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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२५
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन्।
कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥१२॥
वायु आदि प्राण की तरह सूक्ष्म तत्त्व हैं, जिनसे कालसूत्र का मापन किया जाता है वह परमाणुस्वरूप
भगवान ही है। जो सदा एकनिष्ठा से उसी का ध्यान करेगा, उस परमाणुस्वरूप ध्यान की ऐसी महिमा है कि
उसके कारण देह को हलकापन प्राप्त होता है। वह मशक पर चढ़ कर आकाश में भ्रमण करता है। अणिमादिक
जो तीनों धारणायें हैं वे इस देह की ही सिद्धियाँ हैं, यह ध्यान में रखो। वे ही इस देह में सूक्ष्मता, जड़ता और
हलकापन आदि लक्षण उत्पन्न करती हैं। हे बुद्धिमान उद्धव! अब जो शेष पाँच महासिद्धियाँ हैं उनकी धारणा
विधियाँ भी बताता हूँ। सुनो।
धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।
सर्वेन्द्रियानामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३॥
मूल रूप से जो अहंकार रहता है जिससे इन्द्रियों के समस्त विकार उत्पन्न होते हैं और इन्द्रियों का आश्रय
भूत, उन्हें चेतना प्रदान करने वाला, ऐसा देवाधिदेव ईश्वर जो मैं हूँ उसका ध्यान करने से इन्द्रिय के अधिष्ठान में
जो देवता होते हैं उनसे एकात्मता होकर उसमें इन्द्रियप्रकाशक धर्म का उदय होता है। इस कारण से इन्द्रियों के
जो व्यापार चलते रहते हैं वे सब वह स्वयं वहां प्रकट होकर देखता रहता है। इन्द्रियप्राप्ति की सिद्धि का इतना
वैभव वह साध्य कर लेता है। इससे जिन-जिन इन्द्रियों का व्यापार वहाँ चलता रहता है वह सब उसने ही किया
है ऐसा उसे प्रतीत होता है। उसे 'इन्द्रियप्राप्ति' नामक सिद्धि कहते हैं।
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।
प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यंमे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४॥
यह जो महत्तत्त्व है उसे ही माया का प्रथम स्फुरण समझ लो। इसी को 'सूत्रप्रधान क्रिया' कहते हैं। उसमें
मैं स्वयं जन्मरहित होते हुए भी उस सूत्र का सूत्रात्मा बन गया हूँ। मेरे उस स्वरूप का जो सावधान चित्त से ध्यान
करता है उसे उस सूत्र के प्रकाश के प्रवाह से ब्रह्माण्ड और हिरण्यगर्भ भी प्रकाशमान हो जाते हैं, वह प्रकाशकता
ही वश में हो जाती है। इस प्रकार के निदिध्यास से वह सूत्रात्मा को देखता रहता है। उस निदिध्यास में ही वह
कोटि ब्रह्माण्डों का निर्माण कर सकता है। इतनी उत्तम प्रकाश सिद्धि साधकों को मेरे सिवा प्राप्त नहीं होती।
विष्णौ त्र्यधीश्र्वरे चित्तं धारयेत् कालविग्रहे।
स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनाम् ॥ १५॥
माया आदि त्रिगुणों का नियंता, कलिकाल का आकलन करने वाला, उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने
वाला और जो सचमुच अंतःकरण में वास करता है उस विष्णु का अर्थात् मेरा जो निरन्तर ध्यान करता है उसे
ईशत्व प्राप्त होने के कारण अदृश्य वस्तुओं को देखने का सामर्थ्य भी प्राप्त हो जाता है। शतरंज का मिथ्या खेल
खेलने वाला मोहरों की गति अच्छी तरह जान लेता है उसी प्रकार संसार का अनुभव मिथ्या होते हुए भी वह
जीवों की हलचल स्वयं समझ सकता है। वह जीव आदि शरीर की प्रेरणा स्वयं कर सकता है। इस प्रकार
अंतर्यामी नारायण का ध्यान करने से इतनी सिद्धि प्राप्त होती है इसे ध्यान में रखो। वह अपने प्रताप के सामर्थ्य
से मशक से पर्वत के टुकड़े करवा देता है। किसी दुर्बल के हाथों सृष्टि का विनाश करवा कर पुनः उसकी रचना

४२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करवा सकता है अथवा मूशक के हाथों इन्द्र का विनाश करा सकता है। इस प्रकार वह किसी को मरवा देता है,
किसी को पुनः जीवित करता है और अचेतन को भी सचेतन कर देता है। इस प्रकार का ईशत्व (ईश्वरत्व) प्राप्त
होना यह इस सिद्धि का माहात्म्य है।
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते।
मनो मय्यादधद् योगी मद्धर्मा वशितामियात् ॥ १६॥
जीव, शिव और प्रकृति इससे परे जो चौथी स्थिति है जिसे ज्ञानी लोग 'नारायण' कहते हैं, उसी प्रकार
जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इनसे भिन्न जो तुरीयावस्था है उसे भी ज्ञानी 'नारायण' ही कहते हैं। दृश्य, द्रष्टा और
दर्शन इनसे परे जो चौथा पुरुष है उसे भी लोग स्वानुभव से 'नारायण' ही कहते हैं। जो वस्तु त्रिपुटी के अन्दर
होते हुए भी त्रिपुटी से भिन्न है और जो त्रिपुटी से अलिप्त रहने वाला है वह मैं सुप्रसिद्ध नारायण हूँ। यश, श्री,
वैराग्य, ज्ञान, ऐश्वर्य और औदार्य ये छह गुण जिसमें पूर्ण रूप से निवास करते हैं वह नारायण भगवान मैं हूँ।
नारायणरूपी मेरा ध्यान करने से मेरी 'वशिता' नामक सिद्धि प्राप्त होती है। सारे कर्मों में रहते हुए वह अलिप्त
रहता है और सारे भोग भोग कर भी अभोक्ता रहता है।
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते ॥ १७॥
सत्त्वगुण चित्त की देवता है, इन्द्रियाँ रजोगुण हैं और विषय केवल तमोगुण है जो परमानन्द को आवृत्त कर
देते हैं। ये ही तीन गुण परमानन्द पर आवरण बन कर छा गये हैं। उन्हें छोड़कर मेरे निर्गुण और परिपूर्ण ब्रह्म का
जो ध्यान करता है उसे परमानन्द की ऐसी प्राप्ति होती है जिसमें समस्त इच्छाओं का लोप हो जाता है। परमानन्द
की प्राप्ति होने पर सारी इच्छाएँ लुप्त हो जाती हैं। सूर्योदय होते ही जिस प्रकार चन्द्रमा के साथ सभी नक्षत्र लुप्त
हो जाते हैं उसी प्रकार परमानन्द के उदर में इच्छाओं की शशियाँ लुप्त हो जाती हैं। उस समय इन्द्रिय सुख की
बातें लजा कर वहीं विलुप्त हो जाती हैं। हे उद्धव! सुनो। परमानन्द प्राप्ति के बिना कैसी भी युक्तियाँ क्यों न की
जाएँ लेकिन उससे काम की निवृत्ति कभी नहीं होगी। इन अष्टमहासिद्धियों की धारणा मैंने तुम्हें बता दी। इन
सिद्धियों को साध्य करने का सामर्थ्य देवता, मनुष्य आदि के पास नहीं है। इस प्रकार इन आठ महासिद्धियों की
धारणाविधि मैंने तुम्हें बता दी। अब गुणहेतु का प्रबोध सावधानी से सुनो।
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।
धारयञ्श्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः ॥ १८॥
रजतम कार्यों से दूर होकर सत्त्वगुण का अभिमानी मैं श्रीहरि उसकी जो विश्वव्यापकता से धारणा करेगा वह
मेरे ही सत्त्व से सम्पन्न होकर षडूर्मिरहित होगा और उसे शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, तृषा आदि स्पर्श नहीं करेंगे।
मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन्।
तत्रोपलब्ध्वा भूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ १९॥
नाद के साथ शब्दों का माहात्म्य विश्रांति के लिये आकाश में अवश्य आना ही चाहिये। उस आकाश का
भी आत्मा मैं हूँ। आकाश का वास भी मुझमें ही है। हे उद्धव! सचमुच ही मैं नाद के साथ प्राणों का भी प्राण,
वाणी की भी वाणी, सरस्वती का जीवन हूँ यह जान लो। मेरा जो दृढ़तापूर्वक ध्यान अपने हृदय में करेगा वह

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२७
स्वयं विचित्र वाचाओं का श्रवण करेगा। अंतकरण में मेरी सनाद धारणा करने से संसार की गुप्त बातें भी उसके
कर्णपटल पर आती हैं। उस समय दूरश्रवण सिद्धि साद्य होती है।
चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि।
मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ॥ २०॥
मैं ही सूर्य हूँ यह जान कर जो आँखों में मेरा ध्यान करता है तब आँख ही मद्रूप होकर स्वयं सूर्यस्वरूप हो
जाती है। इस प्रकार नेत्र, सूर्य और मैं इन तीनों की एकात्मता होते ही वह स्वयं वहाँ सूक्ष्म द्रष्टा बन जाता है
और सारे संसार को देखने लगता है। अपने ही स्थान पर बैठकर वह चौदह लोकों का दर्शन एक ही समय ले
सकता है। यही 'दूरदर्शन' सिद्धि है।
मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु वायुना।
मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः॥ २१॥
मन अत्यन्त गतिमान है। उस मन का भी मन मैं हूँ यह ध्यान में रखो। उस मन को प्राणायाम के साथ
ध्यानधारणा द्वारा मुझमें एकरूप करना चाहिये उस ध्यान धारणा के प्रभाव से देह को मनोवेग से इधर-उधर गमन
करने की शक्ति प्राप्त होती है। संकल्प से ही जिधर मन जाता है वहाँ देह का भी गमन होता है। यही मनोजव
सिद्धि है यह जान लो। उसकी ध्यान धारणा का ढंग इस प्रकार है।
यदा मन उपादाय यद् यद् रूपं बुभूषति।
तत्तद् भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रयः ॥ २२॥
पहले मनोजवसिद्धि की धारणा कर बाद में मेरी धारणा करनी चाहिये। उस भावना में मेरा अतर्क्य सामर्थ्य
है। वह भी मेरे शरीर में है, इसकी जो कल्पना करता है उसे मेरी अनेक रूप धारण करने की तथा बाद में उन्हें
विसर्जन करने की सत्ता प्राप्त होती है। इस प्रकार मेरी ध्यान धारणा करने से मेरा सामर्थ्य उसके मन को प्राप्त
होता है। फिर वह जिस स्वरूप की कल्पना करता है उसे वह स्वयं प्राप्त कर लेता है। देव, मनुष्य अथवा नाग
इनमें से जिसका भी स्वरूप धारण करने का संकल्प करता है, वह रूप उसे तत्काल प्राप्त हो जाता है। यह मेरी
कामरूपसिद्धि है।
परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत्।
पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ २३॥
परकाया प्रवेश करते समय देह के सभी प्राणों को नियंत्रित कर जिस देह में प्रवेश करना हो उसमें अपनी
भावना धारण करनी चाहिये। उस समय लिंगदेह में जीव और प्राण की एकात्मता होकर देहांतर की अहंता
बाह्यवायु के मार्ग से मिल जाती है। वह इस देह का अभिमान छोड़कर उसमें जाकर मिलते ही उस देह में प्रवेश
कर 'मैं' कह कर उठ खड़ी होती है। जिस प्रकार भ्रमर वायु के वेग से एक कमल से दूसरे कमल में प्रवेश
करता है उसी प्रकार जीव भी अपना शरीर छोड़ कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। अब मेरे स्वरूप की
ध्यानधारणा कैसी होती है, उसका भी श्रवण करो। मेरे स्वरूप का दृढ़ ध्यान करने से पूरे शरीर में तू ही है ऐसा
आभास होता है। अपने पहले देह को छोड़े बिना दूसरे देह में इस प्रकार प्रवेश होता है। अब अपनी ही इच्छा से
किस प्रकार देह का त्याग किया जाय इसके लक्षण नारायण ने अगले श्लोक में निरूपित किये हैं।

४२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पार्ष्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु ।
आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम् ॥ २४॥
देहत्याग करने के लिये योगमार्ग से प्राण धारण करना यही स्वच्छंद मृत्यु का लक्षण है। इसके लिये प्राणों का
ब्रह्मरंध्रतक जो मार्गक्रमण कराना है उसकी योगधारणा सुनो। गुह्यद्वार के स्थान पर बायें पैर की एडी जोर से दबाकर
बैठाओ और इस प्रकार गुह्यद्वार बन्द कर अपानवायु का अधोगमन बन्द कर दो। हृदय में विचरण करने वाले प्राण
का सदा ऊर्ध्वगमन होता है उसे प्राणायाम से नियंत्रित कर अधोमुख करो। इस प्रकार अपानवायु का नीचे जाना बन्द
होकर वह ऊपर चढ़ कर स्वाधिष्ठान चक्र तक पहुँचेगा और प्राण भी अधोमुख होकर नीचे आते-आते उसी चक्र
तक पहुँचेगा। वहाँ प्राण अपान का समाधान होकर उनका ऐक्य हो जाता है और उन दोनों का मिलन होने से वे
दोनों एकरूप होकर ही आगे के मार्ग का उल्लंघन करते हैं। अपान का अधोमार्ग भी छूट जाता है, प्राण हृदय से
गले की ओर जाता रहता है वह भी नहीं जा पाता और दोनों सुषुम्ना का द्वार खोलकर उसके बिल में से सीधे ऊपर
जाने लगते हैं। इस प्रकार सुषुम्ना को जीत कर वे आगे घुस कर मार्ग में आने वाले छहों चक्रों के परदों को दूर कर
काकीमुख का द्वार खोलकर उसमें से ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाते हैं।`लेकिन वहाँ ठीक तरह से पहुँच जाने पर वर्तमान
देह को छोड़कर जिस देह को धारण करने की उसकी इच्छा रहती है वह देह योगी को प्राप्त होता है। वैकुण्ठ,
कैलास अथवा अमरावती जाने की अथवा सार्वभौम चक्रवर्ती होने की जो इच्छा उसके मन में होती है उस स्थिति
को वह तत्काल प्राप्त कर लेता है। यदि वह ब्रह्मस्वरूप की इच्छा करेगा तो पूर्वदेह का मोह छोड़ कर शुद्ध ब्रह्म के
ध्यान में निमग्न हो जायगा और स्वतः सिद्ध ब्रह्म हो जायगा। इस प्रकार प्राण धारण कर जो प्राण छोड़ता है वही
उसका स्वच्छंद मृत्यु का लक्षण है। कलिकाल भी उसके अधीन रहता है।
विहरिष्यन् सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत् ।
विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्तीः सुरस्त्रियः ॥ २५॥
अथवा यदि देवताओं के दिव्य उपभोगों में योगी का चित्र आसक्त हुआ हो तो उसे उन उपभोगों को प्राप्त
करने के लिए मेरे सत्व की ही धारणा करनी चाहिये। जिस सत्व के योग से मैंने स्वर्ग में देवताओं की स्थापना की
है उस सत्त्वगुण की धारणा वह अपने हृदय में करता है। यदि वह देवांगनाओं की कामना करता है तो उसे स्वर्ग के
देवताओं का सम्मान भी प्राप्त होता है। वह विमान में बैठकर अप्सराओं के साथ पर्याप्त कामविलास करता है।
यथा संकल्पयेद् बुद्ध्या यदा वा मत्परः पुमान्।
मयि सत्ये मनो युञ्जंस्तथा तत् समुपाश्नुते ॥ २६॥
संकल्पमात्र से सारे कार्य करने वाले मुझ सत्य संकल्प भगवान में जो अत्यन्त विश्वासपूर्वक अपना चित्त
स्थिर करता है वह जब भी, जहाँ भी, जिस भी काम में और जिस स्थिति में भी जो इच्छा मन में करेगा उसके वे
सारे मनोरथ सफल होते हैं। जो ध्यानधारणा से मुझ सत्यसंकल्प भगवान को हृदय में स्थापित करेगा वह मन में
जो भी इच्छा करेगा उसे वह प्राप्त करेगा।
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान्।
कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७॥
अथवा सबका नियंता तथा स्वतंत्र मेरा ध्यान करने से योगी को मत्स्वरूप ही प्राप्त होता है। सचमुच का

भगवान् मैं हूँ यह जिसने मान लिया उसकी आज्ञा को श्रेष्ठ देवता भी शिरसांवद्य मानते हैं। अर्थात् पशु-पक्षी भी
उस आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे। जिस प्रकार मेरी आज्ञा सब पर चलती है उसी प्रकार उसकी आज्ञा भी पूरे
चराचर पर चलती है। उसकी आज्ञा का कोई रत्तीभर भी उल्लंघन नहीं करता। ऐसी वास्तविक 'आज्ञासिद्धि' उसे
प्राप्त होती है। अब जो पाँच क्षुद्र सिद्धियाँ हैं उसके बारे में भी तुम्हें बताता हूँ।
मद्भक्त्या शुद्धसत्त्वस्य योगिनो धारणाविदः।
तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्युपबृंहिता ॥ २८॥
संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय सचमुच मेरे ही अधीन है। मेरा भजन करने से अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध
हो जाता है। शुद्ध हुए उस अन्तःकरण में भूत, भविष्य और वर्तमान तथा सांसारिक जन्मभोग और मृत्यु आदि का
त्रिकालज्ञान होने की सिद्धि प्राप्त होती है।
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः।
मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा॥ २९॥
चित्त जब अत्यन्त प्रयास करता है तब कहीं मेरा उससे संयोग होता है। चित्त का मेरे साथ योग होने पर
शरीर भी योगयुक्त हो जाता है और उस शरीर को बड़े-बड़े द्वंद्वों से भी बाधा नहीं होती। उसे शीत अथवा ऊष्मा,
मुलायम अथवा कठोर की बाधा नहीं होती। देह में अग्नि का स्पर्श होने पर भी वह नहीं जलता। जिस प्रकार
जलचर जल में निश्चिंत होकर विचरण करते हैं उसी प्रकार वह भी अग्नि में विश्राम करता रहता है। उसे
'अद्वंद्वता' नाम की यह सिद्धि प्राप्त होती है। इसी.सिद्धि की धारणा से 'प्रतिष्ठभं' नामक सिद्धि उत्पन्न होती है।
सारी बाधाओं से मुक्त करने का व्रत जिसने लिया है उस 'प्रतिष्ठभं' नामक सिद्धि का लक्षण सुनो। उसे बाहर के
वायु के झंझावात से कभी पीड़ा नहीं होती। वह प्राणों को भी जीत कर उसे दासी बना लेता है। डंठल निकाले
हुए फूलों की शय्या पर जैसे कोई शयन करता है उसी प्रकार वह धधकते अंगारों पर सोता है। उसे उस अग्नि से
पीड़ा नहीं होती। जाड़े के दिनों में सिद्ध को ठंडे पानी में डुबोने से भी वह बाहर निकलने के लिये नहीं
छटपटाता। जिस प्रकार मछली जल में खेलती है उसी प्रकार वह मौज से क्रीड़ा करता रहता है अथवा ग्रीष्मऋतु
में तपती धूप में यदि सिद्ध को रख दिया जाय तो जिस प्रकार सूर्यकिरणों से कमल प्रफुल्लित होता है उसी प्रकार
धूप लगने से वह अधिक ताजा हो जाता है। सूर्य के ताप से उसे जरा भी बाधा नहीं होती। उसी प्रकार सिद्ध को
शस्त्र के घाव से भी पीड़ा नहीं होती। शस्त्र यदि आकाश पर घाव करने का प्रयास करे तो वह प्रयास व्यर्थ जाता
है उसी प्रकार सिद्ध को शस्त्र के प्रहार से घाव नहीं लगता। सिद्ध को विष देने पर वह विष भी उसे बाधक नहीं
होता। जिस प्रकार विष के कीड़े उसमें सुख से रहते हैं उसी प्रकार वह भी उसमें सुख से रहता है। छाया पर्वत
के नीचे दबी होने पर भी उसे उससे कष्ट नहीं होता उसी प्रकार अग्नि, सूर्य, विष, जल अथवा वायु इनमें से
किसी से भी सिद्ध को बाधा नहीं होती। सिद्धियों की ये बातें सुनकर मन भले ही उल्लसित हो जाय लेकिन मुझे
प्राप्त करने में ये सिद्धियाँ सचमुच ही बाधक हैं। मेरा स्वरूप शुद्ध होते हुए अद्वैत है। उसमें सिद्धि के जो मनोरथ
हैं वे केवल लोकरंजन के लिये हैं। सिद्धियों में परमार्थ नहीं है। पिछले श्लोक के अन्त में 'परचित्ताभिज्ञता'
नामक एक सिद्धि का उल्लेख ध्वनितार्थ में हुआ है, उसका भी लक्षण सुनो। उसी श्लोक में बतलाया गया है कि
भगवान् का ध्यान करते समय प्रकृति का नियंत्रण करने वाला और सबका साक्षी वह स्वयं बन जाता है। ऐसे
ईश्वर का ध्यान करने से चित्त की चालकता ही उसे प्राप्त हो जाती है। तब चित्त की भिज्ञता (ज्ञान) उसे सहज

४३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही प्राप्त हो जाती है। तब चित्त की भिज्ञता (ज्ञान) उसे सहज ही प्राप्त हो जाती है। जिस समय जीव की
स्वप्नावस्था वह साक्षी होकर देखता रहता है उस समय उसके मन में जो भी संकल्प चलता रहता है उसे वह
जानता रहता है। उसके अंतःकरण में चल रही गुप्त चाह के सम्बन्ध में भी वह सहजता से बात कर सकता है।
इस सिद्धि का लाभ उसे तत्काल प्राप्त होता है।
मद्दिभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्त्रविभूषिताः ।
ध्वजातपत्रव्यजनैः स भवेदपराजितः ॥ ३० ॥
'अपराज' सिद्धि प्राप्त करनी हो तो मेरी मूर्ति का ध्यान करें। जिसका नाम लेकर बड़े-बड़े देवतागण भी
निश्चित रूप से विजय प्राप्त करते हैं- चतुर्भुज, मेघ जैसा श्यामवर्ण, शंख, चक्र, गदा, पद्म, छत्र, चामर,
अबदागीर, ध्वज पर उत्तम गरुड़ शोभायमान रत्नजड़ित डंडे की खनकार से पंखा झल रहा है, पैरों में पैंजनियाँ
बज रही हं और असंख्य शत्रु पैरों तले शरणागत आये हुए हैं। मेरी ऐसी मूर्ति का ध्यान जो दक्षतापूर्वक करेगा
वह सर्वत्र विजयी होगा और मेरे प्रताप से वह कहीं भी पराजित नहीं होगा। देखो! मेरे ही ध्यान से वह बिना
किसी की सहायता लिये अकेले ही विजय प्राप्त करता है। केवल इतनी निष्ठा से ही यह सिद्धि प्राप्त होती है।
मुझ जैसे अजीत को जो अपने हृदय में धारण करता है वह सर्वत्र अजेय रहता है। इतना कह कर भगवान ने
सिद्धियों के वर्णन का उपसंहार किया।
उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः।
सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ ३१॥
मैंने जिन-जिन योगधारणाओं के सम्बन्ध में बताया उनका उन भावनाओं के साथ जो भजन करेगा, उसे
उन सिद्धियों की प्राप्ति पूर्वकथित लक्षणों के अनुसार होगी। अथवा चित्त में अनेक स्वरूपों का ध्यान करने से
उन-उन धारणाओं के अनुसार हे उद्धव ! उसे भी अनेक सिद्धियों की प्राप्ति होगी। इस प्रकार जिससे एक ही
धारणा से अनेक धारणाओं की सिद्धि प्राप्त हो ऐसी धारणा के बारे में तुम्हें बताता हूँ।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः ।
मद्दारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ ३२॥
पाँच-पाँच इन्द्रियों की जो जोड़ी है, उसे शमदम के बल से जीत कर, वैराग्य की पताका फहरा कर प्राण
अपान पर विजय प्राप्त की और विवेक के बल से वृत्ती को संयत रख कर सदा मेरा भजन करने से मन को भी
जीता जाता है। इस प्रकार साधक को अपने मन में धारणा कर रात दिन केवल मेरा ध्यान करने से समस्त
सिद्धियाँ उसकी दासी बन जाती हैं। सारे उपाय छोड़कर केवल मेरा ही ध्यान करने से उस साधक के पास किस
चीज की कमी होगी ? और सिद्धियों की दुर्लभता भी कहाँ रह जाती है ? मेरा भजन करने से साधक को सिद्धियाँ
अवश्य प्राप्त होती हैं किन्तु उनका उपभोग करना उचित नहीं है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्तरायान् वदन्त्येता युञ्जतो योगमुत्तमम्।
मया सम्पद्यमानस्य कालक्षेपणहेतवः ॥ ३३ ॥
मेरी प्राप्ति शीघ्र हो जाती है। लेकिन उस समय यदि सिद्धि पर मन आ जाय तो मेरी प्राप्ति में बाधा
उपस्थित होगी। जिसकी विषयभोग में आसक्ति होती है वही सिद्धि का लोभ करता है। लेकिन जिसे मेरी प्राप्ति

में रुचि रहती है वह ऋद्धि-सिद्धि की कामना नहीं करता। जिसे लोगों में मान-सम्मान पाने में बड़प्पन मालूम
होता है वही सिद्धियों के लिये प्रयास करता है। जिसे मेरी प्राप्ति की ही चाह रहती है वह सिद्धि के पीछे नहीं
भागता। काशी जाते समय कोई किसी वेश्या के घर ठहर जाता है और उसके भोग विलास पर लुब्ध होकर
अपना सारा धन उसे अर्पण कर देता है। अब जब तक प्राण है तब तक इसे नहीं छोड़ूँगा ऐसा निश्चय कर वह
उस वेश्या का लंपट हो जाता है। जब तक उसके पास धन है तब तक वह वेश्या उसके आगे-पीछे करती रहती
है लेकिन जब उसके पास एक कौड़ी भी नहीं रह जाती तब उसे घर से निकाल देती है। अगर इतने पर भी वह
घर नहीं छोड़ता तो वह स्वयं उसे छोड़कर चली जाती है। उसी प्रकार महासिद्धियों की स्थिति है। सारे पापों का
क्षालन करने, सारे कुलों का उद्धार करने के लिये काशी जाना तो दूर रहा, उलटे कामलोलुप होने के कारण
वेश्या के हाथों सारी कमाई भी चली गयी। सिद्धियों की कथा भी वैसी ही है। वे मेरी प्राप्ति में बाधक होती हैं
और साधक को मेरे ध्यान, ज्ञान और वैराग्य से वंचित कर उसे कंगाल बना देती हैं। मेरी प्राप्ति के पास ही
उनकी लूट-खसोट जारी रहती है। उसे सुखोपभोग का लालच देकर छलने के लिए उसके मन में मोह उत्पन्न
करती हैं। मेरी प्राप्ति में विलम्ब होने का यही कारण रहता है। हे उद्धव ! मेरा स्वरूप अद्वैत है और उसमें सिद्धि
के जो अनेक रूप दिखायी देते हैं वह सचमुच माया का भुलावा है। मेरी प्राप्ति में सिद्धियों का विघ्न आड़े आता
है इसलिये मैंने सभी सिद्धियों का स्वरूप तुम्हें सविस्तार बताया। मेरा ध्यान कर उसमें मन की एकाग्रता होने पर
यदि साधक सुखोपभोगों के चक्कर में फँस गया तो सिद्धियाँ उसे लूट लेती हैं।
जन्मौषधितपोमन्त्रैर्य्यावतीरिह सिद्धयः।
योगेनाप्नोति ताः सर्व्वानान्यैर्य्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४॥
जन्म, औषधि, मंत्र, तप आदि से भी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं अथवा योगाभ्यास करते समय प्राणापान साध्य
होने पर भी सारी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। कुछ को जन्म से ही सारी सिद्धियाँ प्राप्त रहती हैं तो कोई दिव्य
वनस्पतियों की सहायता से सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं। कुछ लोग तप आदि महान साधनों से सिद्धि प्राप्त करते हैं
तो कुछ उन्हें मंत्रों द्वारा साध्य करते हैं। सर्प को वायु भक्षण, मत्स्य के लिये जल में तैरना, पक्षी के लिये आकाश
में उड़ना ये सिद्धियाँ जन्म से ही प्राप्त रहती हैं। हंस पानी और दूध को अलग करता है, कोकिला मधुर स्वर में
गायन करती है, चकोर चंद्रामृत का सेवन करता है ये सिद्धियाँ भी उन्हें जन्म से ही प्राप्त रहती हैं। इस प्रकार
जन्म से ही जो सिद्धियाँ प्राकृतिक रूप में प्राप्त होती रहती हैं उनके सम्बन्ध में तुम्हें भली-भाँति बतलाया। अब
कुछ दिव्योषधियों का सेवन करने से भी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो। श्वेत मदार
के पेड़ के नीचे गजानन की पूजा कर अंगार की चतुर्थी का व्रत करने से सारी विद्याओं का ज्ञान हो जाता है और
धनधान्य की समृद्धि होती है। अजान वृक्ष की पहचान यही है कि उसके फल कुत्ते के मुँह जैसे होते हैं। उस
वृक्ष का दूध पीने को मिल जाय तो वह व्यक्ति अजर-अमर हो जाता है। नीम का सेवन करने से विष का प्रभाव
नहीं होता। पाताल गरुड़ी नामक वृक्ष विशेष का मुख प्राशन करने से कोई शारीरिक पीड़ा नहीं होती। पूतिका
वृक्ष का मूल तो महाशक्ति का पुतला है। उसे साध्य करने पर साधक तत्काल अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करने
लगता है। इस प्रकार औषधियाँ भी अनेक हैं और सिद्धियाँ भी अनंत हैं। लेकिन उन्हें साध्य करना भी बहुत
कठिन है। हे बुद्धिमान उद्धव ! तपादि सिद्धियों का विधि कैसा होता है यह भी सुनो। कृच्छ्र, पराक, चांद्रायण
आदि व्रत करना, पर्जन्य की धाराओं में बैठना, पानी में खड़े रहना, धूम्रपानादि साधन आदि जो भी तप हैं,

४३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उनकी मन में भावना कर जैसा आचरण किया जाता है उसके अनुसार उसे सिद्धि प्राप्त होती है। अब मंत्रसिद्धि
का लक्षण सुनो। एक रात प्रेत पर बैठ कर अनुष्ठान करने से प्रेतदेवता पूर्णरूप से प्रसन्न हो जाते हैं जिससे भूत,
भविष्य, वर्तमान आदि सभी ज्ञान की प्राप्ति होती है यह ध्यान में रखो। सूर्यमंत्र का अनुष्ठान करने से दूरदर्शन
सिद्धि प्राप्त होती है। जैसा मंत्र और इच्छा रहती है उसी के अनुसार उसे सिद्धि प्राप्त होती है। किन्तु इन सारी
सिद्धियों की समृद्धि एक योगधारणा में ही होती है। दृढ़ आसन लगा कर प्राणापान में ऐक्य साध कर जो
योगधारणा करेगा उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मैंने तुम्हें सिद्धियों के सम्बन्ध में यह बताया ही है कि
प्राणापान सम होने पर तथा योगधारणा सिद्ध हो जाने पर सारी सिद्धियाँ प्रकट होती हैं अथवा प्राणापान को सम
किये बिना, योगधारणा भी किये बिना, मुझ अकेले को हृदय में रखने से सारी सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं। यदि
सचमुच ही मुझे प्राप्त करना है, तो मेरा अकेले का स्मरण करने से, मुझ अकेले का ध्यान करने से चारों मुक्तियाँ
अपने आप दासी बन जाती हैं। अनेक प्रकार की सिद्धियों का विचार करते रहें तो मेरी सलोकता, सामीप्य अथवा
स्वरूपता प्राप्त नहीं होती, फिर सायुज्यता की क्या बात करें? मेरे जो अत्यन्त शुद्ध भक्त हैं वे मुक्ति को भी धता
बता देते हैं। वे मेरी भक्ति में ही सदा सन्तुष्ट रहते हैं और वही मुझे पूज्य हैं। सभी सिद्धियों का ईश्वर मैं हूँ,
लेकिन मैं भी उनकी पूजा करने लगता हूँ। इसलिये वहाँ जो सिद्धियों का मेला लगा रहता है वह अपना साज-
सामान उठा कर भागने लगता है। सभी सिद्धियों के साथ मैं भगवान भक्तों के पास रहता हूँ। यही बात श्लोक के
रूप में श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
सर्वासामपि सिद्धीनां हेतुः पतिरहं प्रभुः।
अहंयोगस्य सांख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम्॥ ३५॥
मैं सारी सिद्धियों का जन्मस्थान हूँ। मेरे ही कारण सिद्धियों को महत्त्व प्राप्त हुआ और मुझमें ही सारी
सिद्धियों का अन्त होता है। इस तरह मैं उनका स्वामी हूँ। जीवात्मा की जो एकता है उस योग का सच्चा स्वामी मैं
हूँ और जिसमें जीवात्मा की वार्ता व्यर्थ है उस ज्ञान का स्वामी भी मैं हूँ। ज्ञानोपदेश करने वाले जो साधु हैं उनका
स्वामी भी मैं हूँ यह प्रसिद्ध ही है। ज्ञानीजनों को मेरे ही उपदेश से ज्ञान का स्पष्ट बोध होता है। वेद उपनिषद्भाग से
उपदेश करता है। मैं गोविंद उस वेद का भी स्वामी हूँ। मेरे बिना उस वेद के उच्चार से एक शब्द का भी उच्चार नहीं
हो सकता। धर्म का अर्थ है ज्ञान का साधन। उसका स्वामी भी मैं हूँ इसे ध्यान में रखो। भीतर और बाहर पूर्णतयः
रहने वाला ज्ञानमय सर्वात्मा मैं हूँ। सर्वात्मा होकर मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ। उद्धव! भीतर और बाहर पूर्णत्व से भरा हुआ
मैं ही हूँ! यह स्थिति मुझमें अपने आप ही किस प्रकार रह गयी है उसे ध्यान से सुनो।
अहमात्माऽन्तरो बाह्योऽनावृतः सर्वदेहिनाम्।
यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा॥ ३६॥
जीवों के जीव में मेरा ही वास है और जीव भी मुझमें खुशी से रह गये हैं। मेरा स्वरूप गुण और माया से
बिलकुल भिन्न तथा असीम है। जिस प्रकार घट आकाश में ही रहता है और उसके भीतर-बाहर आकाश ही
रहता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव के भीतर और बाहर परिपूर्ण भरा हुआ श्रीकृष्ण मैं ही हूँ। समस्त भौतिक
वस्तुओं को जिस प्रकार पंचमहाभूत भीतर और बाहर से घेरते हैं, उसी प्रकार मैं श्रीकृष्ण ने भी सारे संसार को
भीतर और बाहर से घेर रखा है। लहरों को जैसे पानी और गुड़ को माधुर्य घेरे रहता है उसी प्रकार इस अनंत
कोटि ब्रह्माण्डों को भी मैंने परिपूर्णता से व्याप रखा है। मुझ जैसे परिपूर्ण की प्राप्ति का प्रसंग निकट आता है

पन्द्रहवाँ अध्याय ४३३
तभी भोगविलास और सम्पत्ति के प्रयास सिद्धियों को नग्न कर देते हैं। राजा के साथ जिसका मेलजोल रहता है
उसे रिश्वत लेना सरल रहता है लेकिन सम्भवतः इसी में उनकी मृत्यु हो जाती है। उसी प्रकार साधक के लिये
सिद्धि घातक ही है। इस अध्याय के विषय का प्रतिपादन करने का यही कारण है कि उद्धव ! मेरी प्राप्ति में
सिद्धि ही सबसे बड़ा विघ्न है। एकाग्र भजन से मेरी प्राप्ति का प्रसंग निकट आते ही सिद्धियाँ आ जाती हैं और
उन भोगों की आसक्ति से साधकों को भुलावा देकर उन्हें कंगाल बना देती हैं। जो मेरे आत्मसुख के विषय में
नहीं जानते वे मूर्ख रहते हैं, उन्हें अत्यन्त विषय वासना के कारण इस सिद्धि का अत्यन्त कौतुक मालूम होता है।
वेश्या के जैसे हावभाव रहते हैं वैसे ही सिद्धि का वैभव होता है। उस सबका त्याग करने के लिये भगवान ने इस
अध्याय का निरूपण किया। जिसे मेरा आत्मसुख प्राप्त होता है वह इन सिद्धियों को तुच्छ मानता है। वे जन्म-
मरण की चिन्ता भी नहीं करते। उनके अंतःकरण में मेरे प्रति परिपूर्ण आनन्द भरा रहता है। सद्गुरु चरणों की
सेवा करने से सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ही भर जाता है। फिर सिद्धियों को कौन पूछे ? यह बात हरिभक्त जानते हैं।
हरिभक्ति पर भक्त बिक जाता है, भजन से अहंभाव नष्ट होता है, ऐसे समय सिद्धियों के उपयोग की कल्पना भी
मन में नहीं आती। भुक्ति, मुक्ति, ऋद्धि, सिद्धि ये सब सद्गुरु के चरणों में ही हैं। जो मंदबुद्धि यह बात नहीं
जानते वे अनेक प्रकार की सिद्धियों की इच्छा करते हैं। निरपेक्षता यही सचमुच सभी सिद्धियों का साधन है इसे
पक्का ध्यान में रखो। निरपेक्ष व्यक्ति के आँगन में सभी सिद्धियाँ सेवारत रहती हैं जिनके मन में सिद्धियों की
इच्छा रहती है :उन्हें सिद्धियाँ सीधे मुँह देखती भी नहीं और निरपेक्ष व्यक्ति के चरणों की धूल को वे शिरसावंद्य
करती हैं। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भी अधिक निरपेक्षता ही श्रेष्ठ है। यह निरपेक्षता हाथ लगने पर सायुज्यता
मुक्ति भी चरणों पर गिर पड़ती है। निरपेक्षता के पास ही सारी सिद्धियाँ रहती हैं, सारे विधि रहते हैं और समृद्धि
वहाँ दिन-रात चरणों का वन्दन करती रहती है। जहाँ निरपेक्षता होती है वहीं योगक्षेम रहता है और वहीं सद्भाव
रहता है और निरपेक्षता के पास ही भगवान का स्वरूप खड़ा रहता है। निरपेक्षता के पास ही वेदान्त होता है,
निरपेक्षता के पास ही सच्चा योग होता है, निरपेक्षता ही स्वानंद का उपभोग है और निरपेक्ष को ही भगवान प्राप्त
होते हैं। एका (एकनाथ) ने जनार्दन की शरण में जाकर उनके पवित्र चरणों का वंदन करते ही उसे सदा बढ़ती
रहने वाली निरपेक्षता प्राप्त हुई इसलिये वह सदा आनन्द से परिपूर्ण रहता है। हमें स्वानंद का आत्मबोध हुआ
यह केवल सद्गुरु चरणों का प्रसाद है। श्रीगुरुचरणों में ही महासुख का लीलाविलास तथा आनन्द का मूल बीज
होता है। गुरुचरणों की भक्ति करने से अनायास ही चारों मुक्ति प्राप्त हो जाती हैं। इसीलिये विरक्ति गुरुभक्त की
आत्मशांति के साथ सेवा करने लगती है। एका जनार्दन की शरण में गया इसलिये उनकी कृपा से श्रीमद्भागवत
के निरूपण का पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
इति श्रीमद्भागवते एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
एकाकार टीकायां सिद्धि निरूपण स्तोत्र नाम पंचदशोध्यायः ॥ १५ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

सोलहवाँ अध्याय
ओंकारस्वरूप सद्गुरु श्रीमूर्त्ति को मेरा नमस्कार। हे श्रीगुरुराया! यह सारा चराचर तुम्हारा ही स्वरूप है।
विश्व की आत्मा तुम हो, विश्व का स्फुरण भी तुम ही हो और निराकार तथा साकार मूर्ति तुम ही हो। तुम्हारे
रूप की महिमा शास्त्रज्ञों की समझ से परे है। उसके वर्णन के प्रति श्रुति मौन है और वर्णन करने में शब्दों ने भी
हार मान ली है। तुम्हारे स्वरूप के बारे में कोई दृष्टांत भी नहीं दिया जा सकता। तुम्हारे सादृश जो भी खोजने की
कोशिश करें वह तुम्हारा ही स्वरूप रहता है। तुम्हारे प्रभाव की यह विशेषता है कि वहाँ दूजेपन की जड़ ही कट
जाती है। फिर चारों ओर जब एक ही बात हो तो उसमें दूसरे प्रकार का दृष्टांत कहाँ मिलेगा? तुम्हारी महिमा
अगाध है तो तुम्हारा ध्यान भी कैसे किया जाय? उद्देश्य, शब्द और दृष्टांत ये जिसके वर्णन के क्षेत्र में ही नहीं
आते वह श्रीमद्भागवत का अर्थ तुम ओवी के रूप में कहलाते हो। वह मेरे मराठी के आर्त बोल लेकिन सद्गुरु
ने उन्हें गहन बना दिया है। उसमें प्रेम की जो आर्द्रता है वह केवल गुरुभक्त ही जानते हैं। जिनकी गुरुचरणों पर
भक्ति नहीं है उन्होंने भले ही वेदशास्त्र का पठन किया हो शास्त्रव्युत्पत्ति का अध्ययन किया हो लेकिन उनमें
विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी? वे भले ही कोटि प्रयास क्यों न करें लेकिन उनसे उन्हें समाधान नहीं होगा। किन्तु
सद्गुरु की कृपादृष्टि होने पर गुरुभक्तों को ब्रह्मत्व से ही पुष्टि प्राप्त होती है। हे सद्गुरु जनार्दन! आप समस्त
संसार के अधिष्ठान हैं। स्वाभाविक ऐक्य रूप से आप स्वयं ही समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हैं। जिनसे सारे
प्राणिमात्र से ऐक्य होता है, जिन्हें सद्गुरु की भक्ति प्राप्त होती है वही इस श्रीमद्भागवत के अर्थ को जान
सकता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर शास्त्र की व्युत्पत्ति सीखने का कष्ट किये बिना ही उत्तम भावार्थी भक्त
भागवत का अर्थ सहज ही जान सकता है। अंतःकरण में एकनिष्ठ भक्ति उत्पन्न होते ही उस भक्ति के योग से
देवाधिदेव प्रकट होते हैं। तभी भागवत का वास्तविक रहस्य मन पर अंकित होता है। इसलिये गुरुभक्ति करने से
भागवत का अर्थ अच्छी तरह समझ में आता है। फिर काव्य आदि अथवा व्युत्पत्ति आदि उपायों की क्या
आवश्यकता है? शास्त्रज्ञान भी क्यों किया जाय? और व्यर्थ का ध्यान भी क्यों धारण किया जाय? साधकों के
लिये सद्गुरु के चरण यही चलता-फिरता पूर्ण ब्रह्म है। गुरुभजन के बिना शिष्य का समाधान नहीं होता क्योंकि
उससे श्रेष्ठ साधन है ही नहीं। उसी सद्गुरुकृपा के अभ्यास से ग्यारहवें स्कंध के पूर्वार्ध का ज्ञान देशी भाषा में
यथामति आत्मबोध से वर्णन किया। ईख पेरने से उसका रस निकलता है। उसे यदि वैसे ही रख दिया जाय तो
वह अधिक समय तक नहीं टिकता। उसे आँच पर पका कर उसका गुड़ बनाकर रखना पड़ता है। गुड़ भी
अधिक समय तक रखने पर पसीजने लगता है इसलिये उसकी शक्कर बनाकर रखना पड़ता है। चतुर लोग उस
चीनी को भी स्वच्छ और सूखी ताड़ मिश्री बनाकर रखते हैं। श्री भागवत की भी वैसी ही कथा है। सर्वप्रथम
श्रीनारायण ने ही इसका वर्णन किया जिसका श्रीव्यास ने दस लक्षणों में वर्णन किया। शुक्राचार्यजी के मुख से
उस दस लक्षणयुक्त कथा का वर्णन होने से उसमें और भी मिठास आ गयी। उसमें से कठिन शब्दों को स्पष्ट कर
श्रीधर ने उस पर उत्तम टीका प्रस्तुत की। उसी श्रीहरि टीका को 'भावार्थ दीपिका' कहते हैं। उसी भावार्थ का
निरूपण मैंने देशी भाषा में किया। मूल वक्ता नारायण ही है और उस पर व्यास, शुक तथा श्रीधर ने व्याख्यान
प्रस्तुत किया है। उनमें मूल भाष्य की मिठास पर ध्यान देते हुए एकाजनार्दन इस काव्य का कर्त्ता बन गया है।

सोलहवाँ अध्याय ४३५
श्रीनारायण ने मूल बीज ब्रह्मदेव में स्थापित किया जो नारदरूपी भावभूमि में सशक्त रूप से अंकुरित हुआ। उसी
के दश लक्षण-भागवतरूपी बालों का श्रीव्यास ने संकलन किया और शुक्राचार्य ने परीक्षित के लिये बालों में से
दाने मलकर एकत्र किये और उसकी राशियाँ बनायीं। उन दानों को शास्त्र रीति से आत्मबुद्धि के सूप में पछोर
कर श्रीधर ने उनमें से बड़े-बड़े दाने छाँट लिये। फिर एका जनार्दन ने उनके उत्तम पकवान तैयार कर मराठी
शब्दरूपों से उन्हें भक्तजनों को परोसा। जो आत्मभक्त होंगे वही उसका माधुर्य जान पायेंगे। श्रोताओं के ध्यान देने
से और जनार्दन की कृपा के कारण एका जनार्दन ने देशी भाषा में यह पूर्वार्ध पूर्ण किया। उसका क्रम इस प्रकार
है—पहले अध्याय में वैराग्य की उत्पत्ति का प्रसंग लाते हुए श्रीकृष्ण ने अपने कुल का क्षय करने के लिये
ब्राह्मणों के शाप रूप से प्रारम्भ किया। दूसरे अध्याय से चौथे अध्याय तक नारदजी ने वसुदेव के घर जाकर
निमिजयंती के प्रश्नोत्तर के रूप में पंचाध्याई समाप्त की। छठवें अध्याय में श्रीकृष्णमूर्ति का दर्शन करने के लिये
देवताओं की भीड़ उमड़ती है। वे श्रीकृष्ण को निजधाम चलने की प्रार्थना करते हैं। सुरश्रेष्ठों की विनती सुनकर
और द्वारका पर छायी विपत्ति को सुनकर उद्धव श्रीकृष्ण से मुझे भी निजधाम ले चलने की प्रार्थना करते हैं।
उसके प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण ने सातवें अध्याय में ज्ञानमय तथा त्यागयुक्त छोटा-सा भाषण किया। उस समय
त्यागसंग्रह के लक्षण के प्रसंग में यदू और अवधूत के संवाद रूप में चौबीस गुरुओं का परिच्छेद आठवें और
नौवें अध्याय में पूरा किया। श्रद्धा किस प्रकार रखनी चाहिये और ज्ञान पर किस तरह विश्वास करना चाहिये इस
सम्बन्ध में बताकर उसमें अनेक मतों का समावेश करने की दृष्टि से श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में ज्ञान का
चमत्कार समझाया। ग्यारहवें अध्याय में बद्ध-मुक्त का अन्तर बताकर साधु का लक्षण और भक्ति का पूर्ण स्वरूप
स्पष्ट किया। भागवत के बारहवें अध्याय में भगवान ने अत्यन्त गूढ़ ज्ञान प्रकट किया है। उसका रहस्य स्पष्ट
करने में बड़े-बड़े ज्ञाता भी सन्देह में पड़ जाते हैं। बारहवें अध्याय की चाभी केवल युक्ति-प्रयुक्ति से समझ में
नहीं आयेगी किन्तु जनार्दन की कृपारूप माँ साथ में थी इसलिये उसने ग्रन्थ का मार्ग दिखाया। उस बारहवें
अध्याय में सत्संग की अगाध महिमा, कर्म का कर्त्ता कौन, त्यागबुद्धि यही कर्म का लक्षण है आदि विषय हैं।
उस बारहवें अध्याय का श्रवण करने से चित्त पर ज्ञान का संस्कार होता है। लेकिन उसमें विषय-वासना बाधक
होती है जिससे साधकों को पीड़ा होती है। गुणभेदों का लक्षण, और उससे होनेवाली विषय की आसक्ति,
सत्वशुद्धि के प्रकार आदि का निरूपण तेरहवें अध्याय में किया। फिर उसी प्रसंग में विषयों का और चित्त का
समन्वय कैसे होता है और उसे कैसे सुलझाया जाता है यह समझने के लिये उत्तम निर्णयात्मक हंसगीत का
कथन किया। हंसगीत में जो ज्ञान दिया गया है और समाधि तक जो समाधान किया गया है उसे साधने का मार्ग
भगवान ने स्वयं चौदहवें अध्याय में निरूपित किया है। साधनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है, सगुण स्वरूप ही मेरी निर्गुण
मूर्ति है तथा योगयुक्त ध्यानावस्थिति कैसी होती है इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण ने चौदहवें अध्याय में बतलाया
है। सिद्धियों के लिये ध्यानधारणा करने के प्रकार भिन्न-भिन्न हैं। उनके बारे में भी श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया
और ईश्वर प्राप्ति में सिद्धियाँ किस प्रकार बाधक हैं इस बारे में उन्होंने पन्द्रहवें अध्याय में बतलाया है। इस
प्रकार पन्द्रह अध्यायों में पूर्वार्ध का अत्यन्त निर्मल निरूपण हुआ। अब उत्तरार्ध शेष है उसके सम्बन्ध की कथा
के बारे में सुनिये। सोलहवें अध्याय में भगवान की विभूति का निरूपण है तथा अठारहवें अध्याय में वर्णाश्रम
कर्म की जानकारी तथा विधान प्रकारों का निरूपण है। उन्नीसवाँ अध्याय गहन है। उसमें ज्ञान माहात्म्य है तथा
उद्धव के प्रश्नों का ज्ञानात्मक उत्तर दिया गया है। उस ज्ञान का योग, अज्ञान, ज्ञान तथा मध्यावस्था इन तीन
प्रकारों से श्रीकृष्ण ने बीसवें अध्याय में बतलाया है। आगे उद्धव ने गुणदोषों की अवस्था जब वेदों के मत्थे रख

४३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

दी तो उस वेदवाद का सच्चा सात्त्विक निरूपण इक्कीसवें अध्याय में किया। उसी वेदवाद निरूपण के प्रसंग में
तत्त्वों की कुल संख्या कितनी है यह प्रश्न सामने आया। तब श्रीकृष्ण ने उस तत्वसंख्या का यथार्थ निरूपण
किया। सभी तत्त्वों का विवेचन, प्रकृति और पुरुष का लक्षण तथा जन्म-मरण आदि का निरूपण बाईसवें
अध्याय में किया। दूसरों के अपराध सह कर स्वयं निर्द्वंद्व रहना चाहिये इस आशय का भिक्षुगीत संवाद तेईसवें
अध्याय में स्पष्ट किया गया है। अद्वैत में स्थिर होने के लिये चौबीसवें अध्याय में सांख्यशास्त्र का वर्णन है।
निर्गुण से ही गुणों की उत्पत्ति होती है और गुणों का क्षय होने पर निर्गुण ही शेष रहता है। प्रारम्भ में निर्गुण रहता
है और अन्त में भी निर्गुण ही रहता है। इस बीच मिथ्या ही गुणों का आभास होता है। ऐसे इस अद्वैत प्राप्ति के
लिये सांख्यशास्त्र का निरूपण किया। वे मिथ्या गुण प्रवृत्तियुक्त होते हैं, उन तीन गुणों का परस्पर सम्बन्ध रहता
है और निर्गुण के सम्बन्ध से किस प्रकार आत्मनिष्ठा कायम रखी जाय इसे पचीसवें अध्याय में बताया गया है।
छब्बीसवें अध्याय में अनुताप की असीम शक्ति प्रदर्शित करने के लिये पुरूरवा ने कामपाश में फँस कर उर्वशी का
उपभोग करते हुए भी किस प्रकार विरक्ति प्राप्त की इसका वर्णन है। भजन की विधि, मूर्ति का लक्षण, वैदिक,
तांत्रिक तथा मिश्र भजन क्या होता है इस उद्धव के प्रश्न का निरूपण सत्ताईसवें अध्याय में है। बड़े-बड़े योगियों
का योगमंजर, गहन ज्ञान से परिपूर्ण, आत्मसुख का निचोड़ ऐसा अट्ठाईसवाँ अध्याय केवल ज्ञानविषयों से भरा
हुआ है। उसी अध्याय में 'संसार असम्भवनीय है' ऐसा गहन प्रश्न उद्धव ने किया था, उसका उत्तर भगवान ने
दिया है। ग्यारहवें स्कंध का कलश तथा भक्तिप्रेम का अत्यन्त मनोहर स्वरूप ऐसा अत्यन्त रसाल और भक्तियुक्त
ज्ञानोपदेश उन्तीसवें अध्याय में है। उसके अगले दो अध्यायों में स्त्रीपुत्रादि सारे कुल का संहार प्रत्यक्ष अपनी
आँखों के सामने होते हुए भी ज्ञान से समर्थ व्यक्ति का चित्त नहीं डगमगाता यह बात श्रीकृष्ण ने ही प्रत्यक्ष
दिखला दी है। ब्राह्मणों का शाप अत्यन्त कठोर होता है। उस शाप ने श्रीकृष्ण को भी पीड़ा पहुँचायी फिर औरों
की क्या बिसात ? ब्रह्मशाप से सारे कुल का भी विनाश होता है। ब्राह्मण का क्रोध अत्यन्त सामर्थ्यवान होता है,
उसने सारे समुद्र को मूत्रमय कर दिया। ब्राह्मण के क्षोभ से एक क्षण में शिव का भी लिंगपात हुआ। इसलिये
चाहे सज्ञान हो या अज्ञान हो उसे ब्राह्मण से वैर नहीं करना चाहिये। यही दिखलाने के लिये श्रीकृष्ण ने प्रसिद्ध
कुलक्षय का दिग्दर्शन किया। जिसने श्रीकृष्ण के देह पर प्रहार किया उस व्याध को भी श्रीकृष्ण ने जीवन से मुक्त
किया। यहाँ तक यह दिखा दिया कि ज्ञाता किस प्रकार देहातीत और क्षमाशील होता है। उन्तीसवें अध्याय तक
श्रीकृष्ण ने ज्ञान का उपदेश किया। उसके अगले दो अध्यायों में अपनी ही विदेह स्थिति के बारे में बतलाया।
राम अयोध्या आकर गये और कृष्ण ने भी अपना देह त्याग दिया, इन बातों से उन्होंने भावी मुमुक्षुओं को तरने के
लिये देहाभिमान के मिथ्या होने का महत्त्व स्थापित किया। पन्द्रहवें अध्याय तक इस स्कन्ध के पूर्वार्ध का
समापन हुआ। उनमें अत्यन्त पवित्र बातों का कथन हुआ है, साथ ही सूत्र के रूप में उत्तरार्ध के प्रत्येक अध्याय
का तात्पर्य भी स्पष्ट रूप से बतला दिया है। सद्गुरु जनार्दन सहायता के लिये हैं अतः श्रोतागण ध्यान दें। अगले
उत्तरार्ध का व्याख्यान भी जनार्दन एकनाथ के मुख से कहलवायेंगे। वसन्त के आगमन के साथ वृक्षों पर फूल
और फलों की बहार आ जाती है। उसी प्रकार जनार्दन के कृपाकटाक्ष के कारण कविता के शब्द भी पुष्पित
पल्लवित होते हैं। जिस प्रकार आकाश में सूर्य का उदय होते ही नये कमल खिल उठते हैं उसी प्रकार जनार्दन
की कृपा से कविता में नूतनता का विकास होता है। हाथ में मुरली लेकर श्रीकृष्ण ने सारे संसार को समाहित कर
दिया उसी प्रकार मुझे कवीश्वर बनाकर मेरा हाथ थामा और सब कुछ जनार्दन ही बोल रहे हैं। उस जनार्दन की
कृपा साक्षात् क्षीर सागर की तरह है। उसके कृपा की कोई सीमा नहीं है। उस जनार्दन की कृपा से उत्तरार्ध में

सोलहवाँ अध्याय ४३७
अर्थसिद्धि बुद्धि का प्रवेश हो रहा है। पिछली कथा में पन्द्रहवें अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने बताया था कि मेरी
प्राप्ति में सिद्धियाँ बाधक होती हैं। अर्थात् सिद्धियों पर से ध्यान हटा कर मेरे स्वरूप में मन लगाना चाहिये।
श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव ने प्रश्न किया। "हे श्रीकृष्णनाथ! समर्थ, मेरी एक विनती सुनो। तुम
अपनी समस्त विभूतियों के बारे में मुझे बताओ।"
उद्धव उवाच
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम्।
सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्भवः ॥ १॥
भूत और भौतिक का कारण तुम हो, जन्म, स्थिति और लय तुम्हारे ही कारण होते हैं, फिर भी तुम अकर्ता
हो इसीलिये तुम परब्रह्म हो। इस पर तुम कहोगे कि प्राणियों की उत्पत्ति स्थिति और लय प्रकृति ही करती है।
लेकिन वह प्रकृति अर्थात् माया तुम्हारे ही अधीन है। तुम्हारे ही कारण प्रकृति में चालन की क्षमता आती है।
इसलिये प्रकृति परतंत्र है। तुम परमात्मा स्वतंत्र हो। तुम अनादि, अव्यय और अथाह हो। वेदों को भी तुम्हारी
थाह नहीं लगती। प्रकृति पर तुम्हारा आवरण है। तुम स्वयं जीव का स्वरूप हो लेकिन जीव नहीं हो। जीव
जितना अज्ञान से युक्त है और तुम सचमुच ही ज्ञान और अज्ञान से बिलकुल परे हो, इसलिये तुम अविनाशी
और अपरोक्ष साक्षात परब्रह्म हो। तो तुम कैसे अपरोक्ष हो ? इसका कारण यह है कि तुम सबमें सर्वत्र अंतर्बाह्य
व्याप्त हो और तिस पर भी तुम अतर्क्य हो। उसके सम्बन्ध में सुनो।
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयमकृतात्मभिः ।
उपास्ते त्वां भगवन् याथातथ्येन ब्राह्मणाः ॥ २॥
मछली से लेकर हिरण्यगर्भ तक समस्त प्राणियों में निरन्तर अंतर्बाह्य व्याप्त रहने वाले तुम्हें ब्राह्मण वेद के
अर्थ से निश्चित रूप से जानते हैं अथवा जो उपनिषदों का यथार्थ रहस्य जानकर तुम्हारे प्रति भजनयुक्त रहते हैं,
वे तुम्हें निश्चित अर्थ में सर्वव्यापी सर्वात्मा जानते हैं। उस सर्वात्मा का पार जानना चाहे तो तुम अचिंत्य और
अनन्त ऐश्वर्यमुक्त हो। जो साधारण लोग तुम्हें नहीं जानते उनके विचार सुनो। इनका मन बिका होता है, वे
कामेन्द्रियों के दास बन जाते हैं वे केवल जिह्वा का पोषण करते हैं और निद्रा के गरजमाई बन जाते हैं। ऐसे लोगों
को तुम्हारे स्वयंसिद्ध तथा सर्वव्यापी स्वरूप की कल्पना भी नहीं होती। हमारे शरीर में ही आत्मस्वरूप है इसकी
उन्हें कल्पना ही नहीं होती। वे सदा विषयों में लिप्त रहते हैं। विषयों के प्रति उनका अंतःकरण चंचल बना रहता
है। उन्हें सगुण स्वरूप का ध्यान नहीं होता और मन निर्गुण स्वरूप में प्रवेश ही नहीं करता। ऐसे अज्ञानी लोग
किस प्रकार तर पायेंगे ? इसलिये शास्त्रों की खोजबीन करने तथा ध्यानधारणा के झंझट में न पड़ उन्हें केवल
भजन करना पड़े ऐसे प्रकार के उत्तम उपाय जो आपके पास हों उन्हें बतायें।
येषु येषु च भावेषु भक्त्या त्वां परमर्षयः।
उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद् वदस्व मे ॥ ३॥
तुम्हारी जिन विभूतियों की संतों ने दृढ़ भावना से भक्ति कर उपासना की और तुम्हारे स्वरूप तक पहुँचे, वे
सारी विभूतियाँ उनके स्वरूप, उनकी भक्ति और उनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है इसके सम्बन्ध में मुझे
निश्चयपूर्वक बतायें। इस पर यदि तुम सभी वस्तुओं में अपनी विभूतियों को ढूँढ़ने के लिये कहोगे तो हे
श्रीकृष्ण! तुम अतर्क्य हो। वह सब हमारे ध्यान में नहीं आयेगा।

४३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गूढश्चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन।
न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते ॥ ४ ॥
समस्त प्राणिमात्र के हृदय में तुम ही हो। लेकिन हृदय में होते हुए भी तुम गुप्त हो। देह ही मैं हूँ इस भ्रम
में सारे प्राणी तुम्हें नहीं देख पाते। हे देवराया ! उस देहभ्रम का मूल कारण तुम्हारी माया है। लेकिन तुम्हारी कृपा
होने पर उस माया का भी अपने गुणों के साथ विलय हो जाता है और फिर सर्वत्र सभी स्थानों पर समस्त
प्राणिमात्र के देह में भी अंतर्बाह्य तुम्हारा ही स्वरूप अभिव्यक्त होता है। इतना तुम्हारी कृपा का फल है। लेकिन
वह कृपा किन गुणों से प्राप्त होती है। इसलिये हे गोविन्द ! तुम्हारी कृपा प्राप्त करने के लिये तुम्हारी विभूतियों
की उपासना करनी चाहिये। इसीलिये कृपया अपनी समग्र विभूतियों के बारे में बतायें ऐसी विनती बार-बार कर
रहा हूँ।
याः काश्च भूमौ दिवि वै रसायां विभूतयो दिक्षु महाविभूते ।
तां मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते नमामि ते तीर्थपदाङ्घ्रिपद्मम् ॥ ५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल तथा दसों दिशाओं में फैली हुई तुम्हारी समस्त विभूतियों के बारे
में मुझे बतायें। कहते हुए उद्धव ने साक्षात दण्डवत किया और जहाँ से सारे तीर्थों का उद्गम होता है ऐसे
श्रीकृष्ण के चरणों पर मस्तक रख कर वन्दन किया। उद्धव का प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और
क्या उत्तर दिया ? बोले, तुम्हारा यह प्रश्न शत्रुरूपी हाथियों के झुण्ड का सिंह, गाण्डीव धारण कर महान पराक्रम
करने वाला मेरा सखा और लाडला, इतना ही नहीं मेरा प्राण, जिसके रथ पर बैठ कर मैं घोड़ों की लगाम थामता
हूँ, जिसे कुरुक्षेत्र के समरांगण में दोनों सेनाओं के बीच मैंने उपदेश किया उस नरावतार अर्जुन ने भी ऐसा ही
प्रश्न किया था। उद्धव के प्रश्न पर सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
श्रीभगवानुवाच
एदमेतदह पृष्टः प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
युयुत्सुना विनशने सपत्नैर्जुनैन वै ॥ ६ ॥
पहले जब दुर्योधन ने मेरा तिरस्कार कर घनघोर युद्ध की शुरुआत की थी, उस समय अर्जुन ने मुझसे यही
प्रश्न पूछा था। शत्रुओं का निर्दलन करने में अत्यन्त पराक्रमी, धैर्यवान, वीर, ज्ञानसम्पन्न तथा प्रश्न करने वालों में
अत्यन्त चतुर अर्जुन मेरी आत्मा ही है। उस अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में घातक युद्ध में अपने ही लोगों का वध होगा इस
भय से मुझसे यही प्रश्न किया था।
ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गर्ह्यमधर्मं राज्यहेतुकम्।
ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोऽयमिति लौकिकः ॥ ७ ॥
स तदा पुरुषव्याघ्रो युक्त्या मे प्रतिबोधितः।
अभ्यभाषत मामेवं यथा त्वं रणमूर्धनि ॥ ८ ॥
उसने कहा, केवल राज्यलोभ के लिये गुरु, गोत्रज, चाचा आदि का वध करना मेरी दृष्टि से अत्यन्त निंद्य
है। इसलिये भले ही प्राण चले जाए लेकिन मुझे युद्ध नहीं करना है। लौकिक धर्मप्रवृत्ति के कारण 'मैं मारने

सोलहवाँ अध्याय ४३९
वाला और ये मरने वाले' इस प्रकार की मोह की भ्रान्ति अर्जुन के मन में उत्पन्न हुई। राज्यसुख का लालच कर
उसके लिये अपने रिश्तेदारों का निंद्य कर्म करना मुझे शुद्ध अधर्म लगता है। इसमें धर्म के स्वधर्म की हानि
होगी। प्रतिदिन जिसके चरणों का तीर्थ लेना चाहिये, जिनकी उच्चासन पर बिठा कर पूजा करनी चाहिये उन्हें
प्रखर बाणों से घायल कर उन स्वजनों के रक्त में लिपटी हुई पृथ्वी का उपयोग कैसे किया जाय ? जब हमारे ही
बन्धु बान्धवों का रक्त इस पृथ्वी पर बहेगा तभी हम राजकर्ता बनेंगे। यह कर्म अत्यन्त भयंकर है। वह मुझसे
नहीं होगा। जो अपने कुल में सत्पुत्रों के फलने-फूलने की कामना करें उनके ही हृदय में बाणों से प्रहार करें ?
क्या इसी प्रकार हम अपने पूर्वजों के उपकार का बदला चुकायें। जिनका हमें श्राद्ध और तर्पण करना चाहिये
उनके ही प्राण हम अपने बाणों से बाँध कर ले लें? इस प्रकार तो हम अपने पितरों का अच्छा उद्धार करेंगे।
उससे हमारे धर्म का विनाश होगा। इस युद्ध में मरने पर स्वर्ग प्राप्त होगा और विजयी होने पर राज्य प्राप्त होगा।
लेकिन हे श्रीकृष्ण ! ये दोनों ही नश्वर हैं। फिर किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये युद्ध किया जाय? इस उदासीन
प्रवृत्ति से धनुषबाण त्याग कर शोकाकुल अर्जुन उस समरांगण में म्लान देह से खड़ा रहा। उस समय उस महान
वीरसिंह का मैंने अनेक युक्तियों से समाधान किया। उसकी कथा सुनो। हे अर्जुन देह नश्वर होने के साथ मलमूत्र
का केवल भण्डारगृह है। कितना ही उपचार करने पर भी वह मरणाधीन तथा क्षणिक है और जीव स्वयंसिद्ध
तथा नित्य होकर निर्मल है। उसे जन्म नहीं, उसे विनाश नहीं, वह अचल, अच्छेद्य, अभेद्य तथा निर्मल है। वह
मूल में ही जड़ है। हे अर्जुन ! अब इसका सच्चा अर्थ समझो। देह तुम्हारे प्रयत्न से बचने वाला नहीं है और जीव
तुम्हारे मारने से मरने वाला नहीं है। उसकी हत्या का पाप लगेगा यह तुम्हारा सोचना केवल अहँभाव है। यदि
तुमने इन सब का निर्माण किया होता, तो तुम उन्हें मार सकते थे। लेकिन बात वैसी नहीं है। इसलिये मैं इन्हें
मारूँगा यह कहने में तुम अभिमान में लिपटे हुए हो ऐसा भास होता है। जो देह का निर्माता होता है वही उसका
संहारक होता है। तुम न निर्माणकर्ता हो और न मारने वाले ही हो, फिर व्यर्थ ही अहंता कष्ट क्यों भोगते हो?
यदि तुम इस अहंता का त्याग नहीं करोगे तो सभी हत्याओं की राशि तुम्हारे पास आयेगी और उसके लिये अर्जुन
तुम दोषी होगे। हे अर्जुन ! सुनो। देहादि कर्मों की अहंता जो अपने माथे पर लेता है वह तीनों लोकों में पूरी तरह
दोषी होता है। अब यदि तुम स्वधर्म के बारे में पूछ रहे हो तो क्षत्रिय का क्षात्रधर्म सुनो। उस क्षात्रधर्म के अनुसार
यदि समरांगण में पितापुत्र एक दूसरे का वध करें तो इसमें क्षत्रियों को दोष नहीं है। युद्ध तो क्षात्रधर्म का एक
तीर्थ ही है। समरांगण में जिसकी मृत्यु होती है वह निजमुक्त ही होता है। यह जो तुम्हें तुम्हारे भाग्य से प्राप्त
हुआ है उसे तुम अनिष्ट मानते हो। कर्तृत्व मानना यह दोष अहंता के मत्थे है। उस देहअहंता का जो स्पर्श नहीं
करता वही कर्म करके भी अकर्ता तथा भोग भोगते हुए भी अभोक्ता है। वही संग में रह कर भी निःसंग है। वह
अकेला ही पूरा संसार है। जो खरा निरभिमानी होता है वह समरांगण का सच्चा वीर है। हे अर्जुन ! तुम यदि
अभिमान छोड़ दो तो मेरे ही समकक्ष हो जाओगे। फिर किसी पाप की वार्ता भी तुम्हें स्पर्श नहीं करेगी। अब वह
अहंता कैसे जाये ? तो निश्चय करके मुझ पर ध्यान केन्द्रित कर स्वधर्म कर्म का आचरण करने से चित्त की शुद्धि
होगी और चित्त शुद्ध होते ही वह मेरे भक्तिमार्ग पर लग जाता है। भजन के योग से मेरे भक्त तत्काल मुझसे
समरस हो पाते हैं। हे अर्जुन ! अभिमान छोड़ने के सम्बन्ध में यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो जन्म-मरण के
भूषण जो सारे दोष हैं वह तुम्हें भोगने होंगे इसे ध्यान में रखो। तुम जो नित्यमुक्त हो, अजन्मा हो, अविनाशी हो
यह तुम्हारी सद्बुद्धि विलय को प्राप्त होगी और फिर देखना। निरन्तर जन्म-मरण का भोग भोगते रहोगे। इसलिये
'करना' और 'न करना' इन दोनों को प्रकृति के सुपुर्द कर तुम काया, वाचा, मनसा मेरी शरण में आओगे तो मैं

४४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तुम्हें किसी भी कर्म का स्पर्श नहीं होने दूँगा। इसलिये, हे अर्जुन ! 'मरने वाला' और 'मारने वाला' इन दोनों
भावनाओं को छोड़कर तुम समरांगण में वीरता दिखलाओ तभी मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। हे अर्जुन ! तुम कर्म
करने वाले हो और मैं तुम्हारा उद्धार करने वाला, इस प्रकार का भेदभाव मेरे शरणागतों में नहीं होता। पहले मुझ
अनन्त की शरण में आना और फिर जीव के नाते अलग रहना यह गुड़ में पत्थर की तरह जीने की तरह है। वह
अनन्यभाव से शरण आना नहीं है। नदी समुद्र की शरण में जाती है तो समुद्र होकर ही रहती है। वह फिर वापस
लौटना भूल जाती है क्योंकि वह समुद्र के साथ एकरूप जो हो जाती है। गंगा एक बार समुद्र स्वरूप होने पर
कोई प्रवाह उसे पीछे की ओर नहीं खींचता। उसी प्रकार अंतर्वाह्य आत्मस्वरूप के साथ तद्रूप होकर मेरा भक्त
दिन-रात निरन्तर मेरी शरण में आया रहता है। दीपक यदि अग्नि से मिलने जाता है तो वह भी अग्नि ही बन
जाता है। उसी प्रकार हे अर्जुन ! जो मेरी शरण में आया वह मत्स्वरूप होकर रह गया। हे अर्जुन ! अब मुक्तों के
लक्षण सुनो। ये जो प्राणीमात्रों के आकार देख रहे हो वे सब मुझ श्रीकृष्ण के ही हैं इस श्रद्धा से जो देखता है
उसे ही ब्रह्मस्वरूप का साम्राज्य प्राप्त होता है। मेरे आत्मस्वरूप में संसार यही सबसे बड़ा भ्रम है। तब 'मैं
मारनेवाला' और 'ये मरने वाले' इस बात को कौन स्वीकार करेगा ? जहाँ मृगजल नहीं होता वहाँ तो सूखा ही
रहता है लेकिन जहाँ मृगजल का आभास होता है वहाँ क्या आर्द्रता रहती है ? उसी प्रकार संसार को रूप-नाम
देकर कल्पना की जाती है लेकिन वास्तव में वहाँ रूप-नाम का अभाव होता है और केवल शुद्ध ब्रह्म ही रहता है
ऐसा जिसका दृढ़ विश्वास रहता है वह देह में विचरण करते हुए भी चलता-फिरता ब्रह्म ही रहता है। देह को
जड़त्व के कारण कर्म की बाधा नहीं होती और आत्मा धर्म-अधर्म को स्पर्श नहीं करता। यह मर्म जिसने जान
लिया वह देह में विचरण करते हुए भी चलता-फिरता ब्रह्म है। देह में .रहते हुए भी वह विदेही है। मैंने अपना
यह गुह्य ज्ञान अर्जुन को बतलाया। इस प्रकार मैंने अनेक युक्तियों से उस युद्ध में अर्जुन को उपदेश दिया। तब
उसने भी तुम्हारी ही तरह मुझसे विनती कर मेरी विभूतियों के बारे में पूछा था। उस समय मैंने अर्जुन को जो
बतलाया वह तुम्हें भी बतलाऊँगा। इस प्रकार उद्धव को आश्वासन देकर वे उसे अपनी विभूतियाँ बताने लगे।
उद्धव मैं स्वयं भी अपनी विभूतियों की गणना नहीं कर सकता। मैं त्रैलोक्य की ही अन्तरात्मा हूँ, मेरी विभूतियों
की गणना कौन करेगा ?
अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः ।
अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥
मैं सर्वसमर्थ हूँ तथा प्रत्येक जीव के हृदय में हृदयस्थ होकर रहता हूँ। मेरे पास जीव जो कुछ भी माँगता है
उसके लिये मैं कभी भी ना नहीं कहता। प्रभु होने के नाते प्रत्येक वस्तु की पूर्ति करता हूँ। जीव संकट के समय
मुझसे जो कुछ माँगता है उसे मैं अत्यन्त असीम मात्रा में देता हूँ। इसीलिये मुझे ईश्वर कहते हैं। मैं आत्मा के
रूप में हृदय में वास करता हूँ इस बात का जिन्हें विश्वास नहीं है वे मृगजल की बाढ़ में नौका के साथ बह गये
ऐसा समझ लो। उसमें नौका बाँधने का कष्ट व्यर्थ हो जाता है। उसी प्रकार कठिन साधन साध कर वे साधनों के
साथ डूब जाते हैं। मुझे प्राप्त करने का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि मैं परब्रह्म हृदय में ही रहता हूँ। यही
जिसका नित्यकर्म है वही मेरी श्रेष्ठ विभूति है। मैं समस्त प्राणीमात्र के हृदय में रहने वाला, मैं सबका 'सुहृद और
सम्बन्धी, भी ईश्वरी सत्ता का नियामक और मैं ही प्राणीमात्र का शासक हूँ। इस प्रकार समस्त प्राणीमात्र का
स्वामी मैं हूँ, यह जो सारे प्राणी हैं वे भी मैं हूँ, प्राणीमात्र की जन्मभूमि का उत्पत्ति स्थान मैं हूँ और उत्पत्ति आदि

सोलहवाँ अध्याय ४४१
क्रियाओं में कर्त्ता मैं हूँ। किसान की तरह मैं निर्माण करने वाला और पालन करने वाला तथा संहार करने वाला
हूँ। भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये अवतार लेने वाला एक मैं ही हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा,
कर्म की क्रियाशक्ति भी मैं ही हूँ। ये साधारण स्वरूप बतलाये। अब विशेष विभूतियों के बारे में सुनो।
अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम्।
गुणानां चाप्यहं साम्यं गुंणिन्त्यौत्पत्तिको गुणः॥१०॥
लक्ष्मीपति बोले, गतिशील में जो गति होती है वह गति मैं हूँ। हे उद्धव ! सचमुच गति की मूल गति मैं हूँ,
यह जान लो। चेतना से ही सबको गति प्राप्त होती है। चेतना से ही इन्द्रियों की प्रकृति होती है। अर्थात् गति की
गति एक मैं ही हूँ। सभी गतियों में श्रेष्ठ गति है प्राणियों को मुक्ति प्राप्त होना। लेकिन उस मुक्ति को भी मेरे ही
कारण मुक्ति प्राप्त होती है। सारांश गतियों की भी गति एक मैं हूँ। देवताओं और मानवों को एक सीमा में रखने
वाली एक काल की सत्ता है। लेकिन सचमुच उस काल को भी मर्यादा में रखने वाला महाकाल मैं हूँ। हे
भक्तिराज ! तीनों गुणों की साम्यावस्था मैं हूँ। अकृत्रिम गुण का जो स्वभावधर्म है, वह भी सचमुच मैं ही हूँ यह
जान लो।
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥११॥
हे उद्धव ! मैं स्वयं को गुणी कहता हूँ क्योंकि मुझ में क्रिया का प्रथम सूत्र प्रधान रहता है। माया का पहला
कार्य मैं हूँ इसलिये सभी गुणों से युक्त मैं ही हूँ। संसार में आकाश सबसे महान है। लेकिन वह भी मुझसे
लुकाछिपि खेलता है। मेरे महत्तत्त्व के चमत्कार की ठीक-ठीक कल्पना मुझे ही निश्चित रूप से नहीं होती।
नारायण बोले, ज्ञान प्रधान जो महत्तत्त्व है वह मैं हूँ। सूक्ष्म में ब्रह्मदेव आदि भी जिसका आकलन नहीं कर पाते
वह जीव मैं हूँ। अजेय वस्तुओं में मन मैं हूँ। उस मन को जीतने के लिये मेरे सिवाय किसी में पूर्ण सामर्थ्य नहीं
है। मेरा स्मरण करने से मन स्थिर होता है और मुझे भूलने से मन विचलित होता है। वेदशास्त्र के बल पर मन
का आकलन नहीं होता। मैं ही मन हूँ। मेरा चिन्तन करने में उसका विलय हो जाता है और मुझे भूलने से वह
इधर-उधर भटकने लगता है।
हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत्।
अक्षराणामकारोऽस्मि पदानिच्छन्दसामहम्॥१२॥
गोविन्द ने कहा कि वेदों का अध्ययन करने वाला प्रसिद्ध जो ब्रह्मदेव है वह मैं हूँ। मेरे ही कारण वेदों का
उल्लंघन नहीं किया जा सकता। वेदों के सम्बन्ध के विचार भी मैं ही हूँ। ओंकार के अतिरिक्त जितने भी मंत्र हैं
वे सब बच्चों की कहानियों की तरह निष्फल हैं। मैं श्रीकृष्ण ही मंत्र का ओंकार है। उसके ही कारण सारे मंत्र
पावन हो गये। अकार, उकार और मकार इनका अर्थ, मात्रा के साथ जो उच्चार है वही त्रिवर्णात्मक ओंकार है।
इसके ही कारण मंत्र पावन होते हैं। किसी भी अक्षर के उच्चार के लिये अकार आवश्यक होता है। उद्धव ! वह
अकार भी मैं श्रीकृष्ण ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक समझ लो। श्रीकृष्ण ने कहा, छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ इसलिये
ब्रह्मवृंद उस गायत्री मंत्र का सेवन करते हैं। श्रीकृष्ण बोले, सभी छन्दों में प्रमुख जो गायत्री छंद है वह तथा सभी
द्वंद्वों में जो निर्द्वंद्व है, वह मैं हूँ। उस गायत्री मंत्र के ही कारण ब्रह्मवृंद मुझे पूजनीय बन गये हैं।

४४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट्।
आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥
देवताओं में इन्द्र मैं हूँ, वसुओं में अग्नि मैं हूँ, आदित्यों में वामन मैं हूँ और रुद्रों में नीललोहित मैं हूँ।
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनुः।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु ॥ १४ ॥
मैंने ब्रह्मदेव को शाप देकर उसे पूजा के अयोग्य कर दिया। शंकर का नैवेद्य भक्षण करने के लिये निषिद्ध कर
दिया, भृगु ने विष्णु के हृदय पर लात से मारा और उस लात के चिह्न के रूप श्रीवत्सचिह्न ने भृगु के माहात्म्य का
वर्णन किया। श्रीकृष्ण बोले, ब्रह्मर्षि में पूज्य हुआ वह भृगुऋषि मैं हूँ और मनु के रूप में मैं स्वयं श्रेष्ठ राजर्षि बन
गया हूँ। श्रीकृष्ण बोले, देवर्षियों में नारदमुनि मैं ही हूँ। कामधेनु भी मेरा अत्यन्त पवित्र और प्रसिद्ध स्वरूप है।
सिद्धेश्वराणां कपिलः सुपर्णोऽहं पतत्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा ॥ १५ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सिद्धों में मुनिश्रेष्ठ कपिल मैं हूँ। पक्षियों में गरुड़ के रूप में रहने वाला पक्षीराजा मैं हूँ।
कृष्ण ने कहा, प्रजापति में मुख्य दक्ष मैं हूँ और पितृगण में श्रेष्ठ अर्यमा तो मेरा ही स्वरूप है।
मां विद्ध्युद्धव दैत्यानां प्रह्लादमसुरेश्वरम्।
सोमं नक्षत्रौषधीनां धनेशं यक्षरक्षसाम् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, भक्ति के सामर्थ्य से दैत्यों में अत्यन्त महान प्रह्लाद मैं हूँ। उसी प्रकार नक्षत्रों का और
औषधियों का स्वामी जो चन्द्रमा है वह भी मेरा ही स्वरूप है। यक्ष राक्षसों में श्रेष्ठ कुबेर भी भी मेरा ही स्वरूप
है। उसके विश्वास पर श्रीकृष्ण का भण्डार सदा उसके पास रहता है।
ऐरावतं गजेन्द्राणां यादसां वरुणं प्रभुम्।
तपतां द्युमतां सूर्यं मनुष्याणां च भूपतिम् ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा, गजेन्द्रों में जो ऐरावत है वह मैं हूँ, जलचरों का राजा जो वरुण है वह मेरा ही स्वरूप है।
श्रीकृष्ण बोले, अपनी प्रभा से निरन्तर प्रकाश देने वाला, संसार को प्रकाशित कर देदीप्यमान लगने वाला तथा
अपने तेज से अत्यन्त प्रखर दिखायी देने वाला सूर्य मैं हूँ। मनुष्यों में जो पृथ्वी का उपभोग करता है, सारी भूमि
जिसके हाथ में रहती है, जिसे राजा कहते हैं वह मेरा ही स्वरूप है।
उच्चैः श्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम्।
यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥
नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम्।
आश्रमाणाामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥ १९ ॥
श्रीकृष्ण बोले, सारे अश्वों में श्रेष्ठ जो उच्चैःश्रवा है वह मैं हूँ और जिसके लिये सारा त्रैलोक्य प्रयत्नशील
रहता है वह सुवर्ण धातु मैं हूँ। श्रीहरि कहते हैं, नागों में जो अनंत यह नाम धारण करता है वह नाग मैं हूँ।
नाखून, दाढ़ें तथा सींग धारण करने वाले जो चौपाये हैं उनमें सिंह मैं हूँ। नारायण ने कहा, चारों आश्रमों में जो

सोरहवाँ अध्याय ४४३
संन्यास है वह मैं हूँ। वर्णों में श्रेष्ठ तथा चलता फिरता जो ब्रह्म है वह ब्राह्मण मैं हूँ।
तीर्थानां स्रोतसां गङ्गा समुद्रः सरसामहम्।
आयुधानां धनुरहं त्रिपुरघ्नो धनुष्मताम् ॥ २०॥
श्रीरंग बोले, पवित्र नदियों में गंगोदक मैं हूँ। सरोवरों में श्रेष्ठ जो समुद्र है वह पूर्णरूप से मैं हूँ, ऐसा
श्रीकृष्ण ने कहा। शस्त्रों में धनुष नामक जो शस्त्र है, वह मैं हूँ और जिसने त्रिपुरों का संहार किया, वह
त्रिपुरशत्रु धनुर्धर मैं हूँ।
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालयः।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यवः ॥ २१॥
श्रीकृष्ण ने कहा, त्रिभुवन का निवास स्थान जो महामेरु है वह मैं हूँ। चढ़कर जाने में कठिन जो हिमालय
पर्वत है वह भी मैं हूँ ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वृक्षों में पीपल मैं हूँ। औषधियों में प्रसिद्ध जो यव है वह मैं हूँ ऐसा
श्रीकृष्ण ने उत्साह से कहा।
पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब्रह्मिष्ठानां बृहस्पतिः।
स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानजः ॥ २२॥
भगवान बोले, श्रीराम का पुरोहित बनकर नाम कमाने वाले वसिष्ठ मुनि मैं हूँ और वेद वेत्ताओं में अग्रगण्य
श्रेष्ठ देवगुरु वृहस्पति भी मैं हूँ। श्रीकृष्ण बोले, सेनापतियों में श्रेष्ठ जो स्कन्द (कार्तिकस्वामी) है वह मैं हूँ।
स्वधर्मप्रवर्तकों में अग्रगण्य तथा ब्राह्मणों में अत्यन्त पूजनीय ब्रह्मा मैं हूँ।
यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम्।
वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचिः ॥ २३ ॥
और फिर सर्वज्ञ हरि बोले, जिसमें कारण देवता, ऋषि, पितर तथा अन्य प्राणिमात्र और सारा विश्व सन्तुष्ट
होता है वह यज्ञ का ब्रह्मयज्ञ मैं हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा, किसी भी प्राणिमात्र को जिससे दुःख हो ऐसा भाषण नहीं
करना चाहिये ऐसा तो अहिंसाव्रत है वह मैं स्वयं हूँ। किसी को वायु से पवित्रता आती है, किसी को अग्नि से
पावित्र्य आता है, कोई जल से पवित्र होता है तो कोई भाषा से ही पवित्र होता है। कोई बुद्धि से ही पवित्र होते हैं
किन्तु इन सब में पवित्रता नाम की जो वस्तु है वह मेरा ही स्वरूप है। पावन को भी पावन करने वाला एक मैं हूँ
ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। संसार मेरे ही नाम से पवित्र होता है यह सभी मानते हैं। मेरा यह स्वरूप पुनीतों से भी
अधिक पवित्र है।
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम्।
आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४॥
गोविन्द कहते हैं, जिसके कारण साधकों के अंतःकरण में परमानन्द उत्पन्न होता है और सन्तोष की
अनुभूति होती है इस प्रकार का जो योग 'आत्मनिरोध' के नाम से प्रसिद्ध है वह मैं हूँ और हे उद्धव ! मुख्य रूप
से विवेक को साथ लेकर नीति, न्याय से जो विजयी होने की कामना करता है उस नीति की भी नीति मैं हूँ।
गोपाल कहते हैं, केवल आत्मानात्मा का विचार करने वाली जो अध्यात्म विद्या है वह विद्या मैं हूँ। मेरे ही कारण
विवेक की वृद्धि होती है। श्रीकृष्ण बोले, जिसमें विकल्प का अन्त ही नहीं है ऐसे वादों में अखण्ड चलने वाला

४४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वाद मैं हूँ। अन्य कौन से विकल्प हैं, वह भी सुनो। हे उद्धव! आख्याति, अन्यथाख्याति, सत्ख्याति तथा
अनिर्वचनीय ऐसे जो प्रख्यात हैं वे वाद मैं हूँ।
स्त्रीणां तु शतरूपाहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः।
नारायणो मुनीनां च कुमारी ब्रह्मचारिणाम्॥ २५ ॥
जनार्दन बोले, शतरूपा और मनु ये दोनों मैं ही हूँ। सदासर्वदा बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों में नारायण
मैं हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं, सचमुच हे उद्धव! निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर रहने वाले सनत्कुमार भी
मेरा ही स्वरूप हैं यह जान लो।
धर्मानामस्मि संन्यासः क्षेमानामबहिर्मतिः।
गुह्यानां सूनृतं मौनं मिथुनानामजस्त्वहम्॥ २६ ॥
समस्त प्राणिमात्र को अभयदान देने की परम्परा चलते रखना, सारे प्राणियों में आत्माराम मैं हूँ, यह
समझना यही संन्यास का मुख्य धर्म है। पुरुषोत्तम कहते हैं कि वह धर्म स्वयं मैं हूँ। काया, वाचा अथवा मन से
किसी भी प्राणी को दुःख न देना यही संन्यासधर्म कहलाता है। गोविन्द बोले वह संन्यासधर्म मैं हूँ। अंतःकरण में
शुद्ध बोध हुए बिना, ओंठ भींचकर द्वंद्व सहन करना इसे क्षमा नहीं कहते। क्षमा का स्वरूप सुनो। पुरुषोत्तम कहते
हैं, अंतःकरण में सचमुच परब्रह्म अंकित होकर जो बाह्य रूप में प्राणिमात्र से समान भाव से आचरण करता है
वही वृत्ति क्षमा है। वह क्षमा मैं हूँ। जिसके पास क्षमा रहती है उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सहनी होती। सारे संसार
में असत्यवादी मनुष्य ही पापी है। असत्य में करोड़ों पाप भरे रहते हैं। असत्य की बात झूठी होती है। उस पर
कोई ध्यान नहीं देता। बहिर्मुखता को असत्य ही जानो व इस लोक में या परलोक में भी खोटे सिक्के की तरह
है। जिसने मन से उसका त्याग किया उसका मैं श्रीकृष्ण भी वन्दन करता हूँ। सत्य भाषण करना अथवा
मनःपूर्वक मौन धारण करना यही गुह्य में सबसे बड़ा गुह्य है। श्रीकृष्ण ने कहा कि वह गुह्य मैं हूँ। सत्य पर प्रेम
रखना यही मेरा आत्मगुह्य है। ब्रह्मदेव का देह मनु और शतरूपा के रूप में विभाजित हुआ। नारायण कहते हैं,
वह एकनिष्ठा से मनुष्यसृष्टि उत्पन्न करने वाला जोड़ा मैं ही हूँ।
संवत्सरोऽस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्॥ २७॥
श्रीकृष्ण कहते हैं, एक पल की भी गलती किये बिना निरन्तर सावधान रहने वाला संवत्सर काल मैं ही
हूँ। त्रसरेणु से संवत्सर तक लव, निमिष, दिन आदि की कालगणना मैं संकर्षण सावधानी से करता हूँ। कृष्ण
कहते हैं, मधु-माधव इन दो महीनों का जो वसन्त ऋतु है वह मैं हूँ। सारे महीनों में अनाज को परिपक्व स्थिति
में लाने वाला सुहाना मार्गशीर्ष माह मैं हूँ। पंचांग में जिसकी गणना नहीं हो सकती, नक्षत्रों में होते हुए भी जो
सर्वथा गुप्त है, अदृश्य होते हुए भी जो ज्ञानी लोगों को मिल जाता है, वह अभिजित नक्षत्र मैं हूँ, ऐसा श्रीकृष्ण
करते हैं।
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोऽसितः।
द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान्॥ २८॥
श्रीरंग कहते हैं, जिस युग में सभी धर्म व्यवस्थित ढंग से चलते हैं, अधर्म का जरा भी अंश नहीं होता, वह