श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् मैं हूँ यह जिसने मान लिया उसकी आज्ञा को श्रेष्ठ देवता भी शिरसांवद्य मानते हैं। अर्थात् पशु-पक्षी भी
उस आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे। जिस प्रकार मेरी आज्ञा सब पर चलती है उसी प्रकार उसकी आज्ञा भी पूरे
चराचर पर चलती है। उसकी आज्ञा का कोई रत्तीभर भी उल्लंघन नहीं करता। ऐसी वास्तविक 'आज्ञासिद्धि' उसे
प्राप्त होती है। अब जो पाँच क्षुद्र सिद्धियाँ हैं उसके बारे में भी तुम्हें बताता हूँ।
मद्भक्त्या शुद्धसत्त्वस्य योगिनो धारणाविदः।
तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्युपबृंहिता ॥ २८॥
संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय सचमुच मेरे ही अधीन है। मेरा भजन करने से अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध
हो जाता है। शुद्ध हुए उस अन्तःकरण में भूत, भविष्य और वर्तमान तथा सांसारिक जन्मभोग और मृत्यु आदि का
त्रिकालज्ञान होने की सिद्धि प्राप्त होती है।
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः।
मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा॥ २९॥
चित्त जब अत्यन्त प्रयास करता है तब कहीं मेरा उससे संयोग होता है। चित्त का मेरे साथ योग होने पर
शरीर भी योगयुक्त हो जाता है और उस शरीर को बड़े-बड़े द्वंद्वों से भी बाधा नहीं होती। उसे शीत अथवा ऊष्मा,
मुलायम अथवा कठोर की बाधा नहीं होती। देह में अग्नि का स्पर्श होने पर भी वह नहीं जलता। जिस प्रकार
जलचर जल में निश्चिंत होकर विचरण करते हैं उसी प्रकार वह भी अग्नि में विश्राम करता रहता है। उसे
'अद्वंद्वता' नाम की यह सिद्धि प्राप्त होती है। इसी.सिद्धि की धारणा से 'प्रतिष्ठभं' नामक सिद्धि उत्पन्न होती है।
सारी बाधाओं से मुक्त करने का व्रत जिसने लिया है उस 'प्रतिष्ठभं' नामक सिद्धि का लक्षण सुनो। उसे बाहर के
वायु के झंझावात से कभी पीड़ा नहीं होती। वह प्राणों को भी जीत कर उसे दासी बना लेता है। डंठल निकाले
हुए फूलों की शय्या पर जैसे कोई शयन करता है उसी प्रकार वह धधकते अंगारों पर सोता है। उसे उस अग्नि से
पीड़ा नहीं होती। जाड़े के दिनों में सिद्ध को ठंडे पानी में डुबोने से भी वह बाहर निकलने के लिये नहीं
छटपटाता। जिस प्रकार मछली जल में खेलती है उसी प्रकार वह मौज से क्रीड़ा करता रहता है अथवा ग्रीष्मऋतु
में तपती धूप में यदि सिद्ध को रख दिया जाय तो जिस प्रकार सूर्यकिरणों से कमल प्रफुल्लित होता है उसी प्रकार
धूप लगने से वह अधिक ताजा हो जाता है। सूर्य के ताप से उसे जरा भी बाधा नहीं होती। उसी प्रकार सिद्ध को
शस्त्र के घाव से भी पीड़ा नहीं होती। शस्त्र यदि आकाश पर घाव करने का प्रयास करे तो वह प्रयास व्यर्थ जाता
है उसी प्रकार सिद्ध को शस्त्र के प्रहार से घाव नहीं लगता। सिद्ध को विष देने पर वह विष भी उसे बाधक नहीं
होता। जिस प्रकार विष के कीड़े उसमें सुख से रहते हैं उसी प्रकार वह भी उसमें सुख से रहता है। छाया पर्वत
के नीचे दबी होने पर भी उसे उससे कष्ट नहीं होता उसी प्रकार अग्नि, सूर्य, विष, जल अथवा वायु इनमें से
किसी से भी सिद्ध को बाधा नहीं होती। सिद्धियों की ये बातें सुनकर मन भले ही उल्लसित हो जाय लेकिन मुझे
प्राप्त करने में ये सिद्धियाँ सचमुच ही बाधक हैं। मेरा स्वरूप शुद्ध होते हुए अद्वैत है। उसमें सिद्धि के जो मनोरथ
हैं वे केवल लोकरंजन के लिये हैं। सिद्धियों में परमार्थ नहीं है। पिछले श्लोक के अन्त में 'परचित्ताभिज्ञता'
नामक एक सिद्धि का उल्लेख ध्वनितार्थ में हुआ है, उसका भी लक्षण सुनो। उसी श्लोक में बतलाया गया है कि
भगवान् का ध्यान करते समय प्रकृति का नियंत्रण करने वाला और सबका साक्षी वह स्वयं बन जाता है। ऐसे
ईश्वर का ध्यान करने से चित्त की चालकता ही उसे प्राप्त हो जाती है। तब चित्त की भिज्ञता (ज्ञान) उसे सहज