श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ४३५
श्रीनारायण ने मूल बीज ब्रह्मदेव में स्थापित किया जो नारदरूपी भावभूमि में सशक्त रूप से अंकुरित हुआ। उसी
के दश लक्षण-भागवतरूपी बालों का श्रीव्यास ने संकलन किया और शुक्राचार्य ने परीक्षित के लिये बालों में से
दाने मलकर एकत्र किये और उसकी राशियाँ बनायीं। उन दानों को शास्त्र रीति से आत्मबुद्धि के सूप में पछोर
कर श्रीधर ने उनमें से बड़े-बड़े दाने छाँट लिये। फिर एका जनार्दन ने उनके उत्तम पकवान तैयार कर मराठी
शब्दरूपों से उन्हें भक्तजनों को परोसा। जो आत्मभक्त होंगे वही उसका माधुर्य जान पायेंगे। श्रोताओं के ध्यान देने
से और जनार्दन की कृपा के कारण एका जनार्दन ने देशी भाषा में यह पूर्वार्ध पूर्ण किया। उसका क्रम इस प्रकार
है—पहले अध्याय में वैराग्य की उत्पत्ति का प्रसंग लाते हुए श्रीकृष्ण ने अपने कुल का क्षय करने के लिये
ब्राह्मणों के शाप रूप से प्रारम्भ किया। दूसरे अध्याय से चौथे अध्याय तक नारदजी ने वसुदेव के घर जाकर
निमिजयंती के प्रश्नोत्तर के रूप में पंचाध्याई समाप्त की। छठवें अध्याय में श्रीकृष्णमूर्ति का दर्शन करने के लिये
देवताओं की भीड़ उमड़ती है। वे श्रीकृष्ण को निजधाम चलने की प्रार्थना करते हैं। सुरश्रेष्ठों की विनती सुनकर
और द्वारका पर छायी विपत्ति को सुनकर उद्धव श्रीकृष्ण से मुझे भी निजधाम ले चलने की प्रार्थना करते हैं।
उसके प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण ने सातवें अध्याय में ज्ञानमय तथा त्यागयुक्त छोटा-सा भाषण किया। उस समय
त्यागसंग्रह के लक्षण के प्रसंग में यदू और अवधूत के संवाद रूप में चौबीस गुरुओं का परिच्छेद आठवें और
नौवें अध्याय में पूरा किया। श्रद्धा किस प्रकार रखनी चाहिये और ज्ञान पर किस तरह विश्वास करना चाहिये इस
सम्बन्ध में बताकर उसमें अनेक मतों का समावेश करने की दृष्टि से श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में ज्ञान का
चमत्कार समझाया। ग्यारहवें अध्याय में बद्ध-मुक्त का अन्तर बताकर साधु का लक्षण और भक्ति का पूर्ण स्वरूप
स्पष्ट किया। भागवत के बारहवें अध्याय में भगवान ने अत्यन्त गूढ़ ज्ञान प्रकट किया है। उसका रहस्य स्पष्ट
करने में बड़े-बड़े ज्ञाता भी सन्देह में पड़ जाते हैं। बारहवें अध्याय की चाभी केवल युक्ति-प्रयुक्ति से समझ में
नहीं आयेगी किन्तु जनार्दन की कृपारूप माँ साथ में थी इसलिये उसने ग्रन्थ का मार्ग दिखाया। उस बारहवें
अध्याय में सत्संग की अगाध महिमा, कर्म का कर्त्ता कौन, त्यागबुद्धि यही कर्म का लक्षण है आदि विषय हैं।
उस बारहवें अध्याय का श्रवण करने से चित्त पर ज्ञान का संस्कार होता है। लेकिन उसमें विषय-वासना बाधक
होती है जिससे साधकों को पीड़ा होती है। गुणभेदों का लक्षण, और उससे होनेवाली विषय की आसक्ति,
सत्वशुद्धि के प्रकार आदि का निरूपण तेरहवें अध्याय में किया। फिर उसी प्रसंग में विषयों का और चित्त का
समन्वय कैसे होता है और उसे कैसे सुलझाया जाता है यह समझने के लिये उत्तम निर्णयात्मक हंसगीत का
कथन किया। हंसगीत में जो ज्ञान दिया गया है और समाधि तक जो समाधान किया गया है उसे साधने का मार्ग
भगवान ने स्वयं चौदहवें अध्याय में निरूपित किया है। साधनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है, सगुण स्वरूप ही मेरी निर्गुण
मूर्ति है तथा योगयुक्त ध्यानावस्थिति कैसी होती है इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण ने चौदहवें अध्याय में बतलाया
है। सिद्धियों के लिये ध्यानधारणा करने के प्रकार भिन्न-भिन्न हैं। उनके बारे में भी श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया
और ईश्वर प्राप्ति में सिद्धियाँ किस प्रकार बाधक हैं इस बारे में उन्होंने पन्द्रहवें अध्याय में बतलाया है। इस
प्रकार पन्द्रह अध्यायों में पूर्वार्ध का अत्यन्त निर्मल निरूपण हुआ। अब उत्तरार्ध शेष है उसके सम्बन्ध की कथा
के बारे में सुनिये। सोलहवें अध्याय में भगवान की विभूति का निरूपण है तथा अठारहवें अध्याय में वर्णाश्रम
कर्म की जानकारी तथा विधान प्रकारों का निरूपण है। उन्नीसवाँ अध्याय गहन है। उसमें ज्ञान माहात्म्य है तथा
उद्धव के प्रश्नों का ज्ञानात्मक उत्तर दिया गया है। उस ज्ञान का योग, अज्ञान, ज्ञान तथा मध्यावस्था इन तीन
प्रकारों से श्रीकृष्ण ने बीसवें अध्याय में बतलाया है। आगे उद्धव ने गुणदोषों की अवस्था जब वेदों के मत्थे रख