श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
और वह भी पेट भर नहीं मिलता क्योंकि उसे रात-दिन पतन का भय रहता है। देवतागण स्वर्ग का भाग भोगते हैं
लेकिन वे भी दुर्भाग्य की बात करते हैं। लेकिन उसी स्वर्ग के भोग की प्राप्ति के लिये याज्ञिक लोग कितने बेचैन
रहते हैं। इस प्रकार एक बार स्वर्ग की प्राप्ति हो जाने के बाद कैसे-कैसे भोग भोगने पड़ते हैं उसका वर्णन करता
हूँ। उद्धव! ध्यान देकर सुनो। अरे स्वर्ग में भी सबको एक जैसे सुख भोगने को नहीं मिलते। जिसका जैसा पुण्य
रहता है, उसी के अनुसार उसे भोग प्राप्त होते रहते हैं।
स्वपुण्योपचिते शुभ्रे विमान उपगीयते।
गन्धर्वैर्विहरन् मध्ये देवीनां हृद्यवेषधृक्॥ २४ ॥
अपने पुण्य का मोल देकर मिले हुए चन्द्रप्रभा की तरह शुभ्र विमान में बैठ कर वे दिव्य भोग का आनन्द
लेने लगते हैं। वहाँ दिव्य देह प्राप्त होता है तो वहाँ वे पोशाक भी मनोहारी करते हैं। गन्धर्व मधुर गायन करते
रहते हैं और ऐसे आनन्दमय वातावरण में स्त्रियाँ क्रीड़ाएँ करती हैं। स्वर्ग की उन अप्सराओं को देखकर मन
भुलावे में आ जाता है और फिर उन्हीं के छंद में वे अनेक स्थानों पर क्रीड़ाएँ करने लगते हैं।
स्त्रीभिः कामगयानेन किङ्किणीजालमालिना।
क्रीडन् न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृतः॥ २५॥
उन स्त्रियों के साथ वह जहाँ चाहे वहाँ विचरण करता रहता है। वह विमान कितना और कैसे सुशोभित
रहता है यह भी सुनो। उसमें अनेक छोटी-बड़ी घण्टियाँ लगी रहती हैं तथा उसमें रत्नजड़ित मेखला लपेटी रहती
है। पूरा विमान ही घुँघरुओं से वेष्टित रहता है और उसकी गति भी बड़ी मजेदार रहती है। उस विमान को वह
गन्धर्वों के वन में या नंदनवन में अपनी मनचाही जगह पर ले जाता है और वहाँ स्वर्गांगनों का उपभोग लेने में
आसक्त होकर पड़ा रहता है। उस वन में पुष्पों से लदी क्यारियाँ रहती हैं और उनका पराग चारों ओर बिखरा
रहता है। कोकिलाओं के सुमधुर स्वर तथा भ्रमरों के संगीत से वह स्थान भरा रहता है। मंद सुगन्ध तथा शीतल
समीर मलय पर्वत से बहता रहता है और स्वर्गांगनाओं के हँसी कल्लोल से कामुक के विलास पर यौवन छा
जाता है। अग्नि और कर्पूर का मिलन होते ही जिस प्रकार अग्नि की ज्वाला भड़क उठती है, उसी प्रकार उस
कामुक का पुण्य भोग भोगते-भोगते एकाएक समाप्त हो जाता है। लेकिन वह इतना अधिक कामसक्त हुआ रहता
है कि नहीं सोचता कि इसमें मेरा पतन होकर सारे भोग समाप्त हो जायेंगे। दीपक पर फड़फड़ाने वाले पतंगे को
इस बात का जरा भी स्मरण नहीं रहता कि इसमें मेरी मृत्यु निहित है। उसी प्रकार उसका मन भोग में इतना
अधिक लिप्त रहता है कि उसे अपने पतन का स्मरण नहीं होता।
तावत् प्रमोदेत स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।
क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन् कालचालितः॥ २६॥
जब तक पुण्य की सम्पत्ति रहती है तब तक वे स्वर्ग का भोग भोगते हैं और पुण्य की वह शक्ति क्षीण
होते ही उनका पतन हो जाता है। जब तक गाँठ में धन है तब तक वेश्या सौजन्य दिखाती है लेकिन धन समाप्त
होते ही वह उसका मुँह भी नहीं देखती। उसी प्रकार स्वर्ग की स्थिति होती है। अपने पुण्य से भोग भोगते हैं
किन्तु पुण्य का क्षय हो जाने पर उनका भी क्षय हो जाता है। इच्छा न होते हुए भी पतन हो जाता है। सुखी होने
के लिये याज्ञिक अत्यन्त परिश्रम कर स्वर्ग प्राप्त करते हैं। वे अन्त में अत्यन्त सुखी होकर सिर नीचा कर पतन
की ओर उन्मुख होते हैं। स्वर्ग के सारे सुखों का अस्त होकर भाग्य में गर्भवास आ जाता है। ऐसे उन कामियों