श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंजायेंगे, संसार की छत टूट जायेगी और विषयों का लेनदेन भी समाप्त हो जायेगा। मोक्षमार्ग के यात्री जो बेचारे
अनेक साधन अपना कर थक गये, उन्हें भी बंधमोक्ष की प्रतियोगिता जीतने के लिये शीघ्र यहाँ आना चाहिये
और भी जो जप-तप आदि साधन कर अथवा ध्येयध्यानादि अनुष्ठान करके हैरान हुए हों उन्हें भी शीघ्र यहाँ
आकर इस साधन से ज्ञान-अज्ञान पर विजय प्राप्त करनी चाहिये। ऐसी यह कथा नितांत जटिल है। इसलिये
श्रोताओं को सावधान होना चाहिये। एकनाथ विनती करता है कि आज स्वानंदघन जनार्दन प्रसन्न हो गये हैं। इस
ग्यारहवें अध्याय में बद्ध और मुक्त का भेद तथा साधु का लक्षण इसके बारे में श्रीकृष्ण बतायेंगे। इसी क्रम में
प्रसंग के अनुसार भक्ति का लक्षण तथा ग्यारह पूजा के अधिष्ठान का श्रीहरि निरूपण करेंगे।
श्री भगवानुवाच
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः।
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् ॥१॥
हे उद्धव! यदि तुम बद्ध और मुक्त अवस्थाओं को सच मानते हो तो यह सच नहीं है। सुनो, मैं तुम्हें
बताता हूँ। सच पूछो तो मेरे स्वरूप में बद्ध और मुक्त ऐसी अवस्थाएँ हैं ही नहीं। वह सब गुणों के कार्य का
परिणाम है। उनका सम्बन्ध मुझ से नहीं है। मेरे आत्मस्वरूप में न बद्धता है न मुक्तता है। गुणों के कार्यों से ही
गुणों में बद्धता का और मुक्तता का भास होता है। गुण समूल मायावी हैं। मैं माया से विरत, गुणातीत हूँ। सत्य
पर यदि असत्य की बाधा हो जाय तो सारे लोग मृगजल में भी डूबेंगे। चित्त में बनी हुई आग से गाँव जल कर
भस्म होंगे, या स्वप्न के सिक्कों से सांसारिक लेन-देन होगा अथवा जब सूर्य को उसका प्रतिबिम्ब निगल
जायेगा, पुरुष को उसकी छाया बाँध देगी, समुद्र यदि मृगजल में डूब जायगा तभी मैं गुणों की त्रिगुट मुझे बाँध
पायेगी। जीभ पर यदि केश उग आयें, हथेली पर यदि पेड़ उग जायें, आँख में यदि पर्वत घुस जाये, तभी मैं
गुणों के मेल से जकड़ा जाऊँगा। आकाश को यदि कुदाल खरोंच सके अथवा वायु के ललाट पर काजल चढ़े
या बिजली के मस्तक पर लोग सेहरा बाँधे या आकाश टूट कर समुद्र में गिर पड़े पर्वत के साथ सारी पृथ्वी हवा
से उड़ जाये, सूर्य अन्धकार में लड़खड़ाकर गिर पड़े तभी मैं गुणों में दिखाई पडूँगा। अधर में लटकते आकाश
में सरोवर हो, उसमें अनेक प्रकार के मनोहारी कमल खिल उठें और उनका मकरंद भ्रमर सेवन करें ऐसा यदि
सम्भव होगा तभी मैं आत्म गुणों के मेल से नाना प्रकार के विषयों का भोग कर फिर उन विषयों के लालच से
स्वयमेव उन गुणों से बँध जाऊँगा। तीन गुणों के अधीन रहकर कार्य करने से गुणकार्यों से तादात्म्य हो जाता है।
उससे भ्रान्तों को बद्ध और मुक्त इन अवस्थाओं का व्यर्थ ही आभास होता है। तुम कहोगे कि यदि गुण और
आत्मा ये अलग हैं इसे सच मान भी लें तो गुणों के साथ रहने से आत्मा अवश्य ही विकारग्रस्त हो जायेगा।
लेकिन भाई! जिस प्रकार अग्नि के कारण बर्तन गरम होता है, उसके कारण पानी गरम होता है और पानी गरम
होने से खाना पकता है, उसी प्रकार आत्मा विकार मुक्त होता है। अग्नि के ताप से आकाश गरम नहीं होता उसी
प्रकार आत्मा गुणों के साथ रहने पर भी विकार मुक्त रहता है। बहुरुपिया अन्धा दिखाई देने पर भी अन्धा नहीं
होता उसी प्रकार आत्मा गुणों के साथ विचरता दिखाई देने पर भी अपनी निर्गुण अवस्था में ही अवस्थित रहता
है। बहुरूपिया अन्धेपन के अपने अभिनय से सचमुच का अन्धा नहीं बन जाता, उसी प्रकार आत्मा भी गुणों के
मेल से बद्ध नहीं हो जाता क्योंकि ये गुण मायावी हैं और आत्मा शुद्ध है। उनका और इसका किसी भी अर्थ में
कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा व्यापक है और गुण सीमित। इस दृष्टि से भी उसे कोई बन्धन सम्भव नहीं है