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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 869 में से

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पृष्ठ 271

दसवाँ अध्याय २५५
यज्ञकर्ता विघ्नों के समुद्र में ही डूब जाता है। स्वर्ग तो एक है और यज्ञ करने वाले अनेक। उस यज्ञ में देवता
विघ्न उत्पन्न करते हैं। पहले तो इन्द्र ही पूरे स्वर्ग का भोग करने को मिले इसलिये विघ्न उत्पन्न करता है। वेश्या
एक रहती है और रात्रि भी एक लेकिन भोग की इच्छा करने वाले अनेक रहते हैं। इसलिये वे परस्पर झगड़ा
करने लगते हैं। वही गति याज्ञिकों की होती है। जैसे कुतिया जब गरम होती है तो उसका भोग करने के लिये
अनेक कुत्ते तैयार हो जाते हैं और एक-दूसरे को देखकर गुर्राते हैं। उसी प्रकार स्वर्ग की अभिलाषा करने वाले
सकामों की गति होती है। वह कुतिया जिसे भोगने को मिलती है वह भोग करते समय ही गिर पड़ता है और
संसार में उसकी छीः थूः होती है। जिसे भोगने जाता है वह इन्द्रिय फँस कर विमुख हो जाती है। मैथुन द्वार में
फँसे रहने के कारण आने जाने वाले छीः थूः करते रहते हैं। उसी प्रकार यज्ञ करने वालों की स्वर्ग प्राप्ति है। उस
स्वर्ग के भोग से तप का क्षय होता है। स्वर्ग भोग पर आसक्त रहने के कारण वे पुनः उलटे मुँह इहलोक में लौट
आते हैं। सारांश, खेतिहर की ही तरह स्वर्गप्राप्ति में भी अनेक विघ्न हैं। वे किए हुए परिश्रम व्यर्थ कर देते हैं।
फिर भोग भी कैसे प्राप्त होंगे? स्वयं को कर्मकुशल कहने वाले कुछ लोग कहते हैं कि हम कर्म करने में किसी
प्रकार की कमी नहीं रहने देंगे। हम सब कुछ त्रुटिहीन कर स्वर्ग का फल भोगेंगे। लेकिन हे उद्धव! उनसे वह
भी नहीं हो पाता। वह कैसे? तो उसका निरूपण पाँच श्लोकों में करता हूँ।
अन्तरायैरविहतो यदि धर्मः स्वनुष्ठितः।
तेनापि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु ॥ २२॥
जिसमें कोई विघ्न न आये, ऐसे निर्विघ्न कर्म होते ही नहीं हैं और दैवयोग से हो भी गये तो उससे
होनेवाली स्थानप्राप्ति नश्वर होती है। कर्म से जिस पद पर पहुँचते हैं और वहाँ पहुँचने पर उन्हें जो भी प्राप्त
होता है उसके बारे में हे उद्धव, तुम्हें बताता हूँ।
इष्ट्वैव देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः।
भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान् निजार्जितान् ॥ २३ ॥
उत्तम कर्मभूमि प्राप्त होने पर तथा श्रेष्ठवर्ण ब्राह्मणकुल में जन्म लेने पर लोग सदा कामानिक
ज्योतिष्टोमादि यज्ञ अथवा अग्निहोत्र करते हैं। वे तीनों वेद जानते हैं, सभी कर्मों में कुशल रहते हैं लेकिन इस
प्रकार ज्ञानी होते हुए भी वे मूर्ख हैं क्योंकि वे नश्वर स्वर्गप्राप्ति की इच्छा मन में रखते हैं। जिस पुण्य से मुक्ति
प्राप्त न होती हो उसे 'पुण्य' कहने में रोना आता है। यज्ञकर्ता विषयासक्ति में लिप्त रहते हैं, इसीलिये वे स्वर्ग के
भोग के पीछे भागते हैं। इन्द्रादि देवताओं के लिये यज्ञ कर, जिनके कारण मैं दूर हो जाता हूँ ऐसे भोग भोगने के
लिये वे स्वर्गलोक में जाते हैं। जिसे अनेक लोग चूस चुके हैं ऐसी पुरानी हड्डी को लेकर कुत्ता अपनी लार से
चाट कर आनन्द लेता है उसी प्रकार यज्ञकर्त्ताओं को जिस स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रहती है उसे वे अपने पुण्य से
मधुर बना लेते हैं। अथवा जिस प्रकार श्मशान में बलि के लिये जो अन्न रखा रहता है उसके लिये कुत्ते आपस में
लड़-झगड़ कर वह जूठा खाना खाते हैं। उसी प्रकार स्वर्ग के भोग भी अनेक लोगों का जूठा खाद्य ही है। अपने
संग्रह का शुद्ध पुण्य खर्च कर लोग कितनों का ही जूठा भोग मोल लेते हैं और यज्ञकर्ता स्वयं को बहुत पवित्र
समझते हैं। मोल लेकर कितनों का जूठा खाद्य चाटते रहते हैं। वैसे भी कौवे का मांस, वह भी कुत्ते के मुख से
बचा हुआ, मोल लेने पर अधिक मिलेगा भी नहीं। स्वर्ग भोग में याज्ञिकों की स्थिति भी कुछ वैसी ही रहती है।
स्वर्ग अनेक लोगों का उच्छिष्ट है। ऐसा होते हुए भी उसके लिये अत्यन्त परिश्रम का मूल्य चुकाना पड़ता है