श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय ४२५
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन्।
कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥१२॥
वायु आदि प्राण की तरह सूक्ष्म तत्त्व हैं, जिनसे कालसूत्र का मापन किया जाता है वह परमाणुस्वरूप
भगवान ही है। जो सदा एकनिष्ठा से उसी का ध्यान करेगा, उस परमाणुस्वरूप ध्यान की ऐसी महिमा है कि
उसके कारण देह को हलकापन प्राप्त होता है। वह मशक पर चढ़ कर आकाश में भ्रमण करता है। अणिमादिक
जो तीनों धारणायें हैं वे इस देह की ही सिद्धियाँ हैं, यह ध्यान में रखो। वे ही इस देह में सूक्ष्मता, जड़ता और
हलकापन आदि लक्षण उत्पन्न करती हैं। हे बुद्धिमान उद्धव! अब जो शेष पाँच महासिद्धियाँ हैं उनकी धारणा
विधियाँ भी बताता हूँ। सुनो।
धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।
सर्वेन्द्रियानामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३॥
मूल रूप से जो अहंकार रहता है जिससे इन्द्रियों के समस्त विकार उत्पन्न होते हैं और इन्द्रियों का आश्रय
भूत, उन्हें चेतना प्रदान करने वाला, ऐसा देवाधिदेव ईश्वर जो मैं हूँ उसका ध्यान करने से इन्द्रिय के अधिष्ठान में
जो देवता होते हैं उनसे एकात्मता होकर उसमें इन्द्रियप्रकाशक धर्म का उदय होता है। इस कारण से इन्द्रियों के
जो व्यापार चलते रहते हैं वे सब वह स्वयं वहां प्रकट होकर देखता रहता है। इन्द्रियप्राप्ति की सिद्धि का इतना
वैभव वह साध्य कर लेता है। इससे जिन-जिन इन्द्रियों का व्यापार वहाँ चलता रहता है वह सब उसने ही किया
है ऐसा उसे प्रतीत होता है। उसे 'इन्द्रियप्राप्ति' नामक सिद्धि कहते हैं।
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।
प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यंमे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४॥
यह जो महत्तत्त्व है उसे ही माया का प्रथम स्फुरण समझ लो। इसी को 'सूत्रप्रधान क्रिया' कहते हैं। उसमें
मैं स्वयं जन्मरहित होते हुए भी उस सूत्र का सूत्रात्मा बन गया हूँ। मेरे उस स्वरूप का जो सावधान चित्त से ध्यान
करता है उसे उस सूत्र के प्रकाश के प्रवाह से ब्रह्माण्ड और हिरण्यगर्भ भी प्रकाशमान हो जाते हैं, वह प्रकाशकता
ही वश में हो जाती है। इस प्रकार के निदिध्यास से वह सूत्रात्मा को देखता रहता है। उस निदिध्यास में ही वह
कोटि ब्रह्माण्डों का निर्माण कर सकता है। इतनी उत्तम प्रकाश सिद्धि साधकों को मेरे सिवा प्राप्त नहीं होती।
विष्णौ त्र्यधीश्र्वरे चित्तं धारयेत् कालविग्रहे।
स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनाम् ॥ १५॥
माया आदि त्रिगुणों का नियंता, कलिकाल का आकलन करने वाला, उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने
वाला और जो सचमुच अंतःकरण में वास करता है उस विष्णु का अर्थात् मेरा जो निरन्तर ध्यान करता है उसे
ईशत्व प्राप्त होने के कारण अदृश्य वस्तुओं को देखने का सामर्थ्य भी प्राप्त हो जाता है। शतरंज का मिथ्या खेल
खेलने वाला मोहरों की गति अच्छी तरह जान लेता है उसी प्रकार संसार का अनुभव मिथ्या होते हुए भी वह
जीवों की हलचल स्वयं समझ सकता है। वह जीव आदि शरीर की प्रेरणा स्वयं कर सकता है। इस प्रकार
अंतर्यामी नारायण का ध्यान करने से इतनी सिद्धि प्राप्त होती है इसे ध्यान में रखो। वह अपने प्रताप के सामर्थ्य
से मशक से पर्वत के टुकड़े करवा देता है। किसी दुर्बल के हाथों सृष्टि का विनाश करवा कर पुनः उसकी रचना