श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करवा सकता है अथवा मूशक के हाथों इन्द्र का विनाश करा सकता है। इस प्रकार वह किसी को मरवा देता है,
किसी को पुनः जीवित करता है और अचेतन को भी सचेतन कर देता है। इस प्रकार का ईशत्व (ईश्वरत्व) प्राप्त
होना यह इस सिद्धि का माहात्म्य है।
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते।
मनो मय्यादधद् योगी मद्धर्मा वशितामियात् ॥ १६॥
जीव, शिव और प्रकृति इससे परे जो चौथी स्थिति है जिसे ज्ञानी लोग 'नारायण' कहते हैं, उसी प्रकार
जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इनसे भिन्न जो तुरीयावस्था है उसे भी ज्ञानी 'नारायण' ही कहते हैं। दृश्य, द्रष्टा और
दर्शन इनसे परे जो चौथा पुरुष है उसे भी लोग स्वानुभव से 'नारायण' ही कहते हैं। जो वस्तु त्रिपुटी के अन्दर
होते हुए भी त्रिपुटी से भिन्न है और जो त्रिपुटी से अलिप्त रहने वाला है वह मैं सुप्रसिद्ध नारायण हूँ। यश, श्री,
वैराग्य, ज्ञान, ऐश्वर्य और औदार्य ये छह गुण जिसमें पूर्ण रूप से निवास करते हैं वह नारायण भगवान मैं हूँ।
नारायणरूपी मेरा ध्यान करने से मेरी 'वशिता' नामक सिद्धि प्राप्त होती है। सारे कर्मों में रहते हुए वह अलिप्त
रहता है और सारे भोग भोग कर भी अभोक्ता रहता है।
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते ॥ १७॥
सत्त्वगुण चित्त की देवता है, इन्द्रियाँ रजोगुण हैं और विषय केवल तमोगुण है जो परमानन्द को आवृत्त कर
देते हैं। ये ही तीन गुण परमानन्द पर आवरण बन कर छा गये हैं। उन्हें छोड़कर मेरे निर्गुण और परिपूर्ण ब्रह्म का
जो ध्यान करता है उसे परमानन्द की ऐसी प्राप्ति होती है जिसमें समस्त इच्छाओं का लोप हो जाता है। परमानन्द
की प्राप्ति होने पर सारी इच्छाएँ लुप्त हो जाती हैं। सूर्योदय होते ही जिस प्रकार चन्द्रमा के साथ सभी नक्षत्र लुप्त
हो जाते हैं उसी प्रकार परमानन्द के उदर में इच्छाओं की शशियाँ लुप्त हो जाती हैं। उस समय इन्द्रिय सुख की
बातें लजा कर वहीं विलुप्त हो जाती हैं। हे उद्धव! सुनो। परमानन्द प्राप्ति के बिना कैसी भी युक्तियाँ क्यों न की
जाएँ लेकिन उससे काम की निवृत्ति कभी नहीं होगी। इन अष्टमहासिद्धियों की धारणा मैंने तुम्हें बता दी। इन
सिद्धियों को साध्य करने का सामर्थ्य देवता, मनुष्य आदि के पास नहीं है। इस प्रकार इन आठ महासिद्धियों की
धारणाविधि मैंने तुम्हें बता दी। अब गुणहेतु का प्रबोध सावधानी से सुनो।
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।
धारयञ्श्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः ॥ १८॥
रजतम कार्यों से दूर होकर सत्त्वगुण का अभिमानी मैं श्रीहरि उसकी जो विश्वव्यापकता से धारणा करेगा वह
मेरे ही सत्त्व से सम्पन्न होकर षडूर्मिरहित होगा और उसे शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, तृषा आदि स्पर्श नहीं करेंगे।
मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन्।
तत्रोपलब्ध्वा भूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ १९॥
नाद के साथ शब्दों का माहात्म्य विश्रांति के लिये आकाश में अवश्य आना ही चाहिये। उस आकाश का
भी आत्मा मैं हूँ। आकाश का वास भी मुझमें ही है। हे उद्धव! सचमुच ही मैं नाद के साथ प्राणों का भी प्राण,
वाणी की भी वाणी, सरस्वती का जीवन हूँ यह जान लो। मेरा जो दृढ़तापूर्वक ध्यान अपने हृदय में करेगा वह