श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, ये सभी ग्यारह इन्द्रिय अनेक प्रकार के कर्म करते हैं और आत्मा इन सबका
साक्षी रहता है। घर में दीपक जलते ही लोग अपना-अपना काम प्रारम्भ कर देते हैं। दीपक किसी को जलने के
लिये भी नहीं कहता और न जलने के लिये ही कहता है। उसी प्रकार यहाँ जीव की स्थिति है। अब आप कहेंगे
कि जिस प्रकार किसान कुल्हाड़ी लेकर पेड़ काटता है उसी प्रकार जीव इन्द्रियों को प्रेरणा देकर उनसे कर्म
करवाता है। लेकिन उसे इन्द्रियों की प्रेरकता बिलकुल सम्भव नहीं है। उसका वास्तविक कारण तुम्हें बताता हूँ,
सुनो। जो सत्त्वादिक गुण हैं वे ही इन्द्रियों को प्रेरणा देते हैं। जीव, गुण और इन्द्रिय इन दोनों का साक्षी है। उसे
कर्म की प्रेरकता नहीं होती। स्वयं प्रत्यक्ष स्पर्श न कर भी लौह चुम्बक अचेतन लोहे को गतिशील बनाता है उसी
प्रकार यहाँ जीव की स्थिति है अथवा सूर्य का उदय होते ही लोग अपने अच्छे-बुरे काम करने लगते हैं लेकिन
इसका प्रेरणास्रोत सूर्य नहीं होता। वह केवल कर्म के लिये साक्षी रहता है। उसी प्रकार जीव में वास्तव में कर्तृत्व
नहीं होता। ऊपर से जो भी कुछ दिखायी देता है वह केवल भ्रम है। पीलिया से जिसकी आँख प्रभावित रहती है
उसे चन्द्रमा भी पीला दिखायी देता है, उसी प्रकार जो मन्दबुद्धि हैं उन्हें ही आत्मा कर्त्ता होने का आभास होता
है। उनकी समझ में यह नहीं आता कि वह बिलकुल निश्चल है। बादल तीव्र गति से चलते हैं तो बच्चे कहते हैं
कि 'चन्द्रमा दौड़' रहा है। उसी प्रकार जो मंद बुद्धि होते हैं वे ही आत्मा को कर्त्ता मानते हैं। उपाधि के कारण
उन्हें यह भ्रम होता है। 'देह मैं हूँ' और 'कर्म मेरा है' यह बात आत्मा को स्वप्न में भी मालूम नहीं होती। यह
वैसा ही सत्य मानने की तरह है कि राजा मृगजल में डूब गया। सारांश आत्मा में किसी भी प्रकार की कर्तव्यता
नहीं होती यही सत्य है। अब यह भी असत्य है कि वह फल का भोक्ता है। स्वप्न में एक हजार गायें भी
दिखायी दें तो जागृत होने पर उनका दूध प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार उपाधि के कारण आत्मा भी मिथ्या भोक्ता
है। गढ़े में प्रतिबिंबित सूर्य यदि उसके कीचड़ का सेवन करे तभी समझना चाहिये कि आत्मा भी देहरूप भोक्ता
है। प्रतिबिंबित होने वाले चन्द्रमा को यदि मृगजल की मछलियाँ निगलने लगें तो यह माना जा सकता है कि
आत्मा भी देह के कारण भोग भोगता है। सारांश, आत्मा को जो भोक्ता कहते हैं वह उपाधि के कारण है। लेकिन
उपाधि तो मिथ्या है, फिर आत्मा भोक्ता कैसे होगा? इससे सिद्ध होता है कि आत्मा भोक्ता भी नहीं है और कर्ता
भी नहीं है। अब जीव की अनेकता की जो बात कही जाती है वह भी मिथ्या है इसे अब सिद्ध करते हैं।
यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः।
नानात्वमात्मनो यावत्पारतन्त्र्यं तदैव हि॥३२॥
जब तक जीव में सत्त्व रज तम का कोलाहल मचा रहता है तब तक जीव में अनेकता का भ्रम सच ही
मालूम होता है, अहंकार के कारण जब तब जीव को 'मैं' का आभास होता है, तब तक जीव अनेकता को सत्य
मानता है। लेकिन हे उद्धव, वह वास्तव में मिथ्या है। जिस प्रकार दर्पण हमें अपना ही चेहरा दिखाता है और दो
चेहरों का आभास कराता है, उसी प्रकार माया अविद्या के सहयोग से द्वैत का दर्शन कराती है। दर्पण में जो हमें
द्वैतप्रभाव दिखाई देता है वह आभास मिथ्या ही रहता है। वही आभास सामने रहने पर त्रिगुणों के विकार एक
होते हुए भी अनेक दिखायी देते हैं और वे गुणों के क्षोभ से सत्य मालूम होते हैं। हमें अपना एक ही चेहरा
चमचमाती तलवार में, दर्पण में तथा जल में क्रमशः लम्बोतरा, निश्चल तथा चंचल उस उपाधि के कारण मालूम
होता है। सारांश जिस प्रकार तीन प्रकार के कार्य विशेष के कारण हमें अपना चेहरा तीन प्रकार का दिखायी देता
है, उसी प्रकार गुणक्षोभ के कारण विविधता का होने वाला आभास झूठा है। वस्त्र में सूत ही बुना रहता है और
उस पर सूत की आड़ी-तिरछी पंक्तियाँ भी दिखायी देती हैं उसी प्रकार इस चराचर सृष्टि में अनेक आकारों में