श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 447, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें रुचि रहती है वह ऋद्धि-सिद्धि की कामना नहीं करता। जिसे लोगों में मान-सम्मान पाने में बड़प्पन मालूम
होता है वही सिद्धियों के लिये प्रयास करता है। जिसे मेरी प्राप्ति की ही चाह रहती है वह सिद्धि के पीछे नहीं
भागता। काशी जाते समय कोई किसी वेश्या के घर ठहर जाता है और उसके भोग विलास पर लुब्ध होकर
अपना सारा धन उसे अर्पण कर देता है। अब जब तक प्राण है तब तक इसे नहीं छोड़ूँगा ऐसा निश्चय कर वह
उस वेश्या का लंपट हो जाता है। जब तक उसके पास धन है तब तक वह वेश्या उसके आगे-पीछे करती रहती
है लेकिन जब उसके पास एक कौड़ी भी नहीं रह जाती तब उसे घर से निकाल देती है। अगर इतने पर भी वह
घर नहीं छोड़ता तो वह स्वयं उसे छोड़कर चली जाती है। उसी प्रकार महासिद्धियों की स्थिति है। सारे पापों का
क्षालन करने, सारे कुलों का उद्धार करने के लिये काशी जाना तो दूर रहा, उलटे कामलोलुप होने के कारण
वेश्या के हाथों सारी कमाई भी चली गयी। सिद्धियों की कथा भी वैसी ही है। वे मेरी प्राप्ति में बाधक होती हैं
और साधक को मेरे ध्यान, ज्ञान और वैराग्य से वंचित कर उसे कंगाल बना देती हैं। मेरी प्राप्ति के पास ही
उनकी लूट-खसोट जारी रहती है। उसे सुखोपभोग का लालच देकर छलने के लिए उसके मन में मोह उत्पन्न
करती हैं। मेरी प्राप्ति में विलम्ब होने का यही कारण रहता है। हे उद्धव ! मेरा स्वरूप अद्वैत है और उसमें सिद्धि
के जो अनेक रूप दिखायी देते हैं वह सचमुच माया का भुलावा है। मेरी प्राप्ति में सिद्धियों का विघ्न आड़े आता
है इसलिये मैंने सभी सिद्धियों का स्वरूप तुम्हें सविस्तार बताया। मेरा ध्यान कर उसमें मन की एकाग्रता होने पर
यदि साधक सुखोपभोगों के चक्कर में फँस गया तो सिद्धियाँ उसे लूट लेती हैं।
जन्मौषधितपोमन्त्रैर्य्यावतीरिह सिद्धयः।
योगेनाप्नोति ताः सर्व्वानान्यैर्य्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४॥
जन्म, औषधि, मंत्र, तप आदि से भी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं अथवा योगाभ्यास करते समय प्राणापान साध्य
होने पर भी सारी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। कुछ को जन्म से ही सारी सिद्धियाँ प्राप्त रहती हैं तो कोई दिव्य
वनस्पतियों की सहायता से सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं। कुछ लोग तप आदि महान साधनों से सिद्धि प्राप्त करते हैं
तो कुछ उन्हें मंत्रों द्वारा साध्य करते हैं। सर्प को वायु भक्षण, मत्स्य के लिये जल में तैरना, पक्षी के लिये आकाश
में उड़ना ये सिद्धियाँ जन्म से ही प्राप्त रहती हैं। हंस पानी और दूध को अलग करता है, कोकिला मधुर स्वर में
गायन करती है, चकोर चंद्रामृत का सेवन करता है ये सिद्धियाँ भी उन्हें जन्म से ही प्राप्त रहती हैं। इस प्रकार
जन्म से ही जो सिद्धियाँ प्राकृतिक रूप में प्राप्त होती रहती हैं उनके सम्बन्ध में तुम्हें भली-भाँति बतलाया। अब
कुछ दिव्योषधियों का सेवन करने से भी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो। श्वेत मदार
के पेड़ के नीचे गजानन की पूजा कर अंगार की चतुर्थी का व्रत करने से सारी विद्याओं का ज्ञान हो जाता है और
धनधान्य की समृद्धि होती है। अजान वृक्ष की पहचान यही है कि उसके फल कुत्ते के मुँह जैसे होते हैं। उस
वृक्ष का दूध पीने को मिल जाय तो वह व्यक्ति अजर-अमर हो जाता है। नीम का सेवन करने से विष का प्रभाव
नहीं होता। पाताल गरुड़ी नामक वृक्ष विशेष का मुख प्राशन करने से कोई शारीरिक पीड़ा नहीं होती। पूतिका
वृक्ष का मूल तो महाशक्ति का पुतला है। उसे साध्य करने पर साधक तत्काल अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करने
लगता है। इस प्रकार औषधियाँ भी अनेक हैं और सिद्धियाँ भी अनंत हैं। लेकिन उन्हें साध्य करना भी बहुत
कठिन है। हे बुद्धिमान उद्धव ! तपादि सिद्धियों का विधि कैसा होता है यह भी सुनो। कृच्छ्र, पराक, चांद्रायण
आदि व्रत करना, पर्जन्य की धाराओं में बैठना, पानी में खड़े रहना, धूम्रपानादि साधन आदि जो भी तप हैं,