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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 869 में से

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पृष्ठ 444

४२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पार्ष्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु ।
आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम् ॥ २४॥
देहत्याग करने के लिये योगमार्ग से प्राण धारण करना यही स्वच्छंद मृत्यु का लक्षण है। इसके लिये प्राणों का
ब्रह्मरंध्रतक जो मार्गक्रमण कराना है उसकी योगधारणा सुनो। गुह्यद्वार के स्थान पर बायें पैर की एडी जोर से दबाकर
बैठाओ और इस प्रकार गुह्यद्वार बन्द कर अपानवायु का अधोगमन बन्द कर दो। हृदय में विचरण करने वाले प्राण
का सदा ऊर्ध्वगमन होता है उसे प्राणायाम से नियंत्रित कर अधोमुख करो। इस प्रकार अपानवायु का नीचे जाना बन्द
होकर वह ऊपर चढ़ कर स्वाधिष्ठान चक्र तक पहुँचेगा और प्राण भी अधोमुख होकर नीचे आते-आते उसी चक्र
तक पहुँचेगा। वहाँ प्राण अपान का समाधान होकर उनका ऐक्य हो जाता है और उन दोनों का मिलन होने से वे
दोनों एकरूप होकर ही आगे के मार्ग का उल्लंघन करते हैं। अपान का अधोमार्ग भी छूट जाता है, प्राण हृदय से
गले की ओर जाता रहता है वह भी नहीं जा पाता और दोनों सुषुम्ना का द्वार खोलकर उसके बिल में से सीधे ऊपर
जाने लगते हैं। इस प्रकार सुषुम्ना को जीत कर वे आगे घुस कर मार्ग में आने वाले छहों चक्रों के परदों को दूर कर
काकीमुख का द्वार खोलकर उसमें से ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाते हैं।`लेकिन वहाँ ठीक तरह से पहुँच जाने पर वर्तमान
देह को छोड़कर जिस देह को धारण करने की उसकी इच्छा रहती है वह देह योगी को प्राप्त होता है। वैकुण्ठ,
कैलास अथवा अमरावती जाने की अथवा सार्वभौम चक्रवर्ती होने की जो इच्छा उसके मन में होती है उस स्थिति
को वह तत्काल प्राप्त कर लेता है। यदि वह ब्रह्मस्वरूप की इच्छा करेगा तो पूर्वदेह का मोह छोड़ कर शुद्ध ब्रह्म के
ध्यान में निमग्न हो जायगा और स्वतः सिद्ध ब्रह्म हो जायगा। इस प्रकार प्राण धारण कर जो प्राण छोड़ता है वही
उसका स्वच्छंद मृत्यु का लक्षण है। कलिकाल भी उसके अधीन रहता है।
विहरिष्यन् सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत् ।
विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्तीः सुरस्त्रियः ॥ २५॥
अथवा यदि देवताओं के दिव्य उपभोगों में योगी का चित्र आसक्त हुआ हो तो उसे उन उपभोगों को प्राप्त
करने के लिए मेरे सत्व की ही धारणा करनी चाहिये। जिस सत्व के योग से मैंने स्वर्ग में देवताओं की स्थापना की
है उस सत्त्वगुण की धारणा वह अपने हृदय में करता है। यदि वह देवांगनाओं की कामना करता है तो उसे स्वर्ग के
देवताओं का सम्मान भी प्राप्त होता है। वह विमान में बैठकर अप्सराओं के साथ पर्याप्त कामविलास करता है।
यथा संकल्पयेद् बुद्ध्या यदा वा मत्परः पुमान्।
मयि सत्ये मनो युञ्जंस्तथा तत् समुपाश्नुते ॥ २६॥
संकल्पमात्र से सारे कार्य करने वाले मुझ सत्य संकल्प भगवान में जो अत्यन्त विश्वासपूर्वक अपना चित्त
स्थिर करता है वह जब भी, जहाँ भी, जिस भी काम में और जिस स्थिति में भी जो इच्छा मन में करेगा उसके वे
सारे मनोरथ सफल होते हैं। जो ध्यानधारणा से मुझ सत्यसंकल्प भगवान को हृदय में स्थापित करेगा वह मन में
जो भी इच्छा करेगा उसे वह प्राप्त करेगा।
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान्।
कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७॥
अथवा सबका नियंता तथा स्वतंत्र मेरा ध्यान करने से योगी को मत्स्वरूप ही प्राप्त होता है। सचमुच का