श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २६३
स्वभाव हूँ। फिर भी मुझे नाना प्रकार के सम्बोधन दिये जाते हैं। हे उद्धव ! जिसमें जैसा भाव होता है उसी के
अनुसार मैं उसका देवता बनता हूँ। जिसमें नास्तिक भाव रहता है, उसके लिये मैं कहीं नहीं रहता और जिसके
मन में आस्तिक्य बुद्धि होती है उसके लिये मैं सभी जगह उपस्थित रहता हूँ। भक्तिभाव से मुझे जो जहाँ देखता
है उसके लिये मैं वहीं उपस्थित रहता हूँ। देखो, मुझे प्राप्त करने के लिये विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं है।
सर्वात्मा, सर्वव्यापी एक मैं ही हूँ ऐसा जिसका निश्चयी भाव रहता है वही एक मेरा भक्त तथा मेरे ज्ञान का
तिलक है। वह यदि 'आत्मा' है तो मैं उसकी देह हूँ, मैं ध्याता हूँ और वह मेरा ध्येय है, मैं ज्ञाता हूँ और वह मेरा
शुद्ध ज्ञेय है, इतना वह मुझे प्रिय है। हे उद्धव ! जिसे 'एकात्मभक्ति' कहा जाता है, वह यही है। ज्ञानसम्पन्न ज्ञाता
इसी भक्ति से मेरा भजन करते हैं। उनमें और मुझमें अभेद प्रेम रहता है। इसलिये तुम भी इसी ढंग से भजन
करो। परमात्मा एक, नित्य और शुद्ध है, उसे मायामय संसार का बन्धन नहीं है और देहसम्बन्ध भी मिथ्या है इसे
ध्यान में रखो। यही मेरा सच्चा 'आत्मबोध' है। मिथ्या सम्बन्ध में ही जीव फँसता है और 'आत्मज्ञान' से उसकी
मुक्ति होती है। यह मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ। वही बात अन्य मतों का खण्डन कर दृढ़ की। चौहदवें
श्लोक से चौंतीसवें श्लोक तक मीमांसकों के मतों का विस्तार से खण्डन किया। इस प्रकार विरुद्ध मत का
खण्डन कर अद्वैत मत की दृढ़ स्थापना की। चराचर में श्रेष्ठ यही सच्चा आत्मज्ञान है। यह शुद्ध और पवित्र अद्वैत
ज्ञान श्रवण कर उद्धव को बहुत प्रसन्नता हुई। उसके अंतःकरण में हर्ष की तरंगें एकत्र होने लगीं। उसने श्रीकृष्ण
की ओर देखा। वह प्रेम से विह्वल हो गया। वह चिंतन भूल गया, उसकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वह अपने
ही अस्तित्व को भूल गया। उद्धव क्षण भर के लिये अपना होश खो बैठा। इतने में अपने पर नियन्त्रण पाकर वह
श्रीकृष्ण के सामने आ गया। जो अद्वैत भजन करते हैं वही कृष्ण के प्यारे होते हैं इसलिये ऐसा अद्वैत भजन मुझे
कैसे प्राप्त होगा इस सम्बन्ध में वह श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
गुणेषु वर्तमानोऽपि देहेष्वनपावृतः ।
गुणैर्न बद्ध्यते देही बद्ध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥
उद्धव ने कहा, हे कृष्णनाथ ! आत्मा जब शरीर में रहता है तो क्या वह वास्तव में बन्धन में रहता है या
नहीं रहता ? गुण रहते मुक्ति मिलती है या गुण जाने पर मुक्ति मिलती है? यही बात मुझे निश्चयपूर्वक और मुक्त
मन से बताओ। गुण रहते मुक्ति मिलती है यह बात बिलकुल असंगत है क्योंकि ज्वर के रहते कभी स्वास्थ्य
ठीक रहना सम्भव नहीं है या कीड़ा लगने पर पेड़ नहीं बढ़ सकता। शरीर में पत्थर बाँधकर समुद्र में कौन तैर
पायेगा? उसी प्रकार जब तक शरीर में तीन गुण हैं तब तक मुक्ति कैसे मिलेगी? रज तम आदि जो गुण हैं उनका
कार्यक्षेत्र देह है इसलिये वह बिना हिचक गुणों जैसे ही कर्म करता है। इसलिये उन कर्मों का जो फल है, जो
सुख-दुःख है उसे भोगना आवश्यक हो जाता है और ज्ञानी लोग तो कहते हैं कि गुणों को मुक्ति नहीं है। हे
कृष्ण ! यदि यह कहें कि गुण जाने पर मुक्ति मिलेगी तो वह भी सम्भव नहीं है। हे करुणानिधि ! इस सम्बन्ध में
मैं आपसे विनती करता हूँ उसे सुनो। गुणों का कार्य है देह के इन्द्रिय, गुण जाने पर देह का रहना वैसे ही है जैसे
भूमि विहीन वृक्ष। कारण समाप्त हो जाय और कार्य शेष रह जाय, क्या यह सम्भव है ? गुण जाने पर देह जायेगा
ही फिर मुक्त नर कैसे आचरण करेगा ? सारांश, गुण रहें या न रहें तो भी मुक्ति कभी प्राप्त नहीं होगी ऐसा मेरा
विचार है। इसलिये हे कृष्णनाथ ! इसी के सम्बन्ध में मैं तुम्हारा विचार पूछता हूँ। हे जगन्नाथ ! मैं पुनः आपसे