श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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ही प्राप्त हो जाती है। तब चित्त की भिज्ञता (ज्ञान) उसे सहज ही प्राप्त हो जाती है। जिस समय जीव की
स्वप्नावस्था वह साक्षी होकर देखता रहता है उस समय उसके मन में जो भी संकल्प चलता रहता है उसे वह
जानता रहता है। उसके अंतःकरण में चल रही गुप्त चाह के सम्बन्ध में भी वह सहजता से बात कर सकता है।
इस सिद्धि का लाभ उसे तत्काल प्राप्त होता है।
मद्दिभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्त्रविभूषिताः ।
ध्वजातपत्रव्यजनैः स भवेदपराजितः ॥ ३० ॥
'अपराज' सिद्धि प्राप्त करनी हो तो मेरी मूर्ति का ध्यान करें। जिसका नाम लेकर बड़े-बड़े देवतागण भी
निश्चित रूप से विजय प्राप्त करते हैं- चतुर्भुज, मेघ जैसा श्यामवर्ण, शंख, चक्र, गदा, पद्म, छत्र, चामर,
अबदागीर, ध्वज पर उत्तम गरुड़ शोभायमान रत्नजड़ित डंडे की खनकार से पंखा झल रहा है, पैरों में पैंजनियाँ
बज रही हं और असंख्य शत्रु पैरों तले शरणागत आये हुए हैं। मेरी ऐसी मूर्ति का ध्यान जो दक्षतापूर्वक करेगा
वह सर्वत्र विजयी होगा और मेरे प्रताप से वह कहीं भी पराजित नहीं होगा। देखो! मेरे ही ध्यान से वह बिना
किसी की सहायता लिये अकेले ही विजय प्राप्त करता है। केवल इतनी निष्ठा से ही यह सिद्धि प्राप्त होती है।
मुझ जैसे अजीत को जो अपने हृदय में धारण करता है वह सर्वत्र अजेय रहता है। इतना कह कर भगवान ने
सिद्धियों के वर्णन का उपसंहार किया।
उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः।
सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ ३१॥
मैंने जिन-जिन योगधारणाओं के सम्बन्ध में बताया उनका उन भावनाओं के साथ जो भजन करेगा, उसे
उन सिद्धियों की प्राप्ति पूर्वकथित लक्षणों के अनुसार होगी। अथवा चित्त में अनेक स्वरूपों का ध्यान करने से
उन-उन धारणाओं के अनुसार हे उद्धव ! उसे भी अनेक सिद्धियों की प्राप्ति होगी। इस प्रकार जिससे एक ही
धारणा से अनेक धारणाओं की सिद्धि प्राप्त हो ऐसी धारणा के बारे में तुम्हें बताता हूँ।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः ।
मद्दारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ ३२॥
पाँच-पाँच इन्द्रियों की जो जोड़ी है, उसे शमदम के बल से जीत कर, वैराग्य की पताका फहरा कर प्राण
अपान पर विजय प्राप्त की और विवेक के बल से वृत्ती को संयत रख कर सदा मेरा भजन करने से मन को भी
जीता जाता है। इस प्रकार साधक को अपने मन में धारणा कर रात दिन केवल मेरा ध्यान करने से समस्त
सिद्धियाँ उसकी दासी बन जाती हैं। सारे उपाय छोड़कर केवल मेरा ही ध्यान करने से उस साधक के पास किस
चीज की कमी होगी ? और सिद्धियों की दुर्लभता भी कहाँ रह जाती है ? मेरा भजन करने से साधक को सिद्धियाँ
अवश्य प्राप्त होती हैं किन्तु उनका उपभोग करना उचित नहीं है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्तरायान् वदन्त्येता युञ्जतो योगमुत्तमम्।
मया सम्पद्यमानस्य कालक्षेपणहेतवः ॥ ३३ ॥
मेरी प्राप्ति शीघ्र हो जाती है। लेकिन उस समय यदि सिद्धि पर मन आ जाय तो मेरी प्राप्ति में बाधा
उपस्थित होगी। जिसकी विषयभोग में आसक्ति होती है वही सिद्धि का लोभ करता है। लेकिन जिसे मेरी प्राप्ति