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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 869 में से

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४३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उनकी मन में भावना कर जैसा आचरण किया जाता है उसके अनुसार उसे सिद्धि प्राप्त होती है। अब मंत्रसिद्धि
का लक्षण सुनो। एक रात प्रेत पर बैठ कर अनुष्ठान करने से प्रेतदेवता पूर्णरूप से प्रसन्न हो जाते हैं जिससे भूत,
भविष्य, वर्तमान आदि सभी ज्ञान की प्राप्ति होती है यह ध्यान में रखो। सूर्यमंत्र का अनुष्ठान करने से दूरदर्शन
सिद्धि प्राप्त होती है। जैसा मंत्र और इच्छा रहती है उसी के अनुसार उसे सिद्धि प्राप्त होती है। किन्तु इन सारी
सिद्धियों की समृद्धि एक योगधारणा में ही होती है। दृढ़ आसन लगा कर प्राणापान में ऐक्य साध कर जो
योगधारणा करेगा उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मैंने तुम्हें सिद्धियों के सम्बन्ध में यह बताया ही है कि
प्राणापान सम होने पर तथा योगधारणा सिद्ध हो जाने पर सारी सिद्धियाँ प्रकट होती हैं अथवा प्राणापान को सम
किये बिना, योगधारणा भी किये बिना, मुझ अकेले को हृदय में रखने से सारी सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं। यदि
सचमुच ही मुझे प्राप्त करना है, तो मेरा अकेले का स्मरण करने से, मुझ अकेले का ध्यान करने से चारों मुक्तियाँ
अपने आप दासी बन जाती हैं। अनेक प्रकार की सिद्धियों का विचार करते रहें तो मेरी सलोकता, सामीप्य अथवा
स्वरूपता प्राप्त नहीं होती, फिर सायुज्यता की क्या बात करें? मेरे जो अत्यन्त शुद्ध भक्त हैं वे मुक्ति को भी धता
बता देते हैं। वे मेरी भक्ति में ही सदा सन्तुष्ट रहते हैं और वही मुझे पूज्य हैं। सभी सिद्धियों का ईश्वर मैं हूँ,
लेकिन मैं भी उनकी पूजा करने लगता हूँ। इसलिये वहाँ जो सिद्धियों का मेला लगा रहता है वह अपना साज-
सामान उठा कर भागने लगता है। सभी सिद्धियों के साथ मैं भगवान भक्तों के पास रहता हूँ। यही बात श्लोक के
रूप में श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
सर्वासामपि सिद्धीनां हेतुः पतिरहं प्रभुः।
अहंयोगस्य सांख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम्॥ ३५॥
मैं सारी सिद्धियों का जन्मस्थान हूँ। मेरे ही कारण सिद्धियों को महत्त्व प्राप्त हुआ और मुझमें ही सारी
सिद्धियों का अन्त होता है। इस तरह मैं उनका स्वामी हूँ। जीवात्मा की जो एकता है उस योग का सच्चा स्वामी मैं
हूँ और जिसमें जीवात्मा की वार्ता व्यर्थ है उस ज्ञान का स्वामी भी मैं हूँ। ज्ञानोपदेश करने वाले जो साधु हैं उनका
स्वामी भी मैं हूँ यह प्रसिद्ध ही है। ज्ञानीजनों को मेरे ही उपदेश से ज्ञान का स्पष्ट बोध होता है। वेद उपनिषद्भाग से
उपदेश करता है। मैं गोविंद उस वेद का भी स्वामी हूँ। मेरे बिना उस वेद के उच्चार से एक शब्द का भी उच्चार नहीं
हो सकता। धर्म का अर्थ है ज्ञान का साधन। उसका स्वामी भी मैं हूँ इसे ध्यान में रखो। भीतर और बाहर पूर्णतयः
रहने वाला ज्ञानमय सर्वात्मा मैं हूँ। सर्वात्मा होकर मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ। उद्धव! भीतर और बाहर पूर्णत्व से भरा हुआ
मैं ही हूँ! यह स्थिति मुझमें अपने आप ही किस प्रकार रह गयी है उसे ध्यान से सुनो।
अहमात्माऽन्तरो बाह्योऽनावृतः सर्वदेहिनाम्।
यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा॥ ३६॥
जीवों के जीव में मेरा ही वास है और जीव भी मुझमें खुशी से रह गये हैं। मेरा स्वरूप गुण और माया से
बिलकुल भिन्न तथा असीम है। जिस प्रकार घट आकाश में ही रहता है और उसके भीतर-बाहर आकाश ही
रहता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव के भीतर और बाहर परिपूर्ण भरा हुआ श्रीकृष्ण मैं ही हूँ। समस्त भौतिक
वस्तुओं को जिस प्रकार पंचमहाभूत भीतर और बाहर से घेरते हैं, उसी प्रकार मैं श्रीकृष्ण ने भी सारे संसार को
भीतर और बाहर से घेर रखा है। लहरों को जैसे पानी और गुड़ को माधुर्य घेरे रहता है उसी प्रकार इस अनंत
कोटि ब्रह्माण्डों को भी मैंने परिपूर्णता से व्याप रखा है। मुझ जैसे परिपूर्ण की प्राप्ति का प्रसंग निकट आता है