श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
दसवाँ अध्याय २४९
हमारा कर्त्ता है। मन में जो 'अहं' की भावना उत्पन्न होती है वह प्रत्येक शरीर में भिन्न होती है, इसलिये जीव भी
भिन्न-भिन्न हैं, कर्त्तापन और भोक्तापन उनके स्वरूप का प्रमाण है। इससे सम्बन्धित विचार ध्यानपूर्वक सुनो।
लोक, काल, श्रुति तथा जीवित ये अनेक कारणों से अनित्य हैं, ऐसा मेरा वेदांतिक मत है। शायद कर्मवादियों का
मत तुम्हें सच मालूम होगा लेकिन इससे तुम्हारे स्वार्थ की हानि होगी और तुम पर बहुत बड़ा अनर्थ होगा। वह
अनर्थ क्या है जानना चाहते हो तो सुनो। कर्मवादियों का यह भाव पूर्वपक्ष ही है। परमात्मा निर्विकार है तथा
सर्वस्वरूप एक है यह बात उन्हें स्वीकार नहीं। 'संन्यास' का नाम सुनते ही वे उसे महान पातक मानते हैं। इस
प्रकार मताभिमानियों की बक-बक चालू रहती है। त्याग अथवा संन्यास करने वालों को वे अनधिकारी कहते हैं।
वे कर्म को ही प्रधान मानते हैं और तदनुसार वैराग्य की निन्दा करते हैं। उनका मत है कि कर्म करो और सुख
का उपभोग करो। वह कर्म ही जो त्याग देते हैं उन निष्कर्मियों को सुख किस बात का मिलेगा? त्याग समस्त
दुःखों का मूल है। वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं
यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार
कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं कि यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें
वैराग्य हो सकता था लेकिन यहाँ जब अनित्य जैसी कोई बात है ही नहीं तो बैरागी किस चीज का त्याग करेगा?
मीमांसकों का मत है कि वैराग्य चार कारणों से होता है। वे चार बातों को नित्य मानते हैं। नित्यत्व के कारण
चारों बातें सच हैं इस मत पर उन्हें गर्व है। कर्म-प्रकाशक वेद नित्य और अटल है ऐसा वे मानते हैं जीव नित्य
हैं उसी प्रकार भोग और काल भी नित्य हैं ऐसा उनका कथन है। वेदों ने भी स्वर्ग को भोग भोगने का स्थान
बताया है। वह बात तो झूठ नहीं हो सकती। इससे यह सिद्ध है कि ये चारों नित्य हैं। हे उद्धव! देखो, इस प्रकार
यहाँ अनित्य जैसी कोई बात नहीं है तो यहाँ वैराग्य का क्या काम है? तात्पर्य यह है कि बैरागी लोग मिथ्या होते
हैं। भोगने की चीजें यदि नश्वर होतीं अथवा मायावी होतीं तो वैराग्य सम्भव था। ऐसी तो कोई बात यहाँ नहीं है,
(ऐसा उनका मत है) उसी प्रकार
मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा।
तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५॥
जीव के भोग्य पदार्थ हैं गंध, पुष्प, स्त्री आदि। प्रवाहरूप में वे नित्य हैं ऐसा वे अपने मतानुसार कहते हैं।
आत्मा है और संसार नहीं है ऐसा तो कभी नहीं हो सकता क्योंकि जल के बिना समुद्र हो ही नहीं सकता। सृष्टि
यह सदा शुरु ही है अर्थात् नित्य है। पिता पुत्र के रूप में वह अखण्ड चल रही है। यह सारी यातायात कर्म के
कारण है। यह कभी नहीं हो सकता कि सृष्टि अनित्य हो। फिर जो नित्य है उसे ईश्वर नाम का एक कर्त्ता होना
सम्भव नहीं है। नित्य का कर्त्ता कोई नहीं होता इसलिये वहाँ कोई ईश्वर नहीं है। वेदांती लोग स्वरूपभूत आत्मा
को ज्ञानस्वरूप कहते हैं। वह भी यहाँ नहीं होता ऐसा मत वे प्रतिपादित करते हैं। घट पट आदि आकार देखते
समय ज्ञान की क्षणभंगुर अवस्था दिखाई देती है ऐसा होते हुए उन्हें आत्मा को ज्ञानस्वरूप कहने में लज्जा क्यों
नहीं आती? कुल मिलाकर वेदांत में भी आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में पक्का निश्चय नहीं है, फिर जिसे मोक्ष
कहते हैं वह भी मिथ्या ही है। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के अतिरिक्त मोक्षसुख को कुछ अलग बताया
गया है, लेकिन वह भी अविचार ही है क्योंकि इन्द्रियों के द्वारा ही जीवों को प्रत्यक्ष सुख प्राप्त होते हुए भी, ये
मूर्ख लोग उसे स्वीकार नहीं करते। देह के सिवा विदेह अवस्था में क्या कोई सुख भोगता है? अद्वैतवादी व्यर्थ
२५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
की बकवास करते हैं जो सच नहीं है। जिस से जीव को सुख की प्राप्ति होती है उन इन्द्रियों को ही वे मिथ्या
कहते हैं। कोई आँखें फोड़ कर दर्शक बने वैसी ही यह वेदांतियों की बकवास है। यहाँ जब ईश्वर है ही नहीं
तो वह फल देगा यह बात भी मिथ्या होगी। अद्वैतवादी महामूर्ख होते हैं, वे वैराग्य के बहाने मूर्खों को गढ़े में
ढकेलते हैं। जिसका न कोई ठाँव है न ठिकाना और न सत्ता, ऐसे मिथ्या ईश्वर की मन में कल्पना कर वे
कर्मफल का त्याग कराते हैं। नरदेह में ज्ञान का उदय हुआ और उसने देह का ही नाश करा दिया। क्या किसी ने
फल को वृक्ष की जड़ काटते देखा है ? ज्ञान परिपक्व हो जाने पर सारे संसार का ही विनाश हो जाता है ऐसा
वेदांती कहते हैं। लेकिन जब यह सृष्टि प्रवाह रूप में नित्य ही है तो उसका विनाश कैसे होता है ? मनुष्य के
हृदय में स्थित ज्ञान से यदि संसार का नाश होता है तो जुगनू के तेज से चन्द्रमा, सूर्य आदि नवग्रह भी जलकर
भस्म हो जायेंगे। सारांश, निवृत्ति का स्वीकार करने पर किया हुआ परिश्रम व्यर्थ चला जाता है क्योंकि इन्द्रियों
के बिना जीव को कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिये प्रवृत्ति ही सबके लिये श्रेष्ठ है। जमकर कर्म करने
चाहिये और उसके उत्तम से उत्तम फल भोगने चाहिये। जो संसार को केवल माया कहते हैं वे मूर्ख हैं, जीव को
संसार के अतिरिक्त दूसरा कोई सुख नहीं है। इसलिये देवतागण भी मनुष्य के होने की कामना करते हैं और
वेदांती मनुष्य देह की निन्दा करते हैं। उनकी युक्ति को कौन स्वीकार करेगा ? यह वेदवचन है, उसे कौन
झुठलायेगा ? सारांश, उनकी बात पर जो विश्वास करेगा उसका पूरी तरह नाश हो जायेगा। वेदवचन सदा
प्रमाणरूप रहता है उसे ही ये मिथ्या कहते हैं। इसका अर्थ यही न कि ये बहुत बड़े ज्ञानी बन गये ? (भगवान
कहते हैं) मीमांसकों की भाषा ऐसी होती है वे तर्क पर तर्क देकर अपना मत स्थापित करते हैं, लेकिन हे
उद्धव ! यह सरासर झूठ है। मीमांसावादियों का शब्द पांडित्य ध्यान में रखकर, प्रपंच की अनर्थता को दिखला
कर (भगवान) वैराग्य को सिद्ध कर रहे हैं।
एवमप्यङ्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः।
कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६॥
श्रीकृष्ण ने कहा, हे उद्धव ! ये सारा मतवाद मिथ्या है। लेकिन उसे कैसे समझा जाय ? तो उन मतों पर
विचार करना पर्याप्त है। निवृत्ति कष्टप्रद है इसलिये प्रवृत्ति ही अत्यन्त श्रेष्ठ है ऐसा माना जाता है। किन्तु प्रवृत्ति
में भी अनेक कष्ट हैं और मृत्यु का भय तो अनिवार्य है। जन्म के मूल से ही काल जीव का अखण्ड पीछा
करता रहता है। लवनिमिष पल-पल काल 'समय साधता रहता है। जैसी चोर के साथ मित्रता होती है उसी प्रकार
काल का साथ रहता है। समय आते ही वह प्राण लूट लेता है कुछ भी शेष नहीं रहने देता। काल हाट बाजार
नहीं देखता, घंटा मिनट नहीं देखता, देश-विदेश नहीं देखता। अपने प्रभाव से वह सबको स्वाहा कर देता' है।
प्रवृत्ति के कष्ट सहते-सहते एकाएक मृत्यु का प्रहार होता है। ऐसा प्रसंग कभी न आये। जीव में वासना की डोर
जबरदस्त रहती है इसलिये वह मर गया, बचाओ आदि की गुहार करता है। लेकिन मृत्यु के प्रहार को कौन
निरस्त करेगा ? उस समय किसी का कोई उपाय काम नहीं करता। काल केवल मार कर ही छुटकारा नहीं करता,
अपितु भविष्य में भी काफी यातनायें भोगने के लिये बाध्य करता है। इनमें गर्भवास भी है जिसमें अनेक दुःख
होते हैं। माता की उदररूपी गुफा में, मलमूत्र के विस्तार में, नीचे मुड़ी कर नौ महीने तक उसे पकाता रहता है।
उस समय वह चारों ओर से मलमूत्र से लिपटा रहता है, नाक और मुँह में कीड़ों का प्रवेश होता रहता है।
गर्भवास के वे कष्ट किससे कहेंगे ? फिर गर्भवती स्त्री की दोहद की अवस्था आती है जब उसे कडुई, खट्टी
दसवाँ अध्याय २५१
तथा नमकीन चीजें खाने की इच्छा होती है। उस समय गर्भ के शरीर पर पूरी चमड़ी न होने के कारण शरीर
खौलने लगता है और उस दुःख से वह करवटें बदलता रहता है। उस गर्भ को पेट में क्या यातनायें हो रही हैं
इसका अनुमान माँ-बाप को नहीं होता। उनसे छुटकारा दिलाने वाला वहाँ कोई नहीं होता। उस जीव की व्यथा
वह स्वयं ही जानता है। जिस स्थान का उच्चार कोई मुँह से भी नहीं करता, जो स्थान कोई किसी को देखने भी
नहीं देता, ऐसे उस योनिद्वार से अत्यन्त संकट से, आखिर प्राणी का जन्म होता है। जो नित्य का मूत्रालय है,
नरक की खान है और रजस्वला के रुधिर का प्रवाह है, वहाँ से प्राणी का जन्म होता है। रजस्वला स्त्री के गन्दे
रक्त से यह शरीर बनता है और गन्दे रक्त से पुरुष का जन्म होता है, फिर भी वह अपने को पवित्र कहता है।
गर्भवास से अधिक दुःख और कौन सा है? मताभिमानी जो कहते हैं वह मिथ्या है। प्रवृत्ति में सुख बिलकुल
नहीं है। एक जन्म से न जन्म की समाप्ति होती है और न एक मृत्यु से मृत्यु ही समाप्त होती है। काल योनि के
द्वार से असंख्य जन्मों के फेरे लगवाता है। बार-बार जन्म और बार-बार मृत्यु, यह बराबर चल रहा है। ऐसी
प्रवृत्ति में सुख क्या होगा? हाँ, भयंकर दुःख अवश्य सहना पड़ता है। जन्म और मृत्यु के रिक्त स्थान में बड़े-
बड़े दुःख पीड़ा देते हैं। उनका दुःख देने का ढंग भी बताता हूँ। चोरों के हमले के भय से तेजी से भागो तो चोर
बीच में ही लूट लेते हैं, उसी प्रकार जन्म-मरण के अंतराल में षड्विकार रहते हैं। षड्विकारों की पतिव्रता
षडर्मी जीव से जोंक की तरह चिपक जाती हैं। सब मिला कर देखा जाय तो प्रवृत्ति में नितांत दुःख है, सुख जरा
भी नहीं है। अब कर्मवादी जीव को स्वतंत्र कर्मकर्त्ता मानते हैं, लेकिन उनका यह कहना मिथ्या है क्योंकि
पराधीनता उसे स्वयं अपनी आँखों से दिखायी देती है।
अत्रापि कर्मणां कर्तुस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते।
भोक्तुश्चदुःखसुखयोः को न्वर्थो विवशं भजेत्॥ १७॥
यदि जीव स्वतंत्र होता तो उसे कभी दुःख न भोगना पड़ता, सदा सुखी ही रहता। दुःख का मूल जो पाप है
उसे वह न करता। बेचारा जीव हमेशा से ही दीन, कर्म करके कर्माधीन रहने वाला, उसे कर्म का फल देने वाला
कोई दूसरा ही रहता है, वही उसे सुख-दुःख का भोग कराता है, इसे ध्यान में रखो। इसलिये ईश्वर की सत्ता ही
श्रेष्ठ है। वही कर्म का फल देने वाला है। जीव सुख-दुःख का भोक्ता है, वह स्वतंत्र नहीं है। इस पराधीनता के
कारण ही वह भयानक सुख-दुःख भोगता है। दुःख की इच्छा कोई नहीं करता लेकिन फिर भी उसे वह प्राप्त
होता है। इससे भी प्रकट होता है कि उसे स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। वह पराधीन होकर आचरण करता है इसलिये
उसे बिना माँगे सुख-दुःख भोगना पड़ता है। इस पर विपक्षी कहेंगे कि जो विधिपूर्वक कर्म करना नहीं जानते
वही जीव दुःखी होते हैं और जो कर्म करना जानते हैं वे सुखी रहते हैं। जो सदाचार सम्पन्न श्रोत्रिय हैं या जो
याज्ञिक और अग्निहोत्री हैं वे इस लोक और परलोक के लिये विधिपूर्वक कर्म करते हैं। जिनके इन्द्रिय अव्यंग
हैं, उनमें कोई न्यूनता नहीं है, वे विधिपूर्वक कर्म कर दोनों लोकों के सुखों का कर्मयोग द्वारा उपभोग करते हैं।
किन्तु (भगवान कहते हैं) कर्म में भी जो श्रेष्ठ रहता है उसे सुख का उपभोग सदा करने को मिलता ही है, ऐसी
बात नहीं है। उसके बारे में भी बताता हूँ।
न देहिनां सुखं किंचिद् विद्यते विदुषामपि।
तथा च दुःखं मूढानां वृथाहंकरणं परम्॥ १८॥
जो कर्म के सच्चे ज्ञाता हैं वे भी दुःखी दिखाई देते हैं और जो कर्म का स्पर्श भी नहीं करते वे मूर्ख
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लोग भी सुखी दिखायी देते हैं। जो यज्ञपुरुष अच्युत हैं वे उसे छोड़ अग्निहोत्री यज्ञ करते हैं, उनका वह
स्वकर्म ही उन्हें विपरीत फल देता है। अग्नि तो मेरा ही स्वरूप है और श्रुतिमंत्र तो सारे मेरे ही बीज हैं।
होमद्रव्य के रूप में जो है वह भी मेरा ही स्वरूप है। इस मेरे जैसे सर्वव्यापी को अपने मन से नास्तिक समझ
अनीश्वरवादी लोग यज्ञ करते हैं। वही उन्हें बाधक होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा, प्रणीतापात्र आदि सामग्री से कर्मतंत्र
अच्छी तरह करना जानते हैं किन्तु मुझ आत्माराम का सूत्र चुकने से यह याग अपवित्र हो जाता है। वास्तव में
वह सब मैं विश्वतोमुखी होने के कारण मुझ यज्ञपुरुष को ही अर्पण होता रहता है लेकिन याज्ञिक लोग इसे
स्वीकार नहीं करते। उनकी बुद्धि क्षुद्र और सकाम होती है। मुझे अर्पण किये बिना जो पुण्य प्राप्त करते हैं वह
दुःख होता है। जैसे विष को अमृत कहा जाय उसी प्रकार सकाम का पुण्य रहता है। मुझे छोड़ कर जो स्वर्ग
है उसे पीड़ा ही समझो और उससे मिलने वाले भोग को बड़ा रोग समझो। ऐसे याज्ञिकों का प्रयास मूर्खतापूर्ण
होता है। कर्म करते समय यदि उसमें कोई न्यूनता हो तो मैं अर्थात् श्रीकृष्ण का स्मरण करो ताकि उस नाम से
ही उसमें का न्यून कम हो जाय। मेरे नाम का इतना सामर्थ्य है। वही मैं जब याज्ञिकों के पास अन्न माँगने गया
तो उन्होंने मुझे वह नहीं दिया। यही उस कर्म की कर्मठता है। वे मुझ इन्द्रपुरुष को छोड़कर इंद्रादि देवताओं
का भजन करते हैं। लेकिन वे इंद्रादि देव मेरे ही अधीन हैं, इसे वे नहीं जानते। यही उस कर्म की कमी है।
जो अपना कर्म कृष्णार्पण नहीं करता उसका भाग्य फूटा समझो। ऐसा करने से इस लोक में भी दारिद्र्य में
रहना पड़ता है और परलोक में भी विघ्न आता है। अपना मुँह छोड़कर यदि पूरे शरीर को खीर चटायी जाय
तो उससे भूख तो शान्त नहीं होती उलटे दुःख होता है। उसी प्रकार मुझ यज्ञपति को छोड़कर यज्ञयाग करते
हैं, उस यज्ञ को बालविधवा के गर्भ प्राप्ति की तरह फल आते हैं। मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ इसके लिये दूसरे
से धन माँगने पर उस यज्ञ का लाभ धन देने वाला हो जाता है। यज्ञ करने वाला सूखा ही रह जाता है।
अवश्य ही कर्त्ता होने का अभिमान सिर पर सवार रहता है। खीर के चम्मच से लोगों को खीर परोसी जाती
है। वह चम्मच जब गन्दा हो जाता है तो उसे एक ओर रख देते हैं। लेकिन खीर खाने वाले खीर खाकर चले
जाते हैं। गन्ना घानी में डालने पर घानी उसका रस निकाल कर बर्तन भर देती है और स्वयं नीरस चीथड़े
लेकर कटकटाती रहती है। वही दशा याज्ञिकों की होती है। याज्ञिक भी उसी प्रकार यज्ञ करते हैं और उसका
फल धन देने वाले को प्राप्त होता है। यज्ञ में पशु हिंसा करनी पड़ती है वह दोष अवश्य ही कर्तृत्वाभिमान के
कारण याज्ञिक के पल्ले पड़ता है। सारांश कर्म में निष्णात याज्ञिक इस प्रकार का दुःख भोगते हैं। लेकिन जिन
मूर्खों को कर्म का ज्ञान भी नहीं होता वे परमसुख प्राप्त करते हैं। उन्हें कर्म का खटराग मालूम नहीं रहता
लेकिन उनके मन में मेरे प्रति असीम श्रद्धा का भाव रहता है। इसलिये वे अगणित दुःखों को पार कर
आत्मसुख का स्वाद चखते हैं। वे कर्म के प्रति आदर रखना नहीं जानते लेकिन मेरे प्रति उनके मन में श्रद्धा
रहती है। ऐसे सीधे-सादे भक्त अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो गोपाल गोकुल में निरन्तर मेरे साथ थे उन्होंने
कौन सा कर्म किया था? लेकिन उन्होंने कर्म की होली जला कर नित्य नये आत्मसुख का अनुभव आखिर ले
ही लिया। कर्ममार्ग के अनुसार यदि गोपियों के कर्म का विचार किया जाय तो उनका धर्म निन्दनीय था
लेकिन उन्हें पुरुषोत्तम की आसक्ति होने के कारण वे भी परमधाम पहुँच गयीं। इतना ही नहीं बल्कि गोकुल
के पशु, पक्षी, गौएँ और सर्प आदि सभी प्राणी मेरे पद पर पहुँच गये। लेकिन याज्ञिक लोगों को कर्माभिमान
का अत्यन्त गर्व होने के कारण वे अपने ही कर्म में दुःख भोगने लगे। जो केवल कर्मठ होते हैं वे कर्म के
कारण जड़बुद्धि होकर स्वयं सर्वज्ञ होने की मूर्खता के अभिमान में असहनीय दुःख भोगते हैं। दीपक के
दसवाँ अध्याय २५३
कारण पतंगा मृत्यु को प्राप्त होता है लेकिन उस पर न्योछावर होने में उसे सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार
कर्मठों के लिए कर्म ही दुःख का कारण होता है लेकिन अपने अभिमान के कारण ही वे उसमें सुख मानते
हैं। वास्तव में वे अभिमान के कारण ही जीव को स्वतंत्र मानते हैं। यदि विचार किया जाय तो उन्हें स्वतंत्रता
नहीं होती। अब उसी का निरूपण करता हूँ।
यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः।
तेऽप्यद्धा न विदुर्योंगं मृत्युर्न प्रभवेद्यथा ॥ १९॥
दुःख का नाश होकर सुख की प्राप्ति के लिये वे कर्म का आचरण करते हैं। कर्मवादी स्वयं को बहुत ज्ञानी
समझते हैं लेकिन दुःख का नाश कैसे किया जाय यह सचमुच उनकी समझ में नहीं आता। कर्म करने से भी
जिसका नाश नहीं होता ऐसा दुःख कौन-सा है? अगर इसका उत्तर पूछो तो क्रमवार बताता हूँ। मरने से अधिक
कोई दुःख नहीं है, लेकिन उसका ही नाश कैसे किया जाय यह उन बेचारों को नहीं मालूम होता। मृत्यु का प्रहार
इतना प्रखर है कि जैसे गरम पानी में हाथ डालने से हाथ जलता है लेकिन घर नहीं जलता, उसी प्रकार मृत्यु
प्रबल रूप से अनिवार्य होने के कारण वह कर्म से नहीं टलता। जो सबको मारता है उस मृत्यु को कैसे मारा जाय
यह बात उन कर्मठों की समझ में नहीं आती। जो कर्मों में रहते हैं उन्हें मृत्यु अचूक आती है। मरने का दुःख तो
आखिर आना ही है इसलिये जब तक जीवित हैं तब तक सुख भोग लिया जाय ऐसी बातें मूर्ख लोग करते हैं।
लेकिन जीवित अवस्था में भी उन्हें सुख किस बात का है?
कोन्वर्थः सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके।
आघात नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिदः॥ २०॥
हे उद्धव ! कर्मठ लोगों को जीवित अवस्था में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती, यही बात मैं अब तुम्हें बता
रहा हूँ। विष मिलाकर यदि मिष्टान्न तैयार किया जाय तो ज्ञानी लोग उसे मीठा नहीं कहेंगे, उससे मेरी मृत्यु होगी
यह जानकर वे उसे फेंक देंगे। जिस घर में आग लगी हुई हो उसमें बुद्धिमान व्यक्ति क्षण भर के लिये भी नहीं
रुकेगा। मृत्यु के आने से पहले ही वह उस मकान को छोड़कर कहीं दूर भाग जायेगा। जब दरवाजे पर डकैत
आ खड़े हों तो खीर भी मधुर नहीं लगेगी। उसी प्रकार शरीर को मृत्यु आ सकता है यह मालूम होने पर
विषयभोग में सुख कैसे मिलेगा? जिसकी दाढ़ी में आग लगी हो उसे वह चेहरे की शोभा कैसे मानेगा? उसी
प्रकार शरीर में नित्य नया मृत्यु दिखायी देते हुए विषय भोग में सुख कैसे मालूम होगा? जब मृत्यु काल की
व्यथा शुरु होती है तो जन, धन, अन्न तथा स्त्री सुख नहीं दे सकती। वे सारे व्यर्थ हो जाते हैं। अंतकाल में कनक
और कांता ये दोनों ही दुःख का कारण बन जाते हैं। वासना के कारण प्राण उनका शरीर नहीं छोड़ पाता। इसके
कारण वह छटपटाता रहता है। जिस प्रकार सूली पर ले जाते समय विविध प्रकार के समारोह किये जाते हैं और
उस व्यक्ति को पंचपकवान खिलाये जाते हैं किन्तु उनसे उसे सुख नहीं प्राप्त होता। उसी प्रकार सामने साक्षात्
मृत्यु दिखायी देने पर विषय सुख में किसे आनन्द आयेगा? इसलिये जो बुद्धिमान हैं वे विषयों का त्याग करते हैं
और जो मूर्ख हैं वे ही उसमें आसक्त होकर रहते हैं। शरीर में यदि क्षणभर के लिये भी दुःख हो तो करोड़ों
विषय सुख भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये जो विषयसुख के लिये छटपटाते हैं वे पागल हैं। चिरमिठास निर्विषयों
में ही है। सारांश, इस लोक में सुख है ही नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि परलोक में सुख है लेकिन हे उद्धव वहाँ
भी सुख नहीं प्राप्त होता। किस तरह यह सुनो।
२५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रुतं च दृष्टवद् दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययैः।
बह्वन्तरायकामत्वात् कृषिवच्चापि निष्फलम् ॥ २१॥
जैसा यह लोक है उसी प्रकार स्वर्गादि लोकों के बारे में भी हम सुनते हैं लेकिन वे भी पहले से ही
दोषयुक्त हैं। मूर्ख लोग वैसे दोषयुक्त लोक की भी इच्छा करते हैं। अब तुम पूछोगे कि स्वर्ग में कैसा दोष है तो
सुनो। वहाँ भी स्पर्धा, ईर्षा और विनाश रहते हैं। फिर वहाँ भोग के कारण तप भी क्षीण होता रहता है। अपने ही
समान दूसरे का तप देखने पर वह उसके साथ स्पर्धा करने लगता है। अपने ही तरह दूसरा सुख भोग रहा है यह
देखकर मन सुखी नहीं होता। अपने से ऊँचे पद पर किसी को आसीन होते देख उस पर किसी प्रकार का
दोषारोपण कर उसकी निन्दा करते हैं। जब वहाँ भी विषम भाव उत्पन्न होता है तो वहाँ वास्तव में सुख कैसे
मिलेगा ? इसलिये स्वर्ग प्राप्ति के बाद भी सबको एक जैसा सुख नहीं प्राप्त होता। लोग अपने-अपने कर्म और
तप के अनुसार कम-अधिक सुख भोगते रहते हैं। कोई उर्वशी का भोग करता है तो किसी को काली और विद्रूप
हिडिंबा प्राप्त होती है। सारांश, भोग के कारण तप का क्षय होकर विनाश अवश्य होता है। जैसे-जैसे लोग स्वर्ग
का भोग भोगते हैं वैसे-वैसे तप की शक्ति क्षीण होती जाती है। इस प्रकार वे स्वर्ग के लोग तप के क्षय के कारण
नष्ट हो जाते हैं। हे उद्धव ! स्वर्ग प्राप्ति के लिये विधिपूर्वक कर्म करने से विघ्नों की बाधा आती है। इसलिये
वास्तविक स्वर्ग की प्राप्ति तो होती नहीं। जो गर्भ में ही मर जाता है उसका नामकरण नहीं होता। उसी प्रकार
कर्म में विघ्न उत्पन्न हो जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति भी रुक जाती है। अब यदि पूछोगे कि कर्म में विघ्न कौन उत्पन्न
करता है तो कर्म अपनी प्रक्रिया में ही दूषित होता रहता है। वह कर्म ही उस कर्म में भयानक बाधा उत्पन्न करता
है। कर्म ही कर्म का साधक भी है और बाधक भी। कर्म ही कर्म से मुक्त कराने वाला है। लेकिन यह बात न
जानने के कारण लोग उसमें उलझे रहते हैं। काम्य कर्म में विलक्षण बाधायें होती है। उसमें देश, काल, मंत्र, तंत्र,
द्रव्य, दक्षिणा विधि और पात्र सभी कुछ शुद्ध होना आवश्यक है। जिस प्रकार तपेदिक के रोगी के लिये थोड़ा
कुपथ्य भी बाधक होता है उसी प्रकार कामनिक कर्म में थोड़ा सा दोष भी विघ्न उत्पन्न करता है। दूध से भरे बड़े
बर्तन में यदि कांजी का एक बूँद भी पड़ जाय तो उस दूध से दही, दूध या घी कुछ भी प्राप्त नहीं होता। उसी
प्रकार कामनिक कर्म थोड़े से भी दोष के कारण फलरहित हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि वह कर्म ही
भयानक बाधा उत्पन्न करता है। साल भर खटकर किसान खेती करता है लेकिन फसल तैयार होने तक अनेक
बाधायें उपस्थित होती हैं और किसान का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। पहले अच्छा खेत चाहिये, फिर उसके लिये
अच्छा बीज मिलना चाहिये, समय पर वर्षा होनी चाहिये, खेत में कीड़ों का प्रकोप नहीं होना चाहिये। खेती में
काम आने वाले औजार भी अच्छे होने चाहिए। बुआई होने के बाद भी उसकी अच्छी देखरेख होनी चाहिये और
बिना आलस किये सुबह होने तक पहरेदारी आवश्यक है। फसल हाथ में आने पर भी वर्षा उसे भिंगो देती है,
बाल रोग के कारण काले हो जाते हैं, जंगली घास उग आती है। उसी प्रकार कर्म पर अहंकार का रोग लगता है
अथवा अधर्म का कीड़ा उस कर्म का फल नष्ट कर देता है। फसल की यदि समुचित व्यवस्था नहीं हुई तो आशा
तृष्णारूपी पंछी फसल को खा जाते हैं और उसमें अनाज का एक भी दाना नहीं रहने देते। तिल पर यदि अहंकार
की मार पड़ जाय तो फिर क्या पूछना ? सेम दिखायी तो देती है लेकिन उसमें से दाना नदारद। कामक्रोधरूपी
चूहे तो फसल को मूल से ही खा जाते हैं। यदि विकल्प का हमला हो जाय तो फिर खेत में लकड़ी मिलना भी
दूभर हो जाता है और दुर्वासना रूपी टिड्डी दल आ जाए तो फिर ऊपर से लेकर नीचे तक सब खूँट ही रह जाते
हैं। इस प्रकार खेतिहर की ही तरह कामनिक कर्म में भी अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। फल मिलना तो दूर,
दसवाँ अध्याय २५५
यज्ञकर्ता विघ्नों के समुद्र में ही डूब जाता है। स्वर्ग तो एक है और यज्ञ करने वाले अनेक। उस यज्ञ में देवता
विघ्न उत्पन्न करते हैं। पहले तो इन्द्र ही पूरे स्वर्ग का भोग करने को मिले इसलिये विघ्न उत्पन्न करता है। वेश्या
एक रहती है और रात्रि भी एक लेकिन भोग की इच्छा करने वाले अनेक रहते हैं। इसलिये वे परस्पर झगड़ा
करने लगते हैं। वही गति याज्ञिकों की होती है। जैसे कुतिया जब गरम होती है तो उसका भोग करने के लिये
अनेक कुत्ते तैयार हो जाते हैं और एक-दूसरे को देखकर गुर्राते हैं। उसी प्रकार स्वर्ग की अभिलाषा करने वाले
सकामों की गति होती है। वह कुतिया जिसे भोगने को मिलती है वह भोग करते समय ही गिर पड़ता है और
संसार में उसकी छीः थूः होती है। जिसे भोगने जाता है वह इन्द्रिय फँस कर विमुख हो जाती है। मैथुन द्वार में
फँसे रहने के कारण आने जाने वाले छीः थूः करते रहते हैं। उसी प्रकार यज्ञ करने वालों की स्वर्ग प्राप्ति है। उस
स्वर्ग के भोग से तप का क्षय होता है। स्वर्ग भोग पर आसक्त रहने के कारण वे पुनः उलटे मुँह इहलोक में लौट
आते हैं। सारांश, खेतिहर की ही तरह स्वर्गप्राप्ति में भी अनेक विघ्न हैं। वे किए हुए परिश्रम व्यर्थ कर देते हैं।
फिर भोग भी कैसे प्राप्त होंगे? स्वयं को कर्मकुशल कहने वाले कुछ लोग कहते हैं कि हम कर्म करने में किसी
प्रकार की कमी नहीं रहने देंगे। हम सब कुछ त्रुटिहीन कर स्वर्ग का फल भोगेंगे। लेकिन हे उद्धव! उनसे वह
भी नहीं हो पाता। वह कैसे? तो उसका निरूपण पाँच श्लोकों में करता हूँ।
अन्तरायैरविहतो यदि धर्मः स्वनुष्ठितः।
तेनापि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु ॥ २२॥
जिसमें कोई विघ्न न आये, ऐसे निर्विघ्न कर्म होते ही नहीं हैं और दैवयोग से हो भी गये तो उससे
होनेवाली स्थानप्राप्ति नश्वर होती है। कर्म से जिस पद पर पहुँचते हैं और वहाँ पहुँचने पर उन्हें जो भी प्राप्त
होता है उसके बारे में हे उद्धव, तुम्हें बताता हूँ।
इष्ट्वैव देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः।
भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान् निजार्जितान् ॥ २३ ॥
उत्तम कर्मभूमि प्राप्त होने पर तथा श्रेष्ठवर्ण ब्राह्मणकुल में जन्म लेने पर लोग सदा कामानिक
ज्योतिष्टोमादि यज्ञ अथवा अग्निहोत्र करते हैं। वे तीनों वेद जानते हैं, सभी कर्मों में कुशल रहते हैं लेकिन इस
प्रकार ज्ञानी होते हुए भी वे मूर्ख हैं क्योंकि वे नश्वर स्वर्गप्राप्ति की इच्छा मन में रखते हैं। जिस पुण्य से मुक्ति
प्राप्त न होती हो उसे 'पुण्य' कहने में रोना आता है। यज्ञकर्ता विषयासक्ति में लिप्त रहते हैं, इसीलिये वे स्वर्ग के
भोग के पीछे भागते हैं। इन्द्रादि देवताओं के लिये यज्ञ कर, जिनके कारण मैं दूर हो जाता हूँ ऐसे भोग भोगने के
लिये वे स्वर्गलोक में जाते हैं। जिसे अनेक लोग चूस चुके हैं ऐसी पुरानी हड्डी को लेकर कुत्ता अपनी लार से
चाट कर आनन्द लेता है उसी प्रकार यज्ञकर्त्ताओं को जिस स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रहती है उसे वे अपने पुण्य से
मधुर बना लेते हैं। अथवा जिस प्रकार श्मशान में बलि के लिये जो अन्न रखा रहता है उसके लिये कुत्ते आपस में
लड़-झगड़ कर वह जूठा खाना खाते हैं। उसी प्रकार स्वर्ग के भोग भी अनेक लोगों का जूठा खाद्य ही है। अपने
संग्रह का शुद्ध पुण्य खर्च कर लोग कितनों का ही जूठा भोग मोल लेते हैं और यज्ञकर्ता स्वयं को बहुत पवित्र
समझते हैं। मोल लेकर कितनों का जूठा खाद्य चाटते रहते हैं। वैसे भी कौवे का मांस, वह भी कुत्ते के मुख से
बचा हुआ, मोल लेने पर अधिक मिलेगा भी नहीं। स्वर्ग भोग में याज्ञिकों की स्थिति भी कुछ वैसी ही रहती है।
स्वर्ग अनेक लोगों का उच्छिष्ट है। ऐसा होते हुए भी उसके लिये अत्यन्त परिश्रम का मूल्य चुकाना पड़ता है
२५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
और वह भी पेट भर नहीं मिलता क्योंकि उसे रात-दिन पतन का भय रहता है। देवतागण स्वर्ग का भाग भोगते हैं
लेकिन वे भी दुर्भाग्य की बात करते हैं। लेकिन उसी स्वर्ग के भोग की प्राप्ति के लिये याज्ञिक लोग कितने बेचैन
रहते हैं। इस प्रकार एक बार स्वर्ग की प्राप्ति हो जाने के बाद कैसे-कैसे भोग भोगने पड़ते हैं उसका वर्णन करता
हूँ। उद्धव! ध्यान देकर सुनो। अरे स्वर्ग में भी सबको एक जैसे सुख भोगने को नहीं मिलते। जिसका जैसा पुण्य
रहता है, उसी के अनुसार उसे भोग प्राप्त होते रहते हैं।
स्वपुण्योपचिते शुभ्रे विमान उपगीयते।
गन्धर्वैर्विहरन् मध्ये देवीनां हृद्यवेषधृक्॥ २४ ॥
अपने पुण्य का मोल देकर मिले हुए चन्द्रप्रभा की तरह शुभ्र विमान में बैठ कर वे दिव्य भोग का आनन्द
लेने लगते हैं। वहाँ दिव्य देह प्राप्त होता है तो वहाँ वे पोशाक भी मनोहारी करते हैं। गन्धर्व मधुर गायन करते
रहते हैं और ऐसे आनन्दमय वातावरण में स्त्रियाँ क्रीड़ाएँ करती हैं। स्वर्ग की उन अप्सराओं को देखकर मन
भुलावे में आ जाता है और फिर उन्हीं के छंद में वे अनेक स्थानों पर क्रीड़ाएँ करने लगते हैं।
स्त्रीभिः कामगयानेन किङ्किणीजालमालिना।
क्रीडन् न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृतः॥ २५॥
उन स्त्रियों के साथ वह जहाँ चाहे वहाँ विचरण करता रहता है। वह विमान कितना और कैसे सुशोभित
रहता है यह भी सुनो। उसमें अनेक छोटी-बड़ी घण्टियाँ लगी रहती हैं तथा उसमें रत्नजड़ित मेखला लपेटी रहती
है। पूरा विमान ही घुँघरुओं से वेष्टित रहता है और उसकी गति भी बड़ी मजेदार रहती है। उस विमान को वह
गन्धर्वों के वन में या नंदनवन में अपनी मनचाही जगह पर ले जाता है और वहाँ स्वर्गांगनों का उपभोग लेने में
आसक्त होकर पड़ा रहता है। उस वन में पुष्पों से लदी क्यारियाँ रहती हैं और उनका पराग चारों ओर बिखरा
रहता है। कोकिलाओं के सुमधुर स्वर तथा भ्रमरों के संगीत से वह स्थान भरा रहता है। मंद सुगन्ध तथा शीतल
समीर मलय पर्वत से बहता रहता है और स्वर्गांगनाओं के हँसी कल्लोल से कामुक के विलास पर यौवन छा
जाता है। अग्नि और कर्पूर का मिलन होते ही जिस प्रकार अग्नि की ज्वाला भड़क उठती है, उसी प्रकार उस
कामुक का पुण्य भोग भोगते-भोगते एकाएक समाप्त हो जाता है। लेकिन वह इतना अधिक कामसक्त हुआ रहता
है कि नहीं सोचता कि इसमें मेरा पतन होकर सारे भोग समाप्त हो जायेंगे। दीपक पर फड़फड़ाने वाले पतंगे को
इस बात का जरा भी स्मरण नहीं रहता कि इसमें मेरी मृत्यु निहित है। उसी प्रकार उसका मन भोग में इतना
अधिक लिप्त रहता है कि उसे अपने पतन का स्मरण नहीं होता।
तावत् प्रमोदेत स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।
क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन् कालचालितः॥ २६॥
जब तक पुण्य की सम्पत्ति रहती है तब तक वे स्वर्ग का भोग भोगते हैं और पुण्य की वह शक्ति क्षीण
होते ही उनका पतन हो जाता है। जब तक गाँठ में धन है तब तक वेश्या सौजन्य दिखाती है लेकिन धन समाप्त
होते ही वह उसका मुँह भी नहीं देखती। उसी प्रकार स्वर्ग की स्थिति होती है। अपने पुण्य से भोग भोगते हैं
किन्तु पुण्य का क्षय हो जाने पर उनका भी क्षय हो जाता है। इच्छा न होते हुए भी पतन हो जाता है। सुखी होने
के लिये याज्ञिक अत्यन्त परिश्रम कर स्वर्ग प्राप्त करते हैं। वे अन्त में अत्यन्त सुखी होकर सिर नीचा कर पतन
की ओर उन्मुख होते हैं। स्वर्ग के सारे सुखों का अस्त होकर भाग्य में गर्भवास आ जाता है। ऐसे उन कामियों
दसवाँ अध्याय २५७
के सुख को आग लगे। सुख की आशा में याज्ञिक व्यर्थ ही फँस जाते हैं। हे उद्धव! इस प्रकार जिसे 'स्वर्गसुख'
कहते हैं वे इस प्रकार दुःखी होते हैं। मूर्ख ही स्वर्ग को सुख मानते हैं लेकिन वह मार्ग दोषरहित नहीं है।
याज्ञिक लोग विधिपूर्वक कर्म करते तो भी उन्हें महादुःख प्राप्त होता है। लेकिन यह मत समझो कि अविधि से
कर्म करने से वे सुखी होंगे। यहाँ कर्ममार्ग की प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है। एक में विधिपूर्वक आचरण होता
है तो दूसरी में अविधि से। अभी मैंने तुम्हें जो बातें बतलायीं वह वेद विधानोक्त स्थिति है। विधियुक्त कर्म के
आचरण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, यह उचित प्रवृत्ति है। पुण्य का क्षय हो जाने पर किस प्रकार स्वर्ग से पतन
होता है यह भी तुम्हें बतलाया। अब अविधि से किये हुए आचरण के सम्बन्ध में भी सुनो। वे मतिहीन लोग
वेदविधि का उल्लंघन कर खराब लोगों की संगत से किस प्रकार अप्रकृति से अधर्म करते हैं उसके सम्बन्ध में
भी सुनो।
यद्यधर्मरतः सङ्गादसतां वाजितेन्द्रियः।
कामात्मा कृपणो लुब्धः स्त्रैणो भूतविहिंसकः ॥ २७॥
जीव स्वभाव से ही कामासक्त होते हैं इसलिये उन्हें वांछित विषय प्राप्त होते ही वे उस पर लंपट हो जाते
हैं और इच्छित वस्तु प्राप्त न होने पर उनका मन व्याकुल हो जाता है, यह प्राणिमात्र का स्वभाव ही है। ऐसे
स्वभाव वाले मनुष्य का यदि दुष्ट पुरुष के साथ सम्बन्ध हो जाये तो उसे अधर्म पर ही श्रद्धा होने लगती है और
वह अकर्म के लिये प्रवृत्त होता है। चंचल होने के कारण मन भी वानर की तरह है। दुष्ट संगति से यदि वह
मदिरापान करे तथा उसे कामरूपी बिच्छू काट ले तो वह अटपटांग बातें कहने लगता है। इसमें आश्चर्य कैसा ?
पागल के हाथ में मशाल दे देने से वह जगह-जगह आग ही लगाता फिरेगा। उसी प्रकार वे भी दुष्टों की संगति
से होली जलाकर धर्म को समूल भस्म कर देते हैं। छोटे बच्चे के हाथ में शस्त्र देने पर वह यह नहीं देखता कि
जिस प्रकार वह प्रहार कर रहा है वह शरीर उसका है अथवा किसी और का। वह अपना शरीर भी काट लेता है।
वह अपने हित के बारे में नहीं सोचता। जिस प्रकार शरीर में देवता का संचार होने पर ढोंग करने वाली लड़की
के बोलने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता या बहुरुपिया के संन्यास में जिस प्रकार वैराग्य तृणमात्र भी नहीं होता
उसी प्रकार वह भी कुसंगति से ही ढोंग रचाता है जिसके कारण विवेक के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता और
वह कामशास्त्र की राह पकड़ लेता है। कामशास्त्र की लत से उसकी वासना बढ़ जाती है जिसके चलते वह
अधर्म की योजना बनाता है और अधर्म के कारण अकर्म करके निन्दनीय कर्मों का आचरण करता है। निन्दनीय
कर्मों की प्रवृत्ति के लिये भोग की लिप्सा मूल कारण है। भोग की लालच में ही अधर्म का विस्तार होता है।
अधर्म के बढ़ते ही वह परधन और परस्त्री के लिये अनेक प्रकार की युक्ति लड़ा कर शरीर का नाश करता है।
स्त्री के लिये तो उसकी व्याकुलता देखने लायक होती है। स्त्री के छंद में वह स्त्रैण बनता है और उस स्त्री को
प्राप्त करने के लिये प्राणी की हिंसा भी करता है।
पशूनविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान् यजन्।
नरकानवशो जन्तुर्गत्वा यात्युल्बणं तमः ॥ २८ ॥
विधि जो बताती है उसे नहीं कहना, वेद की बात नहीं सुनना, स्मृतिशास्त्र मन को स्वीकार्य नहीं है ऐसी
स्थिति में स्वेच्छा से कर्म करना। जारण, मारण, उच्चाटन, स्तंभन, मोहन, वशीकरण आदि के प्रयोग कर असाध्य
अंजन सिद्ध कर स्त्रियों को वश में करना। नमक, राई और भिलावा शहद में मिला कर तामसी व्यक्ति शाबरी मंत्र
के प्रभाव से होम करने जाता है। जारणमारणादि कर्म करने के लिये बकरी, लोमड़ी, बन्दर, गिरगिटांग, मेढ़क,
मछली, मगर, गिद्ध तथा चील जैसे पशु-पक्षियों का भी होम करते हैं। नग्न भैरव, वैताल, भूत, पिशाच, कंकाल,
मारको, मेसको, मैराल आदि प्रबल भूतों की उपासना करते हैं। काली चिड़िया, मालढोक, चील, कौंआ, बगुला,
उल्लू को मारकर तथा काली बिल्ली को समारोहपूर्वक लाकर शाबरी मंत्रों से होम करते हैं। चलती घानी से तेल
चुरा कर लाते हैं और शनिवार को प्रदोष के समय नहाते हैं तथा मध्यरात्रि में होम में डाकिनी तथा शाकिनी को
जागृत करते हैं। शराब का घड़ा भरकर रखते हैं, मातंगी की पूजा करते हैं और मोहिनी मंत्र का जप कर शव की
खोपड़ी में रुधिर भर कर रखते हैं। पूरे शरीर में हल्दी पोतते हैं, कपाल पर सिंदूर पोतते हैं और कामेच्छा पूरी
करने के लिये अत्यन्त परिश्रम से भजन साध्य करते हैं। होमपात्र उसी क्षण तैयार करने के लिये पीपल को जड़
के साथ उखाड़ते हैं और आसन के नीचे रखने के लिये फल और फूलयुक्त वनस्पतियों को उखाड़ते हैं। मंत्रबीज
का जाप करने के लिये मृग-भालू के शव का ताजा चमन मँगवाते हैं। पाप का भय नहीं मानते। इस प्रकार पशु,
पक्षी तथा जलचर आदि जीवों को भयंकर पीड़ा पहुँचाते हैं, इतना ही नहीं अपितु ब्राह्मण का रक्त लेकर भी
जारण-मारण की क्रिया करते हैं। गौ-ब्राह्मणों को नितांत कष्ट देते हैं, इतना ही नहीं बल्कि जमीन, सम्पत्ति तथा
स्त्री का अपहरण करने के लिये उनकी हत्या भी करते हैं। मन्दिर में भगवान के सामने एकत्र अथवा शिवालय में
शिवजी के सामने रखा हुआ द्रव्य अथवा पदार्थ उठाने में जरा भी सुस्ती नहीं दिखाते। अधर्म में उनकी वासना
इतनी अथाह रहती है। सारांश यह कि इस प्रकार का कर्म करने में वह अकर्म के कारण नरक में इस प्रकार
प्रवेश करता है जैसे चन्द्रमा अन्धकार में डूब जाता है क्योंकि अकर्म इतना प्रबल है कि वह जीव के ज्ञान का
विनाश करता है तथा उसे मूढ़ बनाकर उसे नरक के प्रवाह में बहाता है। उस नरक की स्थिति बड़ी विचित्र है।
करोड़ों वर्षों से वहाँ जाते हुए भी उसकी गहराई किसी को मालूम नहीं हुई। फिर कोई उससे कैसे उबर सकता
है? उसे ही 'अंधतम नरक' कहते हैं, उसे देखते ही वृत्ति अन्धी हो जाती है। मूर्खतावश बाहर आने का मार्ग
भूलकर वह नरक में ही लोटता रहता है और इस प्रकार कर्मभोग का जब तक अन्त नहीं हो जाता तब तक
आकल्प नरक ही भोगता रहता है और फिर उसे स्थावर अवस्था प्राप्त होती है, अर्थात् वह वृक्ष अथवा पाषाण
हो जाता है। इस प्रकार उसकी जड़ अवस्था होती है। उसे सुख स्वप्न भी नहीं दिखाई पड़ते। वह असहनीय
दुःख भोगता रहता है। इस प्रकार अधर्म प्रवृत्ति का आचरण करने से सुख का अंश भी नहीं प्राप्त होता। अनिवार
भोग भोगते हुए उसकी उससे मुक्ति नहीं होती।
कर्माणि दुःखोदर्काणि कुर्वन् देहेन तैः पुनः।
देहमाभजते तत्र किं सुखं मर्त्यधर्मिणः ॥ २९ ॥
हे उद्धव! भाई, सुनो मरण जीव का धर्म है। उसके हिस्से में सुख कभी आता ही नहीं है। वह सदा दुःखद
स्थिति में ही रहता है। नरदेह प्राप्त कर वे बड़े-बड़े क्रूर कर्म करते हैं जिससे उन्हें दुःख के ही फल प्राप्त होकर
वे जीव को बड़ी से बड़ी यातनायें भुगतने के लिये बाध्य करती हैं, जिससे वे दुःख के भँवरे में फँस कर स्वयं
ही अपने घातक बन जाते हैं। वे संतचरणों से विमुख हो जाते हैं, उन्हें स्वप्न में भी सुख नहीं प्राप्त होगा। कामी
लोग क्रूर कर्म ही करते रहते हैं जिससे उनका दुःख बढ़ता ही रहता है। सारांश, प्रवृत्ति में रहकर सकाम कर्म
करने पर भी, भले ही वे कर्म विधिपूर्वक ही क्यों न किये हों लेकिन उसे सदा अनिवार दुःख भोगना पड़ता है।
विधिपूर्वक सकाम कर्म करने पर स्वर्ग से पतन होता है और वही कर्म अविधि से करने पर नरक प्राप्त होता है।
दसवाँ अध्याय २५९
सारांश इस प्रवृत्ति में सकाम पुरुष को सुख कहाँ प्राप्त होता है? तुम विचार करोगे कि दिक्पाल सदा सुख में
रहते होंगे क्योंकि उन्हें जन्म-मरण नहीं है। बस उनकी ही तरह हम भी अमरत्व प्राप्त कर लें तो काम हो जाय
क्योंकि दिक्पाल नित्य अर्थात् शाश्वत होते हैं, लोकपाल भी शाश्वत ही हैं अर्थात् वहाँ का सुख भी शाश्वत ही
होगा। लेकिन जो ऐसी कल्पना करते हैं, वे मूर्ख हैं।
लोकानां लोकपालानां मद्भयं कल्पजीविनाम्।
ब्रह्मणोऽपि भयं मत्तो द्विपरार्धपरायुषः॥३०॥
लोकपालों में अमरेन्द्र अर्थात् इन्द्र ही श्रेष्ठ है क्योंकि वह मरुद्गणों का राजा है, उसे सूर्य, चन्द्रमा, वरुण,
कुबेर, यम आदि सभी सम्मान प्रदान करते हैं उसके लिये अमरावती में सिंहासन है, ऐरावत पर आरूढ़ होने का
सम्मान प्राप्त है, जिसके सामने उच्चैःश्रवा नाम का अश्व स्वयं ही आकर खड़ा है, उर्वशी जिसकी भोगपत्नी है,
रंभा प्रमुख विलासिनी है, तिलोत्तमा नर्तन करती है और पैर के पास चिंतामणि बिखरे रहते हैं, जहाँ अष्टसिद्धि के
भण्डार भरे हुए हैं, जहाँ के महल रत्नों से अलंकृत हैं, जहाँ मोतियों के झूले सुवर्ण की श्रृंखलाओं से बँधे झूल
रहे हैं, जहाँ बैदूर्य मणियों के विशाल वृक्ष हैं, कामधेनुओं के बाड़े हैं और जहाँ कल्पवृक्षों के मण्डप चारों ओर
अपनी शोभा बिखेर रहे हैं, जिसके आगे लोकपाल हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं, देवताओं की सेना ही जिसकी
चतुरंगिणी सेना है और जो स्वर्ग के राज्य का उपभोग करता है उसे भी ब्रह्मदेव का दिन पूरा होने पर काल की
शक्ति ग्रस लेती है। ऐसे एक या दो नहीं बल्कि चौदह इन्द्रों का ब्रह्मदेव का एक दिन पूरा होने पर क्षय होता है।
कहते हैं ब्रह्मदेव की आयु सबसे अधिक लम्बी है। उसे दो परार्ध की आयु प्राप्त है। लेकिन जब तक मेरे काल
की उस पर दृष्टि नहीं पड़ी तभी तक उसकी आयु की श्रेष्ठता है। जिसकी अग्रपूजा सम्मान की योग्यता है जो
लोकों के लोकपालों का भी कर्त्ता है, उस ब्रह्मदेव को भी मेरे काल की सत्ता ग्रस लेती है। मैं कालात्मा
दण्डधारी, शास्त्र, नियंता, ईश्वर, अंतर्यामी सर्वेश्वर हूँ तथा अत्यन्त दुर्धर और सर्वव्यापी हूँ। मेरा काल क्षोभ
अत्यन्त भीषण है उसे कौन रोक सकता है? धर्म, अर्थ अथवा काम से उसका निवारण सम्भव नहीं है। उस
प्रलयंकारी महाकाल को भी मेरी कालसत्ता ग्रस लेती है। सभी मेरे महाभय से भयाक्रान्त हैं। फिर लोकपालों को
सुख कैसे प्राप्त होगा? मेरे ही भय से सूर्य लव-निमेष-पल-पल आगे बढ़ता रहता है। मेरे ही भय से प्राण
खेलता है, मेरे ही भय से वायु प्रवाहित होता है, मेरे ही भय से अग्नि पेट में जठराग्नि के रूप में रहकर पेट में
जो भी कुछ है उसे हजम करा देता है। मेरे ही भय से इन्द्र समय-समय पर पर्जन्य धाराओं की वृष्टि करता है।
मृत्यु भी समय आने पर प्रलय कर देता है क्योंकि वह भी मुझसे बहुत डरता है। मेरे ही भय से समय अपनी
सीमा का अतिक्रमण नहीं करता मेरे ही भय की आशंका से तीनों लोक काँपते रहते हैं। तीनों लोकों का शास्त्र
और नियंता ईश्वर मैं हूँ। इतना कह कर भगवान ने जड़बुद्धि कर्मवादियों की कर्मठता तथा अनीश्वरवादित्व को
पंगु बना दिया। प्रवृत्ति में कितना अनर्थ है इसका उल्लेख पहले ही कर दिया है। उसी प्रकार वैराग्य स्थापित कर
निवृत्ति ही सबमें श्रेष्ठ है इसे भी निरूपित किया। अपने ऐश्वर्य का आविष्कार कर अपना ईश्वरत्व सिद्ध कर
दिया। अब मीमांसकों के मत का खण्डन करने के लिये उसी निरूपण का विस्तार कर रहे हैं। मीमांसकों का मत
है कि जीवों में अनेकता है, जीव ही कर्त्ता और भोक्ता है आदि। इसी का अब पूरी तरह खण्डन करते हैं।
गुणाः सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान्।
जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ॥ ३१॥
२६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, ये सभी ग्यारह इन्द्रिय अनेक प्रकार के कर्म करते हैं और आत्मा इन सबका
साक्षी रहता है। घर में दीपक जलते ही लोग अपना-अपना काम प्रारम्भ कर देते हैं। दीपक किसी को जलने के
लिये भी नहीं कहता और न जलने के लिये ही कहता है। उसी प्रकार यहाँ जीव की स्थिति है। अब आप कहेंगे
कि जिस प्रकार किसान कुल्हाड़ी लेकर पेड़ काटता है उसी प्रकार जीव इन्द्रियों को प्रेरणा देकर उनसे कर्म
करवाता है। लेकिन उसे इन्द्रियों की प्रेरकता बिलकुल सम्भव नहीं है। उसका वास्तविक कारण तुम्हें बताता हूँ,
सुनो। जो सत्त्वादिक गुण हैं वे ही इन्द्रियों को प्रेरणा देते हैं। जीव, गुण और इन्द्रिय इन दोनों का साक्षी है। उसे
कर्म की प्रेरकता नहीं होती। स्वयं प्रत्यक्ष स्पर्श न कर भी लौह चुम्बक अचेतन लोहे को गतिशील बनाता है उसी
प्रकार यहाँ जीव की स्थिति है अथवा सूर्य का उदय होते ही लोग अपने अच्छे-बुरे काम करने लगते हैं लेकिन
इसका प्रेरणास्रोत सूर्य नहीं होता। वह केवल कर्म के लिये साक्षी रहता है। उसी प्रकार जीव में वास्तव में कर्तृत्व
नहीं होता। ऊपर से जो भी कुछ दिखायी देता है वह केवल भ्रम है। पीलिया से जिसकी आँख प्रभावित रहती है
उसे चन्द्रमा भी पीला दिखायी देता है, उसी प्रकार जो मन्दबुद्धि हैं उन्हें ही आत्मा कर्त्ता होने का आभास होता
है। उनकी समझ में यह नहीं आता कि वह बिलकुल निश्चल है। बादल तीव्र गति से चलते हैं तो बच्चे कहते हैं
कि 'चन्द्रमा दौड़' रहा है। उसी प्रकार जो मंद बुद्धि होते हैं वे ही आत्मा को कर्त्ता मानते हैं। उपाधि के कारण
उन्हें यह भ्रम होता है। 'देह मैं हूँ' और 'कर्म मेरा है' यह बात आत्मा को स्वप्न में भी मालूम नहीं होती। यह
वैसा ही सत्य मानने की तरह है कि राजा मृगजल में डूब गया। सारांश आत्मा में किसी भी प्रकार की कर्तव्यता
नहीं होती यही सत्य है। अब यह भी असत्य है कि वह फल का भोक्ता है। स्वप्न में एक हजार गायें भी
दिखायी दें तो जागृत होने पर उनका दूध प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार उपाधि के कारण आत्मा भी मिथ्या भोक्ता
है। गढ़े में प्रतिबिंबित सूर्य यदि उसके कीचड़ का सेवन करे तभी समझना चाहिये कि आत्मा भी देहरूप भोक्ता
है। प्रतिबिंबित होने वाले चन्द्रमा को यदि मृगजल की मछलियाँ निगलने लगें तो यह माना जा सकता है कि
आत्मा भी देह के कारण भोग भोगता है। सारांश, आत्मा को जो भोक्ता कहते हैं वह उपाधि के कारण है। लेकिन
उपाधि तो मिथ्या है, फिर आत्मा भोक्ता कैसे होगा? इससे सिद्ध होता है कि आत्मा भोक्ता भी नहीं है और कर्ता
भी नहीं है। अब जीव की अनेकता की जो बात कही जाती है वह भी मिथ्या है इसे अब सिद्ध करते हैं।
यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः।
नानात्वमात्मनो यावत्पारतन्त्र्यं तदैव हि॥३२॥
जब तक जीव में सत्त्व रज तम का कोलाहल मचा रहता है तब तक जीव में अनेकता का भ्रम सच ही
मालूम होता है, अहंकार के कारण जब तब जीव को 'मैं' का आभास होता है, तब तक जीव अनेकता को सत्य
मानता है। लेकिन हे उद्धव, वह वास्तव में मिथ्या है। जिस प्रकार दर्पण हमें अपना ही चेहरा दिखाता है और दो
चेहरों का आभास कराता है, उसी प्रकार माया अविद्या के सहयोग से द्वैत का दर्शन कराती है। दर्पण में जो हमें
द्वैतप्रभाव दिखाई देता है वह आभास मिथ्या ही रहता है। वही आभास सामने रहने पर त्रिगुणों के विकार एक
होते हुए भी अनेक दिखायी देते हैं और वे गुणों के क्षोभ से सत्य मालूम होते हैं। हमें अपना एक ही चेहरा
चमचमाती तलवार में, दर्पण में तथा जल में क्रमशः लम्बोतरा, निश्चल तथा चंचल उस उपाधि के कारण मालूम
होता है। सारांश जिस प्रकार तीन प्रकार के कार्य विशेष के कारण हमें अपना चेहरा तीन प्रकार का दिखायी देता
है, उसी प्रकार गुणक्षोभ के कारण विविधता का होने वाला आभास झूठा है। वस्त्र में सूत ही बुना रहता है और
उस पर सूत की आड़ी-तिरछी पंक्तियाँ भी दिखायी देती हैं उसी प्रकार इस चराचर सृष्टि में अनेक आकारों में
दसवाँ अध्याय २६१
एक ही वस्तु भरी होती है। शर्करा का ईंख बना दिया जाय ऊपर का कठिन छिलका और भीतर सूखा और गन्ने
को निचोड़ कर रस निकाल लिया जाय इस प्रकार का त्रिगुण दोष उसमें नहीं होता। उसी प्रकार परमात्मा श्रीहरि
इस चराचर सृष्टि में अद्वितीय रूप में भरा हुआ है, सत्त्वादिगुणों के क्षोभ से ही उसमें अनेकत्व का आभास होता
है। जिस प्रकार बहुरूपिया अपने एक ही देह के अनेक रूप बनाता है उसी प्रकार सच्चिदानंद श्रीहरि आत्मरूप में
चराचर में एक ही होते हुए भी अनेक रूपों में दिखायी देता है। यही द्वैत का अद्वैत है। कुछ लोगों के मन में एक
शंका उपस्थित होती है, 'जीव अद्वैतरूपी है' यह तो हमें स्वीकार है लेकिन एक तरफ तुम ही कहते हो कि जीव
'पराधीन' है और अब कहते हो कि अद्वैत होने के कारण वह स्वतंत्र है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं, उन्हें
सच कैसे माना जाय ? एक और अद्वैत का प्रतिपादन करते हो और उधर लोकपालों को भी मेरा भय है ऐसी बात
करते हो, यह बात हमारी समझ से परे है। अद्वैत को किसका भय है ? हे उद्धव ! यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार
की शंका उपस्थित होती है तो उसे तुम्हारे मन का स्पर्श न होने दो। उसका रहस्य तुम्हें बताता हूँ, सुनो। जैसे-
जैसे जीव उपाधि से तादात्म्य प्राप्त करता है वैसे-वैसे उसे अनेकता का भास होने लगता है और जहाँ अनेकत्व
का आभास होता है वहाँ पराधीनता पहले ही उपस्थित हो जाती है। वहाँ फिर ईश्वर की सत्ता का नियंत्रण होता
है। प्रचण्ड सेना एकत्र होने पर भी वह सेनापति के बिना व्यर्थ है, रसीला आम कितना ही क्यों न पक जाय
लेकिन उसकी अच्छी सुरक्षा आवश्यक है, उसी प्रकार जब तक जीव को अनेकता का आभास होता है तब तक
सृष्टि के लिये उत्पत्तिकर्त्ता, संहारकर्त्ता तथा नियंता के रूप में ईश्वर सदैव रहता है और इस प्रकार जीव पराधीन
रहता ही है। अनेकता के कारण पराधीनता प्राप्त होती है इसीलिये नियंता ईश्वर रहता है। ईश्वर की ऐसी सत्ता
देखने पर जीवों को भय लगने लगता है। मेरी ईश्वरी सत्ता के भय से यम भी थर-थर काँपता है। फिर इन्द्रादि
देवताओं की क्या बात की जाय ? ब्रह्मदेव भी मुझसे डरते हैं। मेरी अंत प्रलय की सत्ता का प्रभाव हरिहर के
मस्तक पर भी पड़ता है। अनेकता का संहारक महाकाल मैं ही हूँ। इसीलिये जब तक अनेकत्व है तब तक काल
का भय भी दुःसह है और जब यह अनेकत्व ही समाप्त हो जाता है तो फिर काल किसका विनाश करेगा ?
सारांश अनेकत्व के माथे पर ईश्वरभय की काल सत्ता हैं। हे उद्धव ! उस अनेकत्व के कारण ही जीव को सदा
पराधीनता है। अनेकत्व जब समाप्त होता है तभी काल समाप्त होता है। फिर भय किसका रहेगा ? एकत्व में ही
स्वानंद होता है। जब द्वैत का मल न उठे तब सारी सृष्टि उसे ऐक्य रूप में ही दिखायी देती है। तब आत्मज्ञान से
स्वानंद की अगणित राशियाँ उपभोग के लिये प्राप्त होती हैं। निजात्म ज्ञान का अलौकिक और द्वैतभाव से रहित
अद्वैत सुख को छोड़ परममूर्ख कर्मवादी अनेक प्रकार के लोकों की इच्छा करते हैं। कर्मवादी अर्थात् लोकप्रवृत्त
ही अत्यन्त श्रेष्ठ है इसलिये कर्म करके ही उत्तम भोग भोगने चाहिये ऐसा पहले कहा गया था। इसी का खण्डन
कर उद्धव के मन में अद्वैत भावना दृढ़ करने के लिये भगवान उसी निरूपण को आगे बढ़ा रहे हैं।
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्।
य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचर्पिताः ॥ ३३ ॥
जिनमें गुण विषमता होती है वही नर भोगों के प्रति आसक्त होते हैं ऐसा समझ लो। वे ही नर यागादिक
कर्म कर भोग का स्थान भी प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस लोक को भी वे प्राप्त करते हैं वहाँ से याज्ञिकों को पतन
होने का भय रहता ही है इसलिये वह लोक भी अशाश्वत है यह जान कर उस लोक का अधिपति भी दुःखी ही
दिखायी देता है। वह पद भी जाता है, वह लोक भी जाता है और भोगकर्म से भोग भी नष्ट होते हैं और किये
हुए कर्म तो व्यर्थ होकर वे अधःपतन से दुःखी होते हैं। घायल हुए व्यक्ति को चाबुक से मारने पर जैसी वेदना
२६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होती है उसी प्रकार उसे जीवन-मरण के चक्र में घूमते समय अत्यन्त दुःख होता है और वह अघोर गर्भवास
भोगता है। रहट के कलशों के फेरे लगते रहते हैं, एक भरता है, एक खाली होता है उसी प्रकार यह भी जन्म से
लेकर मृत्यु तक इसी प्रकार चक्कर लगाता रहता है। बिच्छू के काटने से छटपटाने वाले की दाढ़ी में जैसे आग
लग जाय उसी प्रकार भोगक्षय से पतित होने वाले को गर्भ की पीड़ा भी सताती है। स्वर्गादि लोकों की अनित्यता
मालूम नहीं होती इसीलिये उन्हें अधिक दुःख भोगना होता है। संसार के भँवरजाल में फँसने के कारण ही उन्हें
कष्टों का फल दुःखों के रूप में प्राप्त होता है। जिन लोकों में भोगने के लिये भाग मिलते हैं उन लोकों को और
भोगों को अनित्य कहा जाय तो वह भी उचित, नहीं है क्योंकि भोगलोक यदि सत्य होते तो उन्हें 'अनित्य' कहा
जाता। जिस प्रकार रस्सी से सर्प का भ्रम होता है उसी प्रकार इन चौदह लोकों की स्थिति है। वह सारा माया का
ही खेल होने के कारण उसमें सुख का अंश कैसे होगा ? जो केवल मायामय है वहाँ भोगसुख कैसा ? कर्मठ लोग
मूर्ख होते हैं इसीलिये मायिक वस्तुओं की इच्छा करते हैं। मृगजल के तालाब में यदि चावल और केले की खेती
होती तो विषयभोग से सुख प्राप्त हुआ होता। लेकिन जो भ्रांत हैं उनकी समझ में यह बात नहीं आती। संसार तो
सारा भरा पूरा दिखायी देता है, उसे मायामय कैसे कहा जाय ? यदि तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हें सहज भाषा में
बताता हूँ, सुनो !
कालआत्माऽऽगमो लोकः स्वभावो धर्म एव च।
इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरे सति॥ ३४॥
यह संसार पूरी तरह मायामय एवं काल्पनिक है क्योंकि उसकी उत्पत्ति अज्ञान से ही है। मन में विकल्प
आने के कारण ही वह एक को अनेक कहता है। धतूरे का बीज खाने से बुद्धिमान व्यक्ति भी पागल हो जाता है
और उसे जो हैं ही नहीं ऐसे खरगोश, मछली, गौ, सर्प आदि का भास होने लगता है। उसी प्रकार माया के पाश
में फँसने के कारण उसे भ्रमवश अनेकत्त्व का भास होने लगता है। आकाश के बादलों को देखकर सुशोभित
नगर और किले दिखायी देने लगते हैं। अँधेरे में रस्सी देखकर वह कहने लगता है कि यह साँप है, यह लाठी है
या फूलों की माला हैं या कोई मोतियों का हार भूल गया है। उसी प्रकार मैं निजात्मा पुरुषोत्तम सर्वत्र होते हुए
मुझे नाना प्रकार के रूप देकर मुझे काल, आत्मा, वेद, स्वभाव, धर्म आदि के नाम से पुकारते हैं। प्रकृति क्षोभक
होने के कारण मुझे 'काल' कहते हैं। प्रकृति का नियामक होने के कारण मुझे 'आत्मा' कहते हैं, कर्म का प्रबोध
होने के कारण मुझे 'वेद' कहा जाता है और अदृष्ट का द्योतक होने के कारण मुझे 'धर्म' के नाम से पुकारा जाता
है। अदृष्ट को दृष्ट कर उसका भोग कराने के कारण उसे 'धर्म' कहते हैं। अब जिस कारण से उसे 'स्वभाव'
कहते हैं उसे भी जान लो। 'आत्मा-भोक्ता' इसी का नाम स्वभाव है। जिस परिणाम के कारण आत्मा, भोक्ता,
स्वभाव आदि का कारण बनता है, उसे स्वभाव कहते हैं। अनेक प्रकार के लोगों की प्राप्ति अदृष्ट का फल है।
मुझे 'लोक' कहने का भी यही कारण है। सारांश, मुझ अकेले को मूर्ख लोग व्यर्थ ही अनेक मानते हैं। दीवार
पर अनेक रंगों से यथातथ्य चित्र चित्रित रहता है जिससे दीवार नाना रूपों में दिखायी देती है, लेकिन वह
एकरूप ही रहती है। उसके अनुसार नाना प्रकार के रूप, नाना प्रकार के 'धर्म, 'नाना प्रकार के नाम तथा नाना
प्रकार के कर्म इन सबमें सदा सर्वोत्तम आत्माराम मैं हूँ। मेरे सिवा खाली जगह एक अणु के लिये भी नहीं है।
सारे देहों में सदासर्वदा मैं सर्वोत्तम आत्माराम ही हूँ। जिस प्रकार समुद्र में लहरें रहती हैं उसी प्रकार मुझमें सारा
जगत दिखायी देता है, लेकिन वह जगत नहीं स्वयं मैं ही हूँ और अव्यंग्य सुख मुझमें ही है। मैं शुद्ध बुद्ध मुक्त
दसवाँ अध्याय २६३
स्वभाव हूँ। फिर भी मुझे नाना प्रकार के सम्बोधन दिये जाते हैं। हे उद्धव ! जिसमें जैसा भाव होता है उसी के
अनुसार मैं उसका देवता बनता हूँ। जिसमें नास्तिक भाव रहता है, उसके लिये मैं कहीं नहीं रहता और जिसके
मन में आस्तिक्य बुद्धि होती है उसके लिये मैं सभी जगह उपस्थित रहता हूँ। भक्तिभाव से मुझे जो जहाँ देखता
है उसके लिये मैं वहीं उपस्थित रहता हूँ। देखो, मुझे प्राप्त करने के लिये विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं है।
सर्वात्मा, सर्वव्यापी एक मैं ही हूँ ऐसा जिसका निश्चयी भाव रहता है वही एक मेरा भक्त तथा मेरे ज्ञान का
तिलक है। वह यदि 'आत्मा' है तो मैं उसकी देह हूँ, मैं ध्याता हूँ और वह मेरा ध्येय है, मैं ज्ञाता हूँ और वह मेरा
शुद्ध ज्ञेय है, इतना वह मुझे प्रिय है। हे उद्धव ! जिसे 'एकात्मभक्ति' कहा जाता है, वह यही है। ज्ञानसम्पन्न ज्ञाता
इसी भक्ति से मेरा भजन करते हैं। उनमें और मुझमें अभेद प्रेम रहता है। इसलिये तुम भी इसी ढंग से भजन
करो। परमात्मा एक, नित्य और शुद्ध है, उसे मायामय संसार का बन्धन नहीं है और देहसम्बन्ध भी मिथ्या है इसे
ध्यान में रखो। यही मेरा सच्चा 'आत्मबोध' है। मिथ्या सम्बन्ध में ही जीव फँसता है और 'आत्मज्ञान' से उसकी
मुक्ति होती है। यह मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ। वही बात अन्य मतों का खण्डन कर दृढ़ की। चौहदवें
श्लोक से चौंतीसवें श्लोक तक मीमांसकों के मतों का विस्तार से खण्डन किया। इस प्रकार विरुद्ध मत का
खण्डन कर अद्वैत मत की दृढ़ स्थापना की। चराचर में श्रेष्ठ यही सच्चा आत्मज्ञान है। यह शुद्ध और पवित्र अद्वैत
ज्ञान श्रवण कर उद्धव को बहुत प्रसन्नता हुई। उसके अंतःकरण में हर्ष की तरंगें एकत्र होने लगीं। उसने श्रीकृष्ण
की ओर देखा। वह प्रेम से विह्वल हो गया। वह चिंतन भूल गया, उसकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वह अपने
ही अस्तित्व को भूल गया। उद्धव क्षण भर के लिये अपना होश खो बैठा। इतने में अपने पर नियन्त्रण पाकर वह
श्रीकृष्ण के सामने आ गया। जो अद्वैत भजन करते हैं वही कृष्ण के प्यारे होते हैं इसलिये ऐसा अद्वैत भजन मुझे
कैसे प्राप्त होगा इस सम्बन्ध में वह श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
गुणेषु वर्तमानोऽपि देहेष्वनपावृतः ।
गुणैर्न बद्ध्यते देही बद्ध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥
उद्धव ने कहा, हे कृष्णनाथ ! आत्मा जब शरीर में रहता है तो क्या वह वास्तव में बन्धन में रहता है या
नहीं रहता ? गुण रहते मुक्ति मिलती है या गुण जाने पर मुक्ति मिलती है? यही बात मुझे निश्चयपूर्वक और मुक्त
मन से बताओ। गुण रहते मुक्ति मिलती है यह बात बिलकुल असंगत है क्योंकि ज्वर के रहते कभी स्वास्थ्य
ठीक रहना सम्भव नहीं है या कीड़ा लगने पर पेड़ नहीं बढ़ सकता। शरीर में पत्थर बाँधकर समुद्र में कौन तैर
पायेगा? उसी प्रकार जब तक शरीर में तीन गुण हैं तब तक मुक्ति कैसे मिलेगी? रज तम आदि जो गुण हैं उनका
कार्यक्षेत्र देह है इसलिये वह बिना हिचक गुणों जैसे ही कर्म करता है। इसलिये उन कर्मों का जो फल है, जो
सुख-दुःख है उसे भोगना आवश्यक हो जाता है और ज्ञानी लोग तो कहते हैं कि गुणों को मुक्ति नहीं है। हे
कृष्ण ! यदि यह कहें कि गुण जाने पर मुक्ति मिलेगी तो वह भी सम्भव नहीं है। हे करुणानिधि ! इस सम्बन्ध में
मैं आपसे विनती करता हूँ उसे सुनो। गुणों का कार्य है देह के इन्द्रिय, गुण जाने पर देह का रहना वैसे ही है जैसे
भूमि विहीन वृक्ष। कारण समाप्त हो जाय और कार्य शेष रह जाय, क्या यह सम्भव है ? गुण जाने पर देह जायेगा
ही फिर मुक्त नर कैसे आचरण करेगा ? सारांश, गुण रहें या न रहें तो भी मुक्ति कभी प्राप्त नहीं होगी ऐसा मेरा
विचार है। इसलिये हे कृष्णनाथ ! इसी के सम्बन्ध में मैं तुम्हारा विचार पूछता हूँ। हे जगन्नाथ ! मैं पुनः आपसे
२६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसी विनती करता हूँ कि गुण और आत्मा कभी एक साथ नहीं रह सकते। जिस प्रकार मृगजल से भरे तालाब में
चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ेगा उसी प्रकार आत्मा कभी गुणों से बँध नहीं सकता क्योंकि गुणों का स्पर्श भी न
करना उसका स्वभाव धर्म है। गुण है अज्ञान की रात्रि और आत्मा स्वयंप्रकाश सूर्य है। उसके सामने वे आयें भी
तो कैसे ? और उसे बाँधें भी तो कैसे ? अन्धकार यदि सूर्य को निगल सकेगा, कौआ यदि कैलाश पर्वत पर
पहुँचेगा, बगुला यदि मारुति को जर्जर कर पायेगा या मच्छर हाथी को खायेगा मक्खी के पंखों से यदि आकाश
उड़ जायेगा, मेरु पर्वत यदि जलकुण्ड में डूब जायेगा या मृगजल में जहाज डूबेगा तभी आत्मा गुणों के बन्धन में
बद्ध होगा। जिस प्रकार आकाश जाल में नहीं फँसता उसी प्रकार आत्मा भी गुणसमुदाय में नहीं फँसता। फिर
सुख-दुःख का अनुभव गुणों के कोलाहल में वह कैसे भोगेगा ? इस प्रकार विचार करें तो आत्मा किसी बन्धन में
नहीं पड़ता फिर मुक्ति की बात क्यों की जाय ? अतः हे श्रीकृष्णनाथ बद्ध-मुक्त अवस्था किसे प्राप्त होती है
बतायें। सारांश, यहाँ बन्धन होने का क्या कारण है ? और मुक्त नर का क्या लक्षण है ? तात्पर्य बद्ध और मुक्त का
सविस्तार लक्षण मुझे बतायें।
कथं वर्तेत विहरेत् कैर्वा ज्ञायेत लक्षणैः।
किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा ॥ ३६॥
हे श्रीपति ! अब मुझे बद्ध और मुक्त की स्थिति बतायें। वे दोनों किन लक्षणों से और कैसे पहचाने जायेंगे ?
उसी प्रकार विदेह स्थिति प्राप्त होने के बाद वे देह में किस प्रकार विचरण करते हैं ? मुक्तता प्राप्त करने के बाद
वे देह से भोग कैसे भोगते हैं ? उनके त्याग की छाप कैसी रहती है यह भी बतायें ? हे श्रीकृष्ण ! इसे भी बतायें
कि उनकी निद्रा का क्या लक्षण है ? उनका आसन कैसा रहता है ? पूर्ण परब्रह्म जानने के बाद उनका विचरण
किस प्रकार का होता है ? ऐसे जो मुक्तों के लक्षण होंगे और बद्धों के उनसे अलग दीखने वाले लक्षण क्या हैं वह
भी कृपा करके मुझे बतायें।
एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे भ्रमः ॥ ३७॥
हे सर्वश्रेष्ठ वैकुंठाधिपति गोविन्द ! इन प्रश्नों के उत्तरों की मुझे बड़ी उत्कंठा लगी हुई है, आप उनके
समुचित उत्तर देने में समर्थ एवं श्रेष्ठ हैं। यह गुणों का सम्बन्ध अनादि काल से चलता चला आ रहा है इसलिये
आत्मा 'नित्यबद्ध' हो गया है। इसलिये 'नित्यमुक्त' यह शब्द बिलकुल असंगत लगता है। आत्मा को यदि
नित्यमुक्तता प्राप्त हो तो 'बंधन' शब्द का उच्चार ही नहीं करना चाहिये। एक ही को 'बद्ध' और 'मुक्त' कहें तो
हे श्रीकृष्ण ? मुझे इसमें भ्रम लगता है। हे श्रीकृष्ण, आत्मा तो सचमुच एक है। उस एक की ही बन्धन और मुक्ति
ये दो अवस्थायें कैसी होंगी ? जो तृप्त हुआ है वही भूखा, जो जागृत है वही सोया हुआ, जो जीवित है वही मृत
इस बात को कैसे सच माना जाय ? जो काला है वही सफेद, जो आँख वाला है वही अन्धा, जो आधा है उसे
पूरा कैसे कहा जाय ? कैरैले की बेल में केला कैसे उत्पन्न होगा ? नमकीन नमक बिना, सूखा पानी, शीतल और
भीषण अग्नि, गूँगा हो उसे वाचाल कैसे कहा जाय ? साड़ी ही नग्न होने के कारण लज्जा करे, अन्न ही भूख के
कारण व्याकुल हो, मुक्त को ही मुक्ति का अकाल, कर्पूर को ही सुगन्ध नहीं है यह कैसे कहा जाय ? उसी प्रकार
संत को ही असंत, अद्वैत को ही द्वैत, हित ही अनहित है ऐसा अब हमें लगने लगा है। आत्मा नित्यमुक्त हैं तथा
वह शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है, यह आपने ही बोध कराया था और वही गुणों की संगति से बद्ध होता है ऐसा
दसवाँ अध्याय २६५
आपने बोध कराया। इससे मैं बड़ी असमंजस में पड़ गया हूँ। भगवन्! एक ही को एक ही समय बन्धन और
मुक्ति कैसे होगी? हे अनंत! आप कृपालु हैं। इसलिये इसमें सत्य क्या है यह बतायें। मुक्ति को आप आगंतुक
कहें तो मोक्ष अनित्य हुआ और बन्धन को आगंतुक कहें तो उसका आदि भी हुआ। पहले बन्धन था ही नहीं वह
आज से उत्पन्न हुआ इस प्रकार यदि कहा जाय तो वह शास्त्रार्थ के विरुद्ध होगा। श्रुति, स्मृति और शास्त्रों के
अनुसार मुक्ति और बन्ध अनादि सिद्ध हैं और आत्मा एक होते हुए उसकी ये दो अवस्थाएँ? और वे भी एक
दूसरे के विपरीत? यह बात कितनी विचित्र है? यदि बद्धता बढ़ती है तो वह मुक्ति का छल करेगी और मुक्ति
बिफर जाय तो वह बन्धन को को भी निगल लेगी। ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ आत्मा के पास किस तरह रह
पाती हैं? यदि शाम को भोर होगी तभी विद्या और अविद्या एक होगी, सूर्य यदि अन्धकार की गठरी बाँध दे तंभी
ये अवस्थायें आत्मा के साथ रहेंगी। हींग को यदि कर्पूर की गन्ध आने लगे, यदि अविद्या विद्या के बीच आये,
खरगोश यदि शेर पर टूट पड़े तभी ये अवस्थाएँ आत्मा के साथ रहेंगी। उद्धव ने कहा, "हे कृष्णनाथ! ये दो
अवस्थाएँ कैसी हैं यह समझ में आ जाय तो समझो मुक्ति भी हाथ लग गयी, ऐसा मैं निःसन्देह समझता हूँ।"
उसने पुनः कहा, भगवन्! तुम ही मोक्षदाता हो, इसलिये मुझे वे अवस्थाएँ स्पष्ट करके बतायें। इतना कह कर
उसने उनके चरणों पर मस्तक रख दिया। उद्धव का यह मार्मिक प्रश्न सुनकर नारायण परम संतुष्ट हुए। मेरा
उद्धव अब ज्ञानी हो गया इस विचार के मन में आते ही वे आनन्द से डोलने लगे। परमार्थ के प्रति उसकी
छटपटाहट तथा उसके प्रश्न का महत्त्व ध्यान में लाकर वे अपनी काया उद्धव पर न्यौछावर करने के लिये तैयार
हो गये। भगवान् भक्तों के वचन का कभी उल्लंघन नहीं करते। इसके लिये उन्होंने अपने गुप्त ज्ञान का भण्डार
खोल दिया। सचमुच, जब परमेश्वर प्रसन्न होता है तो वह भक्तों पर अपार कृपा ही करता है। उद्धव का प्रश्न
गहरा होने के कारण जगजीवन कृष्ण कृपा से द्रवित हो उठा। एका जनार्दन (एकनाथ) विनयपूर्वक बताता है
कि वह आनन्द का मेघ ही बन कर आया। उसकी वृष्टि से अब शिष्यरूप नदी में आनन्द की बाढ़ आयेगी
जिसके फलस्वरूप शिष्य ज्ञानगंगा के समुद्र से जा मिलेगा। संसार की आस्था छोड़कर जो भक्तिमार्ग पर चल
पड़ा वही इस भागवत का सच्चा अधिकारी है और वही परमार्थ का वास्तविक ग्राहक है और जिसके पेट में
संसार की ही चिन्ता है, उसके मन में यह कथा सुनकर विपरीत भावनाएँ उत्पन्न होंगी क्योंकि चित्त जिस चीज
का चिन्तन करता है वैसे ही होता है। जब तक चित्त सावधान और स्थिर नहीं है तब तक भागवत समझ में नहीं
आयेगा। उसी प्रकार गुरु के बिना भागवत का अर्थ प्राणियों की समझ में नहीं आयेगा। जो संसार से विरक्त होगा,
जो गुरु-चरणों के प्रति अनुरक्त होगा उसे ही परमार्थ प्राप्त होगा और उसे ही भागवत की फलप्राप्ति होगी।
श्रीकृष्ण का मुख देखकर ही उद्धव को नित नया समाधि सुख प्राप्त होता था, फिर भी और अधिक सुनने की
उसे इच्छा थी, इतनी महान थी उसकी श्रद्धा। जिसका वेदों ने भी प्रतिपादन किया है ऐसा वह ज्ञानस्वरूप
परमात्मा श्रीकृष्ण, जिसका गुह्यज्ञान बार-बार सुनने को मिले इसलिये उसने नितांत योग्य प्रश्न ही पूछा था। अब
भगवान श्रीकृष्ण विद्या और अविद्या का निराकरण करेंगे। यह अगला अध्याय बहुत सरस है। श्रोतागण मेरी ओर
ध्यान दें। श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच हुए संवाद की कथा अत्यन्त आह्लाद देने वाली है। इससे एका जनार्दन
(एकनाथ) में भी महाज्ञान और परमानंद प्रकट होगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
परमहंस संहितायां एकाकार टीकायां दशमोध्यायः ॥ १० ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु ।
ग्यारहवाँ अध्याय
श्री गणेशाय नमः! श्री कृष्णाय नमः! हे ओंकाररूप श्री गुरु! तुम्हें नमस्कार है। तुम सत् और चित् के मेघ
हो। तुम स्वानंद जीवन की वृष्टि करते हो जिससे मुमुक्षुरूपी मयूरों को आनन्द होता है और वे हर्ष से नाचने
लगते हैं। उन सजल मेघों को देखकर वे 'सोऽहं' अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' का आर्तनाद करने लगते हैं और
रोमांचरूपी पंख खोलकर अत्यन्त तीव्र गति से सत्त्व का नृत्य करने लगते हैं। स्वानंद के आवेग में नृत्य करने के
कारण उनके सारे शरीर में बड़ी-बड़ी आँखें उभर आती हैं और वे सारे पंख शोभित हो जाते हैं, इसीलिये
श्रीकृष्ण उन पंखों को मस्तक पर धारण करते हैं। वह मेघ सामने देखकर आर्त (भक्त मुमुक्षु) रूपी चातक मुँह
खोलते हैं। मुँह में एक बूँद पड़ते ही वे सुखी तथा नित्य निर्दोष हो जाते हैं। आर्त की तृष्णा तत्काल दूर होती है।
वे स्वानंदजल से तृप्त होकर हर्षोल्लास के साथ सुख का उपभोग करते हैं। उत्तम और निर्मल भूमि देखकर,
उचित समय पर वे मेघवृष्टि करते हैं। उनकी वह सतत और प्रचण्ड वृष्टि शुरू होने पर जल की अनगिनत लहरें
उठने लगती हैं। उस कृपारूपी वर्षा की शुरुआत होते ही शिष्यरूप नदी में बाढ़ आ जाती है। विकल्परूपी कूड़ा
वह बाढ़ अपने प्रवाह में बहा ले जाती है। अनन्तर वह निर्मल प्रवाहयुक्त नदी चिदैक्य सागर में जा मिलती है
और उससे समरस होकर आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाती है। फिर वैराग्य से शुद्ध की हुई भूमि अपनी ही आर्द्रता
से गीली हो जाती है और मृदु हो जाती है। लेकिन उसमें बीज अंकुरित नहीं हुए होते ऐसी उस भूमि पर जब
जल की निरन्तर वर्षा होने लगती है तो वासनारूपी ढेले गलने लगते हैं और सद्भाव की आर्द्रता मिलने से ज्ञान
की वाष्प निकलने लगती है। तब वहाँ आत्मबीज बोये बिना ही अपने आप परिपूर्ण अंकुर निकल कर खेत में
फसल स्वयमेव तैयार हो जाती है। बालों में दाने स्वाभाविक रूप से ही स्वस्थ्य एवं पुष्ट रहते हैं। परमकूपा से
पोषण से पुष्ट होकर समदृष्टि के बाल पकने लगते हैं। परमानन्द से सृष्टि भर जाती है। जीव और शिव एकरूप
हो जाते हैं। दुःखरूपी अकाल समाप्त होकर सुख के सुकाल का उदय होता है। कृपाधन सद्गुरु जब कृपा की
वर्षा करने लगते हैं तो सच्छिष्यों में हर्ष का कोलाहल शुरू हो जाता है। आत्मज्ञानरूपी पर्जन्य की जब वर्षा होने
लगती है तो साथ ही अवताररूपी ओलों की भी वर्षा होती है। वे ओले कार्य के अनुरूप आकार प्राप्त कर अन्त
में निराकार में विलीन हो जाते हैं। उस पर्जन्य के तुषार यदि दैवयोग से जड़मूढ़ पर पड़ जाएँ और उसका एक
बूँद भी सहसा उसके मुँह में पड़ जाय तो वह संतों की सभा में सम्मान पाता है। श्री हरिरूपी सद्गुरु महामेघ की
जिस पर कृपा हो जाय वही चराचर में धन्य होकर देवताओं में तथा मानवों में भी पूजनीय बन जाता है। 'गुरु'
शब्द का अर्थ भारी (वजनी) है। लेकिन वह इतना हलका है कि भवसागर में स्वयं तैर कर शिष्य को भी पार
कराता है। उसका आदि, मध्य और अन्त वेद भी नहीं जान पाये। यह वही सद्गुरु आनन्दघन जनार्दन है जिसने
मेरा एकाकीपन दूर कर इस एक एका को (एकनाथ) को पावन कर दिया और देखो! आत्मज्ञान का बोध
कराकर जो एक है वही अनेक है और जो अनेक है वही एक है यह निश्चित कर दिया। निजआत्मैक्य का ज्ञान
कराकर उसी ऐक्य से भक्ति मार्ग पर लगा दिया और अपनी ही कथा सुनाने के लिये मुझे श्रीभागवत सुनाने के
लिये खड़ा कर दिया। भागवत की कथा यही है कि दशम अध्याय के अन्त में उद्धव ने श्रीकृष्ण को बद्धों की
और मुक्तों की व्यवस्था के बारे में पूछा। उद्धव का प्रश्न अत्यन्त जटिल था। उसे सुनने के बाद अब श्रीकृष्ण
अपने अंतःकरण का गुह्य ज्ञान उद्धव को बताने वाले हैं। वे प्रश्नोत्तर श्रवण करने से जन्ममरण के फेरे समाप्त हो
जायेंगे, संसार की छत टूट जायेगी और विषयों का लेनदेन भी समाप्त हो जायेगा। मोक्षमार्ग के यात्री जो बेचारे
अनेक साधन अपना कर थक गये, उन्हें भी बंधमोक्ष की प्रतियोगिता जीतने के लिये शीघ्र यहाँ आना चाहिये
और भी जो जप-तप आदि साधन कर अथवा ध्येयध्यानादि अनुष्ठान करके हैरान हुए हों उन्हें भी शीघ्र यहाँ
आकर इस साधन से ज्ञान-अज्ञान पर विजय प्राप्त करनी चाहिये। ऐसी यह कथा नितांत जटिल है। इसलिये
श्रोताओं को सावधान होना चाहिये। एकनाथ विनती करता है कि आज स्वानंदघन जनार्दन प्रसन्न हो गये हैं। इस
ग्यारहवें अध्याय में बद्ध और मुक्त का भेद तथा साधु का लक्षण इसके बारे में श्रीकृष्ण बतायेंगे। इसी क्रम में
प्रसंग के अनुसार भक्ति का लक्षण तथा ग्यारह पूजा के अधिष्ठान का श्रीहरि निरूपण करेंगे।
श्री भगवानुवाच
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः।
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् ॥१॥
हे उद्धव! यदि तुम बद्ध और मुक्त अवस्थाओं को सच मानते हो तो यह सच नहीं है। सुनो, मैं तुम्हें
बताता हूँ। सच पूछो तो मेरे स्वरूप में बद्ध और मुक्त ऐसी अवस्थाएँ हैं ही नहीं। वह सब गुणों के कार्य का
परिणाम है। उनका सम्बन्ध मुझ से नहीं है। मेरे आत्मस्वरूप में न बद्धता है न मुक्तता है। गुणों के कार्यों से ही
गुणों में बद्धता का और मुक्तता का भास होता है। गुण समूल मायावी हैं। मैं माया से विरत, गुणातीत हूँ। सत्य
पर यदि असत्य की बाधा हो जाय तो सारे लोग मृगजल में भी डूबेंगे। चित्त में बनी हुई आग से गाँव जल कर
भस्म होंगे, या स्वप्न के सिक्कों से सांसारिक लेन-देन होगा अथवा जब सूर्य को उसका प्रतिबिम्ब निगल
जायेगा, पुरुष को उसकी छाया बाँध देगी, समुद्र यदि मृगजल में डूब जायगा तभी मैं गुणों की त्रिगुट मुझे बाँध
पायेगी। जीभ पर यदि केश उग आयें, हथेली पर यदि पेड़ उग जायें, आँख में यदि पर्वत घुस जाये, तभी मैं
गुणों के मेल से जकड़ा जाऊँगा। आकाश को यदि कुदाल खरोंच सके अथवा वायु के ललाट पर काजल चढ़े
या बिजली के मस्तक पर लोग सेहरा बाँधे या आकाश टूट कर समुद्र में गिर पड़े पर्वत के साथ सारी पृथ्वी हवा
से उड़ जाये, सूर्य अन्धकार में लड़खड़ाकर गिर पड़े तभी मैं गुणों में दिखाई पडूँगा। अधर में लटकते आकाश
में सरोवर हो, उसमें अनेक प्रकार के मनोहारी कमल खिल उठें और उनका मकरंद भ्रमर सेवन करें ऐसा यदि
सम्भव होगा तभी मैं आत्म गुणों के मेल से नाना प्रकार के विषयों का भोग कर फिर उन विषयों के लालच से
स्वयमेव उन गुणों से बँध जाऊँगा। तीन गुणों के अधीन रहकर कार्य करने से गुणकार्यों से तादात्म्य हो जाता है।
उससे भ्रान्तों को बद्ध और मुक्त इन अवस्थाओं का व्यर्थ ही आभास होता है। तुम कहोगे कि यदि गुण और
आत्मा ये अलग हैं इसे सच मान भी लें तो गुणों के साथ रहने से आत्मा अवश्य ही विकारग्रस्त हो जायेगा।
लेकिन भाई! जिस प्रकार अग्नि के कारण बर्तन गरम होता है, उसके कारण पानी गरम होता है और पानी गरम
होने से खाना पकता है, उसी प्रकार आत्मा विकार मुक्त होता है। अग्नि के ताप से आकाश गरम नहीं होता उसी
प्रकार आत्मा गुणों के साथ रहने पर भी विकार मुक्त रहता है। बहुरुपिया अन्धा दिखाई देने पर भी अन्धा नहीं
होता उसी प्रकार आत्मा गुणों के साथ विचरता दिखाई देने पर भी अपनी निर्गुण अवस्था में ही अवस्थित रहता
है। बहुरूपिया अन्धेपन के अपने अभिनय से सचमुच का अन्धा नहीं बन जाता, उसी प्रकार आत्मा भी गुणों के
मेल से बद्ध नहीं हो जाता क्योंकि ये गुण मायावी हैं और आत्मा शुद्ध है। उनका और इसका किसी भी अर्थ में
कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा व्यापक है और गुण सीमित। इस दृष्टि से भी उसे कोई बन्धन सम्भव नहीं है
२६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्योंकि कलश में समुद्र कैसे समा सकेगा ? राई में पर्वत कैसे रह पायेगा ? अंजुली में यदि पृथ्वी समा सकेगी
चिऊँटी यदि हाथी को निगल पायेगी, जुगनू यदि सूर्य को अपना ग्रास बना पायेगा, मक्खी यदि ब्रह्माण्ड को
अपनी बगल में दबा सकेगी, पतंगा प्रलयानल को स्वाहा कर पायेगा तो आत्मा को गुण एकत्र होकर अपने पाश
में बाँध सकेंगे। इस प्रकार बद्धता प्राप्त होना यही असम्भव बात है। बद्धता जाते ही उसके साथ मुक्तता भी
गयी। लेकिन मैं आत्मा के रूप में जो हूँ वह सचमुच बद्ध-मुक्त अवस्थाओं से परे हूँ। स्वप्न का पुण्यात्मा
अथवा महापापी दुष्ट ये दोनों ही जागृत होने पर जिस प्रकार मिथ्या मालूम होते हैं उसी प्रकार आत्मा में भी
बद्धता और मुक्तता ये दोनों मिथ्या हैं। इसलिये जीवात्म पर बद्धता का जो आरोप किया जाता है वह सच नहीं
है। फिर मुझ परमात्मा को बद्ध-मुक्त अवस्था कैसी ? बिम्ब अथवा प्रतिबिम्ब में मल नहीं है लेकिन वह दर्पण
की काँच पर लगा होने के कारण वह देह पर ही लगा है ऐसा लगता है। यदि उसे साफ करना हो तो दर्पण को
ही रगड़ना होगा। ऐसा न कर प्रतिबिम्ब को साफ करने का प्रयत्न करना उचित नहीं होगा। उसी प्रकार जीव
और शिव में दोष नहीं होता वह अंतःकरण में होता है। अंतःकरण को ही शुद्ध करने से बन्ध और मोक्ष दोनों
की ही छुट्टी हो जाती है। उसी प्रकार गुणों के कारण उत्पन्न होने वाले जो अनेक प्रकार के दोष हैं वे सब
अविद्यात्मक हैं। मूर्ख लोग अपनी स्थूल बुद्धि से उन्हें जीव की देह के साथ जोड़ते हैं। प्रबल हो गये गुण जब
सद्बुद्धि से झड़ जाते हैं तभी अविद्या के कारण लगे हुए दोष नष्ट होते हैं और अविद्या ही निर्मल सविद्या हो
जाती है, जीव शिव होकर रहता है। जीव और शिव ये दोनों जब मुझमें एकरूप हो जाते हैं तब मुझ अकेले के
सिवा इस जन में या वन में कुछ शेष नहीं रह जाता। जीवभावना से देखें तो मैं ही जीव हूँ और शिवभावना से
देखें तो मैं ही शिव हूँ। मैं एक भी नहीं हूँ और अनेक भी नहीं हूँ।, मेरा अनुभव मैं ही जानता हूँ। अब यहाँ तुम
ऐसी शंका करोगे कि यदि जीव और शिव दोनों तुम ही हो तो फिर केवल शुकवामदेव ही क्यों मुक्त हैं? और
दूसरों को जड़ जीव क्यों कहते हैं ? जीव के रूप में भी जब सचमुच तुम ही हो तो फिर यह भेदभाव क्यों है ?
शुकवामदेवों की यह अवस्था वेदशास्त्र सम्मत है। वेदवाक्य की तो तीनों लोकों में मान्यता है, इसलिये यह बात
कुछ विचित्र-सी लगती है और इसलिये असत्य है ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह ठीक ही है। वेद कहता है वही
सच है। वेद का वचन मेरा श्वासोच्छ्वास है लेकिन जो मैं अपने मुँह से कहता हूँ उसे तुम झूठ क्यों कहते हो ?
वेदों को भी वाणी देने वाला, सभी शास्त्रों का रचयिता मैं उसके भाषण की तुम असत्य कहते हो और स्वयं को
बड़ा बुद्धिमान समझते हो। वेदों के तीन खण्ड हैं, कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड और ज्ञानकाण्ड ! पाखण्डी नर उसे
वेदवाक्य के बल पर ही मुँह बजाता है। वेद के कारण ही अनेक मतभेद तथा विवाद उत्पन्न होते हैं। लेकिन वेद
केवल मेरा परोक्षवाद है। उससे तत्त्वज्ञान का बोध कैसे प्राप्त होगा ? शब्दज्ञान और ब्रह्मज्ञान बाह्य दृष्टि से एक
से लगते हैं। जिस प्रकार एक तोला और एक तोला सुवर्ण भार एक से होते हैं लेकिन दोनों के मूल्य में कभी
बराबरी नहीं हो सकती उसी प्रकार वेदवाक्य और ब्रह्मस्वरूप का अनुभव ये दोनों एक से नहीं हैं। जिसे हरिहर
भी स्वीकार करते हैं, उसकी बात को तुम प्रमाण नहीं मानते हो यह केवल तुम्हारा ज्ञानाभिमान है। इस अभिमान
का त्याग करो। मेरा भाषण सत्य का भी सत्य है इसे निश्चित रूप से जान लो। तभी परमार्थ सिद्ध होगा। मेरे
इस वचन को ब्रह्म का लेख समझो। हे उद्धव ! मेरे विचार से वसिष्ठ वामदेव की. बातों में बद्ध और मुक्त का
कोई भेद नहीं है। यही मेरा सच्चा आत्मानुभव है। मुक्तों की दृष्टि से देखें तो सारी सृष्टि मुक्त दिखाई देगी
इसलिये शुक और वामदेव की बात अलग कैसे होगी ? बद्धमुक्त से भिन्न मैं चिद्धन परमात्मा हूँ। अगर तुम यह
कहते हो कि जीव को भी बन्धन है तो वह भी सच नहीं है।