है। फिर काव्य आदि अथवा व्युत्पत्ति आदि उपायों की क्या
आवश्यकता है? शास्त्रज्ञान भी क्यों किया जाय? और व्यर्थ का ध्यान भी क्यों धारण किया जाय? साधकों के
लिये सद्गुरु के चरण यही चलता-फिरता पूर्ण ब्रह्म है। गुरुभजन के बिना शिष्य का समाधान नहीं होता क्योंकि
उससे श्रेष्ठ साधन है ही नहीं। उसी सद्गुरुकृपा के अभ्यास से ग्यारहवें स्कंध के पूर्वार्ध का ज्ञान देशी भाषा में
यथामति आत्मबोध से वर्णन किया। ईख पेरने से उसका रस निकलता है। उसे यदि वैसे ही रख दिया जाय तो
वह अधिक समय तक नहीं टिकता। उसे आँच पर पका कर उसका गुड़ बनाकर रखना पड़ता है। गुड़ भी
अधिक समय तक रखने पर पसीजने लगता है इसलिये उसकी शक्कर बनाकर रखना पड़ता है। चतुर लोग उस
चीनी को भी स्वच्छ और सूखी ताड़ मिश्री बनाकर रखते हैं। श्री भागवत की भी वैसी ही कथा है। सर्वप्रथम
श्रीनारायण ने ही इसका वर्णन किया जिसका श्रीव्यास ने दस लक्षणों में वर्णन किया। शुक्राचार्यजी के मुख से
उस दस लक्षणयुक्त कथा का वर्णन होने से उसमें और भी मिठास आ गयी। उसमें से कठिन शब्दों को स्पष्ट कर
श्रीधर ने उस पर उत्तम टीका प्रस्तुत की। उसी श्रीहरि टीका को 'भावार्थ दीपिका' कहते हैं। उसी भावार्थ का
निरूपण मैंने देशी भाषा में किया। मूल वक्ता नारायण ही है और उस पर व्यास, शुक तथा श्रीधर ने व्याख्यान
प्रस्तुत किया है। उनमें मूल भाष्य की मिठास पर ध्यान देते हुए एकाजनार्दन इस काव्य का कर्त्ता बन गया है।