श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २५९
सारांश इस प्रवृत्ति में सकाम पुरुष को सुख कहाँ प्राप्त होता है? तुम विचार करोगे कि दिक्पाल सदा सुख में
रहते होंगे क्योंकि उन्हें जन्म-मरण नहीं है। बस उनकी ही तरह हम भी अमरत्व प्राप्त कर लें तो काम हो जाय
क्योंकि दिक्पाल नित्य अर्थात् शाश्वत होते हैं, लोकपाल भी शाश्वत ही हैं अर्थात् वहाँ का सुख भी शाश्वत ही
होगा। लेकिन जो ऐसी कल्पना करते हैं, वे मूर्ख हैं।
लोकानां लोकपालानां मद्भयं कल्पजीविनाम्।
ब्रह्मणोऽपि भयं मत्तो द्विपरार्धपरायुषः॥३०॥
लोकपालों में अमरेन्द्र अर्थात् इन्द्र ही श्रेष्ठ है क्योंकि वह मरुद्गणों का राजा है, उसे सूर्य, चन्द्रमा, वरुण,
कुबेर, यम आदि सभी सम्मान प्रदान करते हैं उसके लिये अमरावती में सिंहासन है, ऐरावत पर आरूढ़ होने का
सम्मान प्राप्त है, जिसके सामने उच्चैःश्रवा नाम का अश्व स्वयं ही आकर खड़ा है, उर्वशी जिसकी भोगपत्नी है,
रंभा प्रमुख विलासिनी है, तिलोत्तमा नर्तन करती है और पैर के पास चिंतामणि बिखरे रहते हैं, जहाँ अष्टसिद्धि के
भण्डार भरे हुए हैं, जहाँ के महल रत्नों से अलंकृत हैं, जहाँ मोतियों के झूले सुवर्ण की श्रृंखलाओं से बँधे झूल
रहे हैं, जहाँ बैदूर्य मणियों के विशाल वृक्ष हैं, कामधेनुओं के बाड़े हैं और जहाँ कल्पवृक्षों के मण्डप चारों ओर
अपनी शोभा बिखेर रहे हैं, जिसके आगे लोकपाल हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं, देवताओं की सेना ही जिसकी
चतुरंगिणी सेना है और जो स्वर्ग के राज्य का उपभोग करता है उसे भी ब्रह्मदेव का दिन पूरा होने पर काल की
शक्ति ग्रस लेती है। ऐसे एक या दो नहीं बल्कि चौदह इन्द्रों का ब्रह्मदेव का एक दिन पूरा होने पर क्षय होता है।
कहते हैं ब्रह्मदेव की आयु सबसे अधिक लम्बी है। उसे दो परार्ध की आयु प्राप्त है। लेकिन जब तक मेरे काल
की उस पर दृष्टि नहीं पड़ी तभी तक उसकी आयु की श्रेष्ठता है। जिसकी अग्रपूजा सम्मान की योग्यता है जो
लोकों के लोकपालों का भी कर्त्ता है, उस ब्रह्मदेव को भी मेरे काल की सत्ता ग्रस लेती है। मैं कालात्मा
दण्डधारी, शास्त्र, नियंता, ईश्वर, अंतर्यामी सर्वेश्वर हूँ तथा अत्यन्त दुर्धर और सर्वव्यापी हूँ। मेरा काल क्षोभ
अत्यन्त भीषण है उसे कौन रोक सकता है? धर्म, अर्थ अथवा काम से उसका निवारण सम्भव नहीं है। उस
प्रलयंकारी महाकाल को भी मेरी कालसत्ता ग्रस लेती है। सभी मेरे महाभय से भयाक्रान्त हैं। फिर लोकपालों को
सुख कैसे प्राप्त होगा? मेरे ही भय से सूर्य लव-निमेष-पल-पल आगे बढ़ता रहता है। मेरे ही भय से प्राण
खेलता है, मेरे ही भय से वायु प्रवाहित होता है, मेरे ही भय से अग्नि पेट में जठराग्नि के रूप में रहकर पेट में
जो भी कुछ है उसे हजम करा देता है। मेरे ही भय से इन्द्र समय-समय पर पर्जन्य धाराओं की वृष्टि करता है।
मृत्यु भी समय आने पर प्रलय कर देता है क्योंकि वह भी मुझसे बहुत डरता है। मेरे ही भय से समय अपनी
सीमा का अतिक्रमण नहीं करता मेरे ही भय की आशंका से तीनों लोक काँपते रहते हैं। तीनों लोकों का शास्त्र
और नियंता ईश्वर मैं हूँ। इतना कह कर भगवान ने जड़बुद्धि कर्मवादियों की कर्मठता तथा अनीश्वरवादित्व को
पंगु बना दिया। प्रवृत्ति में कितना अनर्थ है इसका उल्लेख पहले ही कर दिया है। उसी प्रकार वैराग्य स्थापित कर
निवृत्ति ही सबमें श्रेष्ठ है इसे भी निरूपित किया। अपने ऐश्वर्य का आविष्कार कर अपना ईश्वरत्व सिद्ध कर
दिया। अब मीमांसकों के मत का खण्डन करने के लिये उसी निरूपण का विस्तार कर रहे हैं। मीमांसकों का मत
है कि जीवों में अनेकता है, जीव ही कर्त्ता और भोक्ता है आदि। इसी का अब पूरी तरह खण्डन करते हैं।
गुणाः सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान्।
जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ॥ ३१॥