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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 869 में से

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पृष्ठ 443

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२७
स्वयं विचित्र वाचाओं का श्रवण करेगा। अंतकरण में मेरी सनाद धारणा करने से संसार की गुप्त बातें भी उसके
कर्णपटल पर आती हैं। उस समय दूरश्रवण सिद्धि साद्य होती है।
चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि।
मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ॥ २०॥
मैं ही सूर्य हूँ यह जान कर जो आँखों में मेरा ध्यान करता है तब आँख ही मद्रूप होकर स्वयं सूर्यस्वरूप हो
जाती है। इस प्रकार नेत्र, सूर्य और मैं इन तीनों की एकात्मता होते ही वह स्वयं वहाँ सूक्ष्म द्रष्टा बन जाता है
और सारे संसार को देखने लगता है। अपने ही स्थान पर बैठकर वह चौदह लोकों का दर्शन एक ही समय ले
सकता है। यही 'दूरदर्शन' सिद्धि है।
मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु वायुना।
मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः॥ २१॥
मन अत्यन्त गतिमान है। उस मन का भी मन मैं हूँ यह ध्यान में रखो। उस मन को प्राणायाम के साथ
ध्यानधारणा द्वारा मुझमें एकरूप करना चाहिये उस ध्यान धारणा के प्रभाव से देह को मनोवेग से इधर-उधर गमन
करने की शक्ति प्राप्त होती है। संकल्प से ही जिधर मन जाता है वहाँ देह का भी गमन होता है। यही मनोजव
सिद्धि है यह जान लो। उसकी ध्यान धारणा का ढंग इस प्रकार है।
यदा मन उपादाय यद् यद् रूपं बुभूषति।
तत्तद् भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रयः ॥ २२॥
पहले मनोजवसिद्धि की धारणा कर बाद में मेरी धारणा करनी चाहिये। उस भावना में मेरा अतर्क्य सामर्थ्य
है। वह भी मेरे शरीर में है, इसकी जो कल्पना करता है उसे मेरी अनेक रूप धारण करने की तथा बाद में उन्हें
विसर्जन करने की सत्ता प्राप्त होती है। इस प्रकार मेरी ध्यान धारणा करने से मेरा सामर्थ्य उसके मन को प्राप्त
होता है। फिर वह जिस स्वरूप की कल्पना करता है उसे वह स्वयं प्राप्त कर लेता है। देव, मनुष्य अथवा नाग
इनमें से जिसका भी स्वरूप धारण करने का संकल्प करता है, वह रूप उसे तत्काल प्राप्त हो जाता है। यह मेरी
कामरूपसिद्धि है।
परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत्।
पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ २३॥
परकाया प्रवेश करते समय देह के सभी प्राणों को नियंत्रित कर जिस देह में प्रवेश करना हो उसमें अपनी
भावना धारण करनी चाहिये। उस समय लिंगदेह में जीव और प्राण की एकात्मता होकर देहांतर की अहंता
बाह्यवायु के मार्ग से मिल जाती है। वह इस देह का अभिमान छोड़कर उसमें जाकर मिलते ही उस देह में प्रवेश
कर 'मैं' कह कर उठ खड़ी होती है। जिस प्रकार भ्रमर वायु के वेग से एक कमल से दूसरे कमल में प्रवेश
करता है उसी प्रकार जीव भी अपना शरीर छोड़ कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। अब मेरे स्वरूप की
ध्यानधारणा कैसी होती है, उसका भी श्रवण करो। मेरे स्वरूप का दृढ़ ध्यान करने से पूरे शरीर में तू ही है ऐसा
आभास होता है। अपने पहले देह को छोड़े बिना दूसरे देह में इस प्रकार प्रवेश होता है। अब अपनी ही इच्छा से
किस प्रकार देह का त्याग किया जाय इसके लक्षण नारायण ने अगले श्लोक में निरूपित किये हैं।