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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 869 में से

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पृष्ठ 280

२६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसी विनती करता हूँ कि गुण और आत्मा कभी एक साथ नहीं रह सकते। जिस प्रकार मृगजल से भरे तालाब में
चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ेगा उसी प्रकार आत्मा कभी गुणों से बँध नहीं सकता क्योंकि गुणों का स्पर्श भी न
करना उसका स्वभाव धर्म है। गुण है अज्ञान की रात्रि और आत्मा स्वयंप्रकाश सूर्य है। उसके सामने वे आयें भी
तो कैसे ? और उसे बाँधें भी तो कैसे ? अन्धकार यदि सूर्य को निगल सकेगा, कौआ यदि कैलाश पर्वत पर
पहुँचेगा, बगुला यदि मारुति को जर्जर कर पायेगा या मच्छर हाथी को खायेगा मक्खी के पंखों से यदि आकाश
उड़ जायेगा, मेरु पर्वत यदि जलकुण्ड में डूब जायेगा या मृगजल में जहाज डूबेगा तभी आत्मा गुणों के बन्धन में
बद्ध होगा। जिस प्रकार आकाश जाल में नहीं फँसता उसी प्रकार आत्मा भी गुणसमुदाय में नहीं फँसता। फिर
सुख-दुःख का अनुभव गुणों के कोलाहल में वह कैसे भोगेगा ? इस प्रकार विचार करें तो आत्मा किसी बन्धन में
नहीं पड़ता फिर मुक्ति की बात क्यों की जाय ? अतः हे श्रीकृष्णनाथ बद्ध-मुक्त अवस्था किसे प्राप्त होती है
बतायें। सारांश, यहाँ बन्धन होने का क्या कारण है ? और मुक्त नर का क्या लक्षण है ? तात्पर्य बद्ध और मुक्त का
सविस्तार लक्षण मुझे बतायें।
कथं वर्तेत विहरेत् कैर्वा ज्ञायेत लक्षणैः।
किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा ॥ ३६॥
हे श्रीपति ! अब मुझे बद्ध और मुक्त की स्थिति बतायें। वे दोनों किन लक्षणों से और कैसे पहचाने जायेंगे ?
उसी प्रकार विदेह स्थिति प्राप्त होने के बाद वे देह में किस प्रकार विचरण करते हैं ? मुक्तता प्राप्त करने के बाद
वे देह से भोग कैसे भोगते हैं ? उनके त्याग की छाप कैसी रहती है यह भी बतायें ? हे श्रीकृष्ण ! इसे भी बतायें
कि उनकी निद्रा का क्या लक्षण है ? उनका आसन कैसा रहता है ? पूर्ण परब्रह्म जानने के बाद उनका विचरण
किस प्रकार का होता है ? ऐसे जो मुक्तों के लक्षण होंगे और बद्धों के उनसे अलग दीखने वाले लक्षण क्या हैं वह
भी कृपा करके मुझे बतायें।
एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे भ्रमः ॥ ३७॥
हे सर्वश्रेष्ठ वैकुंठाधिपति गोविन्द ! इन प्रश्नों के उत्तरों की मुझे बड़ी उत्कंठा लगी हुई है, आप उनके
समुचित उत्तर देने में समर्थ एवं श्रेष्ठ हैं। यह गुणों का सम्बन्ध अनादि काल से चलता चला आ रहा है इसलिये
आत्मा 'नित्यबद्ध' हो गया है। इसलिये 'नित्यमुक्त' यह शब्द बिलकुल असंगत लगता है। आत्मा को यदि
नित्यमुक्तता प्राप्त हो तो 'बंधन' शब्द का उच्चार ही नहीं करना चाहिये। एक ही को 'बद्ध' और 'मुक्त' कहें तो
हे श्रीकृष्ण ? मुझे इसमें भ्रम लगता है। हे श्रीकृष्ण, आत्मा तो सचमुच एक है। उस एक की ही बन्धन और मुक्ति
ये दो अवस्थायें कैसी होंगी ? जो तृप्त हुआ है वही भूखा, जो जागृत है वही सोया हुआ, जो जीवित है वही मृत
इस बात को कैसे सच माना जाय ? जो काला है वही सफेद, जो आँख वाला है वही अन्धा, जो आधा है उसे
पूरा कैसे कहा जाय ? कैरैले की बेल में केला कैसे उत्पन्न होगा ? नमकीन नमक बिना, सूखा पानी, शीतल और
भीषण अग्नि, गूँगा हो उसे वाचाल कैसे कहा जाय ? साड़ी ही नग्न होने के कारण लज्जा करे, अन्न ही भूख के
कारण व्याकुल हो, मुक्त को ही मुक्ति का अकाल, कर्पूर को ही सुगन्ध नहीं है यह कैसे कहा जाय ? उसी प्रकार
संत को ही असंत, अद्वैत को ही द्वैत, हित ही अनहित है ऐसा अब हमें लगने लगा है। आत्मा नित्यमुक्त हैं तथा
वह शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है, यह आपने ही बोध कराया था और वही गुणों की संगति से बद्ध होता है ऐसा